बेजुबान और अनाथ आराध्य
ऋषि के कमरे में आराध्या, ऋषि और प्रियंका की तस्वीरों को गौर से देख रही थी। भले ही वह ऋषि को नहीं जानती थी, पर वह उसका पति तो था ही। अपने पति को किसी और लड़की के इतने करीब देखकर आराध्या के मन में एक टीस उठी। इन सभी तस्वीरों में ऋषि काफी हँसमुख और खुश नज़र आ रहा था। पर कल रात से, जब से वह ऋषि से मिली थी, उसने ऋषि का केवल गुस्से वाला रूप ही देखा था। आराध्या इन तस्वीरों को गौर से देख ही रही थी कि तभी उसके कमरे का दरवाज़ा खुला और ऋषि अंदर आया। ऋषि ने वहाँ आराध्या को अपनी और प्रियंका की तस्वीरों के पास देखा और थोड़ी रूखी आवाज़ में कहा,
"तुम यहाँ क्या कर रही हो?"
आराध्या ने जब दरवाज़े की तरफ़ देखा तो वहाँ ऋषि खड़ा था। उसने ऋषि को देखा और फिर अपनी गर्दन नीचे कर ली।
ऋषि आराध्या के पास आया और फिर से अपनी सख्त आवाज़ में कहा, "तुम मेरे कमरे में क्या कर रही हो?"
आराध्या ने कुछ नहीं कहा, वह वैसे ही सर झुकाए खड़ी रही।
इतने में पीछे से नीमो आई और ऋषि के कमरे में आते हुए बोली, "छोटे साहब, मालकिन ने इसे आपके कमरे में भेजा है।"
"कोई ज़रूरत नहीं है। इसे सामने वाले कमरे में ले जाओ। मुझे मेरे कमरे में किसी का होना बर्दाश्त नहीं।"
नीमो धीरे से आई, आराध्या का हाथ पकड़कर उसे अपने साथ सामने वाले कमरे में ले गई। वह कमरा भी काफी अच्छा था, हाँ, उसमें ऋषि के कमरे जैसी सुविधाएँ नहीं थीं, लेकिन वह कमरा काफी खूबसूरत था। आराध्या के दिमाग में अभी भी ऋषि और उस लड़की की तस्वीरें चल रही थीं जो उसने ऋषि के कमरे में देखी थीं। नीमो नाश्ते की प्लेट टेबल पर रखी और आराध्या से कहा,
"हाथ-मुँह धोकर नाश्ता कर लो। मैं तब तक तुम्हारे लिए कपड़े लेकर आती हूँ।"
आराध्या उस कमरे को गौर से देख रही थी, इधर-उधर घूम रही थी। उसके कमरे में बड़ी माँ और नीमो दोनों आईं।
बड़ी माँ ने आराध्या को यूँ गौर से कमरा देखते हुए कहा, "तुम्हें पसंद आया?"
आराध्या उनकी तरफ़ देखती है और एक छोटी सी मुस्कान के साथ अपना सिर हाँ में हिलाती है।
बड़ी माँ और नीमो अपने पास कुछ कपड़े लेकर आई थीं, जो उन्होंने रख दिए।
बड़ी माँ आराध्या के पास आई और उसका हाथ पकड़कर सोफ़े पर बिठाया और प्यार से उसके सर पर हाथ फेरते हुए बोली,
"मैं जानती हूँ ऋषि ने तुम्हें अपने कमरे में नहीं रहने दिया, तुम्हें बुरा लगा होगा।"
आराध्या अपना सिर ना में हिलाती है और यह बताती है कि उसे बुरा नहीं लगा।
बड़ी माँ आराध्या से कहती है, "देखो बेटा, मैं समझ सकती हूँ, तुम्हारी और ऋषि की शादी के हालात में हुई है। न वह तुम्हें अपना पा रहा है और न तुम उसे अपना पा रही हो। मैं तो यह कहूँगी, अपने रिश्ते को थोड़ा वक़्त दो। देखना, एक दिन वह खुद तुम्हें अपने कमरे में ले जाएगा।"
बड़ी माँ कपड़ों की तरफ़ इशारा करते हुए कहती है, "ये कुछ कपड़े हैं। फ़िलहाल तो मेरे से काम चला लो, कल हम तुम्हारे लिए शॉपिंग करेंगे।"
आराध्या अपना सिर हाँ में हिलाती है। बड़ी माँ उसके सर पर प्यार से हाथ फेरती है और उस कमरे से चली जाती है।
आराध्या उन कपड़ों में से एक साड़ी का सेट लेती है और बाथरूम में चली जाती है। थोड़ी देर बाद आराध्या नहा-धोकर ड्रेसिंग टेबल के सामने खुद को तैयार करती है। अपने बाल सुखाने के बाद उसने अपने चेहरे पर हल्का सा क्रीम लगाया। तभी उसका ध्यान अपने गले पर गया जहाँ ऋषि के नाम का मंगलसूत्र था। बाथरूम से नहाकर आई थी, तब उसने अपने खाली माँग को देखा तो ड्रेसिंग टेबल पर सिंदूर ढूँढने लगी, पर उसे सिंदूर कहीं नहीं मिला। थक-हारकर उसने ढूँढना छोड़ दिया। उसने नाश्ता किया। उसके बाद वह सीधे अपने कमरे चली गई।
अपने कमरे में फ्रेश होकर नीचे आई तो उसे सोफ़े के पास सूरज कुछ काम करते हुए दिखाई दिया। ऋषि ने सूरज से कहा,
"सूरज, आगे का क्या अपडेट है?"
"सर, गौतम अग्रवाल अपने सभी पार्टनर्स के साथ मिलकर अपने बिज़नेस को आगे बढ़ाने की प्लानिंग कर रहा है।"
"पता करो उसे फ़ाइनेंस कहाँ-कहाँ से मिल रहा है और उसके सारे फ़ाइनेंसर और बिज़नेस पार्टनर को अपनी तरफ़ करो। और हाँ, एक और काम है तुम्हारे लिए।"
"जी सर।"
"उस लड़की की सारी डिटेल निकलवाओ।"
सूरज (कन्फ़्यूज़ होते हुए): 🤔 "किसकी डिटेल निकालूँ?"
ऋषि अपनी कठोर नज़रों से सूरज को देखता है।
"आराध्या की डिटेल निकलवाओ! 😠"
सूरज (मन ही मन मुस्कुराते हुए): "अपनी बीवी का नाम इतने डरावने तरीके से ले रहे हैं, सीधे-सीधे नहीं बोल सकते, 'मेरी वाइफ़ की डिटेल निकलवाओ'।"
पर सूरज अपने ख्यालों को वहीं रोक लेता है क्योंकि उसे मालूम था कि अगर वह यह सब बोलेगा तो ऋषि उसकी क्या हालत करेगा।
इतने में बड़ी माँ और नीमो किचन से आती हैं और ऋषि से कहती हैं,
"ऋषि, बेटा, नाश्ता कर लो। सूरज, तुम भी आ जाओ।"
ऋषि और सूरज दोनों डाइनिंग टेबल की तरफ़ चले जाते हैं। दोनों अपना नाश्ता कर ही रहे होते हैं कि इतने में सीढ़ियों से आराध्या नीचे आ रही होती है।
नीमो की नज़र आराध्या पर पड़ती है तो वह बड़ी माँ से कहती है,
"मालकिन, लगता है आपके घर में धन-दौलत की कमी आ गई है।"
नीमो के ऐसा कहने पर बड़ी माँ, सूरज और ऋषि तीनों नीमो की तरफ़ देखते हैं। नीमो सबको अपनी तरफ़ देखते हुए बड़ी माँ से कहती है, "नहीं, जो दिख रहा है वही बोल रही हूँ।"
"ऐसा क्या देख लिया तूने जिसे देखकर तू यह कह रही है कि हमारे घर में धन-दौलत की कमी है?"
नीमो सीढ़ियों की तरफ़ इशारा करती है।
सबका ध्यान सीढ़ियों पर जाता है जहाँ आराध्या धीरे-धीरे कदमों से नीचे आ रही थी। बड़ी माँ ने पहले आराध्या को देखा और फिर नीमो को देखा और बोली,
"बोलना क्या चाहती है, साफ़-साफ़ बोल।"
"यही कि, अपनी शादी को ठीक से बारह घंटे भी नहीं हुए और दुल्हन यूँ ही घूम रही है। देखो ना, आँखों में काजल, माथे पे बिंदी, ना माँग में सिंदूर। बिना सिंगार के घूम रही है। बस इसीलिए कहा कि शायद धन-दौलत की कमी हो गई हो, जो आपकी दुल्हन बिना श्रृंगार के घूम रही है।"
आराध्या नीमो की बात सुन लेती है। वह बड़ी माँ के पास आती है और उससे इशारे में कहती है कि उसके पास श्रृंगार का कोई सामान नहीं है।
बड़ी माँ आराध्या की बात समझती है और नीमो की तरफ़ घूरकर देखती है और कहती है, "इस घर में कितनी सुहागिन हैं?"
"बड़ी मालकिन, सुहागिन तो इस घर में कोई भी नहीं है।"
"जब घर में कोई सुहागिन ही नहीं है तो श्रृंगार का सामान कहाँ से होगा? आराध्या का अपना कोई सामान है ही नहीं। और जहाँ तक बात रही मेरी, तो तुम्हारे मालिक गए कितने साल हो गए हैं, मेरे पास तो श्रृंगार का सामान होने का सवाल ही पैदा नहीं होता। और प्रियंका की क्या ही बात करो। ले देकर बची तुम। तुमने तो कभी शादी नहीं की, जो तुमसे उम्मीद होगी कि तुम्हारे पास श्रृंगार का सामान होगा।"
फिर बड़ी माँ आराध्या की तरफ़ देखती है और कहती है, "तुम फ़िक्र मत करो, मैं किसी को कहकर तुम्हारे लिए सामान मँगवा देती हूँ। मेरी बहू बिना सिंगार के अच्छी नहीं लगती। तुम तब तक जाकर मंदिर से कुंकुम लगा लो।"
आराध्या वहाँ से सीधे मंदिर की तरफ़ चली जाती है।
ऋषि और सूरज अपना नाश्ता ख़त्म करते हैं और ऑफ़िस के लिए निकल जाते हैं।
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ऋषि की कार ऑफ़िस के एंट्रेंस पर रुकती है। एक गार्ड आकर जल्दी से गाड़ी का दरवाज़ा खोलता है। अपनी डैशिंग पर्सनालिटी के साथ ऋषि ऑफ़िस में एंटर करता है। ऋषि अपने प्राइवेट लिफ़्ट से सीधे अपने फ़्लोर पर चला जाता है।
ऋषि के चेहरे को देखकर वहाँ काम करने वाली लड़कियाँ आहें भरने लगती हैं, लेकिन उनकी हिम्मत नहीं होती ऋषि के आस-पास जाने की।
सूरज ऋषि को आज का शेड्यूल बता रहा था। दोनों ऋषि के सीईओ केबिन की तरफ़ बढ़ रहे थे। जैसे ही ऋषि ने केबिन का दरवाज़ा खोला, उसकी आँखें एकदम से चौंधिया गईं।
पूरा केबिन "कॉन्ग्रैचुलेशन" के पोस्टरों से भरा हुआ था; कुछ पर "मैरिज की बेस्ट विश" लिखी हुई थी। सूरज ऋषि के रिएक्शन को पहचान जाता है।
"सर, मैं अभी यह सब हटवा देता हूँ।"
"तुमने यह न्यूज़ अभी तक स्टॉप नहीं करवाई?"
"न्यूज़ तो स्टॉप करवा दी है, लेकिन यह सोशल मीडिया का ज़माना है। एक बार जो चीज़ ट्रेंड हो गई, उसे रोकना बहुत मुश्किल हो जाता है।"
ऋषि फ़्रस्ट्रेशन में बोलता है, "क्या मुसीबत है! अगले दस मिनट में मेरा केबिन साफ़ चाहिए!"
सूरज "यस सर" बोलकर वहाँ से निकल जाता है, अपने साथ दो क्लीनर को लेकर आता है और जल्दी-जल्दी रूम साफ़ करवाता है।
रूम साफ़ होने के बाद सूरज के पास एक कॉल आता है, जिसे अटेंड करने के लिए वह बाहर चला जाता है। ऋषि अपने डेस्क पर बैठकर काम करता है। शाम को उसकी बहुत इम्पॉर्टेंट मीटिंग है, वह उसी के लिए सारी तैयारियाँ कर रहा होता है।
थोड़ी देर बाद ऋषि के केबिन का दरवाज़ा खटखटाता है और सूरज अंदर आने की परमिशन मांगता है। ऋषि उसे अंदर आने को कहता है। सूरज के हाथ में एक फ़ाइल होती है। वह ऋषि की तरफ़ बढ़ाता है और कहता है,
"मैडम की सारी डिटेल है।"
ऋषि जो इस समय अपने लैपटॉप पर काम कर रहा होता है, अचानक से उसके हाथ रुक जाते हैं। वह सूरज की तरफ़ देखता है और अपने कोल्ड लुक में कहता है, "क्या इन्फ़ॉर्मेशन?"
"सर, मैडम का नाम आराध्या है।"
"वह मुझे पता है। उसके आगे की इन्फ़ॉर्मेशन बताओ।"
"मैडम बोल नहीं सकती; वह बेजुबान है।"
ऋषि: 😠 "क्या तुम कोई ऐसी इन्फ़ॉर्मेशन लेकर आए हो जो मेरे किसी काम की हो? यह बात तो मैं पहले से ही जानता हूँ कि वह बोल नहीं सकती।"
"सॉरी सर।"
"उसकी फैमिली कहाँ है और कौन-कौन है उसकी फैमिली में?"
"सर, मैडम अनाथ है।"
ऋषि: 😳 "व्हाट!"
"जी सर, मैडम बारह साल की थी जब वह जीवन दास अनाथ आश्रम में आई थी। अनाथ आश्रम में आने से पहले मैडम अपनी फैमिली के साथ फ़रीदाबाद में रहती थी। उनकी फैमिली में उनकी माँ और पिताजी थे। मैडम बचपन से गूंगी नहीं थी, वह पहले बोल सकती थी। लेकिन एक दिन वह अपने पूरे परिवार के साथ ट्रेन यात्रा पर निकली थी। अचानक से उस ट्रेन का एक्सीडेंट हो गया। उनके माता-पिता की मौके पर ही मौत हो गई और उसी हादसे में मैडम ने अपनी आवाज़ खो दी। उनकी फैमिली में उनके दूर के रिश्तेदार थे, मैडम के चाचा-चाची। पर उन्होंने एक लड़की की ज़िम्मेदारी उठाने से साफ़ मना कर दिया और मैडम को अनाथ आश्रम भेज दिया। मैडम ने अपनी स्कूल की पढ़ाई वहीं से की। क्योंकि मैडम बोल नहीं सकती थी, इसलिए गवर्नमेंट की तरफ़ से भी उन्हें काफी सपोर्ट मिला; एक स्कॉलरशिप के साथ उन्होंने अपनी कॉलेज की पढ़ाई की। मैडम अपने कॉलेज में लिटरेचर पढ़ रही थी; वह एक राइटर बनना चाहती हैं। लेकिन तभी गौतम अग्रवाल और उसके परिवार ने अनाथ आश्रम के हेड से बात करके इनसे शादी के लिए हाँ करवा ली।"
"गौतम ऐसी लड़की से क्यों शादी करना चाहेगा जो बोल नहीं सकती और एक अनाथ भी है?"