दिल्लगी 🍁 🍁 (completed) Ch. 2

Tum mere ho - Chapter 2

Posted by Beautiful stories ( R Mann) • Feb 02, 2025 01:06 PM

"...नहीं प्लीज डार्लिंग... आ जाओ ना... आज मुझे तुम पर बहुत प्यार आ रहा है... इतने दिन हो गए हमें एक दूसरे से प्यार किए हुए..."

अर्जुन अपने माता-पिता के पास मल्होत्रा मेंशन गया था। उसके जाने का असल मकसद अपनी बचपन की सारी तस्वीरें देखना था, जो उसकी माँ के पास थीं। रात को जब वह घर पहुँचा, तो उसके माता-पिता उसे देखकर बहुत खुश हुए।

वह अपनी दादी का लाडला था। दादी तो उसे देखकर बहुत ज़्यादा खुश हो जाती थी। उसने सभी के साथ खाना खाया। घर में तो उसे कोई कुछ नहीं कहता था कि वह इतने दिनों से उन लोगों से नहीं मिलने आता। मगर उसकी छोटी बहन आरा उसे हमेशा कहती थी,

"भाई हमारे पास रहने आ जाओ। हमारा बहुत मन करता है कि आप हमारे पास रहें।"

अर्जुन मल्होत्रा अपने परिवार के साथ न रहकर अपने पेंटहाउस में रहता था। असल में, अगर वह परिवार के साथ रहता, तो उसकी आॅयाशी पर रोक लगती थी। अकेला रहने से उसे रोकने-टोकने वाला कोई नहीं था। इसलिए वह अकेला रहना पसंद करता था।

उसके माँ-बाप यह बात समझते थे, मगर चाहते हुए भी कुछ नहीं कह सकते थे। वे जानते थे कि वह अपनी मर्ज़ी का मालिक है; करेगा तो वही जो उसे पसंद है। इसलिए उन्होंने चुप रहना ही बेहतर समझा। वे बहुत सोचते थे कि काश कोई ऐसी लड़की उनके बेटे के जीवन में आ जाए जो उसको संभाल ले। मगर असली बात तो यह थी कि आज तक उसके बेटे के जीवन में ऐसी कोई लड़की नहीं आई थी।

असल में, जब अर्जुन मल्होत्रा ने अपने पिता का बिजनेस जॉइन किया था, तो उनका काम इतना बड़ा नहीं था। उनके होटल तो कई थे, मगर वे घाटे में चल रहे थे। मगर अर्जुन के बिजनेस संभालने के बाद उसने बिजनेस में बहुत तरक्की की थी। बहुत पैसा कमाया था। इसीलिए पैसे ने उसका दिमाग खराब कर दिया था। जो छोटी उम्र में इतनी कामयाबी मिलने से उसका दिमाग सातवें आसमान पर था। उसके माँ-बाप यह बात समझते थे; इसलिए वे चाहते हुए भी नहीं बोल सकते थे।

चाहे अर्जुन का दिमाग सातवें आसमान पर था, पर उसे अपनी फैमिली बहुत प्यारी थी। वह अपनी माँ-बाप की बहुत इज़्ज़त करता था, और छोटी बहन उसकी जान थी। अपनी दादी का दिल उसने कभी नहीं दुखाया था। उसकी दादी उसे कुछ भी बोल देती, पर वह कभी पलट कर जवाब नहीं देता था।

आज उसे घर देखकर सभी बहुत खुश थे। खाने के बाद वे लोग लॉबी में बैठ गए।

"...माँ आपके पास मेरी बचपन की बहुत सी तस्वीरें हैं... लाओ ना... कहाँ हैं... वह मुझे सब देखनी हैं..."

"...क्या बात है... आज तुझे क्या शौक चढ़ा है... अपनी बचपन की तस्वीरें देखने का... पहले तो आज तक कभी नहीं देखी..."

उसकी बात सुनकर उसकी छोटी बहन वह बॉक्स उठा लाई जिसमें सारी तस्वीरें थीं। अर्जुन ने वे सारी तस्वीरें देखीं; जिसमें से एक दिन के अर्जुन से लेकर उसकी जवानी तक की तस्वीरें थीं। उसने अपनी बचपन की तस्वीरें देखीं। वह बच्ची, जो उसने आज जयपुर में देखी थी, वह बिल्कुल ही उसके जैसी थी। वह देखकर हैरान हो रहा था।

वो बिल्ली आँखों के साथ, वैसे ही गोल्डन ब्राउन बाल, जिसमें हल्के-हल्के कर्ल थे। बिल्कुल उस बच्ची के जैसा लग रहा था। एक तस्वीर में तो अर्जुन के बाल वैसे ही बाँधे हुए थे, जैसे आज जयपुर में उस बच्ची के बाँधे हुए थे। अर्जुन के बालों की लंबाई उतनी ही थी, जितनी आज उस बच्ची के बालों की लंबाई थी। वह जैसे-जैसे पिक्चर देख रहा था, इतना हैरान हो रहा था।

"...माँ मेरी आँखें आपसे मिलती हैं ना... जैसे आपकी आँखें बिल्ली की हैं... मेरी भी वैसे ही आँखें हैं..."

"...सही कह रहे हो बेटा, तुम्हारी आँखें तुम्हारी माँ जैसी हैं... केवल तुम्हारी आँखें ही नहीं... तुम्हारे बाल, तुम्हारे चेहरे का रंग... तुम्हारे पूरे फीचर्स... तुम्हारी माँ जैसे हैं, मगर तुम्हारी हाइट मेरे जैसी है..." उसके पापा हँसने लगे।

"...भाई आप माँ जैसे हैं... मगर मैं बिल्कुल अपने पापा जैसी हूँ..." आरा ने उठकर अपने पापा के गले में बाहें डाल दीं। "...ठीक है ना पापा... मैं बिल्कुल आपसे जैसी हूँ..."

यह बात सच थी; आरा की शक्ल बिल्कुल उसके पापा से मिलती थी। वही काली आँखें, काले बाल, वही उसके पापा जैसी नाक, उसके सारे फीचर्स ही उसके पापा जैसे थे।

उसने शुरू से देखा था कि आरा उसके पापा के ज़्यादा क्लोज़ थी, और वह हमेशा अपनी माँ के ज़्यादा क्लोज़ रहा था। आरा अपने पापा से कितना प्यार करती थी, यह किसी से छुपा नहीं था। वह सामने एक बाप-बेटी की बॉन्डिंग देख रहा था।

उन सामने बाप-बेटी को देखकर उसे वह लड़की याद आ गई। उसे अचानक से उसकी फिक्र होने लगी। "...माँ क्या हमेशा से ही होता है... कि बेटे की शक्ल अपनी माँ पर जाती है... और बेटी की शक्ल अपने डैड पर..."

"...नहीं हमेशा थोड़ी ना होता है... जैसे मेरी आँखें मेरे पापा पर गई हैं... तुम्हारे नाना की आँखें बिल्ली थीं... मैं बिल्कुल अपने पापा जैसी थी... और तुम मेरे जैसे हो... इसलिए कोई ज़रूरी नहीं होता... कि बेटी बाप जैसी... और बेटा माँ जैसा हो..."

"कभी-कभी सारे बच्चे माँ पर चले जाते हैं... कभी-कभी सारे बच्चे बाप पर चले जाते हैं... क्या हुआ... तुम यह सवाल आज क्यों पूछ रहे हो..."

"...कुछ नहीं माँ... पिक्चर देखकर मुझे लगा... मैं बिल्कुल आपके जैसा हूँ... और आरा पापा के जैसी है... इसलिए मैंने पूछ लिया..."

"...आज तो तुम यहीं रहने वाले हो ना..." माँ ने उसे पूछा।

"...नहीं माँ मुझे काम है... मुझे जाना है... मैं तो बस आपके साथ खाना खाने के लिए आया था... मुझे आप लोगों की बहुत याद आ रही थी... कितने दिन हो गए थे आपसे मिले हुए..."

यह कहकर वह वहाँ से चला गया। असल में उसका मन तानिया के पास जाने का बन गया था। कितने दिन हो गए थे उसे तानिया के पास गए हुए। फिर तानिया आँखों से बुला रही थी। पहले तो वह तानिया को फोन करने लगा।

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