Dragonbbvg Ch. 2

Dragon Empayar - Chapter 2

Posted by Swapnil Tawde • Feb 18, 2026 01:15 AM

Capter - 1 बर्थमार्क

रात का घना अंधेरा था। विद्युत अपने हॉस्टल के कमरे में सो रहा था। उसके सीने के बर्थमार्क पर अचानक दर्द होना शुरू हुआ और तभी खिडकी के बाहर से किसी पक्षी के चीखने की ज़ोरदार आवाज़ आई। यह आवाज़ लगातार बढ़ती ही जा रही थी। इस चीखने की आवाज़ से जब विद्युत की आँख खुली तो वह भागकर खिडकी के पास गया। उसने झटके से खिडकी खोली तो एक बाज का पैर खिडकी में फँसा हुआ था। विद्युत ने बाज को छुडाने की कोशिश की, लेकिन उसके हाथ लगाने से पहले ही बाज खुद से छूट गया और अँधेरे में कहीं उड गया।

विद्युत खिडकी वापस बंद करने ही वाला था कि तभी उसे सामने गर्ल्स हॉस्टल की बिल्डिंग की छत पर कुछ चलता हुआ दिखा। पहले-पहल तो डर के मारे उसकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई थी। उसने मन ही मन हनुमान चालीसा बोलना शुरू कर दिया, "भूत पिशाच निकट नहीं आवे महावीर जब..." वो लाइन पूरी भी नहीं कर पाया था, कि तभी वो उस शख्स को पहचान गया। उसके मुँह से निकला, "मालिनी! ये इतनी देर रात बिल्डिंग की छत पर क्या कर रही है?"

विद्युत को समझते देर न लगी कि यह लडकी सामने के गर्ल्स हॉस्टल में रहने वाली मालिनी ही है और यह छत से कूदने की प्लानिंग कर रही है। विद्युत ज़ोर से चिल्लाया, "मालिनी! रुक जाओ, मालिनी! प्लीज़ ऐसा मत करो।" लेकिन विद्युत की आवाज़ मालिनी तक नहीं पहुँच पाई। विद्युत को कुछ समझ नहीं आ रहा था। वह जल्दी से भागकर गर्ल्स हॉस्टल के नीचे पहुँच गया और चिल्लाते हुए बोला, "मालिनी, तुम पागल हो गई हो क्या?"

मालिनी ने एक नज़र नीचे खडे हुए विद्युत पर डाली और कहा, "विद्युत, तुम चले जाओ यहाँ से। मेरा सब कुछ खत्म हो चुका है। मैं अपने इन्हीं हाथों से अपने माँ-बाप का सपना तोड चुकी हूँ। मैं जीते-जी उन्हें मुँह नहीं दिखा सकती।"

विद्युत बोला, "तुम पागल मत बनो, मालिनी। हर प्रॉब्लम का एक सॉल्यूशन होता है। तुम मुझे बताओ, हम मिलकर ज़रूर कोई रास्ता निकालेंगे। यू नो, सुसाइड कोई सॉल्यूशन नहीं है।"

मालिनी विद्युत की बात को बीच में काटते हुए बोली, "मुझे इस बार क्लास में फोर्थ पोजीशन मिली है। मुझे स्कॉलरशिप नहीं मिली तो फीस न भर पाने के कारण मेरी पढ़ाई छूट जाएगी।"

विद्युत बोला, "पहले तुम पीछे हटो। हम सब ठीक कर लेंगे। बस मैं एक मिनट में छत पर आ रहा हूँ। तुम प्लीज़, प्लीज़ कुछ उटपटांग हरकत मत करना।"

इतना कहकर विद्युत पूरी ताकत से छत की ओर भागा। अभी वह हॉस्टल की बिल्डिंग की सीढ़ियों की ओर जा ही रहा था कि उसने देखा कि मालिनी छत से कूद चुकी है। विद्युत की समझ में कुछ नहीं आया और उसमें न जाने कहाँ से ताकत आ गई। उसने आसमान की ओर छलाँग लगाई और वो पंछी की तरह ऊपर उडने लगा और मालिनी को उसने हवा में ही पकड लिया।

अगले पाँच से दस सेकंड में क्या हुआ किसी को कुछ समझ में नहीं आया। जब विद्युत ने मालिनी को गोद से उतार के ज़मीन पर खडा किया तो मालिनी घबराहट से पीछे हट गई और बोली, "दिस इज़ इंपॉसिबल! यह कैसे हो सकता है? तुम... तुम उड कैसे सकते हो?"

विद्युत मालिनी की बात पर हक्का-बक्का था। विद्युत बोला, "मालिनी, मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि क्या हुआ, कैसे हुआ। मुझे लगा कि मुझे तुमको बचाना चाहिए और बाकी क्या हुआ, कैसे हुआ मुझे खुद समझ में नहीं आ रहा।"

मालिनी बोली, "विद्युत, तुम हनुमान जी की तरह हवा में उड रहे थे।"

विद्युत बोला, "तुम प्लीज़ यह सब किसी को मत बताना, नहीं तो लोग मेरा मज़ाक उडाएँगे।"

मालिनी बोली, "और तुम मेरे सुसाइड के बारे में किसी को नहीं बताओगे ना?"

विद्युत बोला, "तुम पागल हो? यह सब कोई बताने वाली बात थोडी है। बाकी रह गई बात स्कॉलरशिप की, तो स्कॉलरशिप नहीं मिली तो क्या हुआ, मैं अंशुमान भैया से बात करके तुम्हारी फीस भरवा दूँगा।" फिर मुस्कुराते हुए बोला, "और जब तुम खूब अमीर हो जाओगी तो पैसे वापस कर देना।"

विद्युत के यह बोलते ही मालिनी ने आगे बढ़कर उसे ज़ोर से गले लगा लिया और कहा, "थैंक यू, विद्युत। मुझे बचाने के लिए और मेरी हेल्प करने के लिए। अच्छा, अब जल्दी से अपने हॉस्टल में जाओ नहीं तो गार्ड भैया जग गए तो तुम पर फाइन लग जाएगा।"

मालिनी की बात सुनकर विद्युत जितनी तेज़ी से आया था, उतनी ही तेज़ी से भागकर अपने कमरे में पहुँच गया। विद्युत को मालिनी की जान बचाने की खुशी इतनी ज़्यादा थी कि उसे नींद ही नहीं आ रही थी। उसे स्पाइडरमैन, सुपरमैन की याद आई तो उसने दो-तीन बार उडने की कोशिश की, लेकिन उडने के चक्कर में घुटना दीवार में टकरा गया, तो उसे एहसास हो गया कि उसका उडना कोई सुपरपावर नहीं बल्कि तुक्का है।

जब अचानक उसके सीने के बर्थमार्क में वापस ज़ोर का दर्द उठा तो वह चुपचाप बेड पर आकर लेट गया। फिर अचानक उसका मोबाइल बजने लगा। इतनी देर रात किसी के फोन की उम्मीद उसे नहीं थी। उसने जल्दी से फोन उठाया तो देखा कि कॉल मुरारी चाचा की थी। फोन उठाते ही मुरारी चाचा बोले, "बेटा, बनवारी के आदमी गुंडागर्दी पर उतारू हैं। इस बार पूरे भौकाल के साथ तीन जेसीबी मशीन, ट्रक और बहुत सारे आदमियों को लेकर ज़मीन पर कब्ज़ा करने आए हैं। अगर सुबह होने तक तुम और अंशुमान आ गए तो ही गुरुजी की समाधि और तुम लोगों का घर बच पाएगा। मैंने अंशुमान को फोन कर दिया है, लेकिन तुम भी रहोगे तो सही रहेगा।"

विद्युत ने चाचा का शुक्रिया अदा किया और समझाया कि वह जल्दी से जल्दी गाँव पहुँच जाएगा। विद्युत के हॉस्टल और गाँव की दूरी आधे घंटे की थी। उसने अपनी साइकिल उठाई और गार्ड को 100 का नोट देकर हॉस्टल का गेट खुलवा लिया और गाँव की ओर निकल गया।

विद्युत इतनी तेज़ी से साइकिल चला रहा था कि उसने रास्ते में आने वाले बाइक और कार को भी पीछे छोड दिया। विद्युत के गुरुजी महंत निरंजन का अयोध्या में बहुत बडा और पुराना घर था। महंत ने लोगों को बहुत सारी ज़मीन रहने के लिए और मंदिर के लिए दी थी, जहाँ एक पूरा गाँव बस चुका था। महंत जी का उस इलाके में बहुत प्रभाव था। विद्युत और अंशुमान भी उसी गाँव के थे और निरंजन गुरु के शिष्य भी थे। इन्हीं गुरुजी से दोनों ने युद्ध कलाएँ, योग और ध्यान का ज्ञान भी पाया था।

सालों से चल रहे मंदिर-मस्जिद के विवाद के फैसले के बाद सरकार ने चौतरफ़ा विकास करना शुरू कर दिया था। जगह-जगह से बाईपास, हाईवे गुज़रने लगे। अयोध्या के आसपास की ज़मीन की कीमत अचानक ही बढ़ने लगी। जहाँ कुछ लोगों को खुशी थी कि रामलला आ रहे हैं, वहीं कुछ ठेकेदार और दबंगों के लिए यह पैसे छापने के मौके के रूप में सामने आया। उन्होंने अधिकारियों को रिश्वत, जान का डर दिखाकर सरकार के विकास की योजनाएँ पता कर लीं और रास्ते में पडने वाली सारी ज़मीन पर कब्ज़ा करना शुरू कर दिया।

विद्युत जब गाँव पहुँचा तो उसने देखा कि मुरारी चाचा और बनवारी आपस में बहस कर रहे हैं। बनवारी चिल्लाते हुए बोला, "अरे बुढ़ऊ, काहे बुढ़ापे में जवान बन रहे हो? कहीं लग-लगा गई तो बिस्तर पकड लोगे।"

मुरारी चाचा चिल्लाते हुए बोले, "बनवारी! यह तुम ठीक नहीं कर रहे हो। यह जगह मंदिर की तरह पवित्र है, यहाँ महंत जी की समाधि है और तुम इसे तोडना चाहते हो? तुम्हें तनिक भी अंदाज़ा है कि यह कितना नीच काम है?"

बनवारी ने आँखों पर लगाया चश्मा उतारा और मुरारी चाचा के कंधे पर हाथ रखते हुए बोला, "देखो चाचा, ऐसा है ना कि ज्ञान तो हमको देओ मत। हमारे मास्टर दिए थे गुल्ला फेंक के मार दिए, ससुर। आज तक एक आँख से देखते हैं। बाप बोले, 'दुकान सँभालो', हम बोले, 'देश सँभालेंगे, नेता बनेंगे।' हमको एक तमाचा मारे, हम लाठी मार दिए, कपार फूट गया उनका। तो ऐसा है कि तुम बुज़ुर्ग हो, एक पाँव कब्र में है। ऐसा न करो कि तुम्हारा दूसरा पाँव भी कब्र में डाल दें। अगर सच में गाँव वालों का भला चाहते हो तो उन दो लौंडों को बुलाओ और बोलो कि साइन मार के रुपया लें और गुल हो जाएँ यहाँ से।"

इतना कहकर बनवारी ने मुरारी चाचा को धक्का दे दिया। मुरारी चाचा गिरने ही वाले थे कि विद्युत ने उनको सँभाल लिया। विद्युत की बनवारी से ज़ोरदार बहस हुई। चाचा ने विद्युत को समझाया, "बेटा, अंशुमान का इंतज़ार कर लो। इस बनवारी के मुँह मत लगो। यह बहुत नीच आदमी है।"

विद्युत ने चाचा से अपना हाथ छुडाया और जेसीबी के सामने आकर खडा हो गया और बोला, "चलाओ जेसीबी! मैं भी तो देखूँ किसके अंदर इतना दम है कि मेरे घर को तोड सके।"

बनवारी ने हाथ से जेसीबी के ड्राइवर को आगे बढ़ने का इशारा कर दिया और चाचा से बोले, "साला, तुम लोगों के साथ यही दिक्कत है। हम चुपचाप रात में आए थे कि भोर होने से पहले बिना खून-खराबा किए काम निपटा देंगे, लेकिन नहीं... तुमको तो फैंटम बनना है। साला, जब पूरी अयोध्या की ज़मीन 'मनोज कुमार की मेरे देश की धरती सोना उगले' बन गई है तो तुम सालों को 'सुनील शेट्टी की तरह धरती मेरी माँ है' करना है तो मरो ससुर। और देख ले बुढ़ऊ, अगर इस लौंडे की समाधि यहीं खुद गई तो इसकी मौत तुम्हारे कपार पर जाएगी।"

बनवारी की बात पूरी भी नहीं हो पाई थी कि पीछे से बाइक की तेज़ आवाज़ आने लगी। बनवारी ने जब पलट कर देखा तो अंशुमान खडा था। अंशुमान को देखकर चाचा और विद्युत उसके पास पहुँच गए। अंशुमान बनवारी से बोला, "देखो बनवारी, मैं तुमको पहले भी कई बार समझा चुका हूँ कि मैं यह ज़मीन किसी भी कीमत पर नहीं बेच सकता हूँ। यह जगह इस गाँव के लिए मंदिर जितनी पवित्र है। महंत जी की समाधि भी यहीं है तो इस ज़मीन के अलावा तुम जिस काग़ज़ पर साइन करने के लिए बोलो, मैं तैयार हूँ।"

बनवारी ने इधर-उधर देखा, फिर बगल में ही गुटखा थूकते हुए बोला, "देखो बेटा, तुम तनिक कन्फ्यूज़ हो। हम परमिशन या साइन नहीं माँग रहे, हम यहाँ आए हैं घर गिराने के लिए। हम घर गिराएँगे, तुम तमाशा देखोगे। तुम बीच में बोलोगे, हम कूट देंगे। तुम अड़ंगा मारोगे तो हम तुमको यहीं खोद के गाड देंगे।"

"बबुआ, का है कि ज़मीन हैंडओवर करने की तारीख़ अब हो रही है ख़त्म। बाकी साइन की बात है तो निशान तो हम तुम्हारे लाश पर से भी ले लेंगे, हमको उसकी चिंता नहीं है। बस इस खंडहर की जगह फाइव स्टार होटल बनाना है।"

अंशुमान बोला, "बनवारी, यह मेरी आख़िरी वॉर्निंग है, मान जाओ वरना दोबारा समझाने के लिए तुम लोग होश में नहीं रहोगे।"

बनवारी ने गुस्से में सिर झटका और अपने आदमियों से बोला, "अबे, कूटो बे इन हरामियों को।"

बनवारी के यह कहते ही ज़ोरदार लडाई शुरू हो गई। अंशुमान अपनी जगह पर खडा था। वो विद्युत के आगे से हट ही नहीं रहा था, ना ही उसने किसी को विद्युत तक पहुँचने दिया। अंशुमान एक के बाद एक सबकी हड्डियाँ तोडता जा रहा था। बनवारी ने जब पासा पलटते देखा तो खुद भी भागकर जेसीबी पर चढ़ गया। तभी पीछे से विद्युत चिल्लाकर बोला, "भैया, पीछे देखो!"

अंशुमान पलटा तो देखा कि बनवारी फुल स्पीड में जेसीबी लेकर अंशुमान की ओर चला आ रहा है। अंशुमान जल्दी से अपनी दाहिनी ओर कूदा और एक ईंट उठाकर बनवारी के सिर पर फेंक कर मार दिया। ईंट लगते ही जेसीबी का बैलेंस बिगड गया और वह सीधे जाकर पीपल के पेड से टकरा गया। जेसीबी के पेड से टकराते ही ज़ोर की आवाज़ आई और देखते ही देखते पेड भरभराकर घर के ऊपर गिर गया। पेड गिरने की आवाज़ सुनकर पूरे गाँव वाले इकट्ठे हो गए। किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या हो गया। सब के सब सन्नाटे में थे। बस बनवारी सिर की चोट को पकडकर हँस रहा था क्योंकि गलती से ही सही, लेकिन घर तहस-नहस हो चुका था।

अंशुमान की आँखों में खून उतर आया। वह तेज़ी से बनवारी की ओर झपटा और बनवारी उल्टे पाँव पेड की ओर भागने लगा। लेकिन तभी आसमान पक्षियों की तेज़ आवाज़ से भर गया। पेड के गिरते ही सारे पक्षी बाहर निकल आए। अचानक विद्युत ज़ोर से चीख पडा। उस पर किसी पक्षी ने हमला कर दिया था। विद्युत के पास खडे मुरारी चाचा बोले, "असंभव! एकदम असंभव!"

यह चीख सुनकर अंशुमान वापस आ गया। उसने चाचा से पूछा, "क्या हुआ चाचा? विद्युत को क्या हुआ?"

चाचा ने आसमान में उड रहे एक पक्षी की ओर इशारा किया और बोले, "मैंने आज से पहले इतना बडा और बूढ़ा पक्षी कभी नहीं देखा।"

अंशुमान बोला, "चाचा, यह कौन-सा पक्षी है?"

चाचा बोले, "गरुड! विष्णु का वाहन गरुड!"

तभी पीछे से बनवारी की ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने की आवाज़ सुनाई देने लगी। सब चौंक गए कि बनवारी को क्या हो गया। सभी बनवारी के पास पहुँचे तो पेड के जड से उखडने की वजह से वहाँ की मिट्टी भी साथ में उखड गई थी। पेड के नीचे एक लाश दफ़न थी जिसका 90% हिस्सा अब भी एकदम ठीक-ठाक था।

अंशुमान मुरारी चाचा की ओर देखकर बोला, "चाचा, गुरुजी की समाधि तो वहाँ पर थी, तो यह किसकी कब्र है?"

तब तक बनवारी के साथी और बाकी दूसरे लोग भी वहाँ आ चुके थे। एक ने लाश पर से कपडा हटाया तो सब डर के मारे और सहम गए। लाश का सिर पक्षी का और बाकी शरीर औरत का था। मुरारी चाचा ने आगे बढ़कर जल्दी से लाश को ढक दिया और बनवारी को झिडकते हुए बोले, "रे नासपीटे! तुझे इतना समझाया लेकिन तेरे अक्ल पर पत्थर पडा हुआ था। यह न जाने किस डायन की कब्र खोद दी है तूने। अब अपना भला चाहता है तो यह तामझाम समेट और भाग जा यहाँ से।"

भूत, प्रेत, डायन का नाम सुनकर थोडी ही देर में बनवारी और गाँव वाले सब के सब गायब हो गए। सबके जाने के बाद अंशुमान फावडा लाने चला गया और मुरारी चाचा गिरे हुए घर को देखने के लिए चले गए और विद्युत को लाश की देखभाल के लिए खडा कर दिया। थोडी देर में अंशुमान ने लाश को फिर से ढक दिया, लेकिन विद्युत ने चुपके से लाश के कपडे का एक टुकडा निकाल लिया। उसने आज तक ऐसा कपडा अपने जीवन में कभी नहीं देखा था। अंशुमान की नज़र जब विद्युत की चोट पर पडी तो देखा कि घाव गहरा था और उसमें से खून बह रहा था। उसने तुरंत गिरे हुए घर के बाकी बचे हुए काम को चाचा को सौंप दिया और विद्युत को लेकर तुरंत हॉस्पिटल जाने के लिए तैयार हो गया।

अंशुमान ने विद्युत को हॉस्पिटल ले जाकर दवाइयाँ दिलवा दीं। तब डॉक्टर ने एक ब्लड टेस्ट करने के लिए कहा था जिसकी रिपोर्ट अगले दिन मिलनी थी। अंशुमान ने विद्युत को कुछ पैसे देकर हॉस्टल भेज दिया और खुद अपने काम पर चला गया।

विद्युत को अब तक समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर उस गरुड ने सब कुछ छोडकर उसके ऊपर ही क्यों हमला किया।

अगले दिन विद्युत के पास डॉक्टर की कॉल आई। वह काफ़ी परेशान से लग रहे थे। उन्होंने विद्युत को हॉस्पिटल बुलाया और रिपोर्ट दिखाते हुए बोले, "विद्युत, तुम जानते भी हो कि तुम कौन हो? मैंने किसी के खून में आज तक ऐसा करिश्मा कभी नहीं देखा। तुम्हारे क्रोमोसोम इस दुनिया के हैं ही नहीं।"

यह बात सुनकर विद्युत ने पूछा, "इसका क्या मतलब है?"

डॉक्टर बोले, "विद्युत, तुम्हारे शरीर के खून का डीएनए आधा इंसान का बना हुआ है और आधा पक्षी का है। तुम्हारे अंदर इंसान के साथ-साथ पक्षी की भी खूबियाँ हैं।"

आखिर विद्युत का खून असामान्य क्यों था? क्या इस क्रोमोसोम की गुत्थी को सुलझा पाएगा विद्युत?

पेड के नीचे वो लाश आखिर किसकी थी? विद्युत का क्या रिश्ता है पक्षियों से? आखिर कौन है वो गरुड?

जानने के लिए सुनते रहिए 'गरुडवंशी' सिर्फ और सिर्फ नॉवेल सीरीज पर।

100%