Boss to husband - Chapter 3
अंबर अपना सिर पकड़े बैठी थी। उसे अपने डैड और मॉम दोनों पर बहुत गुस्सा आ रहा था।
"अब मैं कोई छोटी बच्ची नहीं हूँ जो मुझे कोई खा जाएगा। एक तरफ तो डैड आप मुझे कहते हैं कि आपने मुझे हर तरह की आजादी दी है, तो फिर यह क्या है?" उसने अपने गुस्से से अपने डैड को देखा।
"बेटा, मैं तो किसी बात के खिलाफ हूँ ही नहीं। अगर तुम्हारा कोई बॉयफ्रेंड है तो बता दो। अगर तुम उसके साथ रहना चाहती हो तो रह सकती हो। हमें कोई प्रॉब्लम नहीं है।"
"दिमाग खराब हो गया है क्या? आपके जवान बेटी से कैसी बातें कर रहे हैं? अगर इसका कोई बॉयफ्रेंड है तो बताएँ हमें। हम शादी कर देते हैं, बिना शादी के नहीं रहने देगी इसे किसी के साथ। अभी मैं जिंदा हूँ!" उसकी मॉम अनीता गुस्से में थी।
"मेरा कोई बॉयफ्रेंड नहीं है और ना मुझे किसी के साथ रहने जाना है। मुझे यहीं, इसी घर में रहना है।"
"मगर तीन महीने बहुत होते हैं बेटा। इस जगह अकेले रहना तीन महीने बहुत मुश्किल है। अगर बिल्डिंग में कोई फ्लैट होता तो बात अलग थी। इतने बड़े घर में अकेले रहना ठीक नहीं है।" उसके डैड कह रहे थे।
"इसीलिए आपने मेरे बॉस के घर में मेरे रहने का इंतज़ाम किया है? कहीं और भी तो कर सकते थे। मैं कोई फ्लैट रेंट पर ले लेती हूँ तीन महीने के लिए।"
"नहीं, हम तुम्हें तुम्हारे बॉस के यहाँ नहीं छोड़ रहे। मैं अपने दोस्त बृजेश के घर में तुझे छोड़कर जा रहा हूँ।" अरुण ने कहा। "उसने खुद ही कह दिया कि अंबर हमारे पास रहेगी।"
"और वर्षा आंटी से तो तुम्हारी खूब बनती है। मैं तुम्हें उसी के पास छोड़कर जा रही हूँ।" उसके डैड के साथ उसकी मॉम भी कहने लगी। "और प्रॉब्लम क्या है? जिस बॉस के साथ तो ऑफिस में काम करती हो, अगर उसके घर में रहना भी पड़ा तो कौन सी बड़ी बात है?" उसके डैड कहने लगे।
"ऑफिस में तो बॉस को झेलना पड़ता है। अगर इंसान घर आकर भी कम्फ़र्टेबल ना हो सके तो क्या फ़ायदा?" अंबर मानने को तैयार नहीं थी।
"घर में आकर थोड़ी वो तुमसे ऑफिस का काम कराएगा?" उसके मॉम-डैड मानने को तैयार नहीं थे। वो अपना सिर पकड़े बैठी थी क्योंकि वह वेदांत सहगल के घर में तो हरगिज नहीं रहना चाहती थी। उसे पता था कि जब तक वह सामने रहेगा, वह कम्फ़र्टेबल हो ही नहीं सकेगी।
उधर, वेदांत के घर में उसकी दादी को अंबर के घर में आने का एतराज था।
"तो क्या अब इसके ऑफिस की लड़कियाँ इस घर में भी आएंगी?" उसकी दादी लक्ष्मी देवी ने कहा।
"वो सिर्फ़ इसके ऑफिस में काम नहीं करती। वह तो अरुण की भी बेटी है और अरुण तो मेरा दोस्त है। अब वह दोनों, मियाँ-बीवी, तीन महीने के लिए देश से बाहर जा रहे हैं, तो मैंने खुद ही कह दिया कि अंबर हमारे पास रह लेगी। वैसे भी वह हमारे ही ऑफिस में काम करती है, तो मुझे नहीं लगता कि कोई प्रॉब्लम होनी चाहिए।" वेदांत के डैड, बृजेश सहगल ने कहा।
"देखो, मैं एक बात साफ़-साफ़ बता देती हूँ, जो लड़कियाँ वेदांत के आसपास डोलती हैं ना, मुझे कभी पसंद नहीं आतीं और इन लड़कियों का एक ही मकसद है: मेरे भोले-भाले पोते को फँसाकर, शादी करके इस घर में आना।"
"वह ऐसी नहीं है माँ।" वेदांत की माँ वर्षा कहने लगी।
"तुम तो रहने दो। तुझ में अकल कहाँ है? तुम तो खुद उसे बहू बनकर लाना चाहती हो। मैंने तुम्हारी और बृजेश की सारी बातें सुन ली थीं। इसीलिए वह मुझे पसंद नहीं। वरना अरुण और अनीता तो मुझे हमेशा से अच्छे लगते हैं।" लक्ष्मी देवी ने कहा।
उसकी बात पर बृजेश बोलने लगा। वर्षा ने उसे इशारा करके मना कर दिया।
"जब बहू ढूँढनी हो, आप अपने बेटे की अपनी मर्ज़ी से ढूँढना। यह सिर्फ़ तीन महीने के लिए रहने आ रही है और प्लीज़ उस लड़की से ऐसी-वैसी कोई बात मत करना।" बृजेश ने अपनी माँ से कहा।
"मैं आजकल की लड़कियों को अच्छे से जानती हूँ। मैं यह नहीं कहती कि अरुण और अनीता बुरे हैं, उन्हें मैं जानती हूँ, बहुत अच्छे लोग हैं। मगर आजकल के बच्चों पर हम भरोसा नहीं कर सकते।"
"बस मैं एक बात कह देता हूँ, अगर मैंने उसे अपने बच्चे के आस-पास मँडराते देखा, तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।"
"वह ऑफिस में भी तो उसके साथ ही होती है।"
"ऑफिस की बात और है। घर में देखना, वह कैसे रहती है।" बड़ी मुश्किल से बृजेश ने अपनी माँ को मनाया था।
इस मेंशन में चार बेडरूम नीचे थे और चार बेडरूम ऊपर थे। और सबसे टॉप फ़्लोर पर, टेरेस पर एक साथ बनी हुई एक बालकनी बनी हुई थी जो चारों तरफ़ से ओपन थी, जहाँ पर वह लोग पार्टियाँ भी किया करते थे।
नीचे जो चार बेडरूम थे, उनमें से जो एक दादी का बेडरूम था, उसमें रिनोवेशन का काम स्टार्ट होने वाला था। इसलिए वह कमरा तो रहने लायक नहीं था। बाकी बचे तीन कमरे, तीनों में से एक कमरा बृजेश और वर्षा का बेडरूम था। एक रूम में दादी शिफ़्ट हुई थी और जो उसके साथ एक बेडरूम था, उसका वॉशरूम और दादी माँ के कमरे का वॉशरूम एक था, तो वह दोनों कमरे आपस में अटैच्ड थे।