"Cruel Love"-(The shades of Haterd!) Ch. 1

"Cruel Love"-(The shades of Haterd!) - Chapter 1

Posted by Farheen Rajput • Nov 14, 2025 05:27 PM

{निवास: मुंबई की एक पुरानी, मगर इज़्ज़तदार कॉलोनी में बसी मिडल क्लास फैमिली का हिस्सा।}

शर्मा निवास, मुंबई के उपनगरों में बना एक दो-मंज़िला घर, जहाँ हर दरवाज़ा अब एक नियम बन चुका था।मुंबई की सुबहें अब भी वैसी ही होती थीं — ट्रैफिक की शोर, दूधवाले की घंटी, और पड़ोस में खेलते बच्चों की खिलखिलाहट।

पर शर्मा निवास के एक कमरे में जैसे वक़्त थम गया था। कमरा हल्का सा अंधेरे में डूबा था, खिड़की पर भारी परदे थे — जैसे धूप को आने से पहले सौ बार सोचना पड़ता हो।

"ख़ामोशी सबसे ऊँची चीख़ होती है..."

...और दुआ शर्मा, पिछले एक साल से इसी चीख़ को अपने अंदर दबाए जी रही थी। बिस्तर पर बैठी दुआ शर्मा, किताब खोले, एक ही लाइन पर नज़र टिकाए थी... पर पढ़ कुछ नहीं रही थी।

उसकी आँखें भारी थीं...

न नींद से, न थकावट से —

बल्कि उस अपराधबोध से, जिसने उसे अंदर ही अंदर खा डाला था।

दुआ — वो लड़की जो कभी हर त्यौहार पर घर को अपने हाथों से सजाया करती थी।

जो अपने पापा की जान थी...

अब उसी घर में एक परछाईं बनकर रह रही थी।

कहानी की शुरुआत एक भारी सन्नाटे से होती है..... लफ्ज़ों की नहीं, अपराधबोध की खामोशी — जो चीखती तो नहीं, मगर हर सांस में सज़ा सी महसूस होती है।

मुंबई की हलचल भरी सुबहें किसी को भी ज़िंदा महसूस करवा सकती थीं..... पर दुआ शर्मा के लिए, हर सुबह एक सज़ा थी —!

"एक नई सुबह..... एक और दिन... जब मुझे ज़िंदा रहने की सज़ा भुगतनी है"!..... वो खुद से ही बड़बड़ाई.....।

दुआ — नाम जितना नरम, उतनी ही उसकी रूह में थमी हुई आँधियाँ तेज़ थीं। यूं तो उम्र 22 की थी, पर बोझ ऐसा था जैसे कई ज़िंदगियाँ सिर पर टंगी हों। कभी वो मोहल्ले की सबसे हँसमुख लड़की हुआ करती थी — अब उसे हँसना भी जैसे खुद पर ज़ुल्म लगता था।

उसकी आँखें — भूरी, शांत और गहरी। पर अब वहाँ न सपने थे, न शिकवे। बस एक ठहरा हुआ अपराधबोध, जो हर सुबह उसके तकिये के नीचे से रेंगता हुआ उसके सीने पर चढ़ जाता था।

"काश! ये सांसों की डोर टूट जाए..... तो ये दर्द खत्म हो जाए..... ज़िंदा तो मैं वैसे भी नहीं हूं... बस साँसें भर रही हूं"।..... दुआ ने एक अनकही तकलीफ़ से ख़ुद से कहा।

उसके पिता प्रोफेसर आदर्श शर्मा — एक समय में अपनी बेटी की आँखों में ब्रह्मांड देख लेने वाले पिता, आज उससे आँख मिलाने तक से कतराते हैं।

मां सुनैना शर्मा — अपने पति और बेटी के बीच महज़ एक पुल बनकर रह गई हैं ..... बड़ा भाई..... वरुण शर्मा — भाभी की बातों में जल्दी आ जाने वाला इंसान। भाभी अंजली शर्मा — एजुकेटेड, खूबसूरत लेकिन अंदर से कटु। हमेशा से Dua से जलन करने वाली।

शिवानी छोटी बहन, जो ग्रेजुएशन कर रही है —कभी बहन को देख मुस्कराया करती थी,अब उसे देखकर उसके होंठ थरथराते हैं। वो उसे समझने की कोशिश करती है, पर परिवार के दबाव ने उसकी मासूमियत छीन ली है।

आदित्य, सबसे छोटा, अभी बारहवीं में है — एक अकेला वही है जो इस घर में उससे पहले की तरह ही बर्ताव करता था।

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दुआ अब वैसी लड़की नहीं रही है जो तेज़ आवाज़ में अपने हक के लिए चीखे, मगर उसकी खामोशी में एक चीख छुपी है। एक ज़माने में उसकी हँसी पूरे घर में गूंजती थी — अब वो मुस्कुराए भी तो आईने तक डर जाता है कि कहीं वो टूट न जाए।

बड़ी-बड़ी भूरी आँखें, जिनमें अब न चमक है, न कोई सपना..... और ना कोई शिकवा। बस एक सवाल हमेशा तैरता रहता है —

"क्या मेरी एक गलती मेरी पूरी पहचान मिटा सकती है?"

वो इंटेलिजेंट थी हमेशा से..... पर अब उसकी वो इंटेलिजेंस किसी काम की नहीं..... वो खूबसूरत है, पर खुद को आईने में देखना छोड़ चुकी है। वो सेंसेटिव है, मगर अब हर इमोशन उसे चुभता है। वो सुबह की पहली किरण थी मगर दुआ के लिए वो सुबह भी अंधेरों से घिरी थी..... वो खिड़की से सर टिकाए ख़ुद में ही गुम थी.....!

कमरे के कोने में एक लकड़ी की पुरानी मेज़..... जहां वो अपनी इकलौती दोस्त..... अपनी अकेली साथी..... अपनी डायरी के पास आई..... उसने पेन उठाया..... और रोज़ की तरह एक कोरे पन्ने पर अपना दर्द उतारने लगी। उसके बाल बेतरतीब थे..... आँखें सूजी हुईं। वो डायरी खोलती है… कलम उठाती है… और लिखना शुरू करती है।कुछ पल बाद

"मेरी एक गलती..... एक नादानी ने मेरी पूरी ज़िंदगी तबाह कर दी..... वो गलती जिसने मेरा पूरा वजूद ही बिखेर कर रख दिया..... जो शायद अब कभी नहीं समेटा जा सकता"!

“आज फिर वही सवाल…

अगर मैं अतीत में वापस जा सकती…

तो क्या सब कुछ बदल सकती?

कभी-कभी लगता है,

इस कहानी की सबसे बड़ी गुनहगार मैं ही हूँ।”

लिखते वक्त डायरी के पन्ने पर दुआ के आँसू की एक बूँद गिर पड़ी..... उसने उँगली से आसूं पोंछते हुए..... फिर से लिखना जारी किया!

"ये बीते दो साल,

मेरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा मनहूस हिस्सा रहे हैं"!

उसने एक गहरी साँस लेकर कलम को होठों से लगाया… जैसे कोई बच्चा अपना दर्द चुपचाप पीने की कोशिश कर रहा हो।

"किसे बताऊँ? किससे कहूँ?

मेरे शब्द अब किसी के लिए नहीं बचे…

सब थक चुके हैं मेरी सफ़ाई से…

और मैं?

मैं खुद से भी थक गई हूँ।”

उसने पेन नीचे रख दिया.. कुछ देर तक पन्ने को अनजाने भाव से देखती रही..... फिर फुसफुसाकर कहा.....।

दुआ (धीरे से): अब तू ही है जिससे मैं अपना दर्द बांट सकती हूँ…

तू ही सुन…

तू ही समझ…

तू ही मेरी आख़िरी साथी है।

इतना कहकर दुआ ने अपनी डायरी को सीने से लगाकर आँखें बंद कर ली। इस वक्त कमरे में सिर्फ़ उसकी टूटी साँसों की आहट की आवाज़ गूंज रही थे

अतीत में कुछ ऐसा हुआ जो Dua की ज़िंदगी को दो हिस्सों में बाँट गया —

"पहले वाली दुआ" — जो पिता की आँखों का तारा थी, और

"अब की दुआ" — जो उसी पिता की आँख की किरकिरी बन चुकी है।

उसके एक फैसले ने उसका घर छीन लिया, रिश्ते बदल दिए, और उसके लिए हर दरवाज़ा बंद कर दिया।

उसकी दुनिया अब घर में बसा ये एक जर्जर कमरा है, जहाँ किताबें हैं, एक टूटी डायरी है, और एक पुरानी तस्वीर — जिसमें वो अब के मुकाबले ज़्यादा जिंदा लगती है। भाभी ने घर में दबदबा बना लिया है, और उसका हर कटाक्ष..... हर तंज़..... दुआ की आत्मा को रोज़ एक नया ज़ख्म देता है।

पिता की नज़रों का परायापन उसके दिल को चीरता है — काश वो गुस्सा करते, डाँटते... लेकिन अब तो वो नज़रअंदाज़ करते हैं — जो सबसे ज़्यादा दर्द देता है।

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और अब दुआ बस अपनी खामोश सज़ा काट रही है। उसने हालातों से समझौता कर लिया है..... इसे अपनी नियति मान चुकी है..... अब वो न ही खुद को निर्दोष कहती है, न ही माफी माँगती है — शायद उसे खुद पर यकीन ही नहीं रहा।

दुआ को अपने पिता और बड़े भाई के सामने आने की सख्त मनाही थी।

एक ज़माना था जब उसे पिता उसके बालों में तेल लगाते हुए कहा करते थे,

"मेरी गुड़िया मुस्कराए, तो ये दुनिया हसीन लगती है।"

अब, अगर दुआ गलती से भी उनके सामने आ जाए —

वो अपना अख़बार फेंककर बाहर चले जाते हैं।

बड़े भाई, वरुण, जो कभी उसे हर राखी पर गले लगाकर कहते,

"किसी ने तुझे बुरा कहा तो जान ले लूंगा!"

अब उसकी आवाज़ सुनते ही गुस्से से चीख पड़ते थे।

माँ, जो जानती हैं कि उनकी बेटी टूट चुकी है —

लेकिन पति और बेटे के बीच झूलती एक बेबस शाख़ बन चुकी हैं।

वो रोज़ रात को चुपचाप दुआ के कमरे में आकर उसके तकिए पर हाथ फेर जाती हैं...

और हमेशा बिना कुछ कहे बगैर लौट भी जाती हैं।

और शिवानी उसे समझ ही नहीं आता..... कि वो अपने हालातों का दोष किस्मत को दे..... या दुआ को।

एक आदित्य ही है,जो कभी-कभी उसकी प्लेट में चुपके से खाना रख देता थे,

या वॉशिंग मशीन में उसके कपड़े डाल देता था —

"दीदी, आप थक जाती होंगी..."

उसकी ये मासूम बातें दुआ को तोड़ देती थी।

और फिर... भाभी — 'अंजली भाभी'।

खूबसूरत चेहरा, तेज़ ज़ुबान और दिल में ज़हर।

उसे दुआ से जलन थी, हमेशा से।

अब जब दुआ का गिरा हुआ मुकाम उसे दिखाई देता है,

वो हर दिन उसे कुचलने का एक नया बहाना ढूंढ ही लेती है।

"कुछ लोगों की सूरत भी मनहूस होती है, और वो खुद को देवी समझती आ रही थीं... हुंह।"

ऐसे तानों से उसके दिन की शुरुआत होना अब आम बात हो चुकी थी। और वो कभी हर बात पर लाड़ से लड़ने वाली लड़की, अब बस सब चुपचाप सह लेती है।

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आज फिर एक नई सुबह थी मगर पुराने ज़ख्मों के साथ। जैसे ही घड़ी ने सुबह के 6:30 बजे, दुआ धीरे से उठी।

कपड़ों की अलमारी खोली — हल्की सी सलवार-कुर्ता पहना। बाल बाँधे... और सबसे ज़रूरी बात –पायल नहीं पहनी.....!

आज भी कमरे से बाहर निकलते वक्त दुआ ने अपने पाँवों में पायल नहीं पहनी थी — जो कि कभी उसकी सबसे पसंदीदा चीज़ हुआ करती थी..... ताकि उसके कदमों की आहट किसी को ना सुनाई दे.....क्योंकि अब उसकी हर आहट से इस घर के कुछ दिलों को तकलीफ़ होती थी। वो चुपचाप सीढ़ियाँ उतरते हुए किचेन में आई.....।

"माँ, मैं आलू उबाल देती हूँ... आप हाथ धो लीजिए,"

दुआ ने धीमे से कहा।

माँ की उंगलियाँ थम गईं। उनकी गर्दन भी नहीं हिली, बस होंठ सिहर गए...

दुआ(धीमे मगर झिझके लहज़े से): म.....मां मैं आपकी कुछ मदद कर दूं?

सुनैना जी(बिना दुआ की ओर देखे): रहने दे.. किसी को पसंद नहीं कि तू रसोई में हाथ लगाए।

ये शब्द तलवार की तरह नहीं चुभे...

क्योंकि ये तो रोज़ की बात थी।

पर आज भी उतना ही लहू बहा जितना पहले दिन बहा था। दुआ कुछ नहीं बोली।

दुआ ने अपनी मायूसी को झुठी मुस्कराहट से ढकने की कोशिश की..... उसकी मां उसकी आँखों को देखकर अंदर ही अंदर घबरा गई..... वहाँ कुछ था जो धीरे-धीरे मर रहा था.... दुआ किचेन से बाहर निकलने को हुई..... कि तभी किचेन में अंजली ने कदम रखा..... वो उससे टकराती की दुआ ने फ़ौरन ही अपने कदम पीछे ले लिए थे..... वही रोज़ की ज़हरीली मुस्कान और तंज़ भरे लहज़े के साथ अंजली ने अपनी चुप्पी तोड़ी.....।

अंजली(कटाक्ष करते हुए): ओह! मैडम जी ज़रा ध्यान से..... वरुण जी और पापा जी उठ गए हैं..... जानती हो ना अगर उनके सामने तुम्हारा ये मनहूस चेहरा पड़ गया..... तो बवाल हो जायेगा..... इसीलिए चुपचाप अपने कमरे जा कर पड़ी रहो..... कोई ज़रूरत नहीं है यहां वहां मंडराकर..... दूसरे के मूड का सत्यानाश करने की.....।

जहां अंजली की कटाक्ष भरी ज़हरीली बात सुनकर..... एक तरफ़ दुआ ने ख़ामोशी से अपना सर झुकाते हुए..... अपने क़दम किचेन के बाहर बढ़ा दिए..... वहीं सुनैना जी की पकड़ छुरी पर कस गई थी..... उनके दिल में गहराई से दुआ के लिए अंजली की बातें और तंज़ गढ़ जाते थे..... मगर वो मजबूर थी..... और कहीं ना कहीं दुआ ने उन्हें ख़ुद इस मजबूरी की बेड़ियां पहनाई थीं.....माँ की आँखें उसके पीछे-पीछे उठीं.....पर आवाज़ नहीं दी। अब नहीं।

अंजली(मीठी ज़हर नुमा लहज़े से): मम्मी जी.....आपने देखा कैसे चुपचाप आकर खड़ी हो गई रसोई में? जैसे चोरों की तरह..."

भाभी की आवाज़ किचन से निकली सीधा और दुआ के सीने में धंस गई।

"अब कौन समझाए इसे कि खाना बनाने से पाप नहीं धुलते!"

और फिर अंजली का ज़हरनुमा तंज़िया हल्का सा ठहाका। दुआ ने कुछ नहीं कहा..... वो कहती भी क्या..... ये उसके अपने ही बोए का नतीजा था..... वो जानती थी — हर दिन, हर पल, कोई न कोई उसे कुछ याद दिलाने को बैठा है। दुआ किचेन से बाहर निकली..... तभी पीछे से सीढ़ियों पर किसी के कदमों की आवाज़ आई।

दुआ पलटी...

पिता आ रहे थे — अख़बार हाथ में, उस पर नज़र पड़ते ही..... चेहरा अब भी गुस्से से थम गया।

उनकी नज़र दुआ पर पड़ी —

बस एक पल...

पर वो पल दुआ की रूह तक झुलसा गया।

"सुनैना??"..... वो गुस्से से बिफर कर चिल्ला उठे।

"लो जी शुरू हो गया इंटरस्टिंग फैमिली ड्रामा"..... अंजली ने ग्रीन टी की सिप लेते हुए ज़हरीली मुस्कान के साथ बड़बड़ाया.....।

"ज..... जी"??..... सुनैना जी आदर्श जी की आवाज़ पर हांफती–घबराती किचेन से दौड़कर फ़ौरन ही वहां आ खड़ी हुई थीं।

""मैंने मना किया था ना, मुझे इसकी शक्ल नहीं दिखनी चाहिए?.....

आवाज़ में वो तल्खी थी जो किसी पराए को भी अंदर से चीर दे।

"ग.....गलती हो गई जी..... आइंदा नहीं होगी"।..... सुनैना जी ने बोझिल लहज़े से कहा।

आदर्श ने गुस्से से अख़बार दुआ के सामने फेंका और गेट की तरफ़ बढ़ गए। घर का दरवाज़ा खुला... और एक ज़ोर की आवाज़ के साथ बंद हुआ।

दुआ वहीं खड़ी रही —

साँसें तेज़ थीं...

पर चेहरा शांत।

जैसे हर अपमान अब उसका सांस लेने का हिस्सा..... उसकी नियति बन चुका था।

(सो कैसा लगा इस नई कहानी का ये पार्ट?..... और कृपया करके रिस्पांस में कंजूसी मत किया कीजिए..... आपको बस दो मिनिट निकाल कर अपना फीडबैक देना है....लिखने के लिए मोटिवेट करने के लिए एक समीक्षा लिखने में कितना वक्त लगता..... मैं आपके लिए इतना दिमाग़ खर्च करती आप दो मिनिट खर्च नहीं कर सकते...ये तो ना–इंसाफी है ना?)

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