इंतज़ार: वो भूली दास्तां - Chapter 3
अपने आप को पूरी तरह से सांप और बिच्छू के बीच में घिरा हुआ पाकर विक्रम बुरी तरह से डर गया था। उसने कहीं सुन रखा था कि अपने डर से तुम जितना डरोगे, उतना ही यह डर तुम्हारे ऊपर हावी होता जाएगा। इसलिए अपने डर पर अपना कंट्रोल किया करो। क्योंकि डर के आगे जीत है.... इसलिए वह अपने इस डर से डरना नहीं चाहता था... वह बाहर से खुद को सामान्य रखने की कोशिश कर रहा था, लेकिन फिर भी उसका सारा बदन पसीने से नहा चुका था।
दिल की धड़कन बुलेट ट्रेन की स्पीड से भाग रही थी और उसके कानों में अभी तक वह आवाज गूंज रही थी "तुम्हारा इंतजार है...."
जिसने कि विक्रम के रोए रोए को खड़ा कर दिया था।
उसने झटके से मुड़ कर आवाज की दिशा में देखना चाहा, लेकिन वहां कोई नहीं था। तभी अचानक उसे अपने कंधे पर किसी के हाथ का दबाव महसूस हुआ। कहीं वो आवाज वाली लड़की उसके पीछे तो नहीं!! ऐसा सोच कर ही विक्रम बुरी तरह से डर गया था। उसे याद आ रहा था कि वह लड़की शुरू में देखने में तो बहुत सुंदर लगती है। बड़ी-बड़ी कजरारी, मृगनयनी आंखें..... खड़ी नाक, और उस पर चमकता हुआ हीरे का लॉन्ग, भींगे लाल गुलाब की पंखुड़ियों जैसे होंठ, लेकिन तुरंत ही उसकी शक्ल डरावनी हो जाती है....
काली काली कजरारी उसकी आंखें, जिनमें डूबने का मन करता है। वह आंख जलते हुए अंगारों के समान लाल लाल खून से भरी हुई दिखाई देने लगती है। वह खूबसूरत चेहरा, जिसे अपनी आंखों के रास्ते दिल में बसाने का मन करता है, वह चेहरा बिल्कुल भयानकता की हद तक डरावना हो जाता है, जिसमें जगह जगह से उतरी हुई स्किन दिखाई पड़ती है, वहां पर साफ-साफ हड्डी और कई जगह खून से सने हुए मांस दिखाई पड़ते हैं। भींगे लाल गुलाब की पंखुड़ियों जैसे होंठ, जिन का रस पीने की इच्छा, खुद ब खुद दिल के अंदर जाग जाती है, जिन्हें देखकर ही किसी के मन में प्यास जग जाए। उन होठों से टपकता हुआ खून, किसी के दिल के अंदर डर पैदा करने के लिए काफी थे।
उस लड़की की भयानक शक्ल याद आते ही विक्रम के शरीर ने झुरझुरी सी ली, पर फिर भी वह हिम्मत करके उस लड़की का सामना करने के लिए, झटके से पीछे मुड़ा। वह आज उसे जाने नहीं देना चाहता था। वह जानना चाहता था कि आखिर उस लड़की को उसका इंतजार क्यों है?? लेकिन.... सामने उसके बचपन का दोस्त और भाई विकल्प खड़ा था। विकल्प को सामने देखकर विक्रम ने अपनी आंखें बंद कर ली।
"क्या हुआ भाई?? तू ठीक तो है ना!!" विकल्प के शब्दों में विक्रम के लिए उसका फिक्र साफ साफ दिखाई दे रहा था। विक्रम ने एक गहरी सांस छोड़ते हुए अपनी आंखें खोली और विकल्प से कुछ बताना चाहा, "वह, वह....."
"क्या वह, वह!!! क्या हुआ?? आखिर तू इतना घबराया और डरा हुआ क्यों है??" विकल्प ने विक्रम के चेहरे पर एक गहरी नजर डालते हुए उससे पूछा उसने कमरे में लगे हुए एसी की तरफ देखा।
"अब बोलेगा भी कि क्या बात है?? 16 डिग्री टेंपरेचर में तुझे इस तरह से पसीना क्यों आ रहा हैं??" विकल्प ने हाथ बढ़ाकर विक्रम का चेहरा चाहा। विक्रम झटके से एक कदम पीछे हुआ, तभी उसकी नजर सामने फर्श पर गई। उसकी आंखें हैरत से फैल गई।
अभी तो यहां पर सैकड़ों सांप बिच्छू रेंग रहे थे, लेकिन अब यहां पर कुछ नहीं था। पूरा फर्श बेशकीमती टाइल्स से सजा हुआ, बिल्कुल शीशे की तरह साफ था।
"अरे भाई बताएगा भी?? क्या बात है?? तू इस तरह से नीचे फर्श पर क्या देख रहा है?? कुछ गिर गया है क्या??" विकल्प ने पूछा।
लेकिन विक्रम के मुंह से तो कोई जवाब ही नहीं निकल रहा था। वह हैरत से आंखें फाड़े हुए ही फर्श की तरफ देख रहा था। वह तो विकल्प को फर्श दिखा कर बताना चाहता था कि वह क्या देख रहा था?? और क्यों डरा हुआ था?? लेकिन अब वह उससे वह क्या बताता कि वह किस लिए डर गया था?? यहां सामने तो कुछ भी दिखाई नहीं पड़ रहा था!!
विक्रम समझ गया था कि हमेशा की तरह उसका डर उसके ऊपर हावी हो चुका था, जोकि एक छलावा की तरह से उसे छलकर, उसके दिल में अपना डर बैठा कर, निकल चुका था।
विक्रम ने एक गहरी सांस ली और अपने मन में उन चीजों को सोचने लगा जो कि अभी अभी उसने जागती आंखों के साथ देखा था। वह उसका भ्रम नहीं था। आज उसने कोई डरावना सपना नहीं देखा था, बल्कि उसने खुली आंखों के साथ आज इस कमरे में उस सोने के कलश को देखा था। यह वही सोने का लोटे की आकार वाला कलश था, जो कि हमेशा उस लड़की के हाथ में होता था, जिसमें से पानी की जगह खून निकलता था। लेकिन आज उसमें से निकल रहे काले काले घिनौने और डरावने, जमीन पर रेंगते हुए सांप और बिच्छू उसने देखे थे।
एक सांप तो उसके पैर पर भी चढ़ कर आया था, जिसकी जकड़न अभी भी विक्रम अपने पैरों पर महसूस कर पा रहा था। फिर अचानक से झटके में ही सब कुछ ऐसे कैसे गायब हो सकता है?? क्या वो जागती आंखों से ही आज सपना देख रहा था?? या फिर उसने सब कुछ जागते हुए ही, अपनी आंखों से सच-सच देखा है!! क्या था और क्या नहीं?? विक्रम इस चीज को समझ नहीं पा रहा था। उससे अपना सर घूमता हुआ महसूस हो रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे कि कमरे की छत उसके सर के ऊपर नाच रही हो।
विक्रम को चक्कर आने लगे, ऐसा लगा कि वह बेहोश होकर वहीं पर गिर जाएगा। वह कुछ बोलने और कहने की हालत में भी नहीं था। उसने अपना सर पकड़ लिया। विकल्प उससे कुछ कह रहा था, लेकिन उसे कुछ सुनाई भी नहीं पड़ रहा था, क्योंकि कानों में भी अभी भी सीटिया बजाती हुई उस लड़की की आवाज गूंज रही थी, जिसने की विक्रम के कानों के परदे अंदर तक सुन कर दिए थे।
"लगता है कि तेरी तबीयत ठीक नहीं है!! दिन रात काम के पीछे पागल हुआ रहता है!! कितनी बार कहा है कि थोड़ा आराम भी कर लिया कर। कम से कम अपनी सेहत का ख्याल तो कर लिया कर, लेकिन तुझे कहां किसी की सुननी होती है?? मेरे साथ आ।" विकल्प ने विक्रम की ऐसी हालत देखते हुए उसका हाथ पकड़ा और उसे वही बिछे हुए सोफे पर बिठाया।
विक्रम कुछ समझने की भी हालत में नहीं था। वह ट्रांस सी हालत में, विकल्प के साथ सोफे की पर बैठ गया। विकल्प ने एक गिलास पानी उसके आगे बढ़ाया।
विक्रम ने हैरानी से विकल्प की तरफ देखा। विक्रम को प्यास तो लगी थी लेकिन उसकी हिम्मत पानी के ग्लास को लेने की नहीं हो रही थी। उसके मन में अभी भी डर बैठा हुआ था। कहीं अब पानी से भरा हुआ गिलास खून के गिलास में ना बदल जाए?? आंखों में अजनबीयत का भाव लिए हुए वह कभी पानी के गिलास की तरफ देखता था, तो कभी विकल्प की तरफ।
"ऐसे क्या देख रहा है तू?? ऐसा लग रहा है, जैसे मुझे पहचान भी नहीं रहा है.... चल पानी पी ले। तुझे कुछ रिलैक्स महसूस होगा।" विकल्प ने उसे इस तरह के अजीबोगरीब बिहेव को करते हुए देखकर टोका।
विक्रम ने डरते हुए ही एक घूंट पानी पिया, लेकिन यह पानी ही था, खून नही। विक्रम ने एक राहत की सांस ली और झटके में पानी का गिलास खाली कर दिया और फिर से विकल्प के आगे बढ़ा दिया।
विक्रम की प्यास को देखते हुए, विकल्प ने फिर से उसका ग्लास पानी से भर दिया। 2 गिलास पानी पीने के बाद विक्रम खुद को रिलैक्स महसूस कर रहा था।
एक साथ इतने सारे डरावने दृश्य को देखकर अगर कोई कमजोर दिल का आदमी होता तो शायद उसका वहीं पर हार्ट फेल हो जाता या फिर उसका बेहोश होना तो बिल्कुल निश्चित था, लेकिन ये डरावने सपने बचपन से ही विक्रम को परेशान कर रहे थे। आज तो इन सपनों ने वास्तविकता का रूप लेकर उसके सामने से भी आकर डराना शुरू कर दिया था।
विक्रम अभी भी मन में इन्हीं सब चीजों को सोच रहा था, पर विकल्प आंखों में कई सवाल लिए हुए, विक्रम के चेहरे को गौर से देख रहा था। आज भी विक्रम के पास इन सवालों का कोई जवाब नहीं था। उसे खुद कुछ नहीं मालूम था तो वह विकल्प को क्या बताता?? इसलिए विकल्प के आंखों के सवाल को नजरअंदाज करते हुए विक्रम ने विकल्प से पूछा, "तू यहां क्या कर रहा है??"
"तेरा इंतजार....." विकल्प ने कहा।