जिन्नजादे की आशिकी Ch. 1

जिन्नजादे की आशिकी - Chapter 1

Posted by Shayna choudhary • Jan 15, 2025 02:19 PM

शहर के बीचोबीच बनी एक बहुत ही खूबसूरत हवेली के अंदर से किसी लड़की के सिसकने की आवाज़ें आ रही थीं। उस महल के एक नौकर वाले कमरे में, एक मामूली सी चटाई पर, एक लड़की ओंधे मुँह लेटी हुई थी। उसकी कमर पर, उसकी गर्दन पर, उसके हाथों पर बेल्ट से मारे जाने के निशान मौजूद थे। साथ ही साथ, कहीं-कहीं से उसके हाथों पर जले हुए के निशान भी थे। कुछ निशान ताज़ा थे, तो कुछ निशान पुराने। आज फिर वह लड़की कितनी देर तक इस तरह से रोती रही। तभी एक 75 साल की बूढ़ी अम्मा उस लड़की के पास आई और उसका सर सहलाने लगी।

जैसे ही उस लड़की ने अपने सर पर किसी का शफ़कत भरा हाथ पाया, उसने अपनी आँखें उठाईं। उसने अपने सामने अपनी दादी माँ को देखा। अपनी दादी को देखकर वह खुद को रोक नहीं पाई और उनके गले से लगकर फूटकर रो पड़ी। रोते-रोते कहने लगी, "आखिर कब तक, कब तक दादी माँ? कब तक मुझे यह सब कुछ सहना पड़ेगा? और कब मेरी ज़िन्दगी थोड़ी बहुत आसान होगी? कब जाएँगे मेरी ज़िन्दगी से ये सारे दुःख-ग़म?" वह लड़की बहुत ही बुरी तरह से रो रही थी।

उस लड़की के रोने की आवाज़ सुनकर उसकी दादी माँ भी रोने लगीं। ऐसा लग रहा था कमरे की एक-एक दीवार भी उस लड़की का रोना सुनकर रो रही हो। उसकी दादी माँ भी रोते-रोते बोलीं, "मेरे बच्चे, बस परेशान मत हो। मुझे पूरी उम्मीद है कि बहुत जल्द तेरी सारी परेशानियाँ दूर होंगी। कहने को तो तुम इस हवेली की मालकिन हो, लेकिन तुम्हारी हालत तो किसी नौकर से भी ज़्यादा बदतर है।"

"मेरी बच्ची, सब्र कर। ऊपर वाले के घर में देर है, अँधेरा नहीं। मुझे पूरी उम्मीद है, एक न एक दिन मेरी बच्ची के लिए भी रोशनी ज़रूर होगी।" हमेशा की तरह, आयशा की दादी माँ ने उसके सर पर हाथ फेरते हुए उसे समझाना शुरू कर दिया। जब से आयशा की अम्मा, मुमताज़ बेगम का इंतकाल हुआ था, तब उसके पिता, अमजद अली ने दूसरी शादी कर ली थी। आयशा उस वक़्त केवल 4 साल की थी। सौतेली माँ ने आते ही, पहले तो शुरू-शुरू में आयशा को खूब लाड-प्यार जताया।

लेकिन जैसे ही उसके यहाँ पहले बेटे और फिर एक बेटी ने जन्म लिया, उसके बाद से तो आयशा की ज़िन्दगी उसके घर में नर्क से भी ज़्यादा बदतर हो गई। उसकी सौतेली माँ ने उसके पिता के सामने तो खूब लाड-प्यार जताया, लेकिन अकेले में वह उसे बहुत ही ज़्यादा टॉर्चर करने लगी। उन्होंने आयशा की ज़िन्दगी पूरी तरह से बर्बाद कर दी थी। उसके पिता, अमजद अली तो अपनी दूसरी बीवी के हुस्न में ऐसे गिरफ्तार हुए थे कि उसके अलावा उन्हें कोई और दिखाई ही नहीं देता था।

दूसरी बीवी से जो औलादें हुईं, पहले बेटा हुआ और बेटी हुई, उसके बाद से वह आयशा से ज़्यादा उन दोनों की ओर तवज्जो देने लगे। आयशा के दादाजी यह सारी चीज़ अपनी आँखों से देखा करते थे, लेकिन अपने बेटे के सामने खामोश रहा करते थे। लेकिन जब एक दिन आयशा के दादा ने उसके सौतेली माँ को आयशा पर हाथ उठाते हुए देख लिया, तो उनके सब्र का बाँध टूट गया। और उन्होंने उस वक़्त एक कड़ा फैसला ले लिया। पूरी हवेली की सारी जायदाद उन्होंने आयशा के नाम कर दी।

जैसे ही आयशा 21 साल की हो जाएगी, तब उसकी शादी होते ही सारी की सारी जायदाद आयशा और उसके पति की हो जाएगी। यह उन्होंने अपनी वसीयत में साफ़-साफ़ मेंशन कर दिया था। जिस दिन आयशा के पिता और उसकी सौतेली माँ को इस वसीयत के बारे में पता चला, उन दोनों का गुस्सा सीधा उस मासूम सी बच्ची आयशा पर फूटा। इसीलिए उस दिन उसकी सौतेली माँ ने मन ही मन में कसम खा ली थी कि वह आयशा की शादी कभी भी नहीं होने देगी और हमेशा उसे घर की नौकरानी बनाकर रखेगी। अपनी खूबसूरत बीवी के आगे उसके पिता को कुछ भी दिखाई नहीं देता था। उनका तो यह मानना था कि जो उनकी बीवी जो भी कर रही है, बिल्कुल ठीक कर रही है।

फिर एक दिन आयशा की सौतेली माँ ने आयशा के दादा जी के खाने में ज़हर मिलाकर उनकी भी हत्या कर दी। क्योंकि उन्हें इस बात का बहुत ज़्यादा दुःख था कि उन्होंने अपनी सारी जायदाद आयशा और उसके पति के नाम कर दी थी। आयशा के दादा उसका एक बहुत बड़ा सहारा थे। उसके दादा के जाने के बाद आयशा पूरी तरह से टूट गई। अब सहारे के नाम पर उसके पास कुछ था, तो वो थी सिर्फ़ उसकी बूढ़ी दादी माँ। उसकी बूढ़ी दादी ही उसका सहारा थी, लेकिन उसकी बूढ़ी दादी उसकी सौतेली माँ के ज़ुल्मों से उसे बचा नहीं पाती थी, क्योंकि कितनी ही बार आयशा की सौतेली माँ उनके ऊपर भी हाथ उठा चुकी थी।

दोनों दादी-पोती एकदम नर्क की ज़िन्दगी वहाँ गुज़ार रही थीं। फिर भी, आयशा की दादी का आयशा को बहुत ही ज़्यादा सहारा था। वह कम से कम उनके गले लगकर रो तो लिया करती थी। अभी दादी-पोती एक-दूसरे के गले लगकर रो ही रही थीं कि तभी उसकी सौतेली माँ एक बार फिर वहाँ आकर खड़ी हो गई। और उन दोनों को इस तरह से रोता हुआ देख, वह तालियाँ बजाती हुई उनके पास जाकर खड़ी हो गई और बोलने लगी, "शुरू हो गया तुम लोगों का यह ड्रामा, न जाने तुम मनहूसों से कब जान छूटेगी हमारी?"

ऐसा कहकर उसने एक बार फिर से गंदी सी गाली देना शुरू कर दिया। आयशा और उसकी दादी खामोशी से सर झुकाकर उसकी एक-एक बात को सुन रहे थे। तभी आयशा की सौतेली माँ आगे बढ़ी और आयशा के बालों को कसकर पकड़कर बोली, "अब यहाँ बैठे-बैठे टिश्यू बहाती रहोगी क्या? जाकर शाम का खाना नहीं पकाना है क्या? चल, खड़ी हो और शाम का खाना पका। चल, जल्दी कर। और हाँ, मेरे बेटे के लिए आज सलाण में फ़िश फ़्राई बनाना, मेरे बेटे का मन है खाने का। समझी? और मेरी बेटी के लिए खाना उसकी पसंद का, उससे पूछकर ही बनाना, ठीक है? और हाँ, खबरदार जो मुझे बिना पूछे तुमने कुछ भी खाया, तो तुम्हारे लिए ऑलरेडी दोपहर का बासी खाना पड़ा हुआ है। तुम और तुम्हारी यह बूढ़ी दादी चुपचाप कोने में बैठकर उसे खा लेना, समझी? तुम दोनों। अगर तुम लोगों ने ताज़ा खाना खाने की कोशिश की, तो मैं तुम लोगों का वह हाल करूँगी कि तुम लोग याद रखोगे।" ऐसा कहकर एक बार फिर गंदी सी गाली देकर वह आयशा और उसकी दादी को वहाँ छोड़कर चली गई।

और जाते हुए यह कहना नहीं भूली कि उसे दोबारा से वहाँ न आना पड़े। अपनी सौतेली माँ की बात सुनकर आयशा एक बार फिर रोने लगी और अपनी दादी से कहने लगी, "दादी, मुझे माफ़ कर दो। मैं आपके लिए कुछ भी नहीं कर पा रही हूँ। काश मैं भी आपको अच्छा-अच्छा खाना पकाकर खिला पाती।"

"लेकिन हम लोगों के नसीब में तो बस बचा-कुचा बासी खाना ही रहता है हमेशा।" आयशा की बातों में उदासी साफ़ नज़र आ रही थी। तभी आयशा की दादी ने उससे कहा, "मेरी बच्ची, तू परेशान बिल्कुल मत हो। एक बार तेरी शादी हो जाए, फिर यह सब कुछ, माल-दौलत, सब कुछ तेरा हो जाएगा। क्योंकि तेरे दादा ने सारी ज़मीन और जायदाद तेरे नाम कर रखी है। यह बात तेरी सौतेली माँ अच्छी तरह से जानती है। इसीलिए तेरी यह सौतेली माँ तुझ पर इतनी ज़्यादा कहर नाजिल करती है, क्योंकि यह जलती है तुझसे।"

आयशा अपनी दादी की बात सुनकर तड़पकर रह गई और बोली, "मुझे कोई माल-दौलत नहीं चाहिए दादी। मुझे सिर्फ़ और सिर्फ़ सुकून के दो पल चाहिए। ताकि मैं आपके साथ सुकून की थोड़ी सी ज़िन्दगी गुज़ार सकूँ।"

आयशा की इतनी दर्द भरी बात सुनकर उसकी दादी तड़पकर रह गई और आयशा को एक बार फिर से उन्होंने सीने से लगा लिया और उसके सर को सहलाने लगीं। अभी वह कुछ और कहना चाहती थीं कि तभी एक बार फिर से उसकी सौतेली माँ की कड़क आवाज़ वहाँ सुनाई दी, "अरे, कहाँ मर गईं कलमुही? उसी कमरे में घुसी रहोगी? बाहर भी आओगी नहीं? मेरे बेटे को भूख लगी है। जा, जाकर खाना बना, मनहूस कहीं की।"

अपनी सौतेली माँ की बात सुनकर आयशा जल्दी से अपनी दादी से दूर हटी और बोली, "मुझे जाना होगा दादी। अगर मुझे जाने में देर हो गई, तो वो फिर आ जाएगी और बहुत मारेगी मुझे।"

तभी आयशा की दादी तड़पकर बोलीं, "लेकिन मेरे बच्चे, तेरे हाथों में तो बहुत ही ज़्यादा दर्द है। क्योंकि इन लोगों ने तुझे जानवरों की तरह मारा था। सुबह जब तू करीम को चाय देने के लिए गई थी, चाय का कप तेरे हाथ से टूट गया था। तभी लोगों ने तुझे बहुत बुरी तरह से मारा था मेरे बच्चे, और अभी ये ज़ख़्म नहीं भरे हैं। फिर तू सारा खाना कैसे बनाएगी? और खाना बनाते हुए नमक-मिर्च-मसाले सब तेरे हाथों में लगेंगे, तो तुझे और तकलीफ़ होगी।"

अपनी दादी की बात सुनकर आयशा हल्का सा मुस्कुराते हुए बोली, "रहने दो दादी, आप परेशान ना हों। मुझे कोई दर्द नहीं होता है। बचपन से लेकर आज तक मार खाते-खाते अब मुझे मार खाने की आदत हो गई है। और वैसे भी, अब मैं 19 साल की हो गई हूँ। पिछले 15 सालों से मैं इन लोगों की मार खाते-खाते इतनी तो मज़बूत हो ही गई हूँ कि अब इन ज़ख़्मों से मुझे कोई ख़ास फ़र्क नहीं पड़ता है।"

ऐसा कहते हुए आयशा किचन में चली गई। इस बड़ी सी हवेली में, उसकी सौतेली माँ ने जहाँ पहले 10 से 12 नौकर काम किया करते थे, उन सभी को काम पर से निकाल दिया था। सारा काम आयशा के जिम्मे कर दिया था। शाम का, सुबह का, दोपहर का खाना बनाने से लेकर पूरे हवेली की साफ़-सफ़ाई और इतना ही नहीं, पूरे बगीचे की देखभाल, सब कुछ आयशा के जिम्मे ही था। अगर आयशा से कोई भी काम करने में देर हो जाती थी, तो उसे जानवरों की तरह मारा जाता था। उसके पिता वहाँ होकर भी नहीं होते थे। उन्हें तो अपनी बेटी की दुःख-तकलीफ़ कभी भी दिखाई ही नहीं देती थी। उनकी बीवी उन्हें जैसा कहा करती थी, वह वैसा ही किया करते थे।

हमेशा की तरह, आयशा जल्दी ही किचन में चली गई और अपना दुपट्टा अपने सर से बाँधकर जल्दी से फ़िश धोनी शुरू कर दी। और उसके बाद आयशा को याद आया कि उसकी सौतेली बहन ने उससे कॉफ़ी मँगवाई है, तो वह फ़िश धोने के बाद अपनी सौतेली बहन के लिए कॉफ़ी बनाने लगी।

और आयशा का सौतेला भाई तो उसे कुछ भी नहीं समझता था। उसके नज़रों में तो आयशा उसकी एक पालतू नौकरानी थी, और वह आयशा को जानबूझकर तंग करने के लिए कभी कुछ, कभी कुछ उससे बिना वजह करवाता रहता था। कहने को तो आयशा की सौतेली बहन उससे पूरे 6 साल छोटी थी, लेकिन आयशा की खूबसूरती, उसके खूबसूरत बालों और उसकी खूबसूरत आँखों को देखकर वह उससे बहुत ही ज़्यादा जलती थी और हमेशा अपनी माँ के कान उसके खिलाफ़ भरती रहती थी।

आयशा ने कॉफ़ी बनाकर तैयार कर दी। और जब वह अपनी सौतेली बहन को कॉफ़ी देने के लिए गई, तभी अचानक उसके कमरे की ओर जाते हुए उसे उसकी दादी के ज़ोर-ज़ोर से खांसने की आवाज़ सुनाई देने लगी। इसीलिए आयशा उस कॉफ़ी को हाल में रखकर ही जल्दी से अपनी दादी के कमरे की ओर भागी। जैसे ही वह अपनी दादी के कमरे में गई, उसने देखा उसकी दादी खांसते-खांसते बेहाल हो गई थीं। तभी आयशा ने अपनी दादी को प्यार से पकड़कर उठाया और उनका कमर रगड़ने लगी और जल्दी से उन्हें पानी पिलाया। पानी पीने के बाद उनकी दादी को थोड़ा सा बेहतर लगने लगा।

तब आयशा ने अपनी दादी से कहा, "दादी, अगर आप ठीक हैं, तो क्या मैं जाऊँ? वह सकीना को कॉफ़ी देनी है?"

आयशा की सौतेली बहन का नाम सकीना था। तब उसकी दादी जल्दी से घबराकर बोलीं, "हाँ, मेरी बच्ची, तू जल्दी जा। अगर तूने जाने में देर कर दी, तो कहीं ऐसा ना हो कि वह लोग फिर से जानवर बन जाएँ।"

ऐसा कहकर उसकी दादी ने उसे भेज दिया। जैसे ही आयशा कॉफ़ी उठाकर सकीना के कमरे की ओर गई, तो उसे अंदर से दोनों माँ-बेटी की आवाज़ें आने लगीं। आयशा की सौतेली माँ अपनी बेटी से कह रही थी, "तुझे मैंने कितनी बार समझाया है, अपने बालों में हमेशा अच्छे से तेल लगवाया कर। तूने बाल देखे हैं अपने? कितने कमज़ोर हो गए हैं। तूने उस कलमुही आयशा के बाल देखे हैं? कितने हसीन हैं? कितनी बार उसके बालों को कटवा चुकी हूँ, लेकिन महीने भर में ही उसके बाल फिर से बढ़ जाते हैं, और पहले से ज़्यादा लम्बे और घने हो जाते हैं।"

तब सकीना चिढ़कर बोली, "रहने दे ना मॉम, उस नौकरानी को मुझसे कंपेयर मत किया कर। मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं है।"

तभी आयशा, जो बाहर ही खड़ी थी, जब उसे लगा कि अगर उसने अंदर जाने में और देर कर दी, तो ये माँ-बेटी फिर से उसके पीछे पड़ जाएँगी, यह सोचकर उसने सकीना का दरवाज़ा बाहर से खटखटा दिया। दरवाज़ा खटखटाने की आवाज़ सुनकर सकीना ने गुस्से से कहा, "आजा, अंदर आजा।"

उसने बड़ी बदतमीज़ी से कहा, क्योंकि वह समझ चुकी थी कि ज़रूर आयशा उसके लिए कॉफ़ी लेकर आई होगी। जैसे ही आयशा उसके कमरे में गई, तो सकीना ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा। मिले-जुले कपड़ों में भले ही आयशा खड़ी हुई थी, लेकिन वह बहुत ज़्यादा खूबसूरत लग रही थी। आयशा को देखकर सकीना जल भुन उठी और उसने उसके हाथ से कॉफ़ी ली। और जैसे ही कॉफ़ी का उसने पहला घूँट लिया, तो उसे कॉफ़ी ठंडी लगी। जबकि कॉफ़ी इतनी ज़्यादा ठंडी नहीं थी, लेकिन उसे तो आयशा को देखते ही गुस्सा आ गया था, क्योंकि उसकी माँ ने अभी थोड़ी देर पहले उसके खूबसूरत बालों की तारीफ़ की थी। और अपना गुस्सा उतारने के लिए उसने वह कॉफ़ी का मग उठाकर आयशा के मुँह पर फेंक दिया। जैसे ही आयशा के ऊपर गरम-गरम कॉफ़ी गिरी, आयशा एकदम से चीख उठी। आयशा की चीख काफी ज़्यादा भयानक थी।

आयशा की चीख सुनकर उसकी दादी के साथ-साथ उसके बाबा, उसका सौतेला भाई भी वहाँ आ गए। इस तरह से सबको वहाँ आया देखकर उसकी सौतेली माँ थोड़ा सा डर गई, क्योंकि वह अच्छी तरह से जानती थी कि अगर उसके बाबा के मन में आयशा के लिए मोहब्बत जाग गई, तो वह उसके और उसके बच्चों के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं होगा। यह सोचकर उसने जल्दी से अपना दुपट्टा लिया और आयशा का चेहरा साफ़ करने लगी। तभी उसके बाबा आयशा को चिल्लाते हुए देखकर जोर से बोले, "क्या हो रहा है यहाँ पर? क्यों चीखना-चिल्लाना लगा रखा है?"

लेकिन इससे पहले कि आयशा कुछ बोल पाती, तभी उसकी दादी रोती-पिटती आयशा को देखने लगी और बोलीं, "हाय-हाय! मेरी बच्ची की क्या हालत कर दी इन दरिंदों ने!"

जैसे ही आयशा की दादी ने यह सब कहा, उसकी सौतेली माँ जल गई और तपकर रह गई। और फिर वह आयशा की दादी और आयशा पर गुस्सा करते हुए बोली, "एक तो ठंडी कॉफ़ी ले आई हो, और ऊपर से मेरी बेटी को ही उल्टी-सीधी बातें सुनवा रही हो।"

और उसके बाद आँखों में मगरमच्छ के आँसू लाते हुए उसके पिता की ओर देखते हुए बोली, "देखिए जी, इसमें सकीना की कोई गलती नहीं है। आयशा ने ही बदतमीज़ी की थी।"

हमेशा की तरह, उसके पिता ने उसकी सौतेली माँ की बात सुनकर सच मान ली और आयशा को डाँटते हुए कहने लगे, "क्या तुम एक भी काम ढंग से नहीं कर सकती हो?"

जैसे ही आयशा के पिता ने आयशा को डाँटा, आयशा के सब्र का बाँध टूट गया। और वह बिना किसी की परवाह किए वहाँ से दौड़ती हुई सीधा गार्डन में चली गई। क्योंकि एक गार्डन ही एक ऐसी जगह थी जहाँ पर वह सुकून के कुछ पल बिताया करती थी। जल्दी से आयशा गार्डन में चली गई, लेकिन उसका चेहरा और गर्दन काफी ज़्यादा जल गए थे और उसके गर्दन और चेहरा एकदम से लाल पड़ गए थे। आयशा को काफी ज़्यादा जलन हो रही थी, तो इसीलिए वह गार्डन में जो हैंडपंप लगा हुआ था, उसे खोलकर उसके ठंडे-ठंडे पानी में नीचे बैठ गई।

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