Inderwanshi - Chapter 3
अब तक हमने देखा कि राजकुमार विक्रमादित्य राजकुमार वीरेंद्र को ढूंढने जाते हैं और वो इसमें सफल भी हो जाते हैं। फिर राजमहल में पहुंचने के बाद राजकुमार वीरेंद्र अपनी माता श्री से क्षमा मांगते हैं और दृढ निश्चय करते हैं कि वह आज के बाद ऐसी किसी प्रतियोगिता में नहीं हारेंगे। अगले दिन राजकुमार विक्रमादित्य प्रातःकाल अपनी बडी माँ का आशीर्वाद लेने जाते हे तभी उनके कक्ष में एक सेविका आती है और जोधाणा से आए दूत के बारे में उन्हें बताती है।
अब आगे
राज दरबार
राज दरबार में सभी उपस्थित हैं। महाराज अमरेंद्र सिंह अपने सिंहासन पर विराजमान हैं। उनके दाईं ओर महामंत्री शिवराय और कुलगुरु बैठे हैं। कुछ दूरी पर सारे मंत्रीगण विराजमान हैं, उनके सामने राजकुमार विक्रमादित्य और राजकुमार वीरेंद्र भी उपस्थित हैं। इसी बीच, जोधाणा से आया हुआ दूत सभा के बीचों-बीच सम्मानपूर्वक महाराज के सामने खडा है।
दूत: इंद्रप्रस्थ के महाराज अमरेंद्र सिंह को हमारा प्रणाम! जोधाणा के महाराज ने आपका अभिवादन किया है और यह पत्र भिजवाया है।
महाराज अमरेंद्र सिंह( दूत से): आप पत्र पढना आरंभ कीजिए। हम भी जानना चाहते हैं कि महाराज भवानी सिंह कौन सा शुभ समाचार हमें सुनाना चाहते हैं।
दूत( पत्र पढते हुए):
इंद्रप्रस्थ के महाराज अमरेंद्र सिंह को हमारा प्रणाम। आज से पंद्रह दिन पश्चात, शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को, हमारी सुपुत्री, राजकुमारी चंद्राक्षी का स्वयंवर रचाया जा रहा है। आपका राज्य सादर आमंत्रित है। कृपया इस शुभ अवसर पर हमें आपकी सेवा का अवसर प्रदान करें।
महाराज अमरेंद्र सिंह( हर्षित होकर):
बहुत खूब! राजकुमारी चंद्राक्षी का स्वयंवर रचाया जा रहा है, यह तो अत्यंत खुशी की बात है! दूत से) महाराज भवानी सिंह से जाकर हमारा अभिवादन कीजिएगा और कहिएगा कि इस शुभ अवसर पर हमारा इंद्रप्रस्थ राज्य अवश्य शामिल होगा।
दूत:
जो आज्ञा, महाराज!
महाराज अमरेंद्र सिंह( विचार करते हुए):
हम पहले ही राजकुमार वीरेंद्र के विवाह के विषय में निश्चय कर चुके हैं, अतः हम इस अवसर पर राजकुमार विक्रमादित्य को जोधाणा भेजने का अवसर प्रदान करते हैं।
महाराज: राजकुमार विक्रमादित्य हम चाहते हैं कि इस स्वयंवर में हमारे राज्य की ओर से आप शामिल हों। क्या आपको कोई आपत्ति है?
राजकुमार विक्रमादित्य( सम्मानपूर्वक):
नहीं महाराज! हमें कोई आपत्ति नहीं है। आपने जो भी हमारे लिए किया है, वह सदैव हमारे लिए कल्याण ही रहा है। हम अगले दो दिनों में जोधाणा के लिए प्रस्थान करने को तैयार हैं।
महाराज अमरेंद्र सिंह:
तो तय रहा! राजकुमार विक्रमादित्य ही जोधाणा में राजकुमारी चंद्राक्षी के स्वयंवर में भाग लेंगे।
अब सभा में राज्य के दैनिक विषयों पर चर्चा शुरू हो जाती है। कुछ समय बाद महामंत्री शिवराय कहते हैं,
महाराज, कई दिनों से राजवंशी हाथी बीमार पड रहे हैं। ऐसा पहली बार हुआ है कि एक साथ पचास हाथी बीमार हो चुके हैं, जिनमें से पच्चीस तो नए हाथी हैं। उनमें कुछ हाथी तो गंभीर स्थिति में हैं और अपना अंतिम समय गिन रहे हैं। कृपया करके महाराज इसका कोई समाधान निकालिए।
महाराज अमरेंद्र सिंह( चिंतित होकर):
यह कैसे संभव है कि राजवंशी हाथी एक साथ बीमार हो गए, वह भी केवल राजवंशी हाथी ही? राजकुमार विक्रमादित्य की ओर देखते हुए) यह कार्य हम आपको सौंपते हैं। इस बीमारी की जड तक पहुंचिए और सुनिश्चित कीजिए कि आगे से कोई हाथी बीमार न हो।
राजकुमार विक्रमादित्य:
जो आज्ञा, महाराज!
महामंत्री शिवराय कुछ और जानकारी देते हुए कहते हैं,
महाराज, छह महीने पहले आपने जो भव्य मंदिर निर्माण का आदेश दिया था, वह कार्य अब समाप्ति पर है।
महाराज अमरेंद्र सिंह( प्रसन्न होकर):
यह तो बहुत ही खुशी की बात है, महामंत्री शिवराय( राजकुमार वीरेंद्र से) आप इस भव्य मंदिर का जायजा लीजिए और अगर कोई कमी हो, तो उसे पूरा करवाइए।
राजकुमार वीरेंद्र:
जो आज्ञा, महाराज!
सभा में बचे हुए अन्य दैनिक विषयों पर विचार- विमर्श होता है। कुछ समय बाद महाराज अमरेंद्र सिंह अपने सिंहासन से उठते हुए कहते हैं,
आज की सभा यहीं स्थगित की जाती है।
फिर वह दरबार से बाहर चले जाते हैं। महाराज के जाने के बाद सभी मंत्रीगण और राजकुमार भी सभा से चले जाते हैं।
तभी उप सेनापति अमर सिंह, जो कि राजकुमार विक्रमादित्य के बचपन के मित्र हैं और इन्होंने उनके साथ ही शिक्षा प्राप्त की थी, राजकुमार के पास आते हैं।
अमर सिंह( मुस्कुराते हुए):
राजकुमार, आज आप सभा में बहुत ही विचारमग्न दिख रहे थे। कहीं आपको राजकुमारी चंद्राक्षी स्वप्न में तो नहीं दिखाई दे रही थीं?
राजकुमार विक्रमादित्य( हंसते हुए):
आप कैसी बातें कर रहे हैं, अमर? जिन्हें भला हमने देखा ही नहीं, वे हमारे ख्यालों में कैसे आ सकती हैं? आप भी न, कहीं की भी बातें जोड लेते हैं।
अमर सिंह( आश्वस्त होकर):
राजकुमार, हम जो कह रहे हैं, वह सच कह रहे हैं। देखना, यह सच होकर रहेगा!
राजकुमार विक्रमादित्य( गंभीर होते हुए):
हां, देख लेंगे। लेकिन पहले हमें हाथियों कि गजशाला में जाकर उनकी बीमारी का पता लगाना है। अगर आप हमारे साथ चलना चाहते हैं, तो चलिए।
अमर सिंह:
हम तो चलना चाहते हैं, पर हमें कुछ नए सैनिकों को प्रशिक्षण कराना है।
राजकुमार विक्रमादित्य:
ठीक है, हम चलते हैं।
वहीं दूसरी ओर, राजकुमार वीरेंद्र मंदिर के लिए प्रस्थान कर लेते हैं।
जोधाणा
महाराज भवानी सिंह अपनी तीनों रानियों के साथ विराजमान हैं।
महाराज भवानी सिंह( भावुक होकर):
पता ही नहीं चला हमरी पुत्री राजकुमारी चंद्राक्षी कब इतनी बडी हो गईं! देखिए, अब तो उनकी विदाई के दिन नजदीक आ रहे हैं।
महारानी अमरावती( जो कि महाराज की पहली रानी हैं और स्वभाव से बहुत शांत हैं):
महाराज, हमें भी यह जानकर बडा दुःख हो रहा है कि हमारे आंगन का फूल किसी और के आंगन में खिलने जा रहा है।
महाराज भवानी सिंह:
अब देखते हैं, राजकुमारी चंद्राक्षी अपने लिए कौन सा योग्य वर चुनती हैं।
महारानी अंबा( जो दूसरी रानी हैं और स्वभाव से बहुत चंचल हैं):
महाराज, आप निश्चिंत रहिए! हमारी राजकुमारी बहुत ही होशियार हैं और मां जगदंबा ने भी उनके लिए कोई सर्वश्रेष्ठ वर चुन रखा होगा।
महाराज भवानी सिंह( आशावादी स्वर में):
हम भी यही चाहते हैं, महारानी अंबा, कि हमारी राजकुमारी को एक शूरवीर और महान पुरुष वर के रूप में मिले।
महारानी दुर्गावती( जो सबसे छोटी रानी हैं और स्वभाव से बहुत विनम्र हैं):
महाराज, क्या आपने भारत के सभी राज्यों को निमंत्रण पत्र भिजवा दिए हैं? कहीं कोई राज्य छूट न जाए।
महाराज भवानी सिंह:
धीरज रखिए, महारानी दुर्गावती। हमने कल तक भारत के सभी राज्यों में निमंत्रण पत्र भिजवाने की व्यवस्था कर दी थी। कल तक यह कार्य संपन्न हो जाएगा।
थोडा सोचते हुए) वैसे, आप तीनों हमें यह बताइए, राजकुमारी चंद्राक्षी कहां हैं? आज सुबह से उनके दर्शन नहीं हुए।
महारानी अमरावती( हंसते हुए):
महाराज, वह वहीं हैं जहां उन्हें होना चाहिए—अपने बगीचे में, अपने प्रिय पशुओं के साथ।
महाराज भी हंसते हुए कहते हैं,
हमारी राजकुमारी कितनी कोमल हृदय की हैं!
बगीचे का दृश्य:
बगीचे में हर रंग के फूल खिल हुए हैं। श्याम हो रही है और सूर्यदेव ढल रहे हैं। सूर्यदेव की लालिमा पूरे बगीचे में फैल रही है। तभी एक सुनहरा हिरण दौडता हुआ आता है, और उसके पीछे राजकुमारी चंद्राक्षी दौड रही हैं। राजकुमारी चंद्राक्षी, सूरज की लालिमा में ऐसी प्रतीत हो रही हैं, जैसे कोई स्वर्ग की अप्सरा हो! चांद जैसी चमकदार आंखें, सांवला रंग, लंबाई छः फुट, कमर तक लहराते काले घने बाल, गालों पर हल्की लालिमा, सुर्ख गुलाबी होंठ, तीखे नैन- नक्श और चेहरे पर मासूमियत का अनूठा भाव।
राजकुमारी चंद्राक्षी( हंसते हुए):
रुको, नटखट! अभी हम तुम्हें पकडते हैं। तुमने हमें बहुत परेशान किया है।
तभी उनकी सखी मधुमाला हंसते हुए कहती हैं,
चंद्रा, आप आज भी इनके पीछे भाग रही हैं? अब तो इनके पीछे भागना बंद कीजिए!
राजकुमारी चंद्राक्षी:
कैसे बंद कर दें, मधु? जब भी हम इन्हें आहार खिलाने की कोशिश करते हैं, ये हमें यूं ही अपने पीछे भगाते हैं।
मधुमाला( मुस्कुराते हुए):
वैसे, चंद्रा, क्या आपने इंद्रप्रस्थ की प्रतियोगिता के बारे में सुना?
राजकुमारी चंद्राक्षी( आश्चर्य से):
कैसी प्रतियोगिता?
मधुमाला:
हमें ज्ञात था कि आपको इस बारे में नहीं पता होगा। चलिए, हम आपको बताते हैं। इंद्रप्रस्थ के महाराज अमरेंद्र सिंह ने एक प्रतियोगिता का आयोजन किया था, जिसमें राजकुमारों को घोडे पर सवार होकर लाल झंडे पर तीन तीर एक साथ लगाने थे, और वह भी तीन बार!
राजकुमारी चंद्राक्षी( आश्चर्य से):
फिर क्या हुआ? किसने इस प्रतियोगिता को जीता?
मधुमाला( गर्व से):
इंद्रप्रस्थ के ज्येष्ठ राजकुमार, विक्रमादित्य ने इसे बडी तीव्रता से पार कर लिया। उनके बारे में कहा जाता है कि वे भारत के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर हैं।
राजकुमारी चंद्राक्षी मन ही मन कहती हैं,
राजकुमार विक्रमादित्य!
क्या अचानक बीमार हुए हाथियों की बीमारी का पता चल पाएगा? और अचानक इतने सारे हाथियों की बीमारी के पीछे किसी का कोई षडयंत्र तो नहीं? क्या राजकुमारी चंद्राक्षी, राजकुमार विक्रमादित्य के बारे में जानने की दिलचस्पी दिखाएगी? आगे जानने के लिए पढ़ते
रहिए हमारा रोमांचक उपन्यास इंद्रवंशी स्टोरी मेनिया पर। जिसे लिखा है A R writer ने और सम्पादन भी( edit) Divya verma ने ही किया है।
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