"Cruel Love"-(The shades of Haterd!) - Chapter 3
आज की सुबह भी वैसी ही थी…... घर में हर कोई अपने-अपने काम में लगा था, और दुआ… अपने कमरे की खिड़की से बाहर देखते हुए बस लोगों को आते-जाते देख रही थी। उसे यूँ खामोशी से बैठे कई दिन हो चुके थे। अब तो खामोशी भी उसके साथ घुल-मिल गई थी। उसे अचानक याद आया — आज शिवानी का प्रेज़ेंटेशन है कॉलेज में।
उसने अपनी अलमारी खोली… और उसमें से एक पुराना हरा स्टोल निकाला, जो कभी शिवानी का फेवरेट हुआ करता था। धूल झाड़ी… और बाहर निकल आई..... कमरे से बाहर निकलते ही दुआ को एक हल्का शोर सुनाई दिया—तेज़ आवाज़ें, जैसे कोई बहस हो रही हो। उसने चौकन्नी निगाह से इधर-उधर देखा। सीढ़ियों के पास, तुलसी के चौरे के पास उसकी बहन शिवानी खड़ी थी—चेहरा तमतमाया हुआ, आँखें भरी हुई। सामने उसका बड़ा भाई वरुण गुस्से से लाल हो रहा था, मुट्ठियाँ कसी हुईं।
वो चुपचाप रुक गई। सामने सीढ़ियों की ओट से सब कुछ साफ़ सुनाई दे रहा था, और दिख भी रहा था। खुद को छुपाते हुए वो वहीँ खड़ी हो गई, पर्दे की तरह दीवार के पीछे। आंगन में शिवानी और वरुण आमने-सामने खड़े थे। शिवानी की आँखें आँसुओं से भरी थीं, और वरुण की आवाज़ में वही सख़्ती थी जिससे कभी दुआ भी टकराई थी। सुनैना जी खामोश खड़ी थी..... जबकि अंजली हमेशा की तरह मज़े से ये सब तमाशा देख रही थी.....।
शिवानी (गुस्से और आँसुओं के बीच): तो क्या सिर्फ़ इसलिए कि दी ने गलती की..... अब मैं भी कुछ ना करूँ? मैं कोई कठपुतली नहीं हूँ भैया!
वरुण (आवाज़ ऊँची करके): नहीं हो..... तो कठपुतली बनकर रहो..... यही ठीक रहेगा! एक को उड़ने की छूट देकर देख लिया हमने—क्या मिला?..... नाम, इज़्ज़त, चैन—सब मिट्टी में मिला दिया उसने!
वरुण की आँखों में अचानक कुछ चमकता है—ग़ुस्सा और दुख की मिली-जुली परछाई। वो एक पल को चुप हो जाता है, फिर गरजते हुए बोला.....।
शिवानी (आँखों में ग़ुस्सा और आवाज़ में काँपती हिम्मत): भैया, आप क्या समझते हैं? कि किसी एक की गलती से सबका सपना छीन लेना सही है? मैं आगे पढ़ना चाहती हूँ... और एक्टिंग मेरा शौक नहीं, मेरा सपना है।
वरुण(बिलकुल तल्ख़ी से): सपना?..... ये सपना तुम्हें क्या देगा?..... इज़्ज़त जाएगी, नाम मिटेगा। एक को आज़ादी दी थी—कहाँ पहुँचे हम?..... अब फिर से वही गलती नहीं दोहराएँगे!"
शिवानी(दर्द से): तो उनकी गलती की सज़ा मुझे क्यों मिल रही है...?
ये बात सुनकर..... सब छुपकर देखती दुआ की साँस अटक गई।
वरुण(सख़्ती से): तुम्हें मैंने आगे पढ़ने की इजाज़त दी..... पापा और मां की वजह से..... लेकिन अब इससे ज़्यादा की कोई उम्मीद मत लगाना.....।
अंजली(तपाक से): झूठ बोलूं तो कौवा काटे...और नहीं तो क्या..... जो कांड तुम्हारी बहन ने किया है..... उसके बाद तो तुम्हें घर से कदम निकालने की भी इजाज़त नहीं देनी चाहिए थी..... पर भई कसम से बहुत ना–शुक्रे लोग हो.....।
शिवानी(धीरे मगर जैसे हर लफ़्ज़ ज़हर से भी कड़वा हो): जिस दिन दुआ दीदी ने वो सब किया था...... उसी दिन हमारे लिए दरवाज़े बंद हो गए। एक की 'उड़ान' की सज़ा बाकी सबको मिली।
दुआ का दिल जैसे किसी ने मुट्ठी में कस लिया हो। उसकी आँखें झुक गईं। आँसुओं को रोका, लेकिन वो सच्चाई से नहीं भाग सकती थी। उसे पता था—शिवानी का इशारा उसी की तरफ़ है।
वरुण(आवाज़ और ऊँची करके): अब और फ़िज़ूल बहस मत करो शिवानी! दुआ के पीछे इस घर ने क्या खोया है, तुम नहीं जानती। लेकिन अब तुम्हें वही गलती हरगिज़ नहीं दोहराने दूँगा।
दुआ की आँखें भर आईं। वह चाहकर भी सामने नहीं जा सकी। उसका गला रुँध गया था—जैसे एक नामालूम अपराधबोध उसे जकड़े हुए हो। वह दीवार से टिक कर खड़ी रही — जैसे खुद को सज़ा दे रही हो।शिवानी ने अपनी किताबें ज़मीन पर गिरा दीं और गुस्से में वहाँ से चली गई। वरुण ने नज़रे फेर लीं — शायद कुछ कह नहीं पा रहा था।
शिवानी(कटाक्ष में डूबी): शायद दुआ दीदी को कुछ नहीं खोना पड़ा, लेकिन हमने बहुत कुछ खो दिया, भैया..... लेकिन उनकी वजह से मैं अब और पीछे नहीं हटूँगी.....।
दुआ चुपचाप मुड़ी, और हल्के क़दमों से वापस चली गई। उसके चेहरे पर वो छाया थी, जो कभी किसी ने समझी नहीं।
एक ऐसी स्त्री जो एक बार उड़ चुकी थी… और अब अपनी परछाईं से भी डरती थी।
वरुण(सख़्ती से): शिवानी! बहुत हो गया ये नाटक! कहा ना इस साल के बाद अब कोई पढ़ाई नहीं..... कोई एक्टिंग नही..... (तेज़ कदमों से जाते हुए)..... अगर इस घर में रहना है..... तो यहां के नियम मानने होंगे। वरना दरवाज़ा खुला है!
इतना कहकर वरुण वहां से चला गया..... दुआ भी धीमे कदमो से वापस लौट गई.....।
(कुछ देर बाद.....)
दुआ कुछ देर बाद वापस नीचे आई..... अब चारों ओर सन्नाटा था..... तभी शिवानी ख़राब मूड के साथ..... अपने कमरे से बाहर निकलती उसके साइड से गुज़री..... कि दुआ ने फ़ौरन ही आगे बढ़ते हुए उसे टोका.....।
दुआ(मद्धम लहज़े से): शिवानी… एक मिनट...?
शिवानी ने दुआ की ओर पलटकर देखा..... उसके चेहरे पर अनकहे भाव थे.....।
दुआ(सहजता से वो स्टॉल शिवानी की ओर बढ़ाते हुए): ये ले जा...… शायद आज भी तुझे सूट कर जाए।
दुआ ने अपनी आवाज़ को सामान्य रखने की कोशिश करते हुए शिवानी से कहा..... शिवानी एक पल तक कुछ नहीं बोली। उसने एक तीखी नज़र से उस स्टोल को देखा। शिवानी उसके पास आकर रुकी, कुछ पलों तक बस देखती रही। फिर उसकी आवाज़ टूटी — ना कोमल, ना तल्ख़ — सिर्फ़ भारी।
शिवानी(अनकहे भाव से): आपसे कुछ पूछूँ, दीदी?
दुआ ने धीरे से सिर हिलाया। जवाब देने से ज़्यादा डरने जैसा।
शिवानी(गुस्से और बेबसी के मिले जुले भाव से): कभी सोचा है आपने... कि आपकी एक उड़ान ने हमारी ज़िंदगी कितनी ज़मीनों में बाँध दी?
दुआ ने नजरें नहीं उठाईं, लेकिन उसके हाथ मुट्ठियों में कस चुके थे।
शिवानी (अब भावनात्मक गुस्से में): आपके बाद माँ की आँखों से सपना उड़ गया। भैया की ज़ुबान पर सिर्फ़ 'मर्यादा' रह गई..... और मैं?..... (तंज़ भरी मुस्कान के साथ)..... मुझे तो बस यही सुनने को मिला — 'तुम भी दुआ जैसी ना बन जाना...... इसीलिए बस हद में रहो.....।
दुआ(हौले से): मैंने भी कभी उड़ने की कोशिश की थी, शिवानी। पर हवाओं ने मेरा साथ नहीं दिया। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि तुम अपनी उड़ान छोड़ दो।
शिवानी (तीखेपन से): क्या वाकई...?..... (मिले जुले भाव से)..... आप जानती हैं..... आपके ज़रूरी फ़ैसले ने मेरी आज़ादी छीन ली?..... मैं पढ़ना चाहती हूँ, एक्टिंग करना चाहती हूँ, अपने सपनों को सच होते देखना चाहती हूँ...... (आंखों में गुस्से भरी नमी के साथ)..... लेकिन हमेशा हर दरवाज़ा आपके नाम से बंद हो जाता है..... (तीखे लहज़े से)..... हर बार जब मैं घर से बाहर निकलती हूँ..... माँ का चेहरा डर से भर जाता है..... "कहीं ये भी.......
शिवानी कहते–कहते रुक गई.... लेकिन उसकी अधूरी बात का पूरा मतलब समझते हुए..... दुआ की आँखों में आँसू भर आए, लेकिन वो उन्हें गिरने नहीं दे रही थी।
दुआ(धीरे): मैंने... जो किया... वो मेरी गलती थी शिवानी..... (गले में भारीपन लिए)..... मेरा यकीन करो..... मैंने कभी नहीं चाहा कि तुम मेरी वजह से... कुछ भी खोओ।
शिवानी(कड़वी मुस्कान के साथ): आप चाहें ना चाहें, लेकिन आपकी छाया मेरे हर सपने..... हर आज़ादी पर पड़ चुकी है..... (मायूसी भरे गुस्से से)..... आपके सपनों की आज़ादी ने मेरे सपनों को कैद कर दिया है..... (तीखे भाव से)..... अगर मैं अपने सपनों के लिए कुछ नहीं कर पा रही हूं..... तो उसके पीछे आपके कदमों की गूंज है।
अब दुआ ने उसकी ओर देखा — पहली बार सीधी आँखों में — आँसुओं से भीगती, लेकिन आत्मग्लानि से तेज़।
दुआ(धीरे, जैसे ख़ुद को चीरते हुए): मुझे नहीं पता था कि मेरी उड़ान से तुम्हारे ख्वाबों की उड़ानें गिर जाएँगी, शिवानी..... (बोझिल लहज़े से)..... काश... काश मैं वो सब बदल सकती..... पर फिलहाल तो अब मैं ख़ुद इतनी बेबस हूं..... कि चाह कर भी तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर सकती...... (नम आंखों से)..... मैं बस यही कर सकती हूँ — तुम्हें फिर से उड़ने की हिम्मत दूँ।
शिवानी(तीखी मगर रुंधी आवाज़ में): आप हिम्मत मत दीजिए..... बस हमारे लिए..... ख़ास कर मेरे लिए..... फिर से कोई वजह मत बनिए...... किसी नए इल्ज़ाम की..... (एक पल रुक कर)..... और हां जितना कर चुकी हैं..... काफ़ी है मेरे लिए..... (स्टोल को एक नज़र देखते हुए)..... अब और किसी एहसान की ज़रूरत नहीं है.....।
इतना कहकर शिवानी मुड़ी और तेज़ी से बाहर की ओर निकल गई..... दुआ वहीं खड़ी रह गई — जैसे वक़्त के किनारे खड़ी हो..... उसके चेहरे पर एक नई कसक थी..... वो आज जान गई थी — सिर्फ़ अपनी अधूरी कहानी नहीं..... बल्कि अब उसे दूसरों के अधूरे सपनों का बोझ भी उठाना होगा।
(रात का वक़्त).....!
भाभी के ठहाके रसोई से गूंज रहे थे। वरुण हँसते हुए कुछ कह रहा था। पापा अपने मोबाइल पर किसी समाचार को ऊँची आवाज़ में सुन रहे थे। माँ ने टेबल पर खाना परोसा। दुआ अपने कमरे में थी — लेकिन पेट में दर्द था, और दवाई ख़त्म हो चुकी थी। बहुत सोचने के बाद, वो पहली बार इस वक़्त खुद को किचन की ओर ले गई। रसोई में भाभी थी।
दुआ(धीमे लहज़े से): भाभी... क्या कोई पैनकिलर होगी?
अंजली ने दुआ की आवाज़ पर कुछ चौंककर देखा…... और होंठों को टेढ़ा करते हुए बोली!
अंजली(तंज़ से): झूठ बोलूं तो कौवा काटे..... अब ये कौन सा नया ड्रामा है?
दुआ कुछ नहीं बोली। उसमें हिम्मत ही नहीं थी..... वो मुड़ी और लौटने लगी..... कि तभी किचेन में दाखिल होती सुनैना जी की आवाज़ उसके कानों में पड़ी।
सुनैना जी(अंजली की ओर देखकर): अंजली..... दवा की ड्रॉअर में है पैनकिलर..... निकाल कर दे दो.....।
अंजली के चेहरे का रंग बदल गया, पर उसने कुछ ना कहकर..... ड्रॉअर खोली और एक गोली दुआ के हाथ में थमा दी। दुआ ने सिर झुकाकर 'शुक्रिया' कहा और चली गई।
(कुछ देर बाद).....
दुआ अपने कमरे में थी.... कई रातों की तरह आज भी उसने खाना नहीं खाया था..... उसका मन ही नहीं थी..... और शायद किसी को परवाह भी नहीं..... दुआ ने आज अपनी डायरी भी नहीं खोली थी। बस तकिए के नीचे से एक पुराना स्केच निकाला — एक लड़की का चेहरा, आँखें खुली हुईं मगर अंदर से बुझी। शायद ये उसका अपना अक्स था.....।
(अगले दिन…...)
रोज़ की तरह दुआ सबके जाने के बाद घर की साफ़ सफाई कर रही थी...... कि तभी पड़ोस की अंकिता आंटी आईं थीं — अपने बेटे की किताब लेने। माँ घर पर नहीं थीं। तक दुआ ने दरवाज़ा खोला।
अंकिता आंटी थोड़ी झिझकीं… फिर बोलीं,
"बिटिया… तू तो नज़र ही नहीं आती अब। कैसी है?"
दुआ हल्के से मुस्कराई — "ठीक हूँ आंटी…।
"पहले कितनी बातें करती थी… अब जैसे खुद में ही बंद हो गई है तू। कुछ नहीं पूछूँगी… पर एक बात कहूँ? कोई भी अंधेरा हमेशा नहीं रहता बेटी। तू जैसी थी, वैसी फिर बन सकती है।"
दुआ ने पहली बार अपनी आँखों में हल्की नमी महसूस की — किसी बाहरी इंसान की बिना जजमेंट वाली बात सुनकर।
"शुक्रिया, आंटी…" बस इतना ही कह सकी।
"अच्छा दुआ बेटा तू अपनी क्लासेस कब शुरू करेगी.... अंकित कह रहा था कि वो तेरे पास ही सीखना चाहता है"?.....!
दुआ कुछ कह पाती..... कि तभी अंजली की धारदार आवाज़ वहां गूंजी.....।
"यहां कोई क्लास_ व्लास नहीं होती..... और ना ही होगी"..... तो फ़िज़ूल में यहां आकर बातें बनाने की ज़रूरत नहीं है"..... अंजली ने तेज़ लहज़े से कहा.....।
"अरे! मैं तो बस अपने बेटे की किताब लेने आई थी..... दुआ दिखी तो पूछ लिया"!..... आंटी ने अंजली के लहज़े पर कुछ मुंह बनाकर कहा.....।
"ये लो"..... अंजली ने टेबल से किताब उठाकर आंटी के हाथ पर रख दी..... "अब जाएं यहां से".....।
आंटी फ़ौरन ही वहां से चली गईं..... उनके जाने के साथ ही अंजली ने अपनी तवज्जो दुआ की ओर की.....।
अंजली(तीखे लहज़े से): और तुम..... झूठ बोलूं तो कौवा काटे..... ये ज़्यादा बातें बनाने की बिल्कुल भी ज़रूरत नहीं है लोगों के साथ..... अपने काम से काम रखो समझी.....।
दुआ ने कुछ नहीं कहा..... वो बस खामोशी से वापस अपने काम में जुट गई.....।
(रात का पहला पहर).....।
दुआ बिस्तर पर लेटी थी..... रोज़ की तरह नींद उसकी आंखों से कोसों दूर थी..... आज भी उसने खाना नहीं खाया था..... कि तभी दुआ के ज़हन में अंकिता आंटी की बात आई..... वो आहिस्ता से बिस्तर से उठी..... उसने कमरे में रखी उस एकमात्र अलमारी को खोला..... जहां एक अरसे से..... उसकी सारी ख्वाहिशें..... सारे सपने..... सारी उड़ाने कैद थीं.....।