मीत ए मीरजा - Chapter 3
रात की यह महफ़िल बीत गयी थी और सुबह का सुरज हवेली में रोशनी फैला चुका था ।
जुबैदा बेगम हमेशा की तरह नवाबी लिबास में सजकर तैयार थी ।
जनाना महल में उन्हें कुछ चीजों की आजादी थी जैसे संगीत कला हो , लेखन कला और नृत्य कला और इन्हीं में उन्होंने अपनी जिंदगी खोज ली थी उनका मानना था कि जब बगावत का साहस ना हो तो वक्त के अनुसार ख़ुदको ढाल लो …. थोड़ी तकलीफ़ कम ही होगी ।
और शायद रियाज करना , आज उनका एक बार फिर दरीया बना था .. दर्द छूपाने का …..
बहुत कुछ मिला उन्हें नवाबों मिर्जा साहब की नवाबरानी बनकर … पर वो नहीं जिसकी एक बेगम के रुप में उनको इच्छा थी … और वक्त भी उनके इन नासूर जख्मों पर मरहम ना लगा पाया … तड़प थी , बैचेनी थी और दर्द का एक साया भी उनके होंठ एक नज़्म गुनगुना रहे थे और साथ ही उनके साथ बैठी कुछ सेविकाएं.. उस रियाज कक्ष में धून के कुछ तार छेड़ रही थी ।
सबकुछ तो था उनके पास … पैर दबाने से लेकर बाल सुलझाने तक , गहने पहनाने से लेकर रुप संवारने तक …हर काम के लिए सेविकाएं… पर वह नहीं जिसकी चाहत थी .. ना शौहर का प्यार ना खुली हवा .. इन सब शानो-शौकत के बदले उन्हें कैद में रहने की सजा मिली थी और वो काट भी रहीं थीं बस एक ही शख्स के लिए और वो कौन … मीरजा उद्दीन मिर्जा … उनका चश्मों चिराग
वो चाँदनी में लिपटा इक ख़्वाब थी,
नवाबों के महलों की महकती किताब थी।
गजरा भी शरमाए जिसकी जुल्फ़ों में,
सुनहरी चूड़ियों में एक मीठी साज़ थी।
नज़ाकत उसकी पहचान थी
रूह में तहज़ीब का मौसम बसा था,
हर लफ़्ज़ में जैसे कोई नग़मा बसा था।
परदे की आड़ में जहाँ कैद थी वो,
फिर भी हर महफ़िल की शान थी।
इश्क़ जो बंदिशों में उलझा रहा
महराबों के साए में चुपचाप बैठी,
दिल में मोहब्बत की लौ को समेटी।
बेखबर थी वो या मजबूर थी,
इश्क़ की आग में मगर चुप रही।
सियासत के साए, वफ़ा की क़समें
हाथों की मेंहदी में तहरीरें थीं,
तक़दीर में शायद ज़ंजीरें थीं।
शमशीरों के नीचे मोहब्बत दबी,
सियासत ने फिर से बाज़ी जमी।
एक ख्वाहिश जो अधूरी रही
जुबैदा बेगम की वो मासूम आँखें,
आज भी तारीख़ में सिसकती दिखें।
ख़ामोश दरो-दीवार गवाही देंगे,
कि इश्क़ की राहों में कांटे ही मिलेंगे।
उनकी आवाज में एक अनोखी कशिश थी लेकिन यह सिर्फ जनाना महल में ही कैद रह गयी थी । कुछ दिन उन्हें खुलकर जीने का मौका मिला था क्योंकि उनकी बड़ी बेगम ( मिर्जा साहब की अम्मी ) अभी मक्का , मदिना की यात्रा के लिए गयी थी ।
खैर वो इसे जारी रखती तब तक रुपल उछलते हुए वहां आयी और खुशी से चिल्लायी ,“ बैगम साहिबा एक खुशखबरी हैं । आप सुनेगी तो दिल बाग बाग हो जायेगा । ”
जिस पर सभी सेविकाओं को रुकने का आदेश देकर वह खड़े होते हुए मुस्कराते हुए पीछे पलटी और बोली , “ चेहरे पर इतनी रौनक , लगता हैं बहुत बड़ी खुशी हैं । ”
जिस पर रुपल , “ जी बेगम साहिबा , छोटे नवाब आने वाले इतवार को लंदन से हमेशा की लिए नवाब हवेली आ रहे हैं । ”
जुबैदा बेगम (मुस्कुराते हुए, पर आवाज़ में हल्का सा कंपन) – "चेहरे पर इतनी रौनक, लगता है कोई बड़ी खुशी है, रुपल?"
रुपल (आंखों में चमक लिए, उत्साहित स्वर में) – "जी बेगम साहिबा! छोटे नवाब... मीरजा उद्दीन मिर्जा साहब... इस इतवार को हमेशा के लिए नवाब हवेली लौट रहे हैं!"
जुबैदा बेगम के होंठों पर मुस्कान ठहर गई, लेकिन उनकी आँखों में एक पल के लिए नमी तैर गई। ये खबर उनके दिल के सबसे करीब थी, जिस पल का उन्हें बरसों से इंतजार था। आज सुबह ही तो उन्होंने अपने खुदा से दुआ मांगी थी कि उनका मीरजा जल्दी ही अपनी हवेली लौट आये । आंखें तरस जो गयी थी अपनी औलाद के सलोने मुखड़े के दीदार के लिए लेकिन यह वह दर्द था जिसे वह किसी के सामने जाहिर नहीं होने देती थी । बहुत मुश्किल था इतने सालों से ख़ुदको संभालना ….. सही में बहुत मुश्किल से काटा था यह वक्त उन्होंने और अब शायद नजरों का इंतजार मुमकिन हो पाये ।
जुबैदा बेगम (धीरे से, खुद से) – "मेरा चश्म-ओ-चिराग... अब घर लौट रहा है..."
उन्होंने अपनी कंपकंपाती उंगलियों से हल्के से अपनी आंखों के किनारे छुए, जैसे एहसास कर रही हों कि ये कोई सपना तो नहीं।
रुपल जो अपनी बेगम साहिबा की स्थति समझ रही थी वह (खुश होकर आगे बढ़ती हुई) – "बेगम साहिबा, अब तो पूरे महल में रौनक लौट आएगी! आप देखिएगा, छोटे नवाब साहब आएंगे, तो ये वीरान हवेली फिर से गुलज़ार हो जाएगी।"
जुबैदा बेगम (गहरी सांस लेते हुए) – "हाँ, अब इस हवेली में फिर से क़दमों की आहट गूंजेगी... मेरे मीरजा की आहट। जिस आहट का इंतजार हमें बरसों से था ऋ "
वो पल भर को खामोश हो गईं, जैसे अतीत के उन लम्हों में लौट गई हों जब वो अपने बेटे को अपने हाथों से विदा कर रही थीं। उस वक्त उनकी आंखों में नमी थी लेकिन होंठों पर मुस्कराइट इस कदर थी जैसे ख़ुद को एतबार दिला रही हों कि उनका मीरज़ा एक नेक और रास्तगो इंसान बनकर लौटेगा, और उस वक़्त उनसे ज़्यादा मस्रूर कोई न होगा।
रुपल (मुस्कुराते हुए, हल्के मज़ाकिया लहजे में) – "बेगम साहिबा, अब तो आपको बस ये सोचना है कि छोटे नवाब के स्वागत में कौन-सा जोड़ा पहनेंगी!"
जुबैदा बेगम ने अपनी नर्म उंगलियों से मोतियों की माला को छुआ, जो उनके गले में सजी थी, और धीमे स्वर में बोलीं।
जुबैदा बेगम (हल्की मुस्कान के साथ, मगर सोच में डूबी हुई) – "जोड़ा तो पहन लूंगी, रुपल… लेकिन ये दिल कैसे संभालूं? पाँच साल गुज़र गए… मेरा मीरजा कैसा लगेगा अब? वो अब भी वही मासूम बच्चा होगा, या वक़्त ने उसे बदल दिया होगा? कैसी सूरत होगी उसकी … यह सवाल बहुत सता रहा हैं रुपल कि अगर वक्त। के साथ हमारे मीरजा के लिए हमारी मुहब्बत के मायने बदल गये … अगर दूसरे मुल्क जाकर हमारा मासूम मीरजा बदल गया तो कैसे जीयेंगे हम … हमारा आखिरी सहारा हैं हमारा मीरजा … कैसे सभालेगे हम खुदको … अगर उसे हमारी गोद से ज्यादा स्नेह नवाबों के तख्त से रहा तो …"
रुपल (बेगम साहिबा की आंखों में उमड़ते जज़्बात को देखकर थोड़ा भावुक होते हुए, मगर उन्हें तसल्ली देने के लिए उत्साह बनाए रखते हुए) – "बेगम साहिबा, ऐसा मत कहिए... छोटे नवाब साहब आप ही की ममता की छांव में पले-बढ़े हैं। भले ही वो किसी और मुल्क में रहे हों, लेकिन उनका दिल तो यहीं बसा है, इस हवेली में... आपसे दूर होकर भी वो आप ही के क़रीब रहे हैं।"
(जुबैदा बेगम की आंखों में हल्की नमी झलक आई, पर होंठों पर हल्की मुस्कान भी थी, जैसे रुपल की बातों ने उन्हें थोड़ी राहत दी हो।)
जुबैदा बेगम (धीमे स्वर में, खुद से) – "कभी-कभी फ़ासले सिर्फ़ जिस्म के होते हैं, दिलों के नहीं… लेकिन क्या वक़्त सच में दिलों को जुदा नहीं करता, रुपल?"
रुपल (हौले से मुस्कराते हुए) – "अगर मोहब्बत सच्ची हो तो वक़्त भी बेबस हो जाता है, बेगम साहिबा। आप देखिएगा, छोटे नवाब साहब जब हवेली में कदम रखेंगे, तो सबसे पहले उनकी निगाहें आपको ही ढूंढेंगी।"
जुबैदा बेगम ने गहरी सांस ली, जैसे खुद को यकीन दिला रही हों। फिर, अपने चेहरे को हल्के से थामकर, उन्होंने रुपल की तरफ़ देखा और मुस्कुराईं, लेकिन उनकी मुस्कान में अब भी इंतज़ार की कसक थी।)
जुबैदा बेगम (हल्की मुस्कान के साथ) – "अगर वो हमें पहले की तरह गले लगा ले, तो शायद हमारी रूह को सुकून मिल जाएगा, रुपल…"
(रुपल ने आगे बढ़कर एक गुलाबी शाल उठाई और उसे जुबैदा बेगम के कंधों पर रख दिया, जैसे उन्हें स्नेह और सुरक्षा का एहसास करा रही हो।
रुपल (हौसला देते हुए) – "बेगम साहिबा, ममता का रिश्ता वक्त का मोहताज नहीं होता। आप देखिएगा, जैसे ही वो हवेली में कदम रखेंगे, सब कुछ पहले जैसा महसूस होगा। आपकी एक झलक से ही वो आपके आंचल की खुशबू पहचान लेंगे।"
(जुबैदा बेगम ने हल्के से सिर हिलाया, लेकिन उनके चेहरे पर संतोष और उलझन का संगम था। वो अपनी जगह से उठीं और धीमे कदमों से झरोखे तक जा पहुँचीं, जहाँ से हवेली का मुख्य आंगन दिखता था।)
जुबैदा बेगम (आसमान की तरफ देखते हुए, खुद से बुदबुदाती हुईं) –
"या अल्लाह… मेरे मीरजा को सलामत रखना, उसे दुनिया की ठोकरें मत देना… और अगर उसने बदल भी लिया हो खुद को, तो उसकी माँ का प्यार उसकी रूह तक पहुँचा देना।"
(रुपल ने झरोखे के पास खड़ी अपनी बेगम को देखा और हल्के से मुस्कुराई। वो जानती थी कि ये इंतज़ार आसान नहीं था, मगर अब हवेली के वीरान दरो-दीवार फिर से आबाद होने वाली थी
जारी हैं .....
मीरजा साहब लंदन से भारत लौट रहे हैं तो कैसा होगा आगे का यह सफर ? मनमीत और मीरजा की मुलाकात कैसी होगी ? जानने के लिए पढ़ते हिये - मीत ए मीरजा