तुम तो धोखेबाज़ हो Ch. 3

तुम तो धोखेबाज़ हो - Chapter 3

Posted by Sanyogita • Feb 01, 2026 10:24 AM

सिंघानिया मेंशन...(रात के 12 बजे)

इस आलीशान बंगले के बाहर सिद्धार्थ की कार आकर रुकी। बंगले के अंदर कदम रखते ही नौकरों में हलचल मच गई। आधी रात का समय था फिर भी इस बंगले में एक चिड़िया भी नही सोई थी, कारण बस सिद्धार्थ..यानी सबके छोटे मालिक, जो पूरे एक साल बाद लौटकर घर आये हैं।

“सिद्धार्थ! मेरा बच्चा!”

उसकी माँ कल्पना लगभग दौड़ती हुई आई और कसकर सिद्धार्थ को गले से लगा लिया। पचास साल की उम्र में भी वो काफी खूबसूरत और हसीन लगती थी, लगता ही नही था कि सिद्धार्थ की माँ है, बड़ी बहन की तरह लगती थी।

“मॉम..मुझे थोड़ी साँस तो लेने दो।” सिद्धार्थ ने हँसकर कहा।

कल्पना उससे अलग हुई और उसका माथा चूमकर बोली, “एक साल! पूरा एक साल दूर रहा है तू मुझसे! एक दिन भी ऐसा नही बीता होगा जब मैंने इस घर की चौखट पर तेरी राह ना देखी हो, अरे अपने डैड का फोन मत उठाता पर कम से कम मेरा तो उठा लेता।” उसने शिकायतें करना शुरू किया।

“सॉरी मॉम, पर मुझे लगता था कि कहीं डैड आपके फोन से मुझे फोन कर रहे हों।” सिद्धार्थ ने भी अपनी सफाई पेश कर दी।

कल्पना ने भी अब हल्के से सिर हिलाकर इन बातों को किनारे किया और नौकरों को ऑर्डर देते हुए बोली, “जाओ जाकर खाना लगा दो, मेरे बेटे को भूख लगी होगी।”

सिद्धार्थ ना में मुंडी हिलाकर बोला, “नही मॉम, मुझे भूख नही है।” उसने नौकरों को खाना लगाने से रोक दिया और कॉफी बनाने को बोल दिया।

उसके बाद वो कल्पना के साथ सोफे पर बैठ गया, फिर उसकी गोद में बच्चे की तरह सिर रखकर लेट गया।

“आय एम सो टायर्ड..मॉम!”

कल्पना प्यार से उसके बाल सहलाते हुए बोली, “मेहनत इंसान को थका तो देती है, पर उससे खुशी भी उतनी ही मिलती है, और मेहनत कभी बेकार भी नही जाती, तूने जिस मकसद से इस एक साल में मेहनत की है, वो मकसद ज़रूर पूरा होगा।”

“मेरी कंपनी को खरीद लेना ही तो मकसद था इस साहबज़ादे का।”

यह भारी आवाज़ सुनकर सिद्धार्थ और कल्पना दोनों की ही शक्लें बिगड़ गईं। सिद्धार्थ के पिता व कल्पना के पति राजेश अपना खडूस चेहरा और सख्त नज़रें लिए उन दोनों के सामने आकर खड़े हो गए।

सिद्धार्थ ने भी कल्पना की गोद से सिर उठाया और उनसे बोला, “डैड प्लीज़..मैं अभी लड़ाई के मूड में बिल्कुल नही हूँ।”

राजेश तंज भरी मुस्कान चेहरे पर लाकर बोले, “अरे नही बेटा जी, मेरी इतनी औकात कहाँ जो आपसे लड़ाई कर सकूं, अब तो आप मेरी ही कंपनी को खरीदकर उसके मालिक बन चुके हैं, पर क्या मैं पूछ सकता हूँ आपने इतनी मेहनत क्यों की? क्या मेरे बाद वो कंपनी खैरात में जाने वाली थी?”

“आप अभी उसे...” कल्पना ने कहना चाहा।

“तुम चुप खड़ी रहो, मैं उससे कुछ पूछ रहा हूँ।” राजेश ने उसकी बात काट दी और सिद्धार्थ के जवाब का इंतज़ार करने लगे।

सिद्धार्थ ने पूरे स्वाभिमान के साथ जवाब दिया, “मुझे विरासत में वो कंपनी नही चाहिए थी, आई वॉन्ट टू अचीव एवरीथिंग ऑन माय ओन, नॉट इन योर नेम।” उसने अपने पिता पर उंगली की।

कहने का मतलब, उसे जो कुछ भी हासिल करना है अपने दम पर ही करना है, अपने पिता के नाम पर नही।

कल्पना ने तो सिद्धार्थ की बलाईयां ले लीं, “हाय मेरा बच्चा! कितना मेहनती और स्वाभिमानी है!”

राजेश ने चिढ़कर कल्पना को देखा और कहा, “तुम्हीं ने इसे सर पर चढ़ा रखा है, अरे तुम कभी ये क्यों नही सोचती कि बचपन से ऐशो-आराम और आलसीपने में रहा तुम्हारा ये लाडला इतना बदल कैसे गया?”

कल्पना ने सिद्धार्थ की तरफ देखा, जो अपने पिता को घूर रहा था, ना जाने क्या प्रोब्लम है इन्हें? वो आलसी था तब भी ताने देते थे और अब मेहनत कर रहा है तब भी ताने दे रहे हैं, ये इंसान कभी खुश होता ही नही है, खडूस कहीं का।

नौकर कॉफी लेकर आया, सिद्धार्थ उसे लेकर जाते हुए बोला, “मैं अपने रूम में जा रहा हूँ, गुड नाईट मॉम।”

कल्पना ने भी उसे गुड नाईट किया।

सिद्धार्थ अपने रूम की तरफ चला गया।

उसके जाते ही कल्पना अपने पति पर फूट पड़ी, “आपको परेशानी क्या है मेरे बेटे से, जब देखो उसके पीछे पड़े रहते हैं, एक साल बाद वो वापस आया है लेकिन आप फिर भी उसे ताने ही मार रहे हैं।”

राजेश ने उससे कहा, “तुम बहुत ही भोली हो कल्पना, तुम्हें सिर्फ उसकी मेहनत दिख रही है, लेकिन ये नही दिख रहा कि उसने इतनी मेहनत क्यों की है और किसके लिए की है, ये किसी दिन हमारी इज्जत मिट्टी में मिलवाकर रहेगा।”

कल्पना ने टेढ़ी नज़रों से उन्हें घूरते हुए कहा, “आपने तो जैसे अपनी बहुत इज्जत बनाई हुई है न, क्या मैं नही जानती कि आप एक अंडरवर्ल्ड माफिया हैं, और एक माफिया की इज्जत...”

“बहुत होती है, समझी तुम।” राजेश ने उसकी बात काटकर पूरे गर्व से छाती चौड़ी करके कहा।

सचमुच बहुत इज्जत है उनकी अंडरवर्ल्ड में, अब अगर उनका बेटा किसी दो टके के लड़के के चक्कर में पड़कर उनसे बग़ावत करेगा तो क्या ही इज्जत रह जाएगी उनकी?

शायद सिद्धार्थ के पिता राजेश को ये अंदेशा था कि सिद्धार्थ उनकी कंपनी में काम करने वाले एक साधारण से एंप्लॉयी वरूण से बेपनाह मोहब्बत करता है, और उसी के लिए वो इतना स्वाभिमानी बना है, लेकिन अभी इस बात का उन्हें पुख्ता सबूत मिल नही पाया था कि ये बात सच है या नही?

अपने कमरे की बाल्कनी में खड़ा सिद्धार्थ कॉफी पीते हुए सामने आकाश में उगे गोल चन्द्रमा को देख रहा था। चेहरे की चमक और मुस्कान जाने का नाम नही ले रही थी, कल वरूण से मिलने की एक्साईटमेंट इतनी ज़्यादा थी कि आज की रात उसे नींद भी नही आने वाली थी।

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इधर घबराहट के मारे नींद तो वरूण को भी नही आ रही थी लेकिन शरीर तो थका हुआ था, वो पलंग के दूसरे किनारे पर बैठ गया, उसने देखा अहान तो आराम से गहरी नींद में सो चुका था, वो भी सिर्फ लहंगा पहनकर, ऊपरी धड़ पर तो कुछ भी नही था, ये देख वरूण थोड़ा उत्तेजित हुआ लेकिन फिर उसने तुरंत अपनी नज़र हटा ली और धीरे से कंबल उठाकर अहान पर डाल दिया।

फिर खुद दूसरी तरफ करवट लेकर लेट गया। सिद्धार्थ और अहान के बारे में सोचते-सोचते उसे कब नींद आ गई, पता ही नही चला?

अगली सुबह....

हल्की धूप की किरणें जब कमरे के अंदर आईं, तब वरूण की आँख खुलीं, उसे अपने सीने पर भार महसूस हुआ, उसने आँखें बड़ी करके देखा, अहान उसके सीने पर सिर रखकर सोया हुआ था और कंबल दोनों के ऊपर था।

वरूण ने हड़बड़ाकर उसे खुद से दूर किया। अहान की नींद भी टूटने लगी, वो एक उबासी लेकर मुस्कुराते हुए बोला, “गुड मॉर्निंग सैंया जी!”

वरूण ने चिढ़चिढ़ी सी अजीब सूरत बनाकर कहा, “मेरा नाम वरूण है।”

अहान ने अपनी पूरी आँख खोलकर मुस्कुराते हुए कहा, “हमे पता है, पर हमारी माँ कहा करती थीं कि पत्नी अपने पति को नाम लेकर नही बुलाती, इसलिए हम आपको सैंया जी कहेंगे।”



वरूण ने साफ मना करते हुए कहा, “बिल्कुल नही, मुझे ये पेट नेम, निक नेम, चिक नेम..कुछ भी पसंद नही है, मेरा सिर्फ एक ही अच्छा-खासा नाम है.. वरूण, और तुम भी मुझे इसी नाम से बुलाओगी..मतलब बुलाओगे, समझ गए।”

अहान ने भी उसकी बात समझकर सिर हिला दिया, “ठीक है, सैंया जी!”

वरूण ने उसे नज़रें टेढ़ी करके घूरा, अहान ने दांतों तले जीभ दबा ली और नज़रें चुराते हुए बोला, “सॉरी..मेरा मतलब..व..वरूण जी।” कहते हुए उसके गाल गुलाबी हो उठे थे। जिन्हें देखकर वरूण का बेईमान दिल धक-धक करने लगा। वो उन गुलाबी गालों को छूने जा ही रहा था कि उसका फोन बज उठा।

उसने कान पर लगाया तो दूसरी तरफ से किसी लड़की की आवाज़ आई...

“हेय वरूण! कहाँ रह गया तू, जल्दी ऑफिस आ, आज हमारे नये सीईओ आने वाले हैं, आज से ऑफिस के रूल्स भी चेंज हो जाएँगे, सभी का आना कम्प्लज़री है।”

वरूण ने जल्दी-जल्दी कहा, “ओके, मैं आता हूँ अभी।” उसने फोन रख दिया और फटाफट बाथरूम की तरफ भागने लगा।

उसकी जल्दबाज़ी देखकर अहान बोला, “अरे आप इतनी जल्दी में कहाँ जा रहे हैं?”

“दिख नही रहा, बाथरूम जा रहा हूँ।” वरूण दरवाज़ा खोलकर बाथरूम में घुस गया।

अहान की बात का ढंग से जवाब ही नही दिया। वो अपने-आप से बोला, “कल हमारी शादी हुई और आज ना जाने इतनी जल्दबाज़ी में कहाँ जा रहे हैं?”

अब वरूण के ऑफिस वालों को थोड़े ही पता है कि उस मंडप में वरूण के भाई की जगह उसी के फेरे पड़वा दिए गए थे।

लेकिन राघव-रियांश नामक दो जुड़वा भाईयों को इसकी पूरी जानकारी थी।

समुद्र किनारे लंबी सड़क पर, जहाँ एक तरफ लहरों की आवाज़ थी तो दूसरी तरफ मॉर्निंग ट्रैफिक।

राघव और रियांश ट्रैक सूट में वहाँ जॉगिंग कर रहे थे।

“जब मेरे बेबी को वरूण की शादी का सच पता चलेगा तो..उसका तो दिल ही टूट जाएगा।” रियांश ने भारी दुख के साथ कहा।

“डोंट वरी, हम दोनों हैं तो सही उसका दिल जोड़ने के लिए।” राघव बेफिक्री भरे लहजे में बोला।

रियांश ने उसकी तरफ देखकर कहा, “मैं सोच रहा हूँ, क्यों ना हम दोनों जाकर आज ही बेबी को सब सच बता दें।”

राघव ने तुरंत मना किया, “अरे पागल हो गया है क्या, अभी तो ये धोखेबाज़ी का खेल शुरू हुआ है और तू अभी से एम्पायर बनकर गेम ओवर कर रहा है, पहले देखने तो दे कि अब वरूण क्या करता है, या तो वो खुद ही सब सच बता देगा या फिर...”

रियांश भी सोचता रह गया, अगर वरूण सच नही बताएगा तो फिर क्या करेगा?

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वरूण जल्दी-जल्दी ऑफिस के लिए तैयार हुआ और कमरे से बाहर भागा।

सामने ही पूजा की थाली लिए उसकी माँ उमा मिल गईं, वो हैरान होकर बोलीं, “अरे वरूण, तू आज भी ऑफिस जा रहा है, कल तो तेरी शादी ही हुई है!”

वरूण बिना रूके ही बोला, “ऑफिस वालों को थोड़े ही पता है कि कल मेरी शादी हुई है, और आज मेरा जाना बहुत ज़रूरी है वरना कल ऑफिस के नये नियम मुझे कोई नही समझाने वाला और फिर गड़बड़ होगी तो मेरी नौकरी खतरे में पड़ जाएगी।”

वरूण ये कहता हुआ घर से बाहर निकल गया। रास्ते में कैलाश जी भी हाथ में अखबार लिए खड़े मिले थे पर उन्होंने कभी भी अपने बेटों को काम के लिए नही रोका, वो खुद ही अपनी नौकरी के प्रति हमेशा ईमानदार रहे थे इसलिए नौकरी का महत्व भली-भाँति समझते थे।

अहान भी तैयार होकर कमरे से बाहर आया, उसने गुलाबी रंग की साड़ी पहनी थी, हल्का-फुल्का मेकअप किया था और सिर पर पल्लू डाल रखा था। उसे देखकर उमा मुस्कुराईं और बोलीं, “कितनी प्यारी लग रही है मेरी बहू।”

अहान हल्के से मुस्कुरा दिया और उसने उमा के पैर छू लिए। वहाँ खड़े कैलाश जी के भी पैर छुए। दोनों ने सदा सुहागन रहो, दूधो नहाओ पूतो फलो.. इस प्रकार के आशीर्वाद उसे दे डाले।

उमा अब अहान को मंदिर की तरफ ले जाते हुए बोली, “चल हम दोनों मिलकर पूजा करते हैं, और आज आरती तू ही करेगी, ठीक है।”

अहान ने भी मुस्कुराकर सिर हिलाया और उनके साथ घर के मंदिर की तरफ चल दिया।

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ऑफिस के कॉन्फ्रेस हॉल में पूरा स्टाफ बैठा हुआ था। सब आपस में फुसफुसा रहे थे। अपने नये सीईओ के बारे में ही बात कर रहे थे।

वरूण भी जल्दबाज़ी में वहाँ आया और एक खाली कुर्सी पर आकर बैठ गया। सबने उसे ऐसे देखा जैसे दुनिया का आठवां अजूबा आ गया हो।

वरूण उन सबकी नज़रों से असहज हो गया और फिर थोड़ा सलीके से कुर्सी पर सीधा होकर आराम से बैठ गया। पास में बैठी उसकी कलीग लीची बोली, “हाय वरूण! आज इतना लेट कैसे हो गए? तुम तो हमेशा टाईम पर आते हो न?”

वरूण अब कैसे बताता कि कल रात फेरे लगाते हुए चक्कर आ गए थे, सुबह उठा ही नही।

तभी डोर खुला और सिद्धार्थ अंदर आया, ब्लैक सूट, फुल कॉन्फिडेंस, और चेहरे पर कातिल मुस्कान।

“ओह! तो सिद्धार्थ सर ही हमारे नये सीईओ हैं।” लीची खुशी और हैरानी के मिले-जुले भावों से बोली।

लेकिन सिद्धार्थ को देखकर वरूण की साँसे अटक गई थीं। उसने तो रात-भर भगवान से यही प्रार्थना की थी कि सिद्धार्थ हमेशा सात समंदर पार ही रहे, कभी लौटकर ना आए, लेकिन ये तो धड़कन के सुनील शेट्टी की तरह लौट आया।

तेरी यादों से तेरी बातों से यूं ना जाऊँगा मैं

ये इरादा है मेरा वादा है लौट आऊँगा मैं

लौट आऊँगा मैं.....🎵

वरूण को सिद्धार्थ इस गाने के साथ मूवमेंट करता हुआ दिखाई भी दे रहा था, और डर के मारे वरूण की हालत खराब होती जा रही थी।

“गुड मॉर्निंग एवरीवन, फ्रॉम टुडे...आई एम योर सीईओ।” कहते हुए सिद्धार्थ ने सभी पर नज़रें घुमाईं और उसकी नज़रें वरूण पर जाकर ठहर गईं। सिद्धार्थ के होंठों पर प्यारी सी मुस्कान तैरने लगी, जिसे देख वरूण की जान सूखने लगी।

जारी है......

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