पंचकवच -मृत्यु की पांच मुहरें - Chapter 3
भ्रम की गुफा - दूसरी मुहर की चेतना
बहते समय का गलियारा
पहली मुहर के टूटते ही वैशाली की चेतना पर एक गहन नींद ने अधिकार कर लिया था। यह कोई साधारण नींद नहीं थी। यह एक ऐसी मध्यावधि अवस्था थी जहाँ समय रुक सा जाता है और आत्मा को अपने अगले चरण के लिए तैयार किया जाता है। उसे लगा जैसे वह एक गहरी जल-गुफा में है ,चारों ओर पानी टपकने की धीमी आवाजें, दीवारों पर अजीब सी लहराती परछाइयाँ और एक ऐसी ठंडक जो देह को नहीं, चेतना को छू रही थी।
उसकी दृष्टि धुंध में खोई हुई थी, जब अचानक उस धुंध से एक स्त्री आकृति उभरी। वह अत्यंत शांत, किन्तु रहस्यमयी थी। उसका चेहरा अपरिचित होते हुए भी आत्मीय प्रतीत होता था।
"तुम कौन हो?" वैशाली ने पूछा, स्वर में जिज्ञासा और भय का मिला- जुला भाव था।
स्त्री ने उत्तर दिया, "मैं वो हूँ, जो तुम बन सकती थी , यदि तुमने भ्रम को अपनाया होता।"
उसका नाम सावित्री था।
सावित्री - छाया-संप्रदाय की निर्वासित
सावित्री कभी पंचकवच की तीसरी वाहिका हुआ करती थी। वह दूसरी मुहर की संरक्षक थी। लेकिन जब समय आया दूसरी मुहर को खोलने का, तो वह अपने ही अंतर्विरोधों में उलझ गई।
"मैंने सोचा पंचकवच बस एक शक्ति का माध्यम है," सावित्री ने कहा, उसकी आँखों में थकी हुई स्वीकारोक्ति की आभा थी, "और मैं भी उसी मोह में बह गई , सच्चाई की जगह सत्ता को चुन लिया।"
"तो तुमने विश्वासघात किया?" वैशाली ने पूछा।
"नहीं... मैंने सिर्फ वही किया जो एक सामान्य मनुष्य करता है , अपनी पीड़ा से मुक्ति खोजी। लेकिन जिस दिन मैंने भ्रम को सच माना, उसी दिन मैंने स्वयं को खो दिया। अब मैं इस जल-गुफा में हूँ , अपनी ही कल्पनाओं में, अपने ही भय की परछाइयों में कैद।"
वैशाली चुप रही। उसके भीतर एक कम्पन जागा , क्या वह भी वही राह पकड़ रही है?
भ्रम का द्वार
गुफा की दीवारें अचानक कांप उठीं। सावित्री की आकृति धुंध में विलीन हो गई। वैशाली के सामने एक प्राचीन द्वार प्रकट हुआ। द्वार पर एक शिलालेख उभरा ,
"जिसे तू सत्य समझेगी , वही झूठ निकलेगा।
जिसे तू झूठ समझेगी, वही तेरा मार्ग बनेगा।"
द्वार अपने आप खुल गया। लेकिन उसके पार कुछ भी स्पष्ट नहीं था , केवल एक धुंधिलापन, एक मानसिक खिंचाव, मानो कोई अदृश्य शक्ति चेतना को खींच रही हो।
जैसे ही वैशाली ने द्वार लांघा, उसे लगा जैसे उसकी आत्मा टूट रही है , और उसके टुकड़े पांच दिशाओं में बिखर गए।
चेतना का विखंडन
वह अब अपने ही भीतर थी। लेकिन वह एक नहीं थी , वह पाँच रूपों में बँट चुकी थी। प्रत्येक रूप एक भय, एक अनुभव, एक दर्पण था:
1. भयवह एक बच्ची थी - कांपती, अकेली। उसकी आँखों में आँसू थे। वह अपनी माँ को पुकार रही थी। यही वैशाली थी। वही जो अपने जीवन की पहली असुरक्षा में गुम हो गई थी।
2. अहंकार एक सुंदर, आत्ममुग्ध स्त्री - जिसे लगता था कि वह सबसे श्रेष्ठ है, सबसे ज्ञानी। लेकिन उसके भीतर केवल खोखलापन था। उसका गर्व उसका कवच था, जो टूट चुका था।
3. वासनाएँ एक चित्र - मोहक, आकर्षक। उसमें वैशाली को राज्य, सत्ता, यश और मोक्ष के स्वप्न दिखाए जा रहे थे। उसके मन के सबसे छिपे कोनों को छेड़ने वाली कल्पनाएँ, जिन्हें वह कभी स्वीकार नहीं करती थी।
4. अतीत वह पल, जब उसकी माँ ने उसका हाथ छोड़ा था - और वैशाली ने पहली बार स्वयं से कहा था -"मुझे अब किसी से कुछ नहीं चाहिए।" यही उसकी सबसे गहरी गाँठ थी - त्यागे जाने का घाव।
5. सत्य एक दर्पण - एकदम खाली। उसमें कुछ नहीं दिखता था। वह इतना शुद्ध था कि वह डरावना हो चला था।
और फिर एक आवाज़ आई भीतर से ,
"अब इनमें से एक को चुन ,और बाकी को त्याग।"
अंतिम चयन
वैशाली काँप उठी। हर छवि तीव्र थी, सच थी। वह बच्ची उसकी मासूमियत। वह स्त्री उसका घमंड। वे स्वप्न उसकी इच्छाएँ। वह घाव उसका अतीत। और वह दर्पण उसका शून्य।
वह सोच में डूब गई। लेकिन तभी एक क्षण, एक मौन जैसे किसी और चेतना ने उससे कहा ,
"जिसे तू सबसे डरावना समझे वही तेरा उत्तर है।"
उसने उस दर्पण के सामने हाथ बढ़ाया।
दर्पण में से वही छुरी बाहर निकली जो पहली मुहर की गुफा में मिली थी।
उसने भय, अहंकार, वासना और अतीत उन चारों छवियों को छुरी से काट दिया।
वे चीख़ती हुई गायब हो गईं।
केवल दर्पण रह गया। और वह अब उसके भीतर समा गया।
दूसरी मुहर खुल गई थी।
गुफा में एक प्रकाश फैला शांत, मद्धम, लेकिन गहराई से भरा हुआ।
द्वार से परे की पुकार
गुफा की छत से एक-एक कर जल की बूंदें टपकने लगीं। लेकिन अब वह ठंडक नहीं रही थी, अब वह बूंदें वैशाली के भीतर एक गर्माहट पैदा कर रही थीं जैसे आत्मा को एक नवजीवन मिल रहा हो।
अचानक उसकी आँखों के सामने फिर वही स्त्री आकृति प्रकट हुई सावित्री। पर अब वह बदली हुई थी। उसके वस्त्र अब काले नहीं, उज्ज्वल श्वेत हो चुके थे। उसके चेहरे पर ग्लानि नहीं, शांति थी।
"तुमने दूसरी मुहर को स्वीकार कर लिया," सावित्री ने मुस्कराते हुए कहा।
"मैंने केवल वह स्वीकार किया जिससे मैं भागती रही," वैशाली ने उत्तर दिया।
"अब तुम तैयार हो," सावित्री की आवाज़ में एक गूंज थी, "तीसरी मुहर तुम्हारे सत्य की अग्निपरीक्षा है। वह द्वार नहीं है वह एक आत्मा है, जो स्वयं एक मुहर में कैद है। तुम्हें उसे पहचानना होगा, और मुक्त करना होगा। पर याद रखो यह मुक्ति बलिदान मांगेगी।"
गुफा की दीवारें अब टूटने लगीं। जल वाष्प बनकर उड़ने लगा। और वैशाली एक बार फिर चेतना से परे की यात्रा पर निकल गई…
परछाइयों की सीढ़ी
जैसे ही गुफा की दीवारें टूटने लगीं, वैशाली को अपने पैरों के नीचे से ज़मीन खिसकती महसूस हुई। उसका शरीर जैसे वाष्प में बदलने लगा, चेतना एक तेज़ गति से एक और आयाम की ओर बढ़ने लगी न ऊपर, न नीचे, न समय में आगे और न ही पीछे।
यह कोई स्थान नहीं था , यह एक विचार था।
एक अनदेखा आकाश खुल गया गहरा नीला, जिसमें कोई तारा नहीं, कोई दिशा नहीं, सिर्फ एक छाया थी , गोलाकार, स्थिर, और फिर भी साँस लेती हुई।
वैशाली ने देखा एक काले पत्थर की सीढ़ियाँ नीचे जाती थीं जैसे किसी उपग्रह की सतह पर उकेरी गईं हों। हर सीढ़ी पर एक प्रतीक उभरा ,
मोह → भ्रम → त्याग → बलिदान → मौन
उसने एक-एक कर हर सीढ़ी पर पाँव रखा। और हर बार, उसके भीतर की कोई परछाई कांप उठती।
निषिद्ध नाम
नीचे एक गुफा नहीं, बल्कि एक खुला मैदान था चारों ओर पत्थरों की मूरतें, बिना चेहरों के मानो उनकी पहचान मिटा दी गई हो।
एक पत्थर पर एक अंकित पंक्ति थी:
“जो आत्मा स्वयं को नहीं पहचानती, वह दूसरों का प्रतिबिम्ब बन जाती है।”
वहीं एक और मूरत खड़ी थी इस बार उसकी पीठ वैशाली की ओर थी।
"मैं तीसरी मुहर नहीं हूँ," वह बोली, "मैं उसका द्वार हूँ।"
"तो मुहर कहाँ है?" वैशाली ने पूछा।
"वह एक आत्मा है पर उसका नाम भूल जाना ही उसका श्राप है। जब तक कोई उसका नाम न पुकारे, वह बंधन में है।"
"उसका नाम क्या है?"
"जो तू भूली है, वही उसका नाम है।"
वैशाली की साँसें थमने लगीं।
"मैंने क्या भुलाया है?" उसने स्वयं से पूछा। वह सोचने लगी अपनी माँ, अपनी परछाइयाँ, अपना पहला त्याग, पहला भय…
…और तभी उसकी जुबान पर एक शब्द आया "आर्या"। (आत्मा )
तीसरी मुहर की आहट
चारों ओर की मूर्तियाँ चटकने लगीं। हवा में एक भयंकर सन्नाटा भर गया। धरती कांपने लगी। और उस पीठ किए स्त्री की आकृति घूमी।
वह न वैशाली थी, न सावित्री वह एक अत्यंत सुंदर, और साथ ही करुणामयी आत्मा थी, जिसके नेत्रों में युगों की प्रतीक्षा झलक रही थी।
"तुमने मेरा नाम पुकारा…"
"तुमने मेरी परछाई से मुझे पहचान लिया…"
"मैं आर्या हूँ तीसरी मुहर की आत्मा।"
वैशाली के हाथों में फिर से वही दर्पण उभर आया अब उसमें आर्या की छवि थी।
"तुम मुझे मुक्त कर सकती हो पर याद रखना, इसकी कीमत होगी।"
"कैसी कीमत?" वैशाली ने धीरे से पूछा।
"जो मुक्ति चाहता है, उसे बंधनों से प्रेम त्यागना पड़ता है। तुम जिसे सबसे अधिक चाहती हो, उसे पीछे छोड़ना होगा हमेशा के लिए।"
तीसरी मुहर की ओर प्रस्थान
गुफा अब मिट चुकी थी। बचा था सिर्फ नीला शून्य, और उसमें एक जलती हुई अग्नि की लकीर अग्नि की आत्मा, जो तीसरी मुहर की रक्षा करती थी।
वैशाली ने आर्या का हाथ थामा।
"मैं तुम्हें मुक्त करूँगी," उसने कहा।
"लेकिन मैं यह तय नहीं कर सकती कि मैं किसे खोऊँगी।"
"यही तो मुहर की मांग है," आर्या ने उत्तर दिया, "यह निर्णय तुम्हारे करने से नहीं, तुम्हारे होने से निकलेगा।"
और फिर एक गूंजदार ध्वनि हुई।
एक नया द्वार खुला अग्नि से बना, लहराता, झलकता और उसके भीतर तीसरी मुहर की तीव्रता थी।
वैशाली ने आर्या की आत्मा को अपने भीतर समाहित किया। अब वह अकेली नहीं थी। अब वह वाहिका भी थी, और संरक्षिका भी।
वह तीसरी अग्निमयी आत्मा की ओर बढ़ चली एक नए बलिदान, एक नई परीक्षा, और आत्मा के सबसे गहरे सत्य की ओर…