Rebirth Novel ki Duniya mein - Chapter 3
सात्विक ने अपनी बहन को गले लगा लिया और कहा, "मैं हर कदम पर, हर लड़ाई में तेरे साथ हूँ। जब भी तू कमजोर पड़ेगी, मेरे पास आना। जब तू डगमगाएगी, मैं तुझे संभाल लूँगा। और जब तू लड़ेगी, मैं तेरी ताकत बनूँगा।"
अक्षरा सात्विक के गले लग गई, क्योंकि उसकी पिछली ज़िंदगी में कोई ऐसा इंसान नहीं था जो उसे समझता हो, जो उसका साथ देता हो। कोई ऐसा नहीं था जो उससे प्यार करता हो, जो उसकी इज़्ज़त करता हो, उसकी परवाह करता हो। वह हमेशा अकेली रही थी। खाने को तो उसके पास सब कुछ था—माँ, पापा, बहन, और जिससे वह प्यार करती थी, वह दोस्त। लेकिन उन तीनों ने मिलकर उसे जान से मार दिया था। उसका सब कुछ उससे छीन लिया गया था। और जब उसके पापा ने विरोध किया, उसके पापा को भी मार दिया गया था। उसके पापा ने पूरी ज़िंदगी उससे नफ़रत की थी, और जब अपने आखिरी वक़्त में उसे अपने पापा का प्यार मिला, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
यही सब सोचते हुए अक्षरा नींद के आगोश में चली गई, क्योंकि कल से उसे एक नई लड़ाई लड़नी थी। उसे अगस्त्य का सामना करना था, और उसे उसे हर एक बार के लिए माफ़ करना था। क्योंकि अब वह अगस्त्य को माफ़ नहीं कर सकती थी। भले ही वह सब कुछ आँचल के साथ नहीं हुआ था, लेकिन उसने अपनी ज़िंदगी में वह दर्द झेला था; जब कोई अपना हमें दर्द और तकलीफ देता है, तो कैसा लगता है, और कितना दर्द होता है। अक्षरा ने तो प्यार किया था, और अगस्त्य ने उसे उसकी साँसें छीनी थीं।
आँचल, अच्छा बनकर, उन सबसे अक्षरा का बदला लेगी, जिन्होंने अक्षरा को ज़िंदगी भर दुख, दर्द और तकलीफ दी थी। क्योंकि अक्षरा एक भोली-भाली और सीधी-सी लड़की थी, जिससे हर कोई बेवकूफ़ बना देता था। लेकिन आँचल भोली-भाली नहीं रही थी। उसने दुनिया देखी थी, और उसने दुनिया में संघर्ष किया था, पेट भरने के लिए। इसलिए वह जानती थी कि इस दुनिया में कैसे रहना है, और कैसे जीना है।
Next morning
आज की सुबह अक्षरा की ज़िंदगी में एक नया उजाला लाने वाली थी, क्योंकि अक्षरा हर एक बंधन से आजाद हो चुकी थी। क्योंकि अब वह कभी वापस लौटकर अगस्त्य के पास नहीं जाएगी, ऐसा उसका मानना था। क्या दिन ऐसा ही होने वाला था? शायद नहीं, क्योंकि अगस्त्य को भी तो अपनी गलतियों का एहसास होगा। तब उसे सच्चे प्यार की कीमत समझ आएगी। लेकिन शायद बहुत देर हो चुकी थी, या शायद अभी कोई उम्मीद बाकी थी…
अगली सुबह, प्रताप फैमिली ने अक्षरा को डिस्चार्ज करके अपने घर ले गई। उसे घर देखकर, अक्षरा को पुरानी अक्षरा के साथ हुई सारी बातें याद आने लगीं, और वह अपने मन में निश्चय कर लेती है कि वह अक्षरा को इतना कमज़ोर नहीं रहने देगी। वह हर उस इंसान से बदला लेगी, जिस इंसान ने उसकी ज़िंदगी बर्बाद करने में अहम भूमिका निभाई थी।
तीनों ने अक्षरा को ले जाकर सोफ़े पर बिठा दिया। और एक नौकर ने वहाँ पर चाय-नाश्ता रखकर चला गया। अक्षरा चारों तरफ़ देख रही थी, तभी सात्विक ने कहा, "जिसे तुम ढूँढ़ रही हो, वह घर पर नहीं है। क्योंकि आजकल उसे घर आने की फ़ुरसत नहीं है। वह अपने मायके में खुश है, तो तुम भी उसके बारे में ना सोचो तो अच्छा है।"
सात्विक की ऐसी बातें सुनकर अक्षरा को नीति की बात याद आती है; सात्विक की पत्नी अगस्त्य की बहन थी। और जब से अगस्त्य ने अक्षरा के साथ वह सब किया था, तब से सात्विक और उसकी पत्नी नीति का रिश्ता भी ख़तरे में आ गया था।
लेकिन नीति भी अपनी तरफ़ से कोई कोशिश नहीं कर रही थी इस रिश्ते को बचाने की। और सात्विक तो वैसे ही अगस्त्य और उसकी पूरी फैमिली से नफ़रत करता था, और अब उस नफ़रत में इज़ाफ़ा नीति की हरकतों ने कर दिया था। क्योंकि नीति अपने भाई के दम पर बहुत उछलती थी। उसे अपने अलावा इस दुनिया में कोई दिखाई नहीं देता था। सात्विक नीति से प्यार नहीं करता था। उसने शादी सिर्फ़ और सिर्फ़ अपनी बहन के लिए की थी, क्योंकि उसकी बहन अगस्त्य से प्यार करती थी। और नीति ने सात्विक से वादा किया था कि अगर सात्विक नीति से शादी कर लेगा, तो नीति अक्षरा और अगस्त्य की शादी करवा देगी।
अक्षरा ने सात्विक के हाथ पर हाथ रखा और कहा, "कोई बात नहीं भाई, वह जैसे हैं, रहने दीजिए। जब उन्हें हमारे होने-ना-होने से फ़र्क नहीं पड़ता, तो हमें भी अब उनके होने-ना-होने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता। और एक बात भाई, वह आपके लायक ना पहले थी, ना अब है। लेकिन ये चीज़ देखने में मुझे थोड़ी देर हो गई। अगर आप उसे छोड़ना चाहते हैं, तो आप उसे छोड़ सकते हैं। क्योंकि मैं अब उसे इस घर में कभी वापस नहीं लाऊँगी, और मैं नहीं चाहती कि नीति जैसी लड़की मेरे भाई की ज़िंदगी में रहे।"
अक्षरा की बात सुनकर सात्विक की आँखें नम हो जाती हैं। क्योंकि सात्विक भी नीति से प्यार नहीं करता था। नीति से शादी करना उसकी मजबूरी थी। अब वह मजबूरी अक्षरा थी। नीति हमेशा उसे अक्षरा को लेकर ब्लैकमेल करती थी, और इसीलिए सात्विक इस रिश्ते को ढो रहा था।
अक्षरा नीति के बारे में पढ़कर जान गई थी कि नीति का कई लोगों के साथ रिलेशनशिप है। वह सिर्फ़ सात्विक का इस्तेमाल कर रही थी। सात्विक अपनी बहन के लिए नीति की हर एक बात मान लिया करता था, लेकिन अब उसकी बर्दाश्त की सीमा पार हो गई थी।
सात्विक ने अपनी माँ-पापा की तरफ़ देखा, तो वे दोनों ने भी अपनी गर्दन हिला दी। तो सात्विक वहाँ से उठकर अपने कमरे में गया और कुछ पेपर्स लेकर घर से बाहर निकल गया। सात्विक की गाड़ी जब अगस्त्य के घर के आगे आकर रुकी, तो उसे घर देखकर सात्विक को अपने बचपन से लेकर जवानी तक की याद आ गई। अपनी और अगस्त्य की दोस्ती की याद आ गई। फिर उसे अगस्त्य का अपनी बहन के ऊपर किया हुआ अत्याचार याद आया, तो उसके अंदर जो भी मोहसिन थे, सारे ख़त्म हो गए।
सात्विक अंदर जाकर खड़ा हो गया। दादी को देखकर कहा, "आपकी पोती नीति कहाँ है? ज़रा उसे बुला दीजिए।" आज सात्विक का ऐसा रूप देखकर नीति की दादी थोड़ी हैरान हुई, क्योंकि जब भी सात्विक घर आया करता था, वह हमेशा दादी के पैर छूता था और बहुत अच्छे से उनसे बात करता था। लेकिन आज उसके तेवर कुछ बदले हुए थे।
तभी एक नौकर जाकर नीति को बुलाकर लाया, और नीति के साथ-साथ अगस्त्य की पूरी फैमिली वहाँ खड़ी हो गई। सात्विक ने नीति की तरफ़ देखकर कहा, "ये पेपर्स साइन कर दो।"
नीति ने पेपर्स लिए।
"किस चीज़ के पेपर्स हैं?"
"तलाक के पेपर्स हैं। तलाक चाहता हूँ मैं तुमसे। क्योंकि अब मैं तुम्हें अपनी ज़िंदगी में नहीं रखना चाहता। तुम्हारी और मेरी शादी सिर्फ़ एक डील थी, जो मैंने मेरी बहन के लिए की थी। और जब मेरी बहन इस घर में नहीं है, तो तुम भी मेरी ज़िंदगी में रहकर क्या करोगी? और तुम सब लोगों ने जो मेरी बहन के साथ किया है, उसके बाद तुम्हें अपने घर की परछाई भी अपने घर पर नहीं दिखने दूँगा, तो तुमसे रिश्ता रखना तो बहुत दूर की बात है।"
सात्विक के मुँह से तलाक की बात सुनकर नीति और अगस्त्य दोनों हैरान रह गए। अगस्त्य सात्विक के पास आया और कहा, "तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरी बहन से इस तरह बात करने की?"
तभी सात्विक ने अगस्त्य की आँखों में आँखें डालकर कहा, "वैसे ही जैसे तेरी हिम्मत हुई मेरी बहन को ट्रक के आगे धकेलने की। वैसे ही जैसे इस घर में मेरी बहन को टॉर्चर किया गया। मैंने तो तेरी बहन के साथ कुछ किया ही नहीं, सीधे-सीधे तलाक माँगा है। वरना अगर मैं अपना आपा खो देता, तो तू बहुत अच्छे से जानता है कि मैं क्या कर सकता हूँ। और मुझे तुझसे बेहतर कोई नहीं जानता। मेरी बहन मेरी ताकत है, मेरा गुरूर है, और तुम सब लोगों ने मुझे मेरी ताकत और मेरा गुरूर छीना है। तो मैं तेरी बहन को अपनी ज़िंदगी में कैसे बर्दाश्त कर लूँ, जब तू मेरी बहन को अपनी ज़िंदगी में बर्दाश्त नहीं कर सकता था?"
"हाँ, मैं मानता हूँ मेरी बहन से बचपन में गलती हुई थी। लेकिन तुम लोगों ने क्या किया उसके साथ? उसके साथ जानवरों जैसा सलूक किया। उसे मारा-पीटा, खाना नहीं दिया, अंधेरे कमरे में बंद कर दिया। और तेरे भाई ने उसके साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की। अगर वह उस दिन वहाँ से बचकर ना भागती, तो शायद अब तक ज़िंदा भी ना होती। जिसे तू अपना भाई, अपना सब कुछ मानता है ना, उसने तेरी बीवी की इज़्ज़त पर हाथ डाला था। तुझे इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा, मैं जानता हूँ। लेकिन तुझे पता होना चाहिए कि तू और तेरा परिवार कितना गिरा हुआ है। जो लड़का अपनी माँ समान भाभी की इज़्ज़त पर हाथ डाल सकता है, वह लड़का अपनी बहन और माँ की इज़्ज़त पर भी हाथ डाल सकता है।"
अचानक से अगस्त्य गुस्से में सात्विक का कॉलर पकड़ लेता है। सात्विक ने उसका हाथ झटकते हुए कहा, "यह गुस्सा अपने परिवार पर दिखा। अपने भाई को तहज़ीब-तमीज़ सिखा, उसे औरतों का सम्मान करना सिखा। और तेरी बहन की तो क्या ही कहूँगा… कुछ देखना चाहोगे? चल, दिखा देता हूँ। और हाँ, नीति, अगर तुमने तलाक के पेपर्स साइन नहीं किए ना, तो जो वीडियो मेरे पास हैं ना, मैं उन्हें मीडिया में दे दूँगा। फिर तेरे और तेरे परिवार की इज़्ज़त धज्जियाँ उड़ जाएँगी, कौड़ी की नहीं रहेगी। मैं आज तक चुप सिर्फ़ इसीलिए था क्योंकि यह मेरी बहन का ससुराल था। और जब आज मेरी बहन का इस घर से कोई रिश्ता नहीं है, तो मुझे भी तुम लोगों की इज़्ज़त की कोई परवाह नहीं है।"
फिर उसने एक वीडियो चलाकर अगस्त्य को अपना फ़ोन पकड़ा दिया। जैसे-जैसे अगस्त्य वीडियो देख रहा था, उसके हाथों की मुट्ठी कसती जा रही थी। फिर उसने दूसरा वीडियो चलाकर अगस्त्य को दिया। ऐसे ही करके सात्विक ने आठ से दस वीडियो अगस्त्य को दिखाए। फिर उसने उसके हाथ से फ़ोन छीनकर कहा, "क्या? ये तेरा आदर्श परिवार है ना? यही है ना? देख ले, कैसा परिवार है तेरा। तूने इस परिवार के लिए और अपनी पूर्व प्रेमिका के लिए मेरी बहन की ज़िंदगी बर्बाद की है ना?"
"वह लड़की तो किसी और के साथ भाग गई थी शादी के मंडप से। और तुझे पता है, वह उस लड़के से शादी करके बच्चे भी पैदा कर चुकी है। और तू यहाँ उसकी याद में देवदास बन बैठा है। लेकिन उसकी भी कोई गलती नहीं है। तू ही इस लायक है कि तुझे किसी का प्यार नसीब नहीं होगा। और हाँ, नीति, तुम डिवोर्स पेपर्स साइन कर रही हो कि नहीं?"
नीति ने सात्विक के हाथ से डिवोर्स पेपर्स छीनकर उन पर साइन कर दिए।
सात्विक नीति के पास आया और उसके गले में से मंगलसूत्र खींचकर तोड़ लिया और कहा, "तुझ जैसी लड़की के लिए यह मंगलसूत्र नहीं है।" और मंगलसूत्र छीनकर अपनी पॉकेट में रखकर वहाँ से जाने लगा। फिर दादी की तरफ़ मुड़कर कहा, "भले ही दादी, आप बड़ी हो, इस घर की मुखिया हो, लेकिन आपने अपने घर के बच्चों को संस्कार नहीं दिए। उन्हें सिर्फ़ ऐटिट्यूड और घमंड सिखाया है। और आज देखिए, आपके बच्चे कहाँ से कहाँ पहुँच गए हैं।" और घर से बाहर निकल गया।
वहीं, अगस्त्य अभी भी उन वीडियो के बारे में सोच रहा था। और अब उसे यकीन हो गया था कि अक्षरा जो कहती थी, वह सच था। उसने कुछ नहीं किया था। उसे मंडप पर बैठने वाली नीति थी।
उसे याद आया जब अक्षरा भाग जा रही थी, तब उसने अगस्त्य से कहा था कि उसके भाई शोभित ने उसके साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की है। लेकिन अगस्त्य ने उसकी एक बात का भी विश्वास नहीं किया था। और आज जब अगस्त्य को सच्चाई पता चली, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। अक्षरा उसकी ज़िंदगी से जा चुकी थी, और उसका भाई, जैसा दोस्त, हमेशा के लिए उसे छोड़कर चला गया था। आज अगस्त्य खुद को एक हारा हुआ इंसान समझ रहा था।
दुनिया में हुकूमत करने वाला अगस्त्य आज अपने ही परिवार से हार गया था। अपने परिवार, अपनी बहन, अपने भाई का ऐसा रूप देखकर उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसने इन लोगों को कभी जाना ही नहीं। ये लोग तो मासूम शक्ल के पीछे छिपे भेड़िये थे, जिन्होंने न जाने बेचारी अक्षरा के साथ क्या-क्या नहीं किया था। और ऊपर से उसकी शिकायत करके उसे और टॉर्चर करवाते थे। आज अगस्त्य को अपनी हर एक गलती का एहसास हो रहा था, लेकिन शायद अब देर हो चुकी थी। और अक्षरा उसकी ज़िंदगी से जा चुकी थी। अब अगस्त्य हर मुमकिन कोशिश करेगा अक्षरा को वापस अपनी ज़िंदगी में लाने की।
अगस्त्य उदासी के हर एक क़दम से अपने कमरे में चला गया। जब वह अपने कमरे में गया, तो उसे चारों तरफ़ अक्षरा महसूस हो रही थी।
लेकिन वह घर में नहीं थी, और नहीं अगस्त्य की ज़िंदगी में, क्योंकि वह जा चुकी थी, और अब वापस आना मुमकिन नहीं था। क्योंकि उसके दिल में एक ज़ख़्म था, जो इतनी जल्दी भरने वाला नहीं था। वह खोने वाला कोई और नहीं, उसका खुद का पति था, तो कैसे माफ़ कर देती वह उसे?
प्रताप मेंशन में, जब सात्विक वापस आया, तो आज उसके चेहरे पर एक अलग सी चमक, एक रौनक थी। ऐसा लग रहा था जैसे वह एक बड़े बोझ से आजाद हो गया था। हाँ, नीति का रिश्ता उसके ऊपर एक बोझ तो था, जिसे वह ढो रहा था।
लेकिन अब वह आजाद था। तभी मिस्टर प्रताप आए और कहा, "क्या हुआ सात्विक?"
सात्विक ने डिवोर्स पेपर्स अपने पापा को दिखाते हुए कहा, "नीति ने साइन कर दिए हैं, पापा। कोर्ट में सबमिट करने जा रहा हूँ। उससे पहले मैंने सोचा अक्षरा को भी अपने साथ ले चलूँ। वह भी एक जगह रहने से बोर हो गई है ना, तो थोड़ा घूम आएगी मेरे साथ।"
उन्होंने हाँ कहा। तभी अक्षरा ऊपर से आते हुए बोली, "सॉरी भाई, मैं कहीं नहीं जा सकती। क्योंकि मैं भी खुद को बहुत थका हुआ महसूस कर रही हूँ।"
तो मिस्टर प्रताप ने सात्विक की तरफ़ देखकर कहा, "मैं वकील साहब को यहीं बुला देता हूँ। तुम पेपर्स दे देना।"
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