प्रेम बंधन Ch. 3

प्रेम बंधन - Chapter 3

Posted by Sarvam • Jun 20, 2025 01:02 PM

छह वर्षों के उपरांत, भोर का समय था। पक्षियों की चहचहाहट सुनकर उस छोटे से घर में अठारह वर्षीय अमृत की आँखें खुल गईं। उसके सुंदर बाल इस समय पूर्णतः अस्त-व्यस्त हो चुके थे। उन्हें समेटकर जूड़ा बनाते हुए वह उठकर दीपक जलाने लगा। घर में पुनः प्रकाश फैल गया। उमेश अभी भी निद्रालीन थे। अपने स्नान की तैयारी में, उसने पहले गायों को चारा डाला, फिर अपने वस्त्रों की पोटली उठाकर नदी की ओर प्रस्थान किया।

सूर्य के अभी दर्शन नहीं हुए थे। ऐसे में अपना मार्ग खोजते हुए वह नदी के समीप पहुँच गया। वस्त्र एक पत्थर पर रखते हुए वह पानी में प्रवेश करने लगा और अपने कुर्ते को उतार दिया। अब केवल एक सफेद धोती उसके शरीर पर बची थी।

वहाँ पानी अधिक गहरा नहीं था, परंतु अमृत के सीने तक आता था। इस गाँव के हर स्थान से वह भली-भाँति परिचित था, अतः भय जैसी कोई भावना उसमें नहीं थी।

पानी का तापमान इस समय ठंडा नहीं था। आँखें बंद कर, अमृत पानी में सिर तक डूब गया, जिससे उसके बालों का जूड़ा खुल गया। कुछ क्षणों तक वह ऐसे ही रहा और अचानक ही कुछ उसकी कमर को छूकर गया। अमृत ने झटके से आँखें खोलीं और पानी से बाहर आ गया। आसपास का पानी पूर्णतः शांत था।

उसने पुनः पानी में ध्यानपूर्वक देखा और अपनी कमर को भी छुआ। क्या उसे कोई भ्रम हुआ था?

"हो सकता है कोई मछली हो," सोचते हुए वह हल्के से मुस्कुराया और पुनः पानी में डुबकी लगाकर अपने श्वास पर नियंत्रण करते हुए बैठ गया।

इस बार किसी वस्तु का स्पर्श उसकी पीठ पर पुनः हुआ, और यह कोई भ्रम नहीं था। अमृत ने बाहर आकर पुनः इधर-उधर देखा। अब वह भयभीत हो चुका था। ऐसा अनुभव उसके साथ पहले कभी नहीं हुआ था।

उसने पानी से बाहर निकलने का प्रयत्न किया, परंतु कुछ कदम चलने पर मानो किसी ने उसका पैर पकड़ लिया। अमृत की आँखें बड़ी हो गईं।

चिल्लाने के लिए उसने मुँह खोला ही था कि उससे पहले ही मुँह के बल वह पानी में गिर पड़ा। उसी समय किसी ने उसकी कमर थाम ली और उसे पकड़कर पानी के बाहर ले आया।

मुँह खोलकर अमृत ने लंबी-लंबी साँसें लीं। उसके बाल चेहरे पर आ चिपके थे, परंतु किसी के समक्ष होने का आभास उसे राहत भी नहीं लेने दे रहा था। आँखें खोलते ही उसने एक शरारती मुस्कान से भरा चेहरा देखा।

"महाराज, यह क्या चेष्टा थी? आप हमारे प्राण निकालना चाहते थे क्या?" अमृत ने सामने खड़े वैष्णव पर क्रोध जताते हुए कहा, और चेहरे से बालों को पीछे करने लगा।

वैष्णव ने हल्की हँसी के साथ उत्तर दिया, "हम सुंदर कन्या की प्रतीक्षा कर रहे थे, परंतु आते ही उसने पानी में प्रवेश कर लिया, हमें देखा तक नहीं। तो सोचा, थोड़ी चेष्टा कर लें, कुछ अधिक नहीं।"

कहते हुए वैष्णव ने पुनः उसकी कमर पर अपनी उँगलियाँ फिराईं।

अमृत सिहर उठा। वैष्णव की पकड़ से मुक्त होने का प्रयास करते हुए उसने कहा, "हम आपसे बात नहीं करेंगे, छोड़िए हमें। हमारा प्राण मानो निकलने को आए थे और आपको ये मजाक लगता है?"

"सुंदर कन्या रूष्ट हो गई?" वैष्णव ने उसे पानी में ही घुमा दिया और पानी की गहराई की ओर तैरने लगा।

"हम कन्या नहीं हैं। क्या जीवन भर आपको यही समझाते रहेंगे?" अमृत की तेज आवाज वहाँ गूँज उठी और साथ ही महाराज वैष्णव की नटखट हँसी भी।

कुछ समय पश्चात पानी से बाहर आकर वैष्णव ने किसी को पुकारा, "धर्म!"

एक चौबीस वर्षीय युवक सिर झुकाकर एक कपड़ा लेकर खड़ा हो गया। उसे लेकर वैष्णव ने अमृत को ओढ़ा दिया।

"महाराज, हम अपने वस्त्र साथ लाए हैं। हमें इसकी आवश्यकता नहीं है," अमृत ने कहा।

"तब तक आपको ठंड लग जाएगी। इसे ओढ़े रहिए, कन्या," वैष्णव ने कहा।

पुनः 'कन्या' सुनकर अमृत ने उसे घूरा और कहा, "यदि आपने हमें पुनः कन्या कहा तो हम... "

"तो आप? क्या कर लेंगे मिथिला के महाराज के साथ?" वैष्णव ने अकड़ के साथ भौंहें चढ़ा दीं।

अमृत शांत हो गया। एक राजा उसके साथ मित्रता बनाए हुए है, यही उसके लिए सम्मान की बात थी। फिर उनका मजाक, गुस्सा, हठ – सब कुछ उसे अनचाहे सहना पड़ता था।

"हाँ, सत्य कहा," अमृत ने कहा और अपने कपड़े लेकर दूसरी दिशा में एक झाड़ी के पीछे चला गया।

"हमने कुछ अनुचित कहा क्या, धर्म?" वैष्णव ने धीमी और नासमझी भरी आवाज में पूछा।

"आप कभी कुछ अनुचित कर ही नहीं सकते, महाराज," धर्म की बगल में वीरेंद्र आकर खड़ा हुआ। ये दोनों उन सेनापतियों के पुत्र थे जिन्हें राजगुरु ने तिलक की सहायता हेतु नियुक्त किया था। महाराज के कहने पर वे दोनों तत्पर रहते थे। इसलिए तिलक इन्हें 'मूर्ख' कहकर पुकारता था।

वीरेंद्र के उत्तर पर वैष्णव ने बाहें मोड़ लीं और एक संतोष भरी साँस ली।

पलटकर उसने उस दिशा में देखना शुरू किया जहाँ अमृत गया था। यह सब कैसे आरंभ हुआ था? पहली बार इस गाँव से जाने के बाद वह पूरी तरह अशांत हो चुका था। महाराज बनकर जिम्मेदारी का भार उस पर आ चुका था। ऐसे में ही उसे पुनः इस गाँव में आने का अवसर मिला। अपने सेनापतियों के साथ भ्रमण पर निकले वैष्णव को अमृत से मिलकर बहुत शांति मिली थी। उसके पश्चात, जब भी वह अकेलापन महसूस करता, यहाँ चला आता था। साथ देने के लिए तिलक के दो 'मूर्ख' भी थे जो महल से उसे भगाने का पूर्ण प्रबंध कर देते थे।

"चलिए, महाराज। सूर्य निकल आया है। महिलाएँ पानी भरने आती होंगी," अमृत की आवाज ने वैष्णव को विचारों से बाहर निकाला।

"कहाँ चलना है?" वैष्णव ने कहा।

"यहाँ से निकल कर सोचते हैं," अमृत ने उत्तर दिया। वह अपनी दिनचर्या के अनुसार जड़ी-बूटियाँ एकत्र करेगा। साथ ही उसे यह भी जानना था कि वैष्णव आज किस कारण वहाँ पहुँचा था। प्रत्येक माह दो बार उसका आना-जाना चलता रहता था, परंतु आज यह तीसरी बार था।

वैष्णव बिना कोई प्रश्न किए अमृत के पीछे चल पड़ा, धर्म और वीरेंद्र भी उसके पीछे थे। तभी वैष्णव ने अपनी गति धीमी की और उनके बीच आकर चलने लगा।

"क्या हुआ, महाराज? पूछने में भय लग रहा है?" धर्म ने कहा।

"भय और हम?" वैष्णव ने उसे घूरा।

"महाराज, युद्ध में तलवार चलाना और प्रेम में शब्द चलाना – धरती-आकाश जितना अंतर है। यहाँ भय लगने में कोई बुराई नहीं है," वीरेंद्र ने कहा।

"तो अब? हमें पूछ लेना चाहिए, ना?" वैष्णव ने गहरी साँस भरते हुए कहा।

"अवश्य, महाराज! अब नहीं तो फिर कब? और ध्यान रखिए, इस राज्य के साथ प्रजा पर भी आपका उतना ही अधिकार है। वैद्यजी उसी प्रजा का एक भाग हैं। इसमें कुछ अनुचित नहीं। हमने कई स्थानों पर सुना है राजकुमारों या अधिकारियों का पुरुषों के साथ संबंध रखने के संदर्भ में। बस यह सब गुप्त तरीके से होता है, इसलिए इस पर अधिक चर्चा नहीं होती," वीरेंद्र ने वैष्णव को समझाते हुए कहा।

ऐसे अवसरों पर वैष्णव इन 'मूर्खों' को अपना गुरु मानकर सब सुन लेता और उसे कर भी देता। कहते हैं, प्रेम में सबसे बुद्धिमान भी मूर्ख बन जाता है – महाराज वैष्णव भी बन गए।

अमृत अचानक ही रुक कर उनकी ओर मुड़ा। इस समय वे जंगल में खड़े थे, जहां अमृत सदा अपनी औषधियों का संग्रहण किया करता था।

"हमें यहीं अपना कार्य करना है। आपको कहां जाना है महाराज? भ्रमण पर आए हैं ना पुनः?" अमृत ने पूछा।

"हनन , हाँ! आप अपना कार्य करिए अमृत। हम उसमें बाधा नहीं डालेंगे।" वैष्णव चाहकर भी वह नहीं कह पाया, जो कहने के लिए वह आया था।

इतना सुनकर अमृत ने अपना ध्यान कार्य पर लगा लिया। धर्म और वीरेंद्र ने महाराज को चार बातें बताकर उन्हें साहस देना शुरू किया। हर कार्य में निपुण वह राजा, आज प्रथम बार किसी कार्य को करने में हिचकिचा रहा था।

अपनी आवश्यक औषधियाँ एकत्र करते हुए अमृत ने उन्हें एक पोटली में रखा और उस गुफा की ओर चल पड़ा, जहां वह बिना किसी बाधा के अपने कार्य में व्यस्त हो सकता था।

वह पत्थरों से निर्मित एक गुफा थी। वहाँ मुश्किल से कोई आता-जाता था, सिवाय अमृत या उसके पिता के। शेष सभी अपने खेतों में ही व्यस्त रहते थे। जो लोग पशुओं को चराने आते थे, वे भी मैदानी क्षेत्र में जाया करते थे।

अमृत का सारा सामान उस गुफा में पहले से ही मौजूद था। वहाँ पहुँचते ही वह पुनः अपने कार्य में व्यस्त हो गया और वैष्णव पीछे खड़ा बस देखता रह गया।

"महाराज, आप हमसे कुछ कहना चाहते हैं?" अमृत ने अपना कार्य रोक कर उसे देखा, जो कब से उसके समीप आकर खंभे की भाँति खड़ा था।

"आप हमारी ओर ध्यान नहीं दे रहे वैद्यजी। हर समय इन औषधियों में व्यस्त रहना आवश्यक है क्या? यदि आपको इन्हें बेचकर धन अर्जित करना है तो राजधानी चलिए, हमने पहले भी आपको राजवैद्य बनने का प्रस्ताव दिया था।" वैष्णव ने कहा।

"इसके लिए हम क्षमा चाहते हैं। किंतु जब तक आप कहेंगे नहीं, हमें कैसे ज्ञात होगा महाराज? जहाँ तक राजवैद्य बनने का प्रश्न है तो हम इस गाँव में ही ठीक हैं। हमें अपना घर, गाँव और लोग नहीं छोड़ने।" अमृत ने कहा।

प्रत्येक बार अमृत का यही उत्तर होता था। ऐसे में क्या किया जाए, यह वैष्णव समझ नहीं पाता था। किंतु अब उसने एक अच्छा उपाय सोच लिया था "सब छोड़िए और हमें सुनिए।"

वैष्णव ने अब पूर्ण रूप से कुछ कहने का मन बना लिया था। उसने अमृत के हाथ पकड़ कर कहा, "आप हमारे विषय में क्या सोचते हैं?"

"एक महान राजा, जो अपनी प्रजा का पूरा ध्यान रखता है। आपको सभी की चिंता है। जिन चीजों की कामना हमारे बाबा परमेश्वर से किया करते थे, वह सब आप कर देते हैं। इसी कारण लोग आपको परमेश्वर समान मानते हैं।" अमृत ने कहा।

"हमें परमेश्वर नहीं, राजा ही रहने दें। शेष लोग नहीं, आप क्या सोचते हैं वह बताइए।" वैष्णव ने कहा।

"हम भी वैसा ही सोचते हैं, महाराज।" अमृत ने कहा।

"तो फिर यदि हम कुछ माँग लें तो आप देंगे?" वैष्णव ने पूछा।

"कहिए, जो हम दे सकते हैं, अवश्य देंगे, भले ही वह हमारे प्राण ही क्यों ना हों।" अमृत ने कहा।

"हमें आपके प्राण नहीं, प्रेम चाहिए। देंगे आप?" वैष्णव गंभीर था, किंतु अमृत को उसकी बात का अर्थ समझ नहीं आया।

असमंजस में उसने पूछा, "प्रेम? आपका तात्पर्य मित्रता से है?"

"नहीं, वह प्रेम जो एक प्रेमिका अपने प्रेमी को देती है।" वैष्णव ने कहा।

अमृत का चेहरा फीका पड़ गया। "आप पुनः हमारे साथ विनोद कर रहे हैं ना? छोड़िए हमारा हाथ। आज हमारा कुछ करने का मन नहीं। हम घर लौट रहे हैं।"

वैष्णव ने उसके हाथ नहीं छोड़े। "हम गंभीर हैं अमृत। हम आपके सम्मुख अपने प्रेम का प्रस्ताव रख रहे हैं।"

अमृत ने गला तर कर लिया और नजरें झुका कर डरते हुए कहा, "क्षमा, क्षमा कर दीजिए महाराज। हम, हम इसके योग्य नहीं। कृपया, हमें छोड़ दीजिए।"

वैष्णव के लिए यह असहनीय था। उसने अमृत के हाथों पर पकड़ और कस ली "कारण क्या है?"

"महाराज, आप हमें पीड़ा पहुंचा रहे हैं।" अमृत ने हाथ छुड़ाने का प्रयास करते हुए कहा।

"कष्ट तो आप भी दे रहे हैं। कारण बताइए अमृत।" वैष्णव ने क्रोध में कहा।

"इसका कारण यह है कि आप एक महाराज हैं। हमारा और आपका कोई मेल नहीं। यदि हम सच में कोई कन्या भी होते, तब भी आपको एक राजकुमारी से विवाह करना चाहिए। हम... हम युवक हैं महाराज।" अमृत ने क्रोध में कहा और अपने हाथ छुड़ा लिए। उसने वहाँ से जाने का प्रयत्न किया , किंतु महाराज ने उसका मार्ग अवरुद्ध कर दिया।

"पुरुष भी आपस में प्रेम संबंध रखते हैं, अमृत।" वैष्णव ने कहा।

"वह प्रेम नहीं होता महाराज, वह केवल शारीरिक आवश्यकताओं को पूरा करने का दूसरा मार्ग है। क्षमा करें, हमसे यह नहीं होगा।" अमृत ने फिर वैष्णव से नजरें नहीं मिलाईं।

"नहीं, नहीं आप हमें गलत समझ रहे हैं अमृत। हम... हम आपसे विवाह करना चाहते हैं। आपको अपनी महारानी बनाना चाहते हैं। वचन देते हैं, आपके अतिरिक्त किसी से विवाह नहीं करेंगे, न कोई संबंध बनाएँगे।" वैष्णव ने सफाई देते हुए कहा।

"क्या आपका मस्तिष्क स्वस्थ है, महाराज? नहीं तो हम आपके लिए कोई औषधि बना कर भेज देंगे।" अमृत शीघ्र ही वहाँ से निकल जाना चाहता था।

"हमारा मस्तिष्क पूर्णत: स्वस्थ है और आपको अपना शांत रखते हुए हमारी बात सुननी चाहिए।" वैष्णव ने कहा।

अमृत अपने स्थान पर रुका और स्वयं को शांत करते हुए कहा, "महाराज, हमें आपका प्रस्ताव स्वीकार नहीं है।"

"अमृत, आप हमें अस्वीकार कर रहे हैं? हम महाराज है आपके ।" वैष्णव ने ठंडे स्वर में कहा।

"आपके प्रस्ताव पर अंतिम निर्णय हमारा ही होगा महाराज। इसमें आप बल प्रयोग नहीं कर सकते। हम ना कह चुके हैं। हमारे निर्णय का आपको सम्मान करना होगा।" अमृत ने कठोरता से कहा, तो वैष्णव ने सिर झुका लिया।

अमृत के पास यही अवसर था वहाँ से निकलने का। जैसे ही वह कुछ कदम चला, वैष्णव की आवाज उसके कानों में पड़ी, "हम आपको इतनी सरलता से नहीं छोड़ेंगे, यह स्मरण रहे।"

अमृत ने मुड़कर उसकी ओर देखा। "आपको किसी राजकुमारी से विवाह कर अपना घर बसाना चाहिए और नियमों के अनुसार हमें भी ऐसा ही करना चाहिए।"

"नियम? किसके बनाए हुए नियम? नियम हमसे हैं, हम नियम से नहीं।", वैष्णव ने उसकी ओर देखा "आपको हमारा प्रेम स्वीकार करना होगा। आपको हमसे विवाह करना ही होगा अमृत।"

"क्या यही है आपका प्रेम? नहीं महाराज, अब यह आपका हठ बन चुका है। जिसमें केवल स्वयं के सुख का ध्यान रखा गया है। और आप कहते हैं कि हमने आपको गलत समझा? नहीं, हमने सब सही समझा। क्षमा करें, हमें आपके मनोरंजन का साधन बनना स्वीकार नहीं।" अमृत ने कहा और वहाँ से भाग निकला। वैष्णव ने उसका पीछा करने का प्रयास नहीं किया। खाली आँखों से वह उसे जाते हुए देखता रहा।

"महाराज?" धर्म ने धीरे से पुकारा।

"उन्होंने हमें अस्वीकार कर दिया। अब?" वैष्णव ने ठंडी दृष्टि से धर्म को देखा, मानो अभी उसका शीश धड़ से अलग कर देगा।

"हम कोई और उपाय ढूँढ़ते हैं। आप शांत रहें महाराज।" वीरेंद्र ने शीघ्र कहा। महाराज का कोई भरोसा नहीं था, क्रोध में किसी का शीश काटना उसके लिए वृक्ष की डाली काटने जैसा था।

आगे जानने के लिए कहानी के साथ बने रहे ।

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