श्री लोक 3
महारानी ने धीरे से तारीनिका के गाल पर हाथ रखा और स्नेहभरे स्वर में बोलीं,“राजकुमारी, आप जाइए… और भोजन के पूर्व ही लौट आने का प्रयास कीजिएगा। बहुत दूर मत जाइएगा।”
इतना कहकर उन्होंने हल्की सी मुस्कान दी और महाराज के साथ वहाँ से चली गईं।
अब त्रिशिका को यकीन हो चला था कि वह इस पुस्तक का हिस्सा बन चुकी है… इस दुनिया की "राजकुमारी तारीनिका"। वह धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी, महल के प्रांगण से निकलकर मुख्य द्वार की ओर। तभी एक दासी सिर झुकाकर बोली,
“राजकुमारी, क्या आपके लिए रथ तैयार करूँ या आप अश्व पर जाना चाहेंगी?”
उसने अश्वशाला की ओर इशारा किया। त्रिशिका कुछ पल सोच में पड़ी रही, जैसे कोई अनजानी अनुभूति उसे घेर रही हो। अचानक उसके होंठ खुद-ब-खुद बोले — “अश्व पर!”
दास ने सिर झुकाया और तुरंत एक सफेद, राजकीय घोड़ा उसके पास लाया। वह अश्व… बर्फ-सा उजला, राजसी और अत्यंत सुंदर था। त्रिशिका ने स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरा। घोड़ा हिनहिनाया… मानो वह भी उसे पहचान गया हो। फिर त्रिशिका अचानक ही उस पर सवार हो गई।
न तो उसे डर लगा, न झिझक। उसे खुद पर हैरानी हुई — “मैं तो पहली बार घुड़सवारी कर रही हूँ… फिर यह सब इतना जाना-पहचाना क्यों लग रहा है?” वह घोड़े को हल्का सा संकेत देती है यह परखने के लिए कि क्या वह वास्तव में नियंत्रण कर पा रही है।
और आश्चर्य! घोड़ा उसी दिशा में चला… जैसे वह त्रिशिका के मन की बात समझता हो। कुछ दासियाँ और अंगरक्षिकाएँ उसके पीछे घोड़ों पर सवार हो चलीं, और कुछ पैदल ही चल पड़ीं। कुछ ही क्षणों में राजकुमारी तारीनिका, अपने श्वेत अश्व पर सवार, राज महल से बाहर निकल चुकी थी।
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बाज़ार की ओर
राजमहल की ऊँची प्राचीरों से बाहर निकलते ही त्रिशिका की आँखें चौंधिया गईं… सामने फैला था विशाल बाज़ार, जहाँ रंग-बिरंगे वस्त्रों से सजी दुकानों पर भीड़ लगी थी। हर तरफ़ जीवन धड़क रहा था। बाज़ार की गलियों में ढोल-नगाड़ों की धीमी-धीमी थाप सुनाई दे रही थी।
कहीं बच्चों की खिलखिलाहट थी, तो कहीं व्यापारी ऊँची आवाज़ में अपने सामान की प्रशंसा कर रहे थे—
“राज्य की सबसे कोमल रेशमी चादरें… सिर्फ यहाँ!”
गली के किनारे एक वृद्ध नक्काश लकड़ी पर बारीक कलाकारी कर रहा था, वहीं एक महिला मिट्टी की सुराही बना रही थी — हर चीज़ जैसे जीती-जागती लग रही थी।
पर जब त्रिशिका अपने घोड़े पर सवार होकर उस मार्ग से निकली, तो पूरे बाज़ार में एकाएक खामोशी छा गई। लोगों की नजरें उस पर टिक गईं। कुछ लोग सिर झुकाकर नमन करने लगे — “जय हो राजकुमारी तारीनिका की!”, “राजकुमारी की जय!”
त्रिशिका को थोड़ा अजीब लग रहा था, क्योंकि उसने इन सब के बारे में किताबों में पढ़ा था, पर वह आज पहली बार यह सब देख रही थी।
तभी त्रिशिका के सामने एक वृद्ध स्त्री सड़क के बीच गिर पड़ी थी। उसके हाथों से सब्जियों की टोकरी बिखर चुकी थी। भीड़ में से किसी ने फुसफुसाया, “राजकुमारी तारीनिका अब उस महिला को भी छोड़ेगी क्योंकि उसने राजकुमारी का रास्ता काटने की कोशिश की है।”
तभी… त्रिशिका ने घोड़े की लगाम खींची और बिना एक पल गंवाए घोड़े से नीचे उतर गई।
उसके अंगरक्षकों और दासियों के चेहरे पर हैरानी थी — “राजकुमारी… घोड़े से नीचे?”
बाज़ार के लोग भी रुक गए… चारों ओर सन्नाटा छा गया। सब सोच रहे थे कि शायद आज इस वृद्ध महिला का आखिरी दिन हो, और वह वृद्धा भी बुरी तरह डर गई थी — क्योंकि वह राजकुमारी तारीनिका का क्रोध जानती थी।
किंतु सबकी अटकलों के विपरीत, त्रिशिका विनम्रता से बोली,“ क्या हुआ आपको, माताजी?”
त्रिशिका ने झुककर वृद्धा को सहारा दिया, उसके हाथ से गिरी सब्जियाँ समेटीं, और अपने आँचल से उसका पसीना पोंछा।
वृद्धा काँपती आवाज़ में बोली, “राजकुमारी… आप… आपने…”
त्रिशिका मुस्कुराई, “आप मेरी प्रजा हैं, आपकी सेवा करना मेरा धर्म है।”
यह शब्द जैसे पूरे बाज़ार में गूंज गए। लोगों की आँखें फटी रह गईं। भीड़ में सभी सोच रहे थे — “क्या यह वही तारीनिका है… जो कभी किसी की ओर देखती भी नहीं थी? क्या वही है, जो अपने घोड़े की धूल से भीग जाने पर दासियों को दंडित कर देती थी?”
और अब… वही तारीनिका एक वृद्धा के लिए घोड़े से उतरी थी, भीड़ में झुकी थी… वह मुस्कुरा रही थी…
सबके चेहरे पर अचरज था — “क्या राजकुमारी बदल गई है?”
वृद्धा त्रिशिका के सामने हाथ जोड़कर वहाँ से चली गई। फिर धीरे-धीरे सब लोग भी वापस अपने कामों में लग गए। त्रिशिका कुछ क्षण वहीं खड़ी रही, फिर घोड़े की लगाम थामी और नर्म स्वर में कहा — “चलो…”
सफ़ेद अश्व उसकी बात मानते हुए स्नेहपूर्वक झुका, और वह सहजता से उस पर सवार हो गई।
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अब रास्ता आगे की ओर ले जा रहा था… जहाँ बाज़ार की रंगीनियों का शोर पीछे छूट चुका था।
चारों ओर अब हरियाली थी — खेतों के झुके हुए कानों में सुनहरी धूप लिपटी हुई थी। हल्की हवा में फसलें लहराती थीं, और उस लहर के साथ उड़ती थी तारीनिका के केशों की रेखा… मानो वह खुद हवा में घुलती जा रही हो। सड़क के दोनों ओर हल जोतते किसान नज़र आ रहे थे। कुछ बच्चे बैलगाड़ी के पीछे दौड़ते हुए मुस्करा रहे थे, और जैसे ही उन्होंने राजकुमारी को आते देखा — सभी ने हाथ जोड़कर झुककर प्रणाम किया।
त्रिशिका ने मुस्कुराकर हाथ हिलाया और आगे बढ़ती रही। जैसे-जैसे रास्ता आगे बढ़ता गया, चारों ओर घना जंगल फैलता गया। पेड़ अब इतने ऊँचे हो चले थे कि सूरज की किरणें जमीन तक पहुँचने से पहले ही थक जाती थीं।
त्रिशिका का घोड़ा धीमे-धीमे बढ़ रहा था। हवा में एक अजीब-सी गंध थी — त्रिशिका चौकन्ना होकर इधर-उधर देखने लगी। पेड़ों के बीच हलचल थी, पर कुछ साफ़ नज़र नहीं आ रहा था। और फिर… अचानक! एक तेज़ सनसनाहट के साथ हवा बही, और घोड़ा ज़ोर से हिनहिनाया… उसकी आँखों में डर झलक रहा था।
“अरे! क्या हुआ?” त्रिशिका ने लगाम खींचनी चाही,
पर अब घोड़ा उसके नियंत्रण में नहीं था। घोड़ा अचानक तेज़ दौड़ पड़ा… और तेज़… त्रिशिका का शरीर झटकों से हिलने लगा।
“रुको! रुको!!” वो चीख पड़ी, लेकिन घोड़ा किसी अनदेखी शक्ति से खिंचता जा रहा था। पीछे से अंगरक्षिकाएँ और दासियाँ आवाज़ें लगा रही थीं — “राजकुमारी! राजकुमारी!” लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। घोड़ा त्रिशिका को उनसे बहुत दूर ले जा चुका था।
अब वही त्रिशिका सब तरफ़ डर और हैरानी से काँपते हुए देख रही थी — घोड़ा दौड़ते-दौड़ते उसे दूसरे राज्य की सीमा के भीतर ले गया था।
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क्या होगा अब त्रिशिका के साथ?
क्या उसे वहाँ के सैनिक पकड़ लेंगे?
और क्यों त्रिशिका को सब कुछ जाना -पहचाना सा लग रहा है?
क्या किसी को त्रिशिका पर संदेह हो जाएगा?
आगे जानने के लिए पढ़ते रहिए हमारी कहानी — ✨श्री लोक✨ — जिसे लिखा है A.R. Writer ने इन Yatra - Collected stories।
नॉट- ये एक शोर्ट स्टोरी कलेक्शन है इसमे अलग अलग जोनरा (genre) की बहुत सारी स्टोरीज़ होंगी। और अगली स्टोरी के बारे में, उससे पहले की स्टोरी में प्रमोशन शुरू कर दिया जाएगा I