दिल की हिफ़ाज़त: एक बॉडीगार्ड का प्यार Ch. 3

ख़तरा मंडरा रहा है Chapter 3

Posted by Arohi Gupta (मुस्कान) • May 18, 2025 03:48 PM

मुंबई की रातों में जितनी रौनक होती है, उतनी ही गहराई भी। और कभी-कभी, इन गहराइयों में छुपा होता है ऐसा सन्नाटा जो डर से कहीं ज़्यादा खतरनाक होता है।

मल्होत्रा हाउस के बाहर का इलाका अब भी रोशनी में डूबा था, लेकिन अंदर माहौल कुछ और था।

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विवेक मल्होत्रा — एक सफल बिजनेसमैन, लेकिन उससे भी बड़ा एक ज़िम्मेदार पिता — अपनी स्टडी में खिड़की के पास खड़े थे। सामने समंदर की लहरें टकरा रही थीं, लेकिन उनके ज़हन में उठते सवालों की लहरें ज़्यादा तेज़ थीं।

हाथ में एक पुरानी डायरी थी — आर्या की लिखी हुई — इनायत की मां।

विवेक ने एक पन्ना पलटा —

"इनायत के आने के बाद मुझे दुनिया से डर लगने लगा है… इतनी मासूमियत को कैसे बचाऊँगी मैं?"

उसने पन्ना बंद किया और खामोश निगाहों से बाहर देखा।

उसे ऐसा लग रहा था कि कोई उन्हें देख रहा है। कई दिनों से उसे अपने आसपास एक अनदेखी परछाई महसूस हो रही थी। कार में बैठते समय पीछे शीशे में एक परछाईं, ऑफिस में CCTV फुटेज एक मिनट के लिए ब्लैंक, इनायत के स्कूल के बाहर एक अनजान चेहरा जो तस्वीरें ले रहा था...

ये सब इत्तेफ़ाक़ नहीं हो सकते।

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रात 10 बजे आर. के. मल्होत्रा — इनायत के दादू — धीरे-धीरे चलकर विवेक के कमरे में आए।

"विवेक?" उन्होंने धीमे से पूछा।

"आप अब तक जाग रहे हैं?"

"नींद नहीं आ रही पापा... कुछ गड़बड़ है।"

उन्होंने सारी बातें दादू को बता दीं — इनायत के इर्द-गिर्द मंडराती परछाइयाँ, और उनका बढ़ता हुआ डर।

दादू ने गंभीरता से सब सुना, फिर अपना चश्मा उतारते हुए बोले,

"मुझे लगता था कि ये दिन कभी नहीं आएगा... पर अब लगता है कि वक्त आ गया है। सिक्योरिटी बढ़ानी होगी।"

"पापा, इनायत पहले ही अपनी मां को खो चुकी है। मैं नहीं चाहता कि वो और डर में जीए। कोई बॉडीगार्ड उसे और असहज कर देगा।"

"लेकिन अगर कुछ हो गया तो?"

आर. के. मल्होत्रा की आवाज़ पहली बार काँपी।

"उस बच्ची की आंखों में उसकी मां की मासूमियत है... और हमारे दुश्मनों की निगाहें उसी मासूमियत पर हैं।"

"दुश्मन?" विवेक ने चौंककर पूछा।

दादू कुछ देर चुप रहे।

"कुछ शक हैं मुझे... और शक अगर मल्होत्रा हाउस के अंदर के लोगों पर हो... तो उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।"

विवेक की आंखें खुल गईं।

"आप रघुवीर चाचा के परिवार की बात कर रहे हैं?"

"मैं नाम नहीं ले रहा," दादू ने कड़वाहट छुपाते हुए कहा,

"लेकिन जो मीठा दिखता है, वो हमेशा मीठा नहीं होता... याद रखो, किसी को जहर देने के लिए ज़रूरी नहीं कि वो कड़वा हो।"

विवेक चुपचाप बैठ गए।

"हमें कोई ऐसा चाहिए जो इनायत के आसपास रह सके — उसे बिना डराए, पर हर वक्त उसकी रक्षा करे।"

दादू ने एक नंबर डायल किया।

"हलो? करण, मुझे तुम्हारी मदद चाहिए।"

दूसरी तरफ दादू के पुराने सिक्योरिटी चीफ थे।

"एक नाम है सर — स्वास्तिक ठाकुर। खामोश लड़का है, तेज़ है, वफादार है... लेकिन टूटा हुआ है।"

"टूटे हुए लोग कभी-कभी सबसे मज़बूत बनते हैं," दादू ने कहा।

"उसे भेजो... एक बच्ची की हिफाज़त का सवाल है।"

फोन कट गया। विवेक अब भी चुप थे।

"उसका नाम क्या बताया?"

"स्वास्तिक ठाकुर," दादू ने कहा।

"अगर किस्मत ने चाहा, तो वो न सिर्फ इनायत की हिफ़ाज़त करेगा… बल्कि उसकी अधूरी दुनिया में एक नया रंग भी भर सकता है।"

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और उसी वक्त, शहर के एक दूसरे कोने में...

काले कपड़ों में लिपटा एक लड़का, एक मंदिर की सीढ़ियों पर बैठा था।

हाथ में एक चाकू, आँखों में एक तूफ़ान, और दिल में एक पुराना ज़ख्म।

स्वास्तिक ठाकुर।

उसे नहीं पता था कि उसकी ज़िंदगी की अगली सुबह… किसी की पूरी दुनिया बन सकती है।

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