Heartless ज़ेन मालवीया - Chapter 2
उस आदमी ने एक हाथ से धानी के बाजू को कसकर पकड़ा हुआ था और दूसरे हाथ में धानी के हाथों में पकड़ा हुआ दूध का गिलास ले लिया।
वो गुस्से में धानी की आँखों में देखकर कहता है, "तुम्हारी इतनी औकात नहीं कि तुम जैन मालवीय की पत्नी बन सको। अब सच-सच बताना, क्या जादू किया है तुमने मेरे दादाजी के ऊपर? जो उन्होंने जबरदस्ती तुम्हें मेरे गले में बाँध दिया है?"
धानी घबरा गई। उसने अपने आप को जैन की पकड़ से आजाद करने की कोशिश की।
उसकी आँखों में आँसू आ गए थे और वह घबराते हुए जैन को देखकर घबराई हुई आवाज़ में कहती है, "नहीं जी, आप गलत समझ रहे हैं। मैंने कुछ भी नहीं किया है। आपके दादाजी ने खुद मेरे सामने शादी का प्रस्ताव रखा था।"
जैन गुस्से से अपने दाँत पीसते हुए कहता है, "अगर मेरे दादाजी ने तुम्हारे सामने शादी का प्रस्ताव रखा था, तो तुम उसे इनकार कर देती। तुम्हें हाँ कहने की क्या ज़रूरत थी? तुम्हें उस इंसान के साथ शादी कैसे कर सकती हो? जिसे तुमने कभी देखा तक नहीं है और न ही उसके बारे में कुछ जानती हो।"
"ओह, अब पता चला कि क्यों तुमने मुझसे शादी करने के लिए हाँ कही थी, क्योंकि तुम्हें मेरी दौलत नज़र आई थी। तुम्हें पता था कि मैं एक अमीर घर का लड़का हूँ और मेरे पास बेइंतिहा दौलत है। जिस दौलत पर तुम ऐश करके सारी ज़िंदगी रानी की तरह रहोगी। अब मुझे तुम्हारे इरादे अच्छी तरह से समझ में आ गए हैं। इसीलिए तुमने मेरे दादाजी के सामने ये अच्छाई का मुखौटा पहना हुआ था, पर मुझे पता चल गया है कि तुम एक नंबर की लालची लड़की हो।"
"पैसे और दौलत के लिए तुम किसी के साथ भी शादी करने के लिए तैयार हो जाती हो। बताओ, कितने पैसे चाहिए तुम्हें? मैं तुम्हें दूँगा। बोलो, कितने पैसे चाहिए तुम्हें? मेरी ज़िंदगी जाने के लिए..!"
धानी का पूरा चेहरा आँसुओं से भर गया था। उसका दिल टूट गया था। वह हताश भरे चेहरे के साथ जैन को देख रही थी। उसे लगा नहीं था कि जैन उससे ऐसी बात करेगा।
पहले तो उसे लगा कि जैन शायद किसी बात से नाराज़ है, लेकिन उसकी बातों से धानी को पता लग गया था कि जैन उससे नफ़रत करता है, लेकिन क्यों? उसने तो कुछ भी नहीं किया है।
जैन के दिल में धानी के लिए कितनी बड़ी गलतफ़हमी है। यह सोचकर धानी और ज़्यादा निराश हो गई थी। वह उससे कहना चाहती थी कि वह ऐसा कुछ भी नहीं सोचती है। उसे तो पता भी नहीं था कि उसकी शादी किसके साथ होने जा रही है? ऐसे में वह किसी को धोखा कैसे देगी? उसे तो यह भी नहीं पता था कि दादाजी असल में कौन हैं? वह तो शादी वाले दिन ही उसे इस बात का पता चला था।
धानी रोते हुए जैन की तरफ़ देखकर बोली, "आप गलत समझ रहे हैं जी! मेरा इरादा आपको तकलीफ पहुँचाने का बिल्कुल भी नहीं था और मेरे दिल में ऐसा कुछ भी नहीं है! ना ही मैंने आपसे शादी किसी लालच में की है और ना ही मुझे पैसों की कोई चाहत है। मैंने तो दादाजी की खुशी के लिए शादी की थी।"
"उन्होंने खुद मुझसे शादी के लिए कहा था और कहा था कि आपको भी शादी से कोई परेशानी नहीं होगी! अब भी अपनी मर्ज़ी से शादी कर रहे हैं, अगर मुझे पता होता कि आप यह शादी नहीं करना चाहते हैं, तो मैं यह शादी कभी नहीं करती, मेरा यकीन कीजिए..!"
जैन गुस्से में धानी के बाजू को और कसकर दबाते हुए कहता है, "यकीन करूँ? तुम्हारा यकीन करूँ? क्यों करूँ मैं तुम्हारा यकीन? लगती कौन हो तुम मेरी? बीवी? मैं तुम्हें अपनी बीवी नहीं मानता हूँ और किसी अनजान लड़की पर भरोसा करने की आदत नहीं है मेरी।"
धानी की आँखों में आँसू जैन की बातें सुनकर और ज़्यादा बढ़ गए थे। वह हैरानी से जैन को देख रही थी।
जैन ने अपने हाथों में पकड़े हुए दूध के गिलास को अगले ही पल ज़मीन पर फेंक दिया और गिलास में पड़ा हुआ दूध पूरे फर्श पर फैल गया।
जैन गुस्से में धानी के हाथ को खींचता हुआ उसे बालकनी की तरफ़ ले गया। वह गर्म दूध, जो नीचे फर्श पर गिरा हुआ था, धानी के पैर उस गर्म-गर्म दूध के ऊपर पड़ गए थे और उसके पैरों में तेज जलन का एहसास हो रहा था।
धानी का पूरा चेहरा दर्द से लिपट चुका था। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे। शादी की पहली रात के लिए उसने क्या-क्या सपने सजाए हुए थे? लेकिन उसके सारे सपने यहीं टूट चुके थे।
जैन धानी को खींचता हुआ बालकनी में ले गया और बालकनी का दरवाज़ा खोलकर, उसे बालकनी में लगे सोफ़े पर धकेल दिया। धानी संभल नहीं पाई और सीधे सोफ़े पर जाकर गिर गई।
जैन गुस्से में धानी को देखकर कहता है, "यही तुम्हारी जगह है, मेरी ज़िंदगी और मेरे कमरे से बाहर। रात का वक़्त है, इसीलिए तुम्हें घर से बाहर नहीं निकाल सकता हूँ, लेकिन कमरे से तो बाहर निकाल सकता हूँ ना।"
"चुपचाप बालकनी में पड़ी रहो। और हाँ, यहाँ बैठकर रोना-धोना मत शुरू कर देना! वो क्या है ना, मेरी नींद बहुत कच्ची है। हल्की आवाज़ से मेरी नींद टूट जाती है। मैं नहीं चाहता हूँ कि तुम्हारे रोने की आवाज़ मेरे कानों में आए और मेरी नींद में डिस्टर्बेंस हो। अगर मेरी बात समझ गई हो, तो अच्छी बात है और नहीं भी समझी हो, तो मुझे इन सब से फ़र्क नहीं पड़ता है। मुझे जो कहना था, वो कह दिया है।"
इतना कहकर जैन वापस कमरे में चला गया और दरवाज़ा बंद कर लिया।
धानी अपनी आँखों में आँसू लिए हुए उस बंद दरवाज़े को देख रही थी। खुली बालकनी में ठंडी-ठंडी हवाएँ चल रही थीं और धानी को ठंड भी लग रही थी। उसने अपने दोनों हाथों को क्रॉस करते हुए अपने बाजू पर रखा और खुद में ही सिमटने लगी।
बालकनी में कुछ था भी नहीं। ना कोई ब्लैंकेट और ना ही कोई चादर, जिसे वह खुद को गर्मी का एहसास करवा सके। ऊपर से वह इतने हैवी जोड़े में बैठी हुई थी। उसकी नज़र रह-रह कर उस बंद दरवाज़े की तरफ़ जा रही थी। आँखों से आँसू तो बह रहे थे, लेकिन होंठ बिल्कुल खामोश थे।
क्योंकि जैन ने उसे धमका कर गया था कि उसे नींद में धानी की आवाज़ नहीं आनी चाहिए। इसलिए धानी ने अपने मुँह से एक सिसकी तक नहीं निकलने दी, लेकिन आँखों के आँसू बता रहे थे कि वह अंदर से कितनी टूट चुकी है।
दुल्हन के जोड़े में, बालकनी में बैठी हुई, ठंड को गले से लगाते हुए धानी अपने गुज़रे एक हफ़्ते के बारे में सोच रही थी।
एक हफ़्ते पहले तक तो उसकी ज़िंदगी में सब कुछ ठीक था। कोई भी परेशानी नहीं थी। उसकी ज़िंदगी वैसे ही चल रही थी जैसे कि चलती आ रही थी। पर उसे क्या पता था कि उसकी एक हरकत से उसकी पूरी ज़िंदगी बदल जाएगी।
एक हफ़्ते पहले तक धानी मालवीय अनाथ आश्रम में एक केयरटेकर थी। हाँ, वह फ़िलहाल वहाँ पर एक केयरटेकर ही थी, लेकिन उससे पहले वह भी उस अनाथ आश्रम में रहा करती थी।
धानी एक अनाथ लड़की है और बचपन से ही उस अनाथ आश्रम में ही पली-बढ़ी है। अनाथ आश्रम में हर चीज़ उसे बहुत अच्छे से पता है। वहाँ की हर एक टीचर, हर एक मेंट्रेन से लेकर, हर साल आने वाले गेस्ट, धानी हर किसी को जानती है, लेकिन 18 की होने के बाद, धानी का अनाथ आश्रम छोड़ना ही पड़ा।
लेकिन वह इस जगह को नहीं छोड़ना चाहती थी, जिसे वह अपना घर कहती है। इसीलिए उसने इस अनाथ आश्रम में केयरटेकर की जॉब करना शुरू कर दिया। सैलरी ज़्यादा नहीं थी, लेकिन धानी वहाँ पैसों के लिए काम नहीं करती थी। ऊपर से वह बच्चों का और बाकी सब चीज़ों का बहुत अच्छे से ख्याल रखती थी।