इश्क़-ऐ-बाजार Ch. 1

रेड लाइट एरिया की कोहिनूर - Chapter 1

Posted by unicorngirl ✔️ • May 12, 2025 01:45 PM

मुंबई, कमाठीपुरा

कमाठीपुरा, मुंबई का वह इलाका है जिसे शहर के सबसे पुराने और कुख्यात रेड लाइट एरिया के नाम से जाना जाता है। संकरी गलियों से भरा हुआ यह इलाका, इतिहास के कई दर्दनाक पन्नों को अपने भीतर समेटे हुए था।

यहाँ की इमारतें बूढ़ी हो चुकी थीं — जर्जर दीवारों और पुरानी खिड़कियों में अब कोई सपना नहीं झाँकता था। हर मोड़, हर कोना एक अनकही कहानी सुनाता था — बेआवाज चीखों और थकी हुई मुस्कानों की।

दिन में यह इलाका शांत लगता था, लेकिन वह सन्नाटा बेचैनी से भरा होता था। जैसे सब कुछ थमा हुआ था, मगर अंदर ही अंदर कुछ टूट रहा था। और जब रात उतरती थी, तो यह खामोशी चटख रंगों में बदल जाती थी — चमकते मेकअप, झिलमिलाती लाइट्स और बनावटी हँसी के पीछे छुपे दर्द के साथ।

यहाँ हर लड़की का चेहरा एक चेहरा नहीं, बल्कि एक मुखौटा था — जो किसी मजबूरी, किसी धोखे या किसी सौदे का नतीजा था। कमाठीपुरा में ‘इंसान’ को ‘चीज़’ में बदला जाता था — और यह सब बेहद सधे, ठंडे, और व्यवस्थित तरीके से होता था।

यह एक ऐसा इलाका था जहाँ वक्त रुकता नहीं था, लेकिन जिंदगी आगे बढ़ती रहती थी।

कमाठीपुरा की एक पुरानी गली। लेकिन यह बाकी गलियों से थोड़ी अलग थी — यहाँ का सन्नाटा थोड़ा शांत था, और हवा में बस एक हल्का-सा इत्र घुला हुआ था।

ऊपर पहली मंजिल की खिड़की से कोई लड़की बाहर देख रही थी। चेहरा साफ़ नहीं दिखता था, पर उसकी आँखों में कुछ अलग था — न वह बेचैन थी, न कोई मजबूरी, बस एक गहराई थी।

वह थी — कोहिनूर।

नाम जितना चमकदार, उसकी ज़िन्दगी उतनी ही सादगी भरी थी। कमाठीपुरा में रहते हुए भी वह इस काम का हिस्सा नहीं थी। यह बात यहाँ सब जानते थे — उसकी आँखों में एक ऐसा सपना था जो अब तक टूटा नहीं था।

कोहिनूर यहीं पर बड़ी हुई थी। उसकी माँ कभी इसी धंधे का हिस्सा थीं, लेकिन उन्होंने हमेशा कोशिश की कि कोहिनूर की किस्मत इस रास्ते पर न जाए। माँ अब नहीं थीं, मगर कोहिनूर ने उनकी बात को अब तक थामे रखा था।

वह गली में बच्चों को पढ़ाती थी, बुजुर्गों के लिए दवाई लाती थी और हर उस काम से खुद को जोड़ती थी जो कमाठीपुरा की तंग गलियों में इंसानियत को जिंदा रखता था।

कमाठीपुरा के बारे में बाहर की दुनिया को सिर्फ एक चेहरा दिखता था — औरतें, देह, और सौदे।

पर सच्चाई यह थी कि इन गलियों में सिर्फ जिस्म नहीं, रूहें भी रहती थीं।

यहाँ दर्द भी था, लेकिन अपनेपन की एक मद्धम लौ भी जलती थी।

और उस लौ को सहेज कर रखने वालों में से एक थी — कोहिनूर।

जहाँ रूह बिक जाती है वहाँ दुआएँ भी काम नहीं आतीं। लोगों का ऊपर वाले से भरोसा तक उठ जाता है क्योंकि उनका इंसानियत से ही भरोसा उठ जाता है।

पर कोहिनूर ने ना खुद से भरोसा खोया था, और ना ही ऊपर वाले से।

"हे भगवान। मुझे केवल तुम पर यकीन है। आज की सुबह इतनी खुशनुमा करने के लिए शुक्रिया। लेकिन अंदर एक अजीब सी बेचैनी है। क्या आज का दिन भी बाकी दिनों की तरह मुझे बचाए रखेगा?"

"पर मुझे तुम पर यकीन है। जैसे आज तक तुमने मेरा साथ नहीं छोड़ा है, वैसे आगे भी मेरा भरोसा टूटने नहीं दोगे।"

कोहिनूर की आँखों से दो आँसू बह निकले थे। वह चुपचाप अपने गालों पर बहते आँसुओं को महसूस कर रही थी। उसका दिल नहीं चाहता था कि उसकी सुबह ऐसी हो। आँसुओं के साथ।

उसने आँखें खोलीं तो देखा — सामने से धूप की हल्की किरणें कमरे में आ रही थीं। वह खिड़की से उठी और छत पर चली गई, जहाँ आसमान बिल्कुल साफ़ था और सूरज चमक रहा था।

कोहिनूर ने सूरज की तरफ़ देखा, फिर धीरे से मुस्कुराई — लेकिन वह मुस्कान भी थोड़ी उदासी से भरी थी।

आसमान में उड़ते हुए उन आज़ाद पंछियों को देखकर कोहिनूर ने खुद के मन में कहा — "ये पंछी ही तो आज़ाद गगन में उड़ रहे हैं। इन्हें भी तो कैद होने का डर नहीं है। तो फिर मुझे किस बात का डर है?"

उसने खुद से कहा और अपनी ही बात पर हल्के से हँस दी।

लेकिन जब उसकी निगाहें नीचे आँगन में पड़ीं, तो वही नज़ारा — एक लड़की को जबरदस्ती किसी आदमी के साथ ले जाया जा रहा था। उसकी आँखों में डर था, और उस आदमी की आँखों में हवस।

इस कोठी की मालकिन थी माई जान, जो हर लड़की को पैसों में तौलती थी। और जिस लड़की को ले जाया जा रहा था, उसका नाम था अलका — खूबसूरत और सबकी पसंद। पर उसकी खूबसूरती ही उसकी सबसे बड़ी दुश्मन थी।

लेकिन कोहिनूर। वह आज भी चाहती थी कि उसका नाम उस लिस्ट में न आए।

वापस अपने छोटे से कमरे में आकर कोहिनूर बेड पर बैठ गई और साइड से एक किताब निकालकर पढ़ने लगी। उसे पढ़ना बहुत पसंद था। इन किताबों के ज़रिए ही तो वह बाहर की दुनिया से जुड़ी थी। आज फिर से अपनी किताबों में खुद को गुम करती कोहिनूर आज के दिन के खत्म होने का इंतज़ार कर रही थी कि तभी…

इतने में किसी ने दरवाज़ा खटखटाया।

"कोहिनूर। उठ जा, माई बुला रही है।" दरवाज़े पर उसकी सहेली थी — वैशाली, जो इस कमरे में उसके साथ रहती थी।

"इतनी सुबह-सुबह क्यों?" कोहिनूर ने मन में कहा, लेकिन उसका दिल अंदर से धड़कने लगा था। उसने जाकर दरवाज़ा खोला तो वैशाली कमरे में आ गई और उससे बोली, "तू अभी तक तैयार नहीं हुई? माई तुझे जल्दी बुला रही है।"

फिर वैशाली ने साइड में रखा दुपट्टा कोहिनूर के कंधे पर रखते हुए उसे समझाना शुरू किया।

"देख, जब उससे मिलना तो ‘माई’ कह देना, वो खुश हो जाती है," वैशाली ने धीरे से समझाया।

लेकिन कोहिनूर जानती थी — वह ऐसा नहीं कहेगी। उसके लिए वह एक औरत नहीं, एक सौदागर थी। औरतों की बोली लगाने वाली।

कोहिनूर इस कोठी में तब से थी जब वह आठ साल की थी। उसने यहाँ सब देखा था — कैसे लड़कियों की ज़िन्दगी बिक जाती है, कैसे सपनों का सौदा होता है।

लेकिन इस कोठी की कर्ताधर्ता माई जान थीं। और उनके बुलावे को कोहिनूर इग्नोर नहीं कर सकती थी। वह धीरे-धीरे माई जान के कमरे के बाहर पहुँची।

"आपने बुलाया?" उसने दरवाज़े के बाहर से ही कहा।

माई जान मुस्कुरा दीं, लेकिन उस मुस्कान में कोई अपनापन नहीं था — बस मतलब था।

"मेरी चमकती कोहिनूर! आज एक बड़ा ग्राहक आया है। तुझे देखना चाहता है।"

कमरे में चंदा भी बैठी थी। माई जान के बाद वही थी जो इस कोठी के सारे फ़ैसले लिया करती थी — या यूँ कहें कि खुद को यहाँ की होने वाली माई जान समझती थी। जो हमेशा प्यारी मुस्कान लिए रहती थी, लेकिन कोहिनूर को उसकी मुस्कान भी झूठी लगती थी।

"तू सबसे सुंदर है, लेकिन कुछ करती नहीं। अब वक्त आ गया है। तुझे भी थोड़ा काम करना चाहिए। अरे, कब तक हम सब मिलकर तेरा खर्चा उठाते रहेंगे?" माई जान ने नोटों के बंडल को अलमारी में रखते हुए कहा।

कोहिनूर का दिल अजीब सी घबराहट और डर से भर गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसे क्यों बुलाया जा रहा है। वह कभी भी इस काम का हिस्सा नहीं रही — और इसकी एक वजह थी पूजा, यानी कोहिनूर की माँ।

"लेकिन आपने मेरी माँ से वादा किया था कि आप मुझे कभी इस काम में नहीं धकेलेंगी। क्या आप अपना वादा तोड़ रही हैं? क्या भूल गईं कि आपने मेरी मरती हुई माँ को वचन दिया था कि आप मुझे इस काम का हिस्सा नहीं बनाएंगी?" कोहिनूर ने काँपती हुई आवाज़ में सवाल किया।

माई उसकी तरफ़ देखते हुए बड़ी-बड़ी आँखों से बोलीं, "मुझे अपना वादा अच्छी तरह याद है। तेरी माँ ने कई सालों तक इस कोठी में काम किया है, और आखिरी वक्त में उसने मुझसे वादा लिया था कि मैं उसकी बेटी की सही देखभाल और परवरिश करूँ और उसे कभी इस काम का हिस्सा नहीं बनाऊँगी। मैं आज तक उस वादे पर कायम हूँ। क्योंकि मैंने उससे आखिरी समय पर यह कहा था कि जब तक उसकी बेटी समझदार नहीं हो जाती, तब तक वह इस काम का हिस्सा नहीं बनेगी।"

"मुझे अपना वादा याद है। पर क्या तुझे उस वादे के पूरे शब्द याद हैं या नहीं?" कोहिनूर का दिल काँप उठा। यह सच था — भले ही माई जान ने कोहिनूर की माँ से वादा किया था, लेकिन वह वादा सिर्फ़ तब तक था, जब तक कोहिनूर बालिग नहीं हो जाती। उसकी अठारह साल की उम्र तक ही उस वादे की कीमत थी। वरना उसके बाद तो कोहिनूर की भी एक कीमत तय होनी थी।

फिर माई हल्के मजाकिया लहजे में बोलीं, "अरे तू फ़िक्र क्यों कर रही है? वहाँ कोई सौदेबाज़ी नहीं हो रही। एक छोटी सी महफ़िल है। अरे क्या कहते हैं उन बड़े लोगों में… हाँ, पालर्टी है।"

उसकी बात पर चंदा हँसते हुए बोली, "माई, पालर्टी नहीं, पार्टी है।"

माई ने भी हँसते हुए कहा, "हाँ हाँ, जानती हूँ, वही अंग्रेज़ी पालर्टी।"

"और वहाँ नाचने का प्रोग्राम है। तुझे बस वहाँ जाना है और अपने नृत्य का एक अच्छा सा प्रदर्शन देना है। बदले में वो बहुत पैसे देंगे।"

"क्या मैं अकेली जा रही हूँ?" कोहिनूर की आवाज़ हल्की काँप गई।

"नहीं, और भी लड़कियाँ जाएँगी — सरिता, आलिया, जोया… सब," चंदा ने कहा।

"फिर मुझे क्यों भेज रही हैं? मैं तो वैसी ख़ास नहीं हूँ। और मुझे तो ठीक से नाचना भी नहीं आता।"

चंदा ने उसकी आँखों में देखा और पूछा, "तेरी उम्र क्या है?"

"सत्रह।" कोहिनूर ने धीरे से कहा।

"तो समझ जा। अब तू सबसे छोटी है। सबसे मासूम। और यही मासूमियत… बहुत कीमती है।"

100%