जूनुनि प्यार कि दास्तां - Chapter 2 ( म्म्मा... यूं आर हाॅट )
तभी…"ट्रिन ट्रिन… ट्रिन ट्रिन…"
किसी घंटी की आवाज़ ने माहौल को चीर दिया।
शगुन की आंखें खुलीं। कमरा वही था। वही बेड। वही सब कुछ। लेकिन वहां शगुन का पति माधवन नहीं था। कोई गुनगुनी सांसें नहीं थीं। वो अकेली थी।
उसके पास सिर्फ एक किताब रखी थी, "प्रेम रस" नाम की ,वही बोल्ड रोमांस वाली किताब, जिसे उसने रात 2 बजे तक पढ़ा था। शगुन धीरे से उठकर बैठ गई, बाल बिखरे थे, होठ सूखे हुए, और आंखों में एक अधूरी तलब। उसने खुद से बुदबुदाया, “क्या मैं सपना देख रही थी?”
उसकी सांसें अब भी तेज थीं। होंठ कांप रहे थे। वो अपनी हथेलियों को देख रही थी, जैसे अभी किसी ने थामे हों। फिर एक लंबी सांस लेकर उसने तकिए के नीचे से नाइटी के ऊपर पहने के लिए श्रग निकाला और पहन लिया।
घर की घंटी फिर से बजी। शगुन बेड से उठी, पैर में चप्पल डाले और दरवाज़ा खोलने चली गई। शगुन ने दरवाजा खोला, बाहर दूधवाला खड़ा था। अधेड़ उम्र का, लेकिन नजरें आज भी जरा भटकी हुई थीं।
"मैडम जी, दूध लीजिए।" शगुन दूध का पातिल आगे करती हैं, दूध वाला पातिले में दूध डालते हुए, शगुन को ऊपर से नीचे तक देख कर, अपनी आंखों से उसकी खूबसूरती का रस पीते हुए बोला," वैसे मैडम जी आज तो आप बहुत सुंदर लग रही हैं। काले रंग में तो बिल्कुल... बिजली लग रही हो।"
शगुन उसकी बात सुनकर हल्का सा मुस्कराई लेकिन तुरंत नज़रें झुका लीं। "थैंक्यू " उसने सीधा जवाब दिया और दूध लेकर अंदर आ गई। दरवाज़ा बंद करके उसने अंदर की कुंडी लगाई। वही बाहर खड़ा दूध वाला खुद से बोला," माधवन बाबू की किस्मत सोने की कलम से लिख गई हैं, भगवान ने माधवन बाबू को बीवी नहीं, अप्सरा दी हैं," दूध वाला खुद से बड़बड़ाते हुए वहां से निकल जाता हैं|
वही शगुन किचन में जाकर दूध का भगोना गैस पर चढ़ाया और फिर मोबाइल उठाकर माधवन को कॉल किया। "The number you're trying to call is not reachable at the moment..." शगुन ने फोन स्क्रीन को कुछ पल देखा, जैसे मन ही मन बोल रही हो "तुम कभी मेरे लिए available क्यों नहीं होते, माधवन?" उसने फोन वापस टेबल पर रखा, और किचन की खिड़की से बाहर झांकने लगी।
सामने की बिल्डिंग की छत पर एक लड़की कपड़े सुखा रही थी। उसके पीछे से उसका पति आकर उसे हग कर रहा था। हँसी, शरारत और छेड़खानी दूर से भी महसूस हो रही थी। शगुन की आंखें ठहर गईं। उसने एक धीमी सांस ली और खुद से बोली, “हर किसी की ज़िंदगी में कोई न कोई होता है जो उसे छूता है, देखता है… और मैं?”
शगुन दूध गैस पर से उतारती है, ट्रे में कप-सुगर रखकर अपने पति के लिए चाय बनाने लगती है, जो इस वक्त ऑफिस में होगा… या शायद फिर से किसी मीटिंग में, या… कुछ और। चाय बनाते-बनाते उसका ध्यान फिर से किताब पर चला जाता है — वो किताब जो अभी तक उसके तकिए के पास रखी है। शगुन कमरे में जाकर फिर से किताब पढ़नी कंटिन्यू करती हैं ,“जब वो उसकी कमर पर हाथ रखता है, उसकी धड़कनें रुकने लगती हैं… और होश गुम हो जाते हैं…”
शगुन की आंखें फिर से नम होने लगती हैं।
“काश… कोई मुझे भी ऐसे चाहे,” उसने बुदबुदाकर कहा।
अचानक, उसकी नजर दीवार पर टंगी शादी की तस्वीर पर पड़ी। सफेद शेरवानी में माधवन… और लाल लहंगे में मुस्कुराती हुई वो। वो तस्वीर अब बस एक फ्रेम बन कर रह गई थी। शगुन ने खुद से ही कहा, " छे महीने के अंदर ही हमारे रिश्ते में कोई स्पार्क नहीं बचा था? क्या मैं खूबसूरत नहीं?"
रोज की वही रूटीन — ऑफिस, फोन पर बिजी रहना, और रात को बस हल्की सी बात, और बिस्तर के दो सिरों पर दो लोग। शगुन वापस किचन में गई , और चाय कप में करके ट्रे रखकर, ड्राइंग रूम की तरफ जाती है। खाली सोफा देखती है और फिर वहीं बैठ जाती है।
उसने माधवन के लिए बनाई गई चाय खुद उठा ली और घूंट-घूंट पीने लगी। फिर से अपने हाथ में मौजूद किताब खोली — वो Bold Love Stories वाली किताब।
उसने पन्ना खोला, वही जगह जहां से कल नींद आई थी।
“उसने धीरे से उसकी जांघ पर हाथ रखा… और कहा — तुम्हारे जिस्म में जन्नत बसती है…” शगुन की उंगलियां किताब के पन्ने पर रुक गईं। उसके गाल गर्म हो रहे थे, और सांसों की गति बढ़ती जा रही थी।
लेकिन तभी उसकी नज़र सामने लगी घड़ी पर पड़ी सुबह के 7:10 हो चुके थे। “अब और नहीं…” उसने खुद से कहा, किताब बंद की और चाय खत्म करके कमरे में चली गई, और बाथरूम में जाकर फ्रेश हुए, और अपना चेहरा धोया, शीशे में उसने अपनी आंखों को देखा , गीली सी, प्यास भरी नीली आंखें। जैसे कोई भूखी, प्यासी रूह हो।
वो खुद से सवाल कर रही थी — “क्या मैं बुरी हूं? या फिर बस अधूरी हूं?” सवाल बहुत थे, जवाब कहीं नहीं।
दरवाज़े पर फिर से कोई आया था — शायद काम वाली बाई। लेकिन शगुन अभी अंदर ही थी, खुद के सवालों में उलझी हुई। जब दरवाजा लगातार बजाता रहा, तो शगुन लिविंग हॉल में पहुंची, उसने दरवाज़ा खुला।
शगुन ने सिर उठा कर देखा — माधवन उसके सामने खड़ा था, चेहरे पर कोई भाव नहीं, वो घर में दाखिल हो रहा था। हल्की सी शिकनवाली शर्ट, गले में टेढ़ी पड़ी टाई, और थकान से भरा चेहरा। हाथ में उसका लैपटॉप बैग था और मोबाइल जेब में डाल चुका था।
शगुन गंभीर चेहरा के साथ पूछा, “ रातभर कहां थे तुम?”
माधवन ने जूते उतारे, बैग टेबल पर रखा और सीधे सोफे पर बैठ गया,“ऑफिस में ओवरटाइम था,” उसका जवाब ठंडा और रटा-रटाया सा था। शगुन ने दांत भींचते हुए खुद को काबू में रखा, फिर एक कदम आगे बढ़कर बोली, “कम से कम एक फोन तो कर सकते थे, माधवन… मैं पूरी रात परेशान रही। न फोन उठाया, न कोई मैसेज।”
माधवन ने अपनी कलाई से रिस्ट वाॅच खोलते हुए सख्त
आवाज़ करते हुए बोला,“हर छोटी चीज़ के लिए इतना ड्रामा करना ज़रूरी है क्या? मैं काम पर था, ना कि किसी पार्टी में।” शगुन की आंखें भर आईं। आवाज़ धीमी पर कांपती हुई निकली,“मैं तो बस तुम्हारा हाल जानना चाहती थी… तुम्हारी बीवी हूं, कोई गैर नहीं। कल रात मैंने कितना कुछ सोचा था, ”
माधवन ने झुंझलाते हुए कहा,“तो अब मैं हर रात तुम्हें रिपोर्ट दूं क्या? ज़िम्मेदारियों के नीचे दबा हुआ हूं, और तुम्हें रोमांस की पड़ी है।” शगुन चुप हो गई। आंखों से एक बूंद खामोशी से गिरी और सीधे गाल पर फिसल गई।
कुछ बोलना चाहा लेकिन गला भर गया। वो बिना कुछ कहे मुड़ी और तेज़ क़दमों से किचन की ओर चली गई।
स्टील की थाली से टकराकर चम्मच गिरा, लेकिन शगुन ने नहीं उठाया। स्लीप के पास खड़ी होकर वो धीरे-धीरे सिसक रही थी। दोनों हाथ सिंक के पास रखकर उसने खुद को संभालने की कोशिश की, पर अंदर का टूटना कुछ ज्यादा ही तेज़ था। उधर माधवन ड्रॉइंग रूम में बैठ रहा। कुछ पल सोचता रहा, फिर लंबी सांस लेकर किचन की तरफ बढ़ा।
किचन के दरवाज़े पर आकर उसे कुछ सेकंड शगुन को देखता रहा , झुके हुए कंधे, कांपती हुई पीठ, और आंखों से बहता पानी। फिर उसने पास आकर पीछे से हल्के से उसे गले लगा लिया। “शगुन…” उसकी आवाज़ अब शांत और मुलायम थी, “ऐसा रोया मत करो यार… अच्छा नहीं लगता।”
शगुन उसकी पकड़ में जकड़ी तो रही, लेकिन पलटी नहीं। धीरे से बोली,“तुम्हें परवाह होती तो एक कॉल कर देते। मैं सारी रात सो नहीं पाई…” माधवन ने उसकी कमर को और कसते हुए उसके कान के पास बोला,
“देखो… मैं अब बहस नहीं करना चाहता। थक गया हूं। लेकिन हां, एक बात कहूं?” शगुन ने हल्का सा सिर हिलाया।
“मैं तुम्हारा बाथरूम में वेट कर रहा हूं,” माधवन ने धीमे और ठहरे हुए अंदाज़ में कहा, और फिर उसकी पकड़ छोड़कर सीधे कमरे की तरफ चला गया। शगुन वहीं खड़ी रह गई। पलभर को उसकी आंखें बंद हुईं। शरीर में एक अजीब सी बेचैनी उठी, पर फिर उसी बेचैनी में एक उदासी भी थी।
किचन की लाइट बंद करते हुए वो बड़बड़ाई,
“तुम्हारी ये प्यार जैसी बात भी अब… बस तुम्हारी मजबूरी सी लगती है।” वो बाथरूम की ओर चली तो सही, लेकिन हर कदम जैसे पत्थर सा भारी था।
कमरे में आते ही माधवन की आवाज़ — “जल्दी आओ शगुन, तुम्हें बांहों में लेने की तलब है।”
शगुन दरवाज़े के पास रुकी… आंखें बंद कीं… और फिर धीमे से बोली,“काश ये तलब सिर्फ जिस्म की ना होती, थोड़ा मेरा मन भी पढ़ लेते…” फिर वो चुपचाप अंदर चली गई।