Fated to be yours Ch. 2

Fated to be yours - Chapter 2

Posted by Aarya Rai • Mar 25, 2025 03:08 PM

वह खड़ूस अकड़ू लड़का वहाँ से जा चुका था। दूसरे लड़के ने उस लड़की को अस्पताल में एडमिट करवाया था। लड़की ने कई दिनों से कुछ खाया नहीं था; इसलिए उसके अंदर कमज़ोरी हो गई थी, जिस वजह से वह बेहोश हो गई थी। उसे ग्लूकोज़ चढ़ाया जाने लगा था। वह लड़का उस लड़की के वार्ड के बाहर ही बैठा था।

डॉक्टर ने लड़की को नींद का इंजेक्शन दिया था, इसलिए वह सुबह ही उठने वाली थी। रात के २ बजे लड़के का फ़ोन अचानक बज उठा था, और वह चौंक गया था। नंबर देखा तो बॉस लिखा आ रहा था—मतलब कि फ़ोन उस खड़ूस लड़के का था, जिसका नाम अथर्व सिंघानिया था। और दूसरा वाला लड़का उसका असिस्टेंट और सेक्रेटरी था, अर्नव।

अर्नव ने नाम देखते ही झट से फ़ोन उठाकर कहा,

"हैलो सर, इतनी रात को फ़ोन? कोई प्रॉब्लम?"

"वह जो लड़की आज रास्ते पर हमें मिली थी, उसके बारे में सारी जानकारी निकालो। मुझे कल शाम तक उसके बारे में सारी जानकारी चाहिए। और ध्यान रहे, वह लड़की वहाँ से कहीं जा न पाए।" एक बार फिर अथर्व की सख्त रौबदार आवाज़ उसके कानों में टकराई थी, और इसके साथ ही वह हैरानी से बोल पड़ा था,

"सर, आप इस मामूली सी लड़की में इतनी दिलचस्पी क्यों ले रहे हैं?"

"जितना कहा है उतना करो, इन फ़ालतू के सवालों के करने के पैसे नहीं देता हूँ मैं तुम्हें। चुपचाप अपना काम करो, जब वक़्त आएगा तो तुम्हें खुद सब पता चल जाएगा।" इस बार उसकी आवाज़ में गुस्सा साफ़ झलक रहा था।

अर्नव ने अपना मुँह बंद रखने में ही अपनी भलाई समझी थी और "सॉरी सर" और "ओके सर" कहकर फ़ोन काट दिया था। फ़ोन काटते ही वह खुद से बड़बड़ाया था,

"पता नहीं अब इस शैतान के दिमाग में क्या चल रहा है। बेचारी अंजान लड़की के पीछे ही पड़ गया है... छोड़ यार अर्नव... तू बस अपना काम कर, वरना वह तुझे लात मारकर अपनी कंपनी से बाहर निकाल देगा।"

उसने अपना सर झटका था और वहीं बैठे-बैठे किसी को फ़ोन करके उनसे बात करने लगा था। कुछ देर बाद उसने फ़ोन काटा था और आँखें बंद करके बैठ गया था।

अगली सुबह के छह बजे उस लड़की ने अंगड़ाई लेते हुए अपनी आँखें खोली थीं। आस-पास नज़रें घुमाते ही वह चौंक कर उठकर बैठ गई थी।

"ये मैं कहाँ आ गई?"

उसने झट से अपने कपड़े चेक किए थे। खुद को सही-सलामत देखकर उसने चैन की साँस ली थी और फिर बेड पर से नीचे उतर गई थी। ग्लूकोज़ चढ़ने से उसकी कमज़ोरी दूर हो चुकी थी और वह काफ़ी फ्रेश एंड एनर्जेटिक फ़ील कर रही थी। उसने थोड़ा याद किया था तो उसे याद आया था कि रात को वह एक गाड़ी के आगे बेहोश हो गई थी।

वह एक बार फिर आस-पास नज़रें घुमाते हुए खुद से ही बातें करने लगी थी।

"ओह! तो मैं अस्पताल में हूँ। पर आशना तेरे पास तो बिल पे करने के पैसे ही नहीं हैं। (फिर उसने रूम में नज़रें घुमाते हुए कहा था) ये रूम देखकर तो लगता है कि बहुत महँगा अस्पताल होगा। फिर तो बिल भी मोटा-तगड़ा बनेगा... भाग बेटा भाग... इससे पहले ही यहाँ कोई आ जाए और तुझे धर दबोचे, निकल जा यहाँ से।"

उसने झट से कदम गेट की तरफ़ बढ़ाए थे और जैसे ही बाहर निकली थी, बाहर काउच पर सोते अर्नव पर उसकी नज़र पड़ गई थी, पर वह वहीं लेटा सो रहा था। दरवाज़े की आवाज़ सुनकर अर्नव ने अपनी आँखें खोली थीं और गेट की तरफ़ नज़रें घुमाई थीं। सामने लड़की को देखकर वह उठकर सीधे खड़ा हो गया था। वहीं आशना ने उसे उठते देखा था तो मन ही मन बड़बड़ाया था,

"भाग आशना भाग।"

वह तेज़ कदमों से दूसरी तरफ़ बढ़ गई थी, तो अर्नव झट से उसके पीछे जाते हुए बोला था,

"हेलो, एक्सक्यूज़ मी मैडम, आप ऐसे कहाँ भागी जा रही हैं?"

आशना ने सर घुमाकर देखा था तो अर्नव उसके पीछे ही आ रहा था। यह देखकर उसने दौड़ लगा दी थी, तो अर्नव भी उसके पीछे दौड़ पड़ा था। दोनों अस्पताल के कॉरिडोर में दौड़ने लगे थे। आशना दूसरी तरफ़ घूम गई थी और सीढ़ियों से नीचे जाने लगी थी, तो अर्नव लिफ़्ट की तरफ़ बढ़ गया था।

आशना जैसे ही ग्राउंड फ़्लोर पर पहुँची थी, अपने ठीक सामने अर्नव को खड़ा देखकर उसने मुँह बिचका लिया था। तब तक अर्नव ने उसको घूरते हुए सवाल किया था,

"क्या मैं जान सकता हूँ कि सुबह-सुबह आप मुझसे यह रेस क्यों लगा रही हैं? पकड़म-पकड़ाई खेलने का मन कर रहा है मेरे साथ या ओलंपिक में भागने की प्रैक्टिस कर रही हैं?"

उसकी बात सुनकर आशना ने अपना सर झुका लिया था और मुँह लटकाकर धीरे से बोली थी,

"नहीं, वह मेरे पास पैसे नहीं हैं, आप मुझसे पैसे माँगेंगे, इसलिए मैं आपसे भाग रही थी।"

"और आपको यह किसने कहा कि मैं आपसे पैसे माँगने वाला हूँ?" अर्नव ने एक बार फिर भौंह उठाकर सवाल किया था। उसकी बात सुनकर आशना ने क्यूट सी शक्ल बनाकर कहा था,

"आपने मुझे यहाँ एडमिट करवाया था, तो अब बिल तो मुझसे ही लेंगे ना। तभी तो आप मेरे रूम के बाहर इंतज़ार कर रहे थे।"

उसकी बात सुनकर अर्नव की हँसी छूट गई थी। आशना अचरज से उसे देखने लगी थी। अर्नव ने उसके कंफ़्यूज़ एक्सप्रेशन देखे थे तो मुस्कुराकर बोला था,

"डोंट वरी, मैं बाहर इसलिए वेट नहीं कर रहा था कि अस्पताल का बिल आपसे लूँ। बल्कि मैं आपके होश में आने का इंतज़ार कर रहा था। कल रात आप मेरी गाड़ी के आगे बेहोश हो गई थीं, मैं ही आपको यहाँ लाया हूँ और अस्पताल का बिल पहले ही पे हो चुका है, तो आपको उसकी टेंशन लेने की ज़रूरत नहीं है।"

"क्या सच में आप मुझसे पैसे नहीं लेंगे?" आशना का चेहरा खुशी और एक्साइटमेंट से दमक उठा था। इस बार हैरान होने की बारी अर्नव की थी। वह मन ही मन बोला था,

"अजीब लड़की है, इतनी छोटी सी बात पर इतना खुश हो रही है।"

वह यह सोच ही रहा था, तभी आशना ने आगे कहा था,

"आपका बहुत-बहुत शुक्रिया जो आप मुझे यहाँ लाए। रात भर यहाँ रुककर मेरे होश में आने का इंतज़ार किया और अब मुझसे पैसे भी नहीं ले रहे।... वह मैं ना कल ही यहाँ आई थी और आते ही आपके शहर ने मुझे एक सरप्राइज़ दे दिया... वह कमीना बाइक वाला, मेरा बैग लेकर भाग गया। मेरा सब कुछ उसी में था, तो अब मेरे पास कुछ भी नहीं है। पुलिस से कहा तो है, पर जाने कब वह मेरा बैग ढूँढकर मुझे वापिस देंगे।"

यह कहते हुए आशना ने मुँह लटकाया था, तो अर्नव को बिल पे होने के नाम पर उसके इतने खुश होने की वजह समझ आई थी। साथ ही वह यह भी समझ गया था कि जो लड़की उसके सामने खड़ी है, वह बेहद मासूम है और यहाँ की नहीं है। उसका दिल बहुत ही साफ़ है, तभी उसने उसे सब बता दिया था। उसे उदास देख अर्नव ने मुस्कुराकर कहा था,

"आपका नाम क्या है?"

"आशना... और आपका?" आशना ने तुरंत ही सवाल किया था, तो अर्नव ने भी मुस्कुराकर जवाब दिया था,

"अर्नव... वैसे डॉक्टर कह रहे थे कि आपने शायद काफ़ी दिनों से कुछ खाया नहीं है, इसलिए आप कमज़ोरी के वजह से बेहोश हो गईं थीं, तो अगर आपको कोई एतराज़ ना हो तो हम अंदर चल सकते हैं। आप कुछ खा लीजिएगा और साथ में मुझे अपनी कहानी भी सुना दीजिएगा... चिंता मत कीजिए, खाने का बिल नहीं माँगूँगा आपसे।"

अर्नव ने मुस्कुराकर कहा था, तो आशना हँस पड़ी थी और हामी भरकर कमरे की तरफ़ बढ़ गई थी।

कुछ ही मिनट बाद आशना अस्पताल बेड पर बड़े शौक से आलती-पालती मारकर बैठी हुई थी। उसके सामने ट्रे में कई सारी डिशेज़ रखी थीं, जो उसी ने ऑर्डर की थीं और अब वह अपने होंठों पर जीभ फेरते हुए ललचाई निगाहों से उन्हें देख रही थी। उसकी बच्चों जैसे हरकत देखकर अर्नव मुस्कुराए जा रहा था।

जब आशना ने कुछ देर तक खाना शुरू नहीं किया था, तो अर्नव ने मुस्कुराकर सवाल किया था,

"क्या हुआ?... खाइए ना, सब आपके लिए ही है।"

आशना ने पहले उसे देखा था और वापिस खाने को देखते हुए स्पून उठा लिया था। कई दिनों से ठीक से खाना नहीं खाया था, तो अब वह खाने पर टूट पड़ी थी और जल्दी-जल्दी खाने लगी थी। इस चक्कर में उसका खाना सरक गया था और वह ज़ोर-ज़ोर से खांसने लगी थी। अर्नव ने तुरंत पानी का ग्लास उसके तरफ़ बढ़ा दिया था,

"पानी लीजिए।"

आशना ने ग्लास पकड़ा था और पानी पीने लगी थी। तब कहीं जाकर वह कुछ शांत हुई थी। अब अर्नव ने पीछे हटते हुए कहा था,

"आराम से खाइए, कोई आपसे छिनने वाला नहीं, सारा आपका ही है।"

उसकी बात सुनकर आशना ने उसे देखा था और मुस्कुरा दी थी। बदले में अर्नव ने मुस्कुराकर खाने का इशारा किया था, तो अब आशना ने उसके तरफ़ ट्रे खिसकाते हुए कहा था,

"आप भी खा सकते हैं, यह बहुत सारा है। माना कि मैंने कई दिनों से ढंग से खाना नहीं खाया है, मुझे ज़ोरों की भूख भी लगी है, पर मैं राक्षसी नहीं हूँ जो इतना सारा एक बार में खा जाऊँ।"

इतना कहकर वह अपनी ही बात पर हँस पड़ी थी। उसकी बात सुनकर अर्नव भी मुस्कुरा दिया था और इंकार करते हुए बोला था,

"जानता हूँ आप इंसान हैं और बहुत ही इनोसेंट हैं, पर मुझे सच में अभी नहीं खाना, आप खाइए और अगर चाहे तो खाते हुए मुझे अपने बारे में भी बता सकती हैं। जैसे आप कहाँ से हैं? यहाँ आने की वजह? यहाँ किसके साथ रहने वाली हैं? अपनी फैमिली के बारे में जो भी आप बताना चाहें।"

उसकी बात सुनकर आशना की मुस्कान फीकी पड़ गई थी, अगले ही पल दर्द भरी मुस्कान उसके लबों पर फैल गई थी। उसने ट्रे साइड करते हुए कहा था,

"मेरी फैमिली को मैं फैमिली नहीं मानती। मेरे हिसाब से परिवार वह होता है जिनके बीच प्यार, विश्वास और अंडरस्टैंडिंग हो। जो एक-दूसरे के सुख-दुख के साथी बनें। जो आपको समझे, आपका साथ दें, अगर आप गलत हैं तो आपको समझाएँ। यहाँ लोग बस मतलब के लिए आपके साथ हों, उसे परिवार नहीं कहते? जहाँ किसी को आपके जीने-मरने, आपके सुख-दुख, आपकी मुस्कान और आँसुओं से फ़र्क ना पड़े, वह परिवार नहीं हो सकता। जहाँ कोई आपको समझता ना हो, आप सही हों या गलत, हमेशा आपको गलत ठहराया जाता हो, वह मेरी नज़रों में परिवार कहलाने के लायक है ही नहीं। फिर भी मैं आपको अपने परिवार के बारे में बता देती हूँ... हम छह लोग थे उस परिवार में। मम्मी-पापा, एक बड़ी बहन, एक छोटी बहन और छोटा भाई। बाकियों का तो पता नहीं, पर मुझे कभी अपने मम्मी-पापा का प्यार और वक़्त नहीं मिला। बचपन से कोशिश करती थी कि मैं उन्हें खुश रख सकूँ, उनके सब काम करती कि शायद वह मुझे प्यार करें, तब छोटी थी ना तो सोचती थी कि अगर किसी का काम करो तो वह आपको प्यार करता है। पर फिर धीरे-धीरे मैं बड़ी हो गई और दिमाग आया कि अगर कोई काम के वजह से आपसे प्यार करे तो वह तो प्यार है ही नहीं। फिर भी अपना फ़र्ज़ निभाती गई, जन्म दिया था उन्होंने मुझे, यह एहसान तो उतारना ही था। बचपन में ज़्यादा नहीं बोलती थी, पर मेरी ख़ामोशी बहुत कुछ कहती थी, बस कभी कोई उसको समझ नहीं सका। मुझे घमंडी का तमगा पकड़ा दिया गया, साथ बदतमीज़ भी करार दिया गया। पहले दुख होता था, बुरा लगता था... अकेले में घंटों रोती भी थी, पर कभी कोई आया ही नहीं चुप करवाने, कभी किसी ने प्यार से सर पर हाथ रखकर पूछा ही नहीं कि बच्चे क्या हुआ? तू इतनी उदास क्यों है? चुप-चुप क्यों रहती है? उन्होंने नहीं पूछा तो मैंने भी नहीं बताया, फिर धीरे-धीरे मैंने एक बात सीखी कि ज़िंदगी आँसू बहाने का नहीं, दर्द में भी मुस्कुराने का नाम है, उसके बाद मैंने खुद को पूरा बदल लिया... और अब मैं जो हूँ, जैसी हूँ, आपके सामने हूँ।"

आशना ने मोहिनी मुस्कान लबों पर बिखेरते हुए कहा था, पर अर्नव को उसकी आँखों में नमी भी नज़र आ गई थी। उसकी खुशी के लिए उसने मुस्कुराकर कहा था,

"आप यहाँ क्यों आईं? और कहाँ से हैं?"

"मैं दिल्ली से हूँ, चाँदनी चौक में मेरी फैमिली रहती है। मेरा सपना है कि मैं इंडिया की सबसे बड़ी डांस अकादमी खोलूँ। उसके लिए मैं सालों से पैसे जमा कर रही थी, पर फिर अचानक ही मेरे पापा ने मेरे सर पर शादी नाम का बम फोड़ दिया। मुझे शादी नहीं करनी थी, मैंने मना भी किया, पर लड़का बड़ी दीदी के ससुराल का लगता है, इसलिए सबने मुझे फ़ोर्स किया। मेरा घर से बाहर निकलना बंद करवा दिया गया था, गुस्से में मैंने हाँ तो बोल दी थी, पर मेरा दिल नहीं माना... बहुत दिनों से मौके की तलाश में थी। परसों शादी थी मेरी, तब कमरे में सिर्फ़ मैं थी। बाकी सब काम में लगे थे, मुझे जिस मौके की तलाश थी, वह मुझे मिल गया था और मैं कुछ कपड़े और पैसे लेकर खिड़की से कूदकर भाग गई थी। रेलवे स्टेशन जाकर मुंबई की टिकट ली थी, स्टेशन पर वह पुलिस लेकर पहुँच गए थे, पर मैं बचकर भाग गई थी। कहते हैं मुंबई सपनों की नगरी है। मैं भी यहाँ अपने सपने को पूरा करने आई थी, मेरे सारे गहने, पैसे, कपड़े सब उस बैग में थे, जो वह कमीना बाइक वाला चोर लेकर भाग गया था। अब मेरे पास इन कपड़ों के अलावा कुछ भी नहीं है। सोचा तो था कि कोरियोग्राफ़र बनकर अपना करियर शुरू करूँगी, खूब पैसे कमाऊँगी। फिर अपनी अकादमी खोल लूँगी, पर मेरे सारे सपने टूट गए। अब तो पहले रहने और खाने का जुगाड़ करना पड़ेगा, उसके लिए पैसे चाहिए और उनके लिए अब मेहनत करनी पड़ेगी। यही है मेरी कहानी।"

यह कहते हुए उसने अंगड़ाई ली थी और टेबल पर रखा काँच का ग्लास ज़मीन पर गिर गया था। आशना ने घबराकर नीचे देखा था और अपना सर पीटते हुए बोली थी,

"फैल गया रायता... आशना की बच्ची, तू कभी नहीं सुधर सकती है। तेरे ना हाथ-पैरों को बाँधकर रखना चाहिए, जब देखो कुछ ना कुछ तोड़ती-फोड़ती रहती है।"

वह खुद पर ही गुस्सा करने लगी थी, तो अर्नव उसे हैरानी से देखते हुए बोला था,

"इट्स ओके, एक ग्लास ही तो था। इतना गुस्सा करने वाली क्या बात है इसमें?"

"आपको नहीं पता। अभी तक मैंने आपको अपनी सबसे बड़ी ख़ासियत तो बताई ही नहीं है ना। चाँदनी चौक में सब मुझे चलता-फिरता भूचाल कहते थे और एक नाम है मेरा, मिस तोड़-फोड़... जहाँ जाती हूँ, कुछ ना कुछ तोड़ती-फोड़ती ही रहती हूँ। चाहे कितनी ही कोशिश करूँ, पर यह आदत छूटती ही नहीं है। (अब उसने नीचे पड़े ग्लास को देखते हुए कहा था, जो टूटकर बिखर चुका था) नमूना आपके सामने है। देखिए, बैठे-बैठे मैंने इस ग्लास का अंतिम संस्कार कर दिया।"

आशना एक बार फिर नॉनस्टॉप बोले जा रही थी। वहीं अर्नव उसे देखकर सोच में पड़ गया था कि जिस लड़की के सीने में इतना दर्द छुपा हो, क्या वह ऐसी बिंदास हो सकती है? उसने अपना दिमाग झटका था, फिर आशना को देखकर बोला था,

"इट्स ओके... एक ग्लास ही था, आप खाना खाइए।"

आशना ने उसे देखा था तो उसने मुस्कुराकर खाना खाने का इशारा कर दिया था। आशना वापिस खाना खाने लगी थी।

"आप खाना खाइए, मैं एक फ़ोन करके आता हूँ।"

आशना ने उसकी बात सुनकर हाँ में सर हिला दिया था, तो अर्नव रूम से बाहर निकल गया था। उसने अथर्व को फ़ोन लगाया था और जो भी आशना ने उसे बताया था, वह सब उसे बता दिया था। अथर्व शांति से उसकी बात सुनता रहा था, उसके बाद हमेशा वाली सख्त आवाज़ में बोला था,

"अपने आदमियों से इसकी छानबीन करवाओ, कहीं झूठ तो नहीं बोल रही?"

"सर, वह लड़की बहुत मासूम है, उसकी आँखों में मैंने सच्चाई देखी है। वह अपने दिल में कुछ नहीं रखती, सब बता देती है। मुझे नहीं लगता वह झूठ कह रही है। फिर भी मैं अपने आदमियों को काम पर लगा देता हूँ। शाम तक आपको सारी सच्चाई पता चल जाएगी।"

अर्नव ने बड़े ही आत्मविश्वास के साथ जवाब दिया था। उसका जवाब सुनकर अथर्व कुछ देर खामोश रहा था, फिर आगे बोला था,

"उस लड़की का ध्यान रखना।"

अर्नव ने "ओके सर" कहा था, तो अथर्व ने फ़ोन काट दिया था। बेचारा अर्नव एक बार फिर कंफ़्यूज़ हो गया था कि उसके बॉस के दिमाग में आखिर चल क्या रहा है?

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