सुहागरात ए लव स्टोरी Ch. 1

सुहागरात ए लव स्टोरी - Chapter 1

Posted by Moon Star • Jul 20, 2025 10:55 PM

कमरे में लाल गुलाब की पंखुड़ियाँ बिखरी थीं, रेशमी चादर पर इत्र की हल्की महक फैली थी। दो औरतें धीरे-धीरे बिस्तर सजा रही थीं, जैसे किसी अनदेखे तूफान के लिए तैयारी कर रही हों। एक ने फुसफुसाते हुए कहा, “बेचारी दुल्हन, उसे नहीं पता वो किसके साथ बाँधी गई है।” दूसरी मुस्कुरा दी, लेकिन उसकी मुस्कान में एक अजीब सा डर झलक रहा था—“वो आदमी सिर्फ मर्द नहीं... आग है, जो छू ले, जल जाए।” चादर को सीधा करते हुए पहली बोली, “पहली वाली तो बस तीन दिन ही रह पाई थी, फिर बुखार चढ़ा और चल बसी... लेकिन सब कहते हैं, वो बुखार नहीं था, उसका असर था।” दूसरी ने धीमे से जोड़ा, “और जबसे मरी है... उस कमरे से अब तक उसकी कोई आवाज़ नहीं आई।” कुछ पल के लिए कमरे में सन्नाटा छा गया, मानो दीवारें भी उस रहस्य को जानती हों और डरती हों। “दुल्हन तो आज गई,” पहली औरत ने दबी आवाज़ में कहा। दूसरी की आँखें चादर पर टिकी थीं, “उसकी आँखों में जो आग है ना... सुहागरात नहीं, क़हर बनती है।” बिस्तर अब सज चुका था — खूबसूरत, लेकिन जैसे किसी कुर्बानी की सेज। वही ,

मशालों की मद्धम रौशनी, कमरे में फैली गुलाब की महक और छत के पंखे की धीमी गति के बीच सब कुछ ठहरा हुआ था।

मखमली चादर के बीच बैठी थी **शामली ( उम्र 19 )** — लाल रंग की साड़ी में, घूँघट आधा गिरा हुआ, होंठ काँपते हुए, साँसें भारी।

उसकी कलाई में चूड़ियाँ खनक रही थीं — जैसे हर हरकत पर वो खुद को टोक रही हों।

और सामने खड़ा था **विश्वनाथ प्रताप सिंह ( उम्र 40 ) ** — 6 फ़ीट लंबा, चौड़ी छाती, हल्के नम बाल, और आँखों में एक कड़क प्यास।

उसने धीरे-धीरे दरवाज़ा बंद किया और कुंडी चढ़ा दी।

“अब कोई नहीं रोकेगा…”

उसकी आवाज़ भारी थी… और गूंज सी रही थी।

शामली ने नज़रें झुका लीं, लेकिन चेहरे पर डर नहीं… एक **हलक़ा-सा इंतज़ार** था।

“तुम जानती हो, ये मेरी दूसरी शादी है…”

विश्वनाथ ने धीरे से कहा, पास आता गया।

“जी…”

“और मैं नाटक पसंद नहीं करता, ना दिखावे…”

उसने एक हाथ से उसकी ठोड़ी उठाई।

“आज की रात सिर्फ़ मेरी है। तुम्हारी भी… और हमारी भी।”

उसका हाथ अब शामली की कमर तक पहुँच चुका था — साड़ी के भीतर वो नर्मी थी, जो किसी भी जमींदार की रातें सुलगाने को काफ़ी होती।

शामली की साँसें तेज़ थीं। उसकी पीठ अब बिस्तर की सिलवटों पर पिघल रही थी।

“तुम बहुत खूबसूरत हो, शामली… लेकिन उससे ज़्यादा, तुमने मेरे अंदर की भूख फिर से जगा दी है…”

उसने साड़ी की पिन खोली — एक झटके में… और फिर चूड़ियाँ भी एक-एक करके।

**हवा अब महकने लगी थी, पसीने और गुलाब के बीच एक नई खुशबू बन रही थी।**

शामली की आँखें बंद थीं… और होंठ कांप रहे थे — जैसे खुद को रोक भी रही हो, और सौंप भी रही हो।

विश्वनाथ अब पूरी तरह उस पर झुक गया था… और उनकी साँसें अब एक-दूसरे के गले में उलझ गईं।

उसका हाथ अब पेट से नीचे की ओर खिसक रहा था… और तभी…

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**ठक… ठक… ठक…**

**दरवाज़ा ज़ोर से खटका।**

दोनों चौंक गए।

“पापा?”

बाहर से आवाज़ आई — **युवाओं की, साफ़, मासूम पर तीखी।**

“आर्यन?”

विश्वनाथ ने खुद को अलग करते हुए कहा।

शामली ने घूँघट फिर से खींच लिया — जल्दी-जल्दी चादर में खुद को समेटते हुए।

विश्वनाथ ने बमुश्किल खुद को संभाला और दरवाज़ा खोला।

**आर्यन — 19 साल का, स्मार्ट, कॉलेज बॉय, थोड़ी फटी जींस, जैकेट और आँखों में जोश।**

“सरप्राइज़!”

उसने हँसते हुए कहा।

“मैं अचानक आ गया, सोचा शादी की बधाई खुद दूँ…”

विश्वनाथ उसे देखते रह गया — और पीछे देखा… जहाँ शामली चुपचाप बिस्तर पर बैठी थी, फिर से लाज से सिमटी हुई।

आर्यन ने झांकते हुए पूछा —

“ओह! यही हैं मेरी नयी मम्मी?”

और फिर जैसे उसकी साँस अटक गई।

उसकी आँखें… शामली पर टिकीं रह गईं।

एक सेकंड… दो… तीन…

**वो वही लड़की थी — जिसे वो कॉलेज में पिछले एक साल से पसंद करता था।**

वही लड़की… जिसकी तस्वीर उसने फोन में छिपाकर रखी थी।

अब वो **उसके पापा की बीवी बन चुकी थी**।

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