एक राज़ 🔥रूहानी सफ़र का Chapter 2
निधि ने थूक की गटकन से अपना सूखा गला तर किया| इससे पहले कि वो कुछ सोच पाती कि उन अजनबियों की तेज़ आवाज़ उस वातावरण को चीर गई|
“वाह लड़की अभी तक बंधी है.... आजा|” एक शराबी दूसरे को इशारा करता हुआ कहता है – “जा तू उसे खोल, देख हमे देख कैसे छटपटा रही है|”
निधि दीवार की ओट से सुनती अंतरस काँप गई| वह तो यहाँ है तो अंदर कौन बंधा है उसकी जगह !! ये सोचते जैसे डर की सिरहन उसके पूरे देह को हिला गई| वह उलटी दिशा की ओर भागी| जितना दम लगाकर वह भाग सकती थी वह भागने लगी पर थकान और उस पल रेत की वजह से उसके कदम बार बार धीमे हो जाते| भागते भागते उसे उनकी चीख सुनाई पड़ी जिससे डर और दहशत से उसकी चाल और धीमी हो गई और चेतन शुन्य हो कर वो जमीन पर गिर पड़ी|
वह असहाय सी रेतीली जमीन पर पड़ी थी कि अचानक उसने महसूस किया वहां कुछ ही देर में ढेर सारी हलचल बढ़ गई है, उसने पलट कर देखा तो लोगों का जत्था उसकी ओर बढ़ा आ रहा था| उसने रेत में सने हाथो को कपड़े में पोछ कर अपनी आँखों को मलते हुए उस ओर देखा तो उसकी सारी देह जैसे ठंडी हो गई| उस पल न उसका शरीर वहां से हिला न चेतना|
वो जत्था लगातार उसकी ओर बढ़ा आ रहा था और वह चाह कर भी वहां से हिल नहीं पा रही थी| उसने गौर से देखा वो सब गाँव वाले लग रहे थे, आगे आगे आदमी, बच्चे, औरते और सब के सब सामानों को अपने कन्धों पर उठाए थे| निधि चाह कर भी वहां से टस से मस नहीं हो पा रही थी| उसके हलक में जैसे चीख दब के रह गई थी| निधि अपनी तेज़ होती सांसो से बस उस ओर देखे जा रही थी| जत्था अब उसके नजदीक आ गया| उस पल निधि कस कर चीखना चाहती थी पर आवाज़ जैसे उसके हलक में ही सूख गई| उस पल जैसे उसकी साँस गले में अटक सी गई, जत्था उसके शरीर को पार करता निकल गया| निधि सिर्फ हवा की गर्मी को महसूस करती रह गई जैसे कोमा में पड़ी आंखे खोले अपने जीवन को वेंटिलेटर में चलता देख रही हो|
एक पल में ही जत्था उसके पार जाते उस रेतीली जमी में गायब सा हो गया| इसके अगले ही पल वेंटिलेटर से जैसे बाहर आ गई निधि और उठ कर खड़ी हो गई और बेतहाशा भागने लगी उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि आखिर कहाँ किस ओर वह जाए बस बेतहाशा भागे जा रही थी| कि उसे लगा जैसे वह किसी चीज़ से टकराई है| एक आह के साथ उसने देखा उसके सामने पल भर में वहां कोई गाँव सा दिखाई दिया| जहाँ सभी लोग थे आदमी, औरते, बच्चे| ये देख उस पल उसके अन्दर के डर को कुछ राहत हुई| उसने देखा अपने घर के बाहर एक औरत अपने दुधमुहे बच्चे को स्तनपान करा रही है| उसने उसके पास जाकर एक साँस में अपनी गाथा कहने लगी –
“वो मैं न – यहाँ फंस गई हूँ – प्लीज़ मेरी हेल्प करिए...|”
कहते हुए वह लगातार उस औरत से अपनी कह रही थी पर ये क्या उस औरत ने एक बार भी उसकी तरफ नहीं देखा| अगले ही पल निधि की सांसे थमी की थमी रह गई| तभी उस औरत ने उसकी ओर देखा| निधि ने देखा उसका पूरा सपाट चेहरा और आँखों की जगह सफ़ेद गोली जैसे टकी थी| काटो तो खून नहीं वह चिल्ला पड़ी| उसके सामने पूरा निर्जीव लोगों का बसा बसाया गाँव था| सब तरह के लोग अपने काम में तल्लीन उसे दिख रहे थे लेकिन किसी का भी ध्यान उसकी ओर नहीं था| फिर उसे याद नहीं कि कितनी तेज गति से वह वहां से भागी कि उसने पीछे पलट कर भी नहीं देखा| उन बिन चेहरे वाले लोगों के बीच से गुज़रते वह लगातार चीखती रही और भागती रही| उसे इसके अवाला कुछ नहीं सूझ रहा था| उसकी चेतना जैसे शून्य हो चली थी| बस बेतहाशा बस भागी जा रही थी| रेत पर पैर कभी किसी कंकाल से टकरा जाता कभी वह किसी टूटी दीवार से टकरा जाती| उसके शरीर में जगह जगह चोटों के निशान पड़ गए थे पर डर और दहशत से उसकी चेतना गुम होती जा रही थी| फिर सहसा एक तेज धक्के से वह किसी गेंद सी रेत में लुढ़क गई|
फिर दूर कोई रौशनी उसकी ओर बढ़ती हुई आती है निधि तो बेहोश पड़ी थी पर रौशनी उसकी ओर आती रही फिर एक कराह के साथ उसने अंतिम बार आँख खोली सामने कुछ धुंधले चेहरे दिखे और वह फिर बेहोश हो गई|
हॉस्पिटल के एक रूम के बाहर कुछ लोग गहन मुद्रा में खड़े थे| कोई अपना सर पकड़े था कोई माथा सबके चेहरे पर जैसे बारह बज रहे थे| लेकिन डॉक्टर को अपने पास आते देख सभी उनकी तरफ एक साथ लपके और जैसे एक साँस में ही सबके स्वर एक हो गए|
“डॉक्टर साहब कैसी है निधि?”
डॉक्टर उसके चेहरे को उस पल गौर से देखता है फिर धीरे से कहना शुरू करता है
– “मुझे पता है पूरे दस दिनों से आप सभी को मैं एक ही दिलासा दे रहा हूँ पर अभी भी मैं बस यही कहूँगा कि आप जिस हालत में अपनी पत्नी को यहाँ लाए थे उससे उसके शरीर से कहीं ज्यादा उसके दिमाग में किसी हादसे का असर है, जीवित है सांसे चल रही है, आँख भी खोलती है पर बोलती क्यों नहीं समझ नहीं आ रहा| बस आप दुआ कीजिए कि आप सबका प्रेम और दुआ उनको सही कर सके|”
एक साँस में अपनी बात कहते डॉक्टर चले गए और जतिन वहीँ सर पकड़े अपने पास खड़े निधि के भाई धीरज से कह उठा – “काश उस दिन निधि की बात मान लेता और उन अजनबियों को लिफ्ट नहीं देता|”
जतिन अपनी बिखरी हालत में कहता रहा और पास खड़ा धीरज हताश सुनता रहा | वे सब पिछले दस दिन से हॉस्पिटल में निधि के होश में आने का इंतजार कर रहे थे| जिस हनीमून के लिए जतिन और निधि आए थे वह अनजाने में ही उनके लिए श्राप बन चुका था| निधि के बेहोशी में मिलते जतिन आनन् फानन अपने और उसके परिवार में उस घटना का जिक्र करता बताता है जिससे वे सभी तुरंत उदयपुर से जैसलमेर चले आते है|
“निधि को कहीं भी कोई ज्यादा चोट नहीं लगी पर इस बेहोशी से जाने कब वह उठेगी और मैं उसे अकेला छोड़ने की कब उससे माफ़ी मागूंगा |” जतिन हताशा से अपने बालो को खींचते हुए कहता है|
“चिंता मत करिए जीजा जी – वह जल्दी होश में आ जाएगी और जो होना था उसपर आपका कोई बस नही था बस वक़्त पर भरोसा रखिए |” धीरज अपनी भरसक कोशिश में जतिन को हौसला देने का प्रयास करता है|
“हाँ वक़्त पर विश्वास करने के अलावा कर भी क्या सकते है |”
जतिन को आश्वस्त करते धीरज उनके कंधे पर हाथ रखता है|
“निधि ने अपनी भरसक कोशिश की उनसे बचने की और शुक्र है उन गुंडों से वह भाग भी निकली - उन गुंडों की लाश तक कार में मिली शायद पी कर ड्राइव करने से एक्सीडेंट में मर गए पर मुझे समझ नही आता कि अगर एक्सीडेंट से वे आदमी मरे तो निधि उस कार से काफी दूर क्यों मिली वो भी बेहोश !!”
जतिन अजब पहेली में उलझ चुका था|
“अब ये सब तो तब पता चलेगा जब निधि होश में आएगी |”
“हाँ अब इंतजार के अलावा क्या कर सकते है लेकिन यही सुकून है कि अगर कार में हमारा मोबाईल नहीं छूटता तो ट्रैक करके हम कभी निधि तक नहीं पहुँच पाते लेकिन मुझे दुःख है कि मैं निधि को सही सलामत नहीं रख सका|” कहते कहते जतिन की आवाज भीग उठी|
“जीजा जी आप हौसला रखिये सब ठीक होगा|” रुंधे गले से धीरज कहता है|
“पता नहीं पर हम तो जल्दी पहुँच गए उनका पीछा करते फिर निधि कार से कब उतरी और उस कुलधरा के गाँव की सीमा तक जाने कैसी पहुंची?” आश्चर्य से जतिन सबकी ओर देखता है और उसकी आवाज सुन सबकी नज़रों में चेतन शुन्य पड़ी निधि कुलधरा के राज़ को सोचती उस एकांत में अपनी ऑंखें झपकाती है|