श्रापित एक श्राप की दास्तां - Chapter 3(रात का तीसरा पहर)
"रानी मीनावती अपने वफादार सैनिक के साथ सफर पर निकल पडी थी क्योंकि उन्हें शताक्षी बाई से पूरे राज्य और महाराज को बचाना था। इसलिए रानी मीनावती जंगल के रास्ते से होते हुए सफर पर जा रही थी। सुबह से निकले हुए उन्हें दोपहर हो गई थी। लेकिन अभी तक वह अपनी मंजिल तक नहीं पहुंची थी। इतनी दूर का सफर करने पर रानी मीनावती काफी थक गई थी। थोडी देर के लिए रानी मीनावती और सैनिक ने आराम किया। और फिर वह अपने सफर पर निकल पडे।
थोडी देर में उन्होंने देखा कि वह एक बडे से मैदान के वहां पर खडे थे। वहां पर एक बहुत बडा आश्रम बना हुआ था। और शाम के वक्त के वजह से मंदिरों के घंटियो की आवाज उनके कानों में सुनाई पड रही थी। रानी मीनावती ने अपने हाथ जोडकर माता रानी को प्रणाम किया। और फिर आश्रम की तरफ चल पडी।
रानी मीनावती ने एक शीर्ष से हाथ जोडकर प्रणाम किया और फिर उनसे कहा" हम रानी मीनावती चित्तौडगढ की रानी है हमें गुरुजी से मिलना है।
शीर्ष रानी मीनावती को बताया कि गुरु जी अभी अपने ध्यान में लीन है। इसलिए उन्हें थोडा इंतजार करना होगा।
थोडी देर बाद रानी मीनावती गुरु जी के सामने खडी थी। उन्होंने गुरुजी को नमस्ते किया और फिर कहा गुरुजी हम यहां आपसे मदद के लिए आए हैं। आपसे कुछ छुपा नहीं है। आप अच्छे से जानते हैं कि इस वक्त हमारे पूरे चित्तौडगढ और महल पर एक भारी संकट आ गया है। और इस संकट से आप ही हमें बाहर निकाल सकते हैं।
गुरु जी ने मुस्कुराते हुए कहा" तो आखिर उसे डायन ने महाराज को अपने वश में कर ही लिया। गुरु जी की बातें सुनकर रानी मीनावती आश्चर्य से उनकी तरफ देखने लगी।
तो गुरु जी ने कहा" वह एक डायन है। जो काफी सालों से उसे जंगल में तपस्या कर रही थी। उसे एक ऐसे व्यक्ति की तलाश थी जो एक रंगीन मिजाज का हो। तभी वह उसे अपने वश में आसानी से कर सकती थी।
रानी मीनावती ने घबराते हुए कहा" लेकिन गुरुजी वह कह रही थी। कि दो दिन बाद कोई पूजा है। जिसमें वह महाराज के साथ करने वाली है और इसी के बाद इस धरती पर शैतानों का राज होगा। हमें कुछ समझ नहीं आ रहा। गुरुजी हम क्या करें अब आप ही हमारी मदद कीजिए।
गुरु जी ने रानी मीनावती की तरफ देखकर कहा" हां वह यह बहुत समय से कर रही है। और कल अमावस की रात है। जिसमें शैतानों की शक्तियां अधिक बढ जाती है। लेकिन चाहे कुछ भी हो जाए। हमें उसकी पूजा को सफल नहीं होने देना है। अगर यह पूजा सफल हो गई। तो इस धरती पर शैतानों का राज होगा। और इस धरती से अच्छाई का नाम और निशान हमेशा के लिए मिट जाएगा। जो कि हम ऐसा होने नहीं दे सकते हैं बस माता रानी से यही प्रार्थना है। कि हम अपने मकसद में कामयाब हो जाए रात हो गई। तो आप दोनों जाकर विश्राम करें। हमें कल सुबह ही चित्तौडगढ के लिए यहां से रवाना होना होगा। तभी हम वक्त पर महल पहुंच पाएंगे। और उस डायन को उसके इरादों में कामयाब होने से रोक पाएंगे नहीं तो अनर्थ हो जाएगा।
गुरुजी ने रानी मीनावती को और उनके सैनिक को अपने आदमी से कहकर उन दोनों को अपने कमरे में विश्राम करने के लिए भेज दिया। सुबह के वक्त मुझे अपने ध्यान में लीन थे उसके बाद वह सभी चित्तौडगढ के लिए रवाना हो गए।
वहीं दूसरी तरफ महल में चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ था। चारों तरफ अंधेरा था। बिल्कुल भयानक लग रहा था। महल के बीच एक हवन कुंड रखा हुआ था। और शताक्षी बाई ने काला कपडा पहन रखा था उनके सामने महाराज उदय प्रताप सिंह अपना sir झुका कर खडे थे। उदय प्रताप सिंह के पीछे पूरे राज्य के लोग अपना sir झुका कर खडे थे। ऐसा लग रहा था वह सब इस डायन के बस में हो वश में हो
"शताक्षी बाई ने अपने दोनों हाथों को ऊपर करके जोर से कहा" आप सबका हम शैतानों की दुनिया में स्वागत है। आपसे आप सब शैतान के गुलाम है। और आज से आप सब भगवान के बजाय शैतान को पुजेंगे शैतान की ही पूजा करेंगे शताक्षी वाई की आंखें इस वक्त पूरी काली थी फिर वो पूजा में बैठकर पूजा करने लगी उसने पुरे एक सौ बच्चों की बलि चढाई।
दूसरी तरफ बिना रानी मीनावती के कक्ष में युवराज और राजकुमारी के साथ बैठी हुई थी। और प्रार्थना कर रही थी कि जल्द ही रानी मीनावती महल वापस लौट आए उसने हाथ जोडकर भगवान से प्रार्थना करते हुए कहा है। माता रानी हम सबको इस संकट से बचा लीजिए नहीं। तो आज सब खत्म हो जाएगा आज यह बुराई जीत जाएगी माता रानी ऐसा मत होने देना।
शताक्षी भाई ने पूरे एक सौ कुंवारी लडकियों की बलि चढाने वाली थी। तभी गुरुजी और वह अपने आदमियो के साथ महल में प्रवेश कर चुके थे। उन्होंने पूरे महल को अपनी सुरक्षा कवच से बांध दिया था। और वह शताक्षी बाई के सामने खडे होकर अपनी आंखें बंद करके कुछ मंत्र पढ रहे थे। यह सब देख कर शताक्षी बाई क्रोधित हो उठी थी। क्योंकि उसकी पूजा अधूरी रह गई थी। उसने अपनी आंखें बंद की और फिर दोनों हाथों से उसने गुरु जी पर वार किया।
लेकिन इससे गुरुजी पर कोई असर नहीं पडा। क्योंकि उन्होंने पहले से ही एक सुरक्षा रेखा बनाया था। जिसमें वो सब खडे थे। यह देखकर शताक्षी बाई और ज्यादा क्रोधित हो उठी। उसने अपना मुंह खोला और उसके मुंह से हवा निकलने लगा। जिस वजह से सुरक्षा रेखा हवा की वजह से रेखा की लकीर मिट गई वहां पर पहुंच जाता है। चारों तरफ बहुत जोर की हवाए चल रही थी। आंधी तूफान आ गई थी। उन हवाओं में शताक्षी बाई हंसी गुंज रही थी। जिससे माहौल काफी भयानक लग रहा था। यह देख कर राज्य के लोग और महल के सभी लोग काफी डर रहे थे।
गुरुजी के एक आदमी ने कहा" गुरुजी इस डायन पर तो हमारे शक्तियों का कोई असर नहीं हो रहा है। इसके सामने हमारी शक्तियां कमजोर पडती जा रही है।
गुरु जी ने कहा" यह रात का तीसरा पर है कैसे भी करके हमें इस डायन को अपने वश में करना होगा। बस कुछ छन तक हम इस डायन को रोक सकते हैं। फिर उसके बाद अमावस्या की रात खत्म हो जाएगी। फिर यह डायन कुछ नहीं कर पाएगी। फिर वह सभी आदमी एक मोटी रस्सी से शताक्षी बाई को बांध देते हैं।
"लेकिन शताक्षी बाई की शक्तियां उन सब पर भारी पड रही थी। उसने उस रस्सी को अपनी शक्तियों से तोड डाला और उसने शैतानों की तरह हंसते हुए कहा" तुम सब मेरा कुछ नहीं बिगाड सकते। आज मुझे मेरे मकसद में कामयाब होने से कोई नहीं रोक सकता।
°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°
तो अब क्या होगा आगे आखिर अब इस डायन को गुरुजी अपने वश में कैसे करेंगे और कैसे इस डायन का विनाश करेंगे
Guys please give me supporting.