I Will Find My Love Ch. 1

अजनबी या अतीत Chapter 1

Posted by Aliza khan • Apr 17, 2026 03:04 PM

बेसमेंट में गूँजती कार के इंजन की धीमी आवाज़…

और उसके बाद अचानक छा गई खामोशी।

एक काली, महंगी कार धीरे-धीरे आकर रुकी।

दरवाज़ा खुला…

और एक लड़की बाहर उतरी।

उसकी चाल में थकान थी, लेकिन आँखों में एक अजीब सी बेचैनी भी—जैसे उसे खुद समझ नहीं आ रहा था कि उसे क्या डर सता रहा है।

उसने अपने अपार्टमेंट की तरफ कदम बढ़ाए।

एक…

दो…

तीन…

धड़ाम!

पीछे का दरवाज़ा इतनी तेजी से खुला कि हवा तक चीर गई।

कुछ समझने से पहले—

एक मजबूत हाथ बाहर आया।

उसकी कमर को बेरहमी से जकड़ा… और उसे अंदर खींच लिया।

“आह—!”

उसकी चीख पूरी भी नहीं हुई थी कि—

दरवाज़ा बंद।

दुनिया खत्म।

अब बस अंधेरा… और वो।

---

वह पिछली सीट पर गिर पड़ी।

दिल इतनी तेजी से धड़क रहा था कि उसे लगा अभी सीने से बाहर निकल आएगा।

लेकिन अगले ही पल—

वो खुद को संभालते हुए उठी।

“क… कौन हो तुम?”

उसकी आवाज़ काँप रही थी, लेकिन आँखों में डर से ज्यादा गुस्सा था।

सामने बैठा आदमी चुप था।

सिर्फ उसकी साँसों की आवाज़… और कार के अंदर फैली भारी खामोशी।

फिर—

उसकी बाहें आगे बढ़ीं।

और बिना किसी जल्दी के… उसने उसे अपनी तरफ खींच लिया।

आरना का शरीर एकदम सख्त हो गया।

“छोड़ो मुझे—!”

उसने खुद को छुड़ाने की कोशिश की… लेकिन उसकी पकड़ पत्थर जैसी मजबूत थी।

अब वो उसकी गोद में थी।

इतनी करीब… कि दोनों की साँसें आपस में टकरा रही थीं।

उसका दिल बेकाबू हो चुका था।

ये क्या हो रहा है…?

उसकी टांगें उसके शरीर से सटी हुई थीं…

और उस आदमी का बदन—गर्म, सख्त और खामोश।

जैसे किसी तूफान से पहले की शांति।

वो खुद को छुड़ाने के लिए तड़पी—

तभी उसका हाथ उसकी कमर से टकराया।

और—

कुछ गीला।

चिपचिपा।

उसने झट से हाथ पीछे खींचा।

उसकी उंगलियाँ हल्के से काँप रही थीं।

खून।

कार के अंदर हल्की सी धातु जैसी गंध फैल चुकी थी।

उसका दिल एक पल के लिए रुक गया।

ये आदमी… घायल है…?

---

“शांत रहो।”

उसकी आवाज़ गूंजी।

गहरी।

धीमी।

और ऐसी… जिसे अनसुना करना नामुमकिन हो।

आरना ने पहली बार उसे ध्यान से देखा।

कार की खिड़की से आती हल्की रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी।

तीखी नाक…

साफ़ जॉ-लाइन…

और वो आँखें—

गहरी। ठंडी। खतरनाक।

जैसे वो सिर्फ देख नहीं रहा…

बल्कि उसके अंदर तक उतर रहा हो।

आरना की सांस अटक गई।

मैंने इसे पहले देखा है…?

दिल ने हाँ कहा।

दिमाग ने इंकार किया।

---

तभी—

ठक… ठक… ठक…

कार के बाहर भागते कदमों की आवाज़।

“जल्दी! हर कोना चेक करो!”

“वो यहीं कहीं है!”

आरना का खून जम गया।

उसने डर से उस आदमी की तरफ देखा।

“वो लोग… मुझे ढूंढ रहे हैं…” उसकी आवाज़ फुसफुसाहट से भी धीमी थी।

आदमी ने कोई जवाब नहीं दिया।

बस उसकी पकड़ थोड़ी और मजबूत हो गई।

जैसे—

वो उसे छुपा रहा हो।

या…

कैद कर रहा हो।

---

कार के बाहर से टॉर्च की रोशनी शीशों पर पड़ी।

कुछ सेकंड…

जो घंटों जैसे लगे।

आरना की सांस रुक गई।

अगर दरवाज़ा खुल गया तो…?

अगर उन्होंने देख लिया तो…?

---

लेकिन फिर—

कदमों की आवाज़ दूर चली गई।

खामोशी लौट आई।

---

“तुम… कौन हो?”

इस बार उसकी आवाज़ धीमी थी… लेकिन उसमें डर से ज्यादा जिज्ञासा थी।

आदमी ने धीरे से उसकी ठुड्डी उठाई।

उसकी आँखें सीधे उसकी आँखों में टिक गईं।

और वो बोला—

“तुम्हें याद नहीं…?”

आरना का दिल जोर से धड़का।

याद…? क्या?

आरना सोच ही रही थी कौन था यह आदमी ?

क्या सच में वह इस आदमी को पहले से पहचानती थी या उसका कोई वहम?

कौन है वो लोग जो इस आदमी को खोज रहे है कही सच में यह आदमी उसके लिए मुसीबत तो नही जो उसके ऊपर आने वाली है?

सभी राज़ जानने के थोड़ा थोड़ा फ्लैशबैक में चलते है...

...

Flashback

3 साल पहले…

मुंबई

गोल्डन रॉयल होटल (काल्पनिक नाम)

कॉरिडोर की लंबी, सुनसान लाइन… ऊपर झिलमिलाती झूमरों की रोशनी… और नीचे बिछा वो मुलायम, शैम्पेन-गोल्डन कालीन—जिस पर दौड़ते हुए हर कदम जैसे आवाज़ को निगल रहा था।

आरना भाग रही थी।

सिर्फ भाग नहीं रही थी… जैसे अपनी जान लेकर भाग रही हो।

उसके रेशमी ब्राउन बाल हवा में उलझकर उसके चेहरे पर आ-आकर गिर रहे थे, लेकिन उसे फुर्सत नहीं थी उन्हें हटाने की। उसकी सांसें बेकाबू थीं… दिल इतनी तेज़ धड़क रहा था कि जैसे छाती तोड़कर बाहर आ जाएगा।

पर असली डर बाहर नहीं था…

असली डर उसके अंदर था।

उसके शरीर में एक अजीब सी जलन फैल रही थी… सूखी, खतरनाक… जैसे कोई आग धीरे-धीरे नसों में दौड़ रही हो। हर सेकंड वो जलन और बढ़ रही थी… उसके चेहरे तक पहुँचती हुई… उसकी सोच को धुंधला करती हुई।

"ये… क्या हो रहा है मुझे…?"

कुछ ही देर पहले तो वो होटल में आई थी।

मिया ने मुस्कुराते हुए पानी का ग्लास दिया था… और उसने बिना सोचे-समझे पी लिया।

मिया खन्ना—उसकी सौतेली बहन।

जिसे वो कभी पूरी तरह समझ ही नहीं पाई।

अब सब कुछ समझ आ रहा था… लेकिन बहुत देर हो चुकी थी।

पीछे से भारी-भारी कदमों की आवाज़ गूंज रही थी।

"भाग कहाँ जाएगी… पकड़ो उसे!"

"इतनी खूबसूरत लड़की… मिस मिया ने खुद हमें गिफ्ट किया है!"

उनकी गंदी हँसी कॉरिडोर की दीवारों से टकराकर और डरावनी लग रही थी।

आरना का दिल बैठ गया।

उसकी चाल लड़खड़ाने लगी थी… शरीर साथ छोड़ रहा था… और वो दरिंदे अब बस कुछ कदम दूर थे।

"नहीं… नहीं… अभी नहीं…"

तभी—

टिंग!

VIP लिफ्ट का दरवाज़ा उसके सामने खुला।

जैसे किसी फिल्म में आखिरी सेकंड पर हीरो एंट्री मारता है… वैसा सीन था।

अंदर से लोगों का एक ग्रुप बाहर निकला—बॉडीगार्ड्स, स्टाफ… और फिर—

वो।

एक आदमी… नहीं… एक मौजूदगी।

इतना शांत… इतना ठंडा… कि उसके आसपास की हवा भी जैसे उसकी इजाज़त से चल रही थी।

कस्टम-टेलर्ड सूट… परफेक्ट फिट।

जेब में हल्का लाल रुमाल… जैसे खून का इशारा दे रहा हो।

चेहरे के नैन-नक्श—इतने परफेक्ट कि लग रहा था किसी कलाकार ने महीनों लगाकर तराशा हो।

उसकी आँखें…

गहरी… ठंडी… और खतरनाक।

वो वहाँ खड़ा था जैसे कोई राजा अपने दरबार में खड़ा होता है—

सब उसे देख सकते थे… लेकिन छूने की हिम्मत किसी में नहीं।

और उसी पल—

आरना की आखिरी उम्मीद उसी पर टिक गई।

वो लड़खड़ाती हुई उसकी तरफ भागी… और सीधे उससे लिपट गई।

उसकी उंगलियाँ उसकी कॉलर को कसकर पकड़ चुकी थीं।

"प्लीज… मुझे बचा लीजिए…" उसकी आवाज़ कांप रही थी, "मुझे नशा दिया गया है… वो लोग… वो मेरे साथ—"

उसकी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि—

"मैं तुम्हें नहीं जानता।"

आवाज़…

गहरी।

धीमी।

और बेरहम।

जैसे किसी ने उम्मीद को एक झटके में काट दिया हो।

आरना जम गई।

धीरे-धीरे उसने सिर उठाया… और उसकी आँखों में देखा।

वो आदमी उसे देख रहा था—

लेकिन जैसे देख भी नहीं रहा था।

उसकी नजरों में कोई भावना नहीं थी…

ना दया… ना गुस्सा… बस एक ठंडी दूरी।

"मैं तुम्हें नहीं जानता," उसने दोबारा कहा, इस बार और साफ़, "इसलिए तुम्हें बचाने की कोई वजह नहीं है।"

तर्क…

बिल्कुल सही।

इतना सही कि उसके खिलाफ कुछ कहा ही नहीं जा सकता।

पर उस पल…

आरना को लगा जैसे किसी ने उसे ठंडे पानी में धक्का दे दिया हो।

उसकी आखिरी उम्मीद…

यहीं खत्म हो गई थी।

पीछे से उन गुंडों की आवाज़ फिर करीब आ रही थी—

और सामने खड़ा ये आदमी… जिसके पास उसे बचाने की ताकत थी…

वो बस खड़ा था।

जैसे ये सब उसका मामला ही नहीं हो।

आरना की पकड़ धीरे-धीरे ढीली पड़ने लगी…

उसकी आँखों में अब डर के साथ-साथ एक सवाल भी था—

"क्या सच में… कोई मुझे बचाने वाला नहीं है?"

और तभी—

पीछे से एक हाथ उसकी कलाई तक पहुँचने ही वाला था…

लेकिन…

उस आदमी की आँखों में एक पल के लिए कुछ बदला…

या ये सिर्फ आरना का भ्रम था?

“किस्सा यहीं रुका है, मगर कहानी अभी चल रही है।”

“क्रमशः जारी…”

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