जिन्नजादे की आशिकी Ch. 3

जिन्नजादे की आशिकी - Chapter 3

Posted by Shayna choudhary • Jan 18, 2025 02:32 PM

आयशा आधी रात के बाद उठ बैठी थी क्योंकि उसे एक अजीब सा सपना आया था। वह फिर सो नहीं पाई। उसे बार-बार ऐसा लग रहा था जैसे कोई उसे कहीं ले जा रहा हो।

उठने के बाद, आयशा अपनी कमरे की छोटी सी खिड़की के पास खड़ी हो गई। वहाँ से उसका खूबसूरत बाग़ साफ़ दिखाई देता था।

आयशा हमेशा ऐसा करती थी। जब भी उसे बहुत मारा-पीटा जाता था और रात भर नींद नहीं आती थी, तो वह घंटों खिड़की के पास खड़ी होकर अपने बाग़ को निहारती थी।

बाग़ देखने से उसे बहुत सुकून मिलता था। आज भी वह बाग़ देख रही थी, लेकिन आज कुछ अलग था। आज बाग़ के पीछे के छोर पर, अजीब तरह की रोशनी जगमगा रही थी; जो बाग़ को और भी खूबसूरत बना रही थी। आयशा को समझ नहीं आ रहा था कि यह क्या हो रहा है, क्योंकि वह बचपन से इस बाग़ को देखती आई थी, लेकिन आज तक ऐसी रोशनी, इतनी जगमगाहट, उसने कभी नहीं देखी थी।

फिर आज अचानक ऐसा क्या हो गया था? आयशा ने सोचा, शायद उसकी सौतेली माँ ने कुछ अलग तरह के बल्ब लगवाए होंगे। क्योंकि उसकी सौतेली माँ को घर में अलग-अलग तरह के प्रयोग करना बहुत पसंद था। वह कोई हिस्सा बनवा देती थी, या कोई कमरा बनवा देती थी। यह काम वह करती रहती थी। यह सब करके, उसकी सौतेली माँ समझती थी कि वह इस घर की मालकिन है और सब कुछ उसके आदेश से होता है।

यह सोचकर उसने अपना सिर झटक दिया। और कुछ देर बाग़ देखने के बाद, जैसे ही वह अपनी चटाई पर लेटने गई, उसे एक बहुत ही सुन्दर खुशबू महसूस हुई।

आयशा ने दिल खोलकर उस खुशबू को सूँघना शुरू कर दिया, क्योंकि वह खुशबू उसे एक अलग ही एहसास करवा रही थी।

आयशा को इस बात का कोई अंदाज़ा नहीं था कि जब वह खिड़की के पास खड़ी थी, उसी वक्त, अदृश्य होकर कोई उसे बहुत करीब से देख रहा था और अपनी नीली गहरी आँखों में उसका खूबसूरत चेहरा बसा रहा था।

दूसरी ओर, आयशा की सौतेली माँ और सौतेली बहन, सकीना, सुकून से सो रही थीं। उन दोनों को लग रहा था कि सुबह तक आयशा की खूबसूरती बदसूरती में बदल जाएगी।

क्योंकि सकीना को हमेशा आयशा की खूबसूरती से जलन होती थी। सकीना का रंग उसकी माँ पर गया था। उसकी माँ भी हल्के साँवले रंग की थी, और सकीना भी। लेकिन आयशा अपनी माँ, मुमताज बेगम, पर गई थी; जो बहुत खूबसूरत औरत थी। आयशा भी रंग-रूप से अपनी माँ पर ही गई थी। इसीलिए, उसकी सौतेली माँ और सौतेली बहन को आयशा से बहुत चिढ़ होती थी।

लेकिन अब, आयशा पर कॉफ़ी फेंकने के बाद, उन्हें यकीन हो गया था कि आयशा बहुत बदसूरत हो गई होगी; इतनी बदसूरत कि कोई उसकी ओर देखेगा भी नहीं।

इसी सुकून और चैन के साथ वे दोनों सो गई थीं, ताकि अगली सुबह वे आयशा का बदसूरत चेहरा देख सकें।

हमेशा की तरह, अगली सुबह ठीक 5:00 बजे आयशा उठ गई। वह जानती थी कि अगर वह 5:00 बजे नहीं उठी, तो उसकी सौतेली माँ या तो उसके ऊपर ठंडा पानी फेंकेगी या फिर कुछ गर्म चीज से उसे जलाने की कोशिश करेगी।

वह हमेशा ऐसा करती थी। जब आयशा को सोकर उठने में देर हो जाती थी, तो वह या तो उसके ऊपर ठंडा पानी डाल देती थी या फिर किसी गर्म चीज से उसके हाथ-पैर जला देती थी।

लेकिन आज आयशा 5:00 बजे ही उठ गई। और उठते ही, थोड़ा सा हाथ-मुँह धोने के बाद, वह सीधा किचन में चली गई, क्योंकि उसे 6:00 बजे तक सारा नाश्ता बनाकर तैयार करना होता था।

क्योंकि उसके अब्बा हर रोज़ सुबह अपने दफ़्तर जाते थे। साथ ही, उसका सौतेला भाई और सौतेली बहन भी अपने कॉलेज जाते थे। तो हर रोज़ सुबह 7:00 बजे तक उसे सारा काम खत्म करना होता था। जब वह 5:00 बजे उठती थी, तो 7:00 बजे तक सारा काम निपटा लेती थी।

आयशा जैसे ही किचन में गई, उसने देखा कि सारा नाश्ता बना हुआ था। हॉट पॉट में गरमा-गरम पराठे थे। चूल्हे पर गरमा-गरम सब्ज़ी रखी हुई थी। साथ ही, चाय भी कपों में रखी हुई थी।

यह सब देखकर उसे बहुत हैरानी हुई। एक बार तो उसे लगा कि कहीं उसकी सौतेली माँ ने यह सब बनाया हो, लेकिन तभी उसकी सौतेली माँ की आवाज आई: "अरे, कहाँ मर गई कलमोही? मेरी चाय कहाँ है? कब नाश्ता लगाओगे? तुम्हारे अब्बा को जाने में देर हो रही है! क्या तुम्हें समय दिखाई नहीं देता? क्या हर रोज़ सुबह बताना पड़ेगा?" सुबह-सुबह उन्होंने गालियों से आयशा का स्वागत किया।

अब आयशा को यकीन हो गया था कि नाश्ता उसकी सौतेली माँ ने नहीं बनाया था। आयशा को समझ नहीं आ रहा था कि फिर किसने बनाया। लेकिन नाश्ता बना हुआ था, इसलिए जल्दी-जल्दी आयशा ने वह सारा नाश्ता टेबल पर लगा दिया। जैसे ही उसकी सौतेली माँ आई, उसने टेबल पर गरमा-गरम खाना देखकर हैरानी से मुँह खोल दिया।

उन्होंने सोचा था कि अगर उसने नाश्ता तैयार नहीं किया होगा, तो उसे गाली देगी और मारेगी भी, लेकिन सारा नाश्ता तैयार देखकर वह खामोश हो गई। क्योंकि आयशा नाश्ता लगाकर किचन में चाय लेने गई थी, इसलिए उसकी सौतेली माँ ने अपने बच्चों और अपने पति को नाश्ते के लिए बुला लिया।

हमेशा की तरह, दादी को नहीं बुलाया गया था। बचा हुआ नाश्ता आयशा और दादी मिलकर खाती थीं। जैसे ही वे सब नाश्ते के लिए टेबल पर आए, उन्होंने गरमा-गरम पराठे, दो तरह की सब्ज़ियाँ, और पराठों की खुशबू देखी। उन्होंने चाव से खाना शुरू कर दिया। आज आयशा के अब्बू उसकी तारीफ किए बिना नहीं रह पाए और बोले, "वह बेटा, आज तो क्या नाश्ता बनाया है!"

जैसे ही आयशा के अब्बू की आवाज़ उसके कानों में पहुँची, उसे ऐसा लगा जैसे उसे कोई बड़ा तोहफा मिल गया हो। आज पहली बार उसके अब्बू ने उसके लिए "बेटा" शब्द का इस्तेमाल किया था, जो उसके लिए बहुत मायने रखता था। लेकिन आयशा की तारीफ सुनकर सकीना और उसकी अम्मी जल-भुन गईं। इसलिए सकीना तेज आवाज़ में बोली, "अरे, लड़की, कहाँ मर गई? क्या हम यह नाश्ता ऐसे ही खाएँगे? तुझे पता है ना मैं पराठे बिना चाय के नहीं खाती, तो चाय कहाँ है? इतना टाइम क्यों लग रहा है?" उसके अब्बू ने उसकी तारीफ की थी, इसलिए जानबूझकर आयशा को नीचा दिखाने के लिए उसने चाय न होने का नाटक शुरू कर दिया था।

लेकिन जल्दी ही आयशा चाय लेकर उनके सामने खड़ी हो गई। चाय मँगवाने का एक कारण यह भी था कि वे आयशा का चेहरा देखना चाहते थे। क्योंकि उसकी सौतेली बहन ने आयशा पर जो कॉफ़ी डाली थी, उसके बाद उसका चेहरा कितना बदसूरत हो गया है, वे देखना चाहते थे। जैसे ही आयशा चाय की ट्रे लेकर आई और उसकी सौतेली माँ और सकीना की नज़र आयशा के चेहरे पर गई, तो उनके मुँह हैरानी से खुले के खुले रह गए।

आयशा का चेहरा पहले से भी ज़्यादा खूबसूरत हो गया था।

आयशा का खूबसूरत चेहरा देखकर उन दोनों माँ-बेटी का बुरा हाल था। लेकिन जैसे ही उसके पिता की नज़र आयशा के चेहरे पर गई, तो वे उसकी खूबसूरती देखकर बोले, "अरे, वह बेटा, आज तो आप बड़ी खूबसूरत लग रही है!" उनकी तारीफ़ सुनकर उसकी सौतेली माँ और बहन और भी ज़्यादा जल गईं। अब सकीना को मन कर रहा था कि वह गरमा-गरम चाय उठाकर आयशा के मुँह पर दे मारे।

लेकिन अपने अब्बू के सामने वह ऐसा नहीं कर सकती थी। वह जानती थी कि अगर उसने ऐसा किया, तो उसके अब्बू के सामने उसकी माँ की सच्चाई आ जाएगी। क्योंकि वह उसके अब्बू से छिपकर ही आयशा को सताती थी। यहाँ यह बात और थी कि अगर सामने भी वे लोग आयशा को कुछ कहते, तो उसके अब्बू ज़्यादा ध्यान नहीं देते थे। उन्हें लगता था, सौतेली माँ है, थोड़ा-बहुत तो डांटेगी ही, लेकिन यह थोड़ा-बहुत कितना ज़्यादा हो जाता था, उन्हें इस बात का अंदाज़ा नहीं था।

नाश्ता करने के बाद उसके अब्बू दफ़्तर के लिए चले गए। उनके जाने के बाद उसकी सौतेली माँ उठी और अचानक आयशा के बालों को कसकर पकड़ लिया। आयशा के बालों को पकड़ने के बाद उसका इरादा आयशा का सिर गरमा-गरम चाय पर मारने का था।

लेकिन इससे पहले कि वह ऐसा करती, उसके सौतेले भाई ने अपनी माँ का हाथ पकड़ लिया और बोला, "मॉम, ये आप क्या कर रही हैं? छोड़ दीजिए आयशा को।" और आयशा की ओर देखते हुए बोला, "आयशा, तुम अपने कमरे में जाओ।" उसकी माँ अपने बेटे की हरकत पर हैरान थी, क्योंकि उसके बेटे ने आज तक आयशा को मारने से नहीं रोका था। लेकिन आज अचानक उसे क्या हो गया था? लेकिन कहीं भी उसके सौतेली माँ को अपने बेटे की आँखों में आयशा के लिए कोई बुरा इरादा दिखाई नहीं दिया।

जैसे ही आयशा के पिता ने आयशा की खूबसूरती की तारीफ़ की थी, उसी वक्त आयशा के सौतेले भाई ने आयशा की ओर देखा था और उसकी खूबसूरती को देखकर वह मन ही मन में एक शैतानी प्लान बनाने लगा था।

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