प्रीतम का कुछ दोष नही है...!! - Chapter 1
एक बंद कमरे में आईने के सामने एक लड़की दुल्हन के वेश में बैठी हुई थी…… आज उसकी शादी हुई थी।
लेकिन उस शादी की चमक, एक दुल्हन के चेहरे पर दिखने वाली रौनक, खुशी — कुछ भी उसके चेहरे पर नज़र नहीं आ रहा था।
दिख रहे थे तो बस उसके गालों पर सूख चुके आँसुओं के निशान…… और पानी से भरी उन आँखों में सिर्फ और सिर्फ दर्द…!!
सुबह तो वह कितनी खुश थी……
आज उसकी शादी उस लड़के से होने वाली थी जिसे उसने पसंद किया था……
मन ही मन वह अपने सुखी संसार के सपने देखने लगी थी……
हर लड़की के मन में अपनी शादी को लेकर, अपने जीवनसाथी को लेकर कुछ न कुछ सपने होते ही हैं ना……
वैसे ही उसके भी कुछ सपने थे……
और आज वही सपने पूरे होने वाले थे……
कादंबरी…
गोरा रंग, लंबे काले घने बाल, नाज़ुक रेखाओं वाली आँखें, पतला-सा नाज़ुक बदन, कद मुश्किल से चार फुट सात-आठ इंच……
पहली नज़र में ही दिल में उतर जाने वाला मासूम चेहरा था उसका……
मानो चाँदनी ने किसी इंसानी रूप में जन्म ले लिया हो…!!
एक साधारण परिवार में जन्मी कादंबरी चार साल की थी, तभी उसके माता-पिता एक कार दुर्घटना में चल बसे……
नन्ही-सी बच्ची थी वह……
इस घटना ने उसके कोमल मन पर गहरा आघात किया था……
अभी-अभी दुनिया को समझना शुरू ही किया था कि दुख का पहाड़ उस पर टूट पड़ा……
पूरी तरह बिखर गई थी वह बच्ची……
लेकिन उसे इस हालात से बाहर निकाला उसके काका-काकू ने……
माता-पिता के बाद उन्हीं लोगों ने उसे पाला-पोसा था……
अपनी सगी बेटी की तरह आज तक उसे संभाल कर रखा था……
अब वह चौबीस-पच्चीस साल की हो चुकी थी……
इतने बड़े घर से रिश्ता चलकर आया था, तो उन्होंने भी उसे इस शादी के लिए राज़ी कर लिया था……
जिस कंपनी में कादंबरी काम करती थी, उसी कंपनी का CEO उसका हाथ माँगने आया था……
विराज…
CEO of VR Company……
उसने खुद कादंबरी के काका-काकू से शादी के लिए उसका हाथ माँगा था……
उनकी परिस्थिति को देखते हुए कादंबरी ने भी खुशी-खुशी इस शादी के लिए हाँ कर दी थी……
और इस बीच बार-बार मिलने-जुलने में कहीं न कहीं उसके मन में भी विराज के लिए भावनाएँ जन्म ले चुकी थीं……
आख़िर होने वाला पति था वह……
उसके बारे में सोचे बिना वह कैसे रह सकती थी…!!
आईने के सामने बैठी कादंबरी अपने वैवाहिक जीवन के सपने सजा रही थी……
आने वाले सफर की कल्पना करते-करते उसका मन उछलने लगा था……
अनगिनत भावनाएँ दिल में उमड़ रही थीं……
विराज का ख़याल आते ही उसके गालों पर शर्म की लाली चढ़ने लगी थी……
जो उसके सौंदर्य में चार चाँद लगा रही थी……
कादंबरी अपने ही ख़यालों में खोई हुई थी कि तभी उसकी सहेली नीता उसके पास आ जाती है……
“ओह्ह हो... भाईसाहब !! क्या लग रही है रे तू कादंबरी……
आज मंडप में तबाही मचने वाली है
तेरा ये रूप देखकर तो आज दूल्हा क्लीन बोल्ड होने वाला है!!”
नीता हँसते हुए उसके पास आकर बोलती है……
उसकी बातें सुनकर कादंबरी और भी ज़्यादा शर्माने लगती है……
शर्माते हुए उसके गालों पर खिली वो मुस्कान……
और उस मुस्कान से उभरी वो प्यारी-सी गालों की डिंपल……
सच में, कितनी खूबसूरत लग रही थी कादंबरी……
मानो स्वर्ग की अप्सरा हो…!!
“चल, तेरा दूल्हा मंडप में तेरा इंतज़ार कर रहा है…… उन्हें और इंतज़ार मत करवा……
पहले से ही बड़ी बेसब्री से तेरी राह देख रहे हैं…!!”
नीता बोलती है और उसे बाहर ले जाने लगती है……
कादंबरी उसके साथ चल तो देती है……
लेकिन उसके मन में एक अजीब-सी अनजानी घबराहट भरने लगती है……
‘अनजान लोग, नए रिश्ते, शादी जैसा नाज़ुक बंधन……
क्या मैं सब संभाल पाऊँगी…?’
ये विचार उसके मन में कौंध जाता है……
पहले से ही थोड़ी-सी डरपोक कादंबरी का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगता है……
इन्हीं ख़यालों में वह शादी के मंडप तक पहुँच जाती है……
पंडित जी पहले से ही अंतरपाट पकड़े हुए थे……
एक तरफ़ कादंबरी खड़ी थी और दूसरी तरफ़ विराज……
दोनों ही एक-दूसरे को देखने के लिए बेचैन थे……
कादंबरी सिर झुकाए खड़ी थी……
तभी पंडित जी मंगलाष्टक कहना शुरू करते हैं……
(मंगलाष्टक श्लोक ज्यों-का-त्यों)
पहली मंगलाष्टक पूरी भी नहीं हुई थी कि…
धड़ामsss—!!!
एक ज़ोरदार आवाज़ ने
पूरे हॉल को हिला कर रख दिया था..…
सन्नाटा…
फिर…
डर…
काले सूट-बूट में
बीस–तीस आदमी…
हाथों में गन लेकर उस हॉल में एंटर होते है …
आँखों में जैसे मौत दिखाई दे रही थी उन लोगोंके…
तभी
टक… टक… टक…
महंगे जूतों की आवाज़ वहा गुंजने लगती है …
एक शख़्स…
रौब और ख़ामोशी के साथ
मंडप की ओर बढ़ रहा था…
ग्रे थ्री-पीस सूट…
सधे हुए क़दम…
कलाई पर चमकती घड़ी…
और वो नज़र…
जो सामने वाले को
जीते-जी मार दे…!!
जैसे-जैसे वो आगे बढ़ रहा था…
वैसे-वैसे
विराज के क़दम पीछे हट रहे थे…
उसके चेहरे का रंग उड़ चुका था…
“देवांश…” विराज धीरे आवाज में बडबडता है....!!
नाम नहीं था वो…
ख़ौफ़ था…!!
विराज उसे इतना क्यों डर रहा है — ये बात कादंबरी को समझ नहीं आ रही थी……
वह बस उलझी-सी नज़रों से विराज को देख रही थी……
“अरे!!
ये क्या बदतमीज़ी…!!”
विराज को इतना डरा हुआ देखकर उसकी माँ शकुंतला देवी कुछ कहने ही वाली थीं कि
पल भर में वह आदमी उनके ऊपर गन तान देता है……
गन लोड होने की आवाज़ आती है……
और शकुंतला देवी के शब्द गले में ही अटक जाते हैं……
वो बीस-तीस भारी-भरकम आदमी……
उसकी बाज़ जैसी नज़र……
और वो फुल-लोडेड गन देखकर
वहाँ मौजूद हर चेहरे का रंग उड़ चुका था……
डर का दूसरा नाम —
मिस्टर देवांश रघुवंशी…!!
नाम देवता का…
लेकिन वह था एक निर्दयी दानव…!!
साढ़े छह से सात फुट लंबा कद……
रौबदार, मजबूत शरीर……
चमकती आँखें……
शेर जैसी भेदती नज़र……
किसी से न डरने वाला निडर सीना……
हाथी-घोड़े जैसी दमदार चाल...
सिर्फ नज़र से ही सामने वाले को चीर देने वाली उसकी कातिल निगाहें……!!
प्यार - तरस जैसे शब्द मानो उसके लिए बने ही नहीं थे……
वह सामने वाले को अपने पैरों की धूल समझता था……
ऐसा था वह —
दिल से पूरी तरह पत्थर…
देवांश…!!
***
stay tunned.