मीत ए मीरजा Ch. 1

मीत ए मीरजा - Chapter 1

Posted by rimjhim Sharma • Feb 26, 2025 02:25 PM

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आज की सुबह नवाबों के शहर लखनऊ में कुछ अलग सी थी । 

आज फिर नवाबों के भी नवाब, नवाब आसफ़ उद्दीन मिर्जा, अपनी शानो-शौकत के साथ अपनी हवेली के दीवान-ए-खास में बैठे थे। हाथ में एक नक्काशीदार पानदान, सामने रखा फ़ारसी कढ़ाई वाला हुक्का, और चारों ओर बैठे ख़ास मेहमान। उनके चेहरे पर वही पुरानी नवाबी ठसक थी, जो उनकी रगों में पीढ़ियों से चली आ रही थी।

हल्की गर्मी की रात में हवेली के खुले आंगन में फ़व्वारे चल रहे थे, और कहीं दूर से ठुमरी की धीमी आवाज़ कानों में पड़ रही थी । नवाब मिर्जा साहब हमेशा से ही अपने नवाबी ठाठ के साथ ही अपनी शेरों शायरी के लिए भी जाने जाते थे । हर वक्त उनकी हवेली में महफील जमीं रहती थी जहां वो सबके साथ बैठकर नयी ग़ज़लों का आनन्द लिया करते थे और आज फिर महफ़िल सजी थी ।

यह दौर वह दौर था जब लखनऊ से नवाबशाही हटाने के जुमले बड़ी चर्चा में थे लेकिन मिर्जा साहब सरकार के इस फैसले के विरोध में थे ।

खैर अब कुछ परिचय हो जाये ……

नवाब आसफ़ उद्दीन मिर्जा, लखन‌ऊ के नवाब अपने पिता नवाब मसीख मिर्जा की चौथी  संतान थे । उनकी पहली दो संताने पैदा होने के साथ ही मर गयी और तीसरी उन्हें बेटी हुई और चौथी नवाब मिर्जा उनके लाड़ प्यार में कुछ ज्यादा ही बिगड़ गये । नवाब मिर्जा साहब को हर वो शौक था जो उस समय नवाबों की शान माना जाता था । शराब से लेकर कभी कभी तो उनकी रातें लखनऊ के सबसे बड़े कोठे , रानी बाई के कोठे पर भी गुजरती थी । 

 जुबैदा मिर्जा , नवाबी शानौ शौकत  रखने वाले मिर्जा साहब की इकलौती पत्नी जो अपनी सास के साथ जनाना महल में रहती थी । यह बचपन से नवाबी परम्पराओं की बेड़ियों में जकड़ी , एक कैद परींदे की तरह अपनी जिंदगी गुजार रही थी बस एक ही रहम था इन पर कि इनके शौहर ने दूसरी शादी नहीं की जो उस वक्त के नवाबों में बहुत आम था ।

……

नवाब मिर्जा ने अपने पानदान से पान का एक बीड़ा उठाया और मुंह में रखने के बाद एक शेर बोले 

"हयात लेके चले थे, जहाँ-ए-इश्क में हम,

मगर ये क्या कि क़फ़स में गुज़ार दी हमने..."

शेर के खत्म होते ही महफ़िल में बैठे मेहमानों ने तालियों से नवाब मिर्जा की तारीफ की। किसी ने "वाह-वाह" कहा, तो किसी ने "सुभानअल्लाह"। लेकिन जनाना महल से उसी तरफ आती बेगम ज़ुबैदा मिर्जा को यह शेर किसी कटाक्ष से कम नहीं लगा। कैद तो उन्होंने भी गुज़ारी थी, मगर इश्क का नाम तक न मिला।

तभी उनके एक दोस्त ने कहां …..

मिर्जा साहब आप भाभीजां के इश्क में इस तरह कैद हैं लगता हैं बहुत खुबसूरत हैं वो …..

जिस पर मिर्जा साहब मुस्कराकर , “ मियां , यह हक नहीं हैं आपको कि हमारी बेगम पर यूं नजरें जमाने की गुस्ताखी करें आप ….और वैसे भी यह एक शेर हैं ….

वो आगे कुछ बोलते तब तक जुबैदा बेगम भी अपनी कुछ सेविकाओं और कुछ महिलाओं के साथ वहां आ पधारी , उन्होंने लम्बा घूंघट कर रखा था फिर भी उनके आगे एक लम्बा पर्दा था  और साथ ही गहनों और खुबसूरत लिबास से उनके शरीर का हर हिस्सा ढका था और वह पूरी जगह और दिवान ए ख़ास में सजी महफिल में एक बड़ा और मोटा सा पर्दा लगा था । 

वो एक कटाक्ष की तरह बोली …

“  जनाब , इश्क हमेशा खुबसूरती से होता हैं और किसी हुस्न में वो बात नहीं जो नवाब मिर्जा को अपनी बंदिशों में कैद कर सके … आपके मिर्जा साहब बड़े रंगीन मिजाजी हैं और ऐसा कभी होता हैं क्या मियां …. भंवरा कभी एक फूल पर नहीं टिकता हैं जब वह एक फूल पर बैठ जायें तो उसका जी दूसरे फूल के लिए मचलता ही हैं । 

जारी हैं

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