Beauty of Bride - Chapter 3
सामने देवराज मल्होत्रा खडा था. उसकी घनी मूंछें और काली दाढी में उभरते सफेद बाल उसके रौब को और भी खतरनाक बना रहे थे. सिर पर अभी भी वही गुलाबी पगडी बंधी थी, और हैरानी की बात ये थी कि वो अब तक पिछली रात के कपडों में ही था—जैसे रात खत्म ही न हुई हो. उसकी आंखों में जलता हुआ गुस्सा साफ दिखाई दे रहा था. और वो गुस्सा अब किसी भी पल फट सकता था. वो गुर्राते हुए बोला“ क्यों विनोद त्रिपाठी. औकात भूल गए हो क्या? कमरे की हवा जैसे जम गई. तेरी भांजी का रिश्ता पहले मैंने भेजा था. फिर तेरी हिम्मत कैसे हुई किसी और से रिश्ता जोडने की? विनोद के गले से आवाज ही नहीं निकल रही थी. उसका शरीर कांप रहा था. माथे पर पसीने की बूंदें साफ दिखाई दे रही थीं. वो झट से झुक गया“ मल्होत्रा साहब. मेरी कोई गलती नहीं है. मैं—” चटाक! उसकी बात पूरी होने से पहले ही देवराज का हाथ उसके गाल पर पड चुका था. विनोद का सिर एक तरफ झटक गया. कमरे में बैठे हर आदमी की सांस रुक गई. सुशीला का दिल जैसे मुंह को आ गया. वो डर के मारे वहीं बैठी रह गई. देवराज ने उंगली उठाकर कहा“ चुप! एक शब्द और नहीं! उसकी आवाज में इतनी ठंडक थी कि वो किसी को भी अंदर तक जमा दे. मुझे तेरी भांजी चाहिए. ये सुनते ही सुशीला के चेहरे का रंग उड गया. देवराज आगे झुका“ किसी भी हालत में. मुझे नहीं पता तू उसे कहां से लाएगा. कैसे लाएगा. लेकिन वो लडकी मुझे चाहिए. उसकी आंखों में अब गुस्से के साथ जुनून भी उतर आया था. अगर नहीं लाया. वो धीरे धीरे बोला तो तुम दोनों को ऐसी मौत दूंगा. कि चिता भी नसीब नहीं होगी. कमरे में सन्नाटा छा गया. विनोद और सुशीला की सांसें जैसे अटक गईं. सुशीला ने डरते हुए हिम्मत जुटाई“ लेकिन. अब तो उसकी शादी हो चुकी है. देवराज दहाडा“ मुझे फर्क नहीं पडता! उसकी आवाज दीवारों से टकराकर गूंज गई. मुझे बस वो लडकी चाहिए! सुशीला अंदर ही अंदर कांप उठी. उसके मन में एक ही सवाल बार- बार गूंज रहा था आखिर उस लडकी में ऐसा क्या है. जो इतने बडे लोग उसके पीछे पडे हैं? उधर. फार्महाउस में शाम ढल चुकी थी. सूरज की आखिरी किरणें भी अब अंधेरे में खो रही थीं. लेकिन वीर प्रताप सिंह के लिए जैसे समय का कोई मतलब ही नहीं था. वो अपने स्टडी Room में बैठा था. सामने लैपटॉप खुला था. और उसकी उंगलियां कीबोर्ड पर इतनी तेजी से चल रही थीं जैसे वो किसी मशीन का हिस्सा हो. कमरे में सिर्फ टाइपिंग की आवाज गूंज रही थी दरवाजे के बाहर खडा था—विक्रम. उसके चेहरे पर हिचक थी. डर था. और थोडी चिंता भी. कुछ सेकंड तक वो वहीं खडा रहा. फिर हिम्मत करके उसने दरवाजा खटखटाया—“ छोटे हुकुम सा अंदर आ जाऊं? वीर ने बिना नजर उठाए हल्का सा सिर हिला दिया. विक्रम अंदर आया. और हाथ बांधकर खडा हो गया. कुछ पल तक सन्नाटा रहा. फिर उसने धीरे से कहा“ छोटे हुकुम सा छोटी हुकुम रानी सा कहीं दिख नहीं रही. वीर की उंगलियां अचानक रुक गईं. कमरे में सन्नाटा और गहरा हो गया. कुछ सेकंड बाद उसने धीरे से सिर उठाया. और विक्रम की तरफ देखा. विक्रम की हिम्मत नहीं हुई कि वो उसकी आंखों में देख सके. वीर की नजरें. खामोश होते हुए भी जैसे उसे चीर रही थीं. वो यहीं कहीं होगी. उसने ठंडी आवाज में कहा“ जाओ. ढूंढो उसे. विक्रम ने हकलाते हुए कहा“ पूरा घर देख लिया छोटे हुकुम सा. वो अंदर नहीं हैं. इस बार वीर की आवाज गूंज उठी“ तो बाहर ढूंढो! उसकी आंखों में गुस्सा चमक उठा. वो यहां से कहीं नहीं जा सकती! विक्रम तुरंत वहां से निकल गया. वीर कुर्सी पर पीछे टिक गया. उसने आंखें बंद कीं. फिर खुद से बुदबुदाया— तुम यहां से जा ही नहीं सकती. फिर हो कहां? फार्महाउस के पीछे. अब अंधेरा पूरी तरह छा चुका था. चारों तरफ सन्नाटा था. सिर्फ झींगुरों की आवाजें गूंज रही थीं. विक्रम ने अपने फोन की टॉर्च ऑन की और धीरे- धीरे आगे बढने लगा. आगे कटीली झाडियां थीं. और उनके पास एक पुराना कुआं. अचानक. उसे किसी के रोने की हल्की आवाज सुनाई दी. वो रुक गया. ध्यान से सुना. आवाज वही से आ रही थी. वो जल्दी से उस दिशा में बढा और जैसे ही उसने टॉर्च आगे की. वो ठिठक गया. पाखी. कुएं के पास सिकुडकर बैठी थी. उसका घूंघट अब भी उसके चेहरे को ढके हुए था. और वो चुपचाप रो रही थी. छोट हुकुम ी रानी सा विक्रम की आवाज में राहत और हैरानी दोनों थे. पाखी ने कोई जवाब नहीं दिया. बस अपना मुंह दूसरी तरफ फेर लिया. आप यहां क्या कर रही हैं? विक्रम धीरे से बोला. पाखी की आवाज कांप रही थी“ पाखी अंदर नहीं जाएगी. उसकी आवाज में डर था. और एक मासूम जिद भी. लेकिन यहां मच्छर हैं. विक्रम समझाने लगा“ आपको काटेंगे. पाखी सुबकते हुए बोली मच्छर काट रहे हैं. दर्द हो रहा है. वो कुछ पल रुकी. फिर बोली लेकिन पाखी अंदर नहीं जाएगी. विक्रम उलझ गया. क्यों? पाखी ने धीरे से कहा“ पति जी ने डांटा. उसकी आवाज में इतना दर्द था कि विक्रम के चेहरे का भाव बदल गया. तभी. पीछे से एक सख्त आवाज गूंजी कोई और काम नहीं है तुम लोगों के पास? विक्रम तुरंत सीधा खडा हो गया. वीर आ चुका था. उसकी मौजूदगी ही काफी थी सबको खामोश करने के लिए. गार्ड्स तुरंत वहां से हट गए. अब वहां सिर्फ दो लोग थे वीर. और पाखी. वीर धीरे धीरे उसके सामने आया. कुछ पल तक वो उसे देखता रहा. फिर बोला“ बहुत बडी नौटंकी हो तुम. उसकी आवाज में तंज था. मैंने तुम्हें कमरे से जाने को कहा था. घर से नहीं. पाखी चुप रही. उसका शरीर अब भी कांप रहा था. वीर ने झुंझलाकर कहा“ आखिर चाहती क्या हो तुम? फिर उसकी आवाज और ठंडी हो गई“ याद रखो. शादी की है मैंने तुमसे. लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि तुम मेरी पत्नी बन गई. ये शब्द. सीधे दिल पर वार कर रहे थे. तुम मेरी मजबूरी हो. मेरी गलती की सजा. पाखी की आंखों से आंसू बहने लगे. लेकिन वो फिर भी नहीं हिली. वीर का गुस्सा अब बढ चुका था. उसने झटके से उसका हाथ पकड लिया“ चलो अंदर! उसी पल चूडी टूट गई. कांच का टुकडा पाखी की कलाई में धंस गया. खून बहने लगा. वीर के हाथ में भी हल्की चोट आई. लेकिन उसे फर्क नहीं पडा. पाखी दर्द से सिहर उठी. उसकी सांसें तेज हो गईं. और अगले ही पल वो बेहोश होकर वीर के हाथों में झूल गई. वीर ठिठक गया. उसने उसे देखा. उसके चेहरे पर पहली बार झुंझलाहट के साथ कुछ और भी था एक हल्की सी बेचैनी. बिना कुछ कहे. उसने उसे अपनी बाहों में उठा लिया. अंदर. वीर उसे अपने कमरे में नहीं. बल्कि पास वाले कमरे में लेकर गया. धीरे से उसे बिस्तर पर लिटाया. मुडा. जाने लगा. लेकिन उसकी नजर पाखी की कलाई पर पड गई. खून अब भी बह रहा था. कुछ पल के लिए वो रुका. फिर बिना कुछ बोले. फर्स्ट एड बॉक्स लाकर उसके पास बैठ गया. धीरे- धीरे उसकी ड्रेसिंग करने लगा. उसके हाथ अब पहले जैसे कठोर नहीं थे. उनमें एक अजीब सी नरमी थी. ड्रेसिंग करते करते उसकी नजर पाखी के चेहरे पर गई. घूंघट थोडा हट चुका था. उसके गुलाबी होंठ. मासूम चेहरा. वीर कुछ पल के लिए वहीं ठहर गया. जैसे किसी अनजाने खिंचाव में बंध गया हो. उसका हाथ धीरे धीरे उसकी तरफ बढा. लेकिन तभी फोन की घंटी बज उठी. वीर जैसे होश में आया. उसने तुरंत हाथ पीछे खींच लिया. ये मैं क्या कर रहा था. वो खुद से गुस्से में बोला. और कमरे से बाहर चला गया. स्टडी Room में. वीर ने फोन उठाया. दूसरी तरफ से आवाज आई—“ वीर. ये क्या किया तुमने? ये उसका बडा भाई—अर्जुन था. वीर ने गहरी सांस ली—“ हां. शादी कर ली मैंने. क्यों? क्योंकि वो मेरी है. उसकी आवाज ठंडी थी. लेकिन उसमें जिद साफ थी. उसे किसी और की पत्नी नहीं बनने देता मैं. कुछ पल खामोशी रही. फिर अर्जुन बोला“ तुम उसे जानते भी नहीं. वीर हल्का सा मुस्कुराया—“ जानने के लिए वक्त है. लेकिन खोने के लिए नहीं. Call cut हो गई. कमरे के बाहर. विक्रम और अमन खडे थे. वीर बाहर आया. उसने दोनों को घूरा—“ तुम दोनों मेरे साथ रहते हो. या किसी और के लिए काम करते हो? दोनों घबरा गए—“ नहीं साहब. अमन ने तुरंत एक फाइल आगे बढाई—“ साहब. इसमें पाखी की पूरी जानकारी है. वीर ने फाइल ली. और कुर्सी पर बैठ गया. धीरे- धीरे उसने पहला पन्ना खोला—“ पाखी कश्यप. उसकी नजर हर लाइन पर जा रही थी. उसकी पढाई. उसका परिवार. उसका अतीत. सब कुछ लिखा था. लेकिन उस फाइल में एक सच्चाई गायब थी पाखी का टूटा हुआ मन. उसकी मासूमियत. उसकी दुनिया. जो अभी भी एक बच्ची की तरह थी.