रुतबा "सियासत की बिसात पर, दिल भी दांव पर थे।" - Chapter 2
वह नौजवान लड़का फोन पर बात खत्म करके धीरे-धीरे ड्राइंग रूम में अंदर आया।
कमरे का माहौल पहले से ही भारी था।
सीताराम शांत बैठे थे, जैसे हर चीज़ को समझ रहे हों लेकिन बोल नहीं रहे हों। नरेंद्र त्रिवेदी सामने बैठे थे, और उनके चेहरे पर वही राजनीतिक संतुलन था जो हर बड़ी मीटिंग में दिखता था।
तभी बातचीत शुरू हुई।
गुरु शेर सिंह बराड़ ने सामने बैठे नरेंद्र शास्त्री की तरफ सीधा देखा।
उनकी आवाज़ शांत थी, लेकिन उसमें एक साफ सच्चाई और ठहराव था—
“गुरशेर सिंह बराड़ के अंदर क्या चल रहा है, ये कोई बाहर वाला आसानी से नहीं समझ सकता।”
गुरशर सिंह बराड़ ने कहा,
“ मैं आपकी मदद क्यों करूँ?”
कमरे में एक पल के लिए सन्नाटा सा छा गया।
बराड़ ने नजरें सीधी रखते हुए बात जारी रखी,
“जब मैं लोकजन राष्ट्रीय पार्टी का यूथ अध्यक्ष बनने जा रहा था, उस वक्त आपने मेरा विरोध किया था… और मेरे विरोधियों का साथ दिया था। ये मैं भूल नहीं सकता।”
नरेंद्र शास्त्री ने शांत रहते हुए जवाब दिया,
“मैं जानता हूँ आप क्या सोचते हो… लेकिन अब हालात अलग हैं।”
बराड़ ने हल्का सिर हिलाया, जैसे वह बात को पूरी तरह सुन रहे हों लेकिन स्वीकार नहीं कर रहे हों।
उधर नरेंद्र त्रिवेदी ने माहौल को समझते हुए सीधे मुद्दे पर बात रखी—
“आज बात विरोध की नहीं है… बात भविष्य की है।”
उन्होंने बराड़ की तरफ देखते हुए कहा,
“आप पंजाब की राजनीति में आगे बढ़ना चाहते हैं… लोकजन राष्ट्रीय पार्टी पंजाब में आप अध्यक्ष बनना चाहते हैं।”
हल्की सी खामोशी के बाद उन्होंने और साफ कहा,
“आपकी नजर सीएम पद पर भी है।”
बराड़ के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आई।
“ये तो सब जानते हैं,” उन्होंने शांत स्वर में कहा।
नरेंद्र त्रिवेदी ने इस मौके को पकड़ते हुए आगे बात बढ़ाई—
“और मैं आपकी इसमें मदद कर सकता हूँ।”
बराड़ ने हल्की भौंह उठाई।
वह अब उनकी बात का असली मतलब समझना चाहते थे।
नरेंद्र त्रिवेदी ने सीधा, साफ और रणनीतिक अंदाज़ में कहा—
“जैसे आप आर्यमन शास्त्री के करीब हैं… वैसे ही मैं निर्मला शास्त्री के करीब हूँ।”
फिर उन्होंने बात और साफ की,
“आर्यमन और उसकी टीम मुझे पसंद नहीं करती… वैसे ही पार्टी के कुछ सीनियर लोग और महिला नेतृत्व आपको भी आसानी से स्वीकार नहीं करते।”
कमरे में माहौल और गंभीर हो गया।
नरेंद्र शास्त्री ने धीमे स्वर में जोड़ा,
“यानी हम दोनों के रास्ते अलग हैं… लेकिन मंज़िल कहीं न कहीं एक ही सिस्टम में है।”
और पहली बार उस कमरे में सभी को साफ महसूस हुआ—
ये सिर्फ बातचीत नहीं थी… ये एक बड़ा राजनीतिक सौदा बनने की शुरुआत थी।
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तभी सीताराम बीच में बोले।
उनकी आवाज़ शांत थी, लेकिन उसमें अनुभव का वजन था—
“मैं एक बात साफ कर देता हूँ…”
वह थोड़ा आगे झुके और सबको देखते हुए बोले,
“आप आर्यमन और उनकी टीम को इस बात के लिए कन्वेंस कीजिए कि वह नरेंद्र त्रिवेदी का विरोध न करें। जैसा निर्मला जी चाहती हैं, उन्हें करने दीजिए।”
फिर उनकी नज़र हल्की सी गुरु शेर सिंह बराड़ की तरफ गई,
“और जो सीनियर नेतृत्व है, जो आपको लेकर पूरी तरह सहज नहीं है… उन्हें भी आप अपने तरीके से कन्वेंस कर सकते हैं।”
कमरे में एक पल के लिए खामोशी छा गई।
तभी नरेंद्र त्रिवेदी ने बात को पकड़ते हुए बीच में कहा—
“मैं भी अपनी तरफ से पूरा कन्वेंस करूंगा।”
उनकी आवाज़ सीधी और स्पष्ट थी।
“पिछले दस सालों में लोकजन राष्ट्रीय पार्टी पंजाब में सत्ता में नहीं आ पाई है। लेकिन आप, यूथ विंग के नेता के तौर पर, वहां बहुत मजबूत पकड़ रखते हैं।”
उन्होंने बराड़ की तरफ देखा,
“लोग आपको जानते हैं, पहचानते हैं… और अगर पंजाब की कमान आपके जैसे किसी मजबूत हाथ में दी जाए, तो पार्टी वहां फिर से सत्ता में आ सकती है।”
फिर उन्होंने धीरे से जोड़ दिया,
“यानी हम एक-दूसरे की मदद कर सकते हैं।”
कमरे में मौजूद सभी लोग अब समझ रहे थे कि यह बातचीत सिर्फ पदों की नहीं थी…
यह पूरे राजनीतिक भविष्य की दिशा तय करने की कोशिश थी।
गुरु शेर सिंह बराड़ हल्का सा मुस्कुराए।
“आप तो तो अभी होम मिनिस्टर बनना है एक हफ्ते बाद।”
फिर उनका स्वर थोड़ा और गंभीर हो गया,
“पंजाब की बात करें तो वहाँ अभी दो साल चुनाव में हैं… और छह महीने तक तो पार्टी का अध्यक्ष भी नहीं बदल सकता।”
उन्होंने हल्की मुस्कान के साथ जोड़ा,
“क्योंकि जो मौजूदा अध्यक्ष है, उसका कार्यकाल पूरा होने में समय है।”
फिर उनकी नज़र सीधी नरेंद्र त्रिवेदी पर गई—
“तो आप जो अभी कह रहे हैं, उस पर आप कल भी वैसे ही टिके रहेंगे, इसकी क्या गारंटी है?”
कमरे में खामोशी और भारी हो गई।
बराड़ ने धीरे से कहा,
“एक बार होम मिनिस्टर बन जाने के बाद… आप शायद मुझे याद भी न रखें।”
उनकी आवाज़ में न गुस्सा था, न तंज—बस अनुभव था।
फिर उन्होंने आगे जोड़ा,
“आज तक आपने कई लोगों का इस्तेमाल भी किया होगा… लेकिन क्या कभी किसी से पूछा है?”
एक पल रुके, फिर अंतिम बात कही—
“आपका रिकॉर्ड यूँ ही इतना बड़ा नहीं हुआ नरेंद्र त्रिवेदी। एक छोटे शहर की एमसी इलेक्शन से लेकर यहाँ तक पहुँचना आसान नहीं था।”
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“अब मैं कौन सी गारंटी दूँ?” नरेंद्र त्रिवेदी ने सख्त आवाज़ में कहा।
“मैं नहीं बदलूँगा… और पंजाब अध्यक्ष बनने में आपकी पूरी मदद करूंगा।”
उनकी बातों में आत्मविश्वास था, लेकिन गूरशेर सिंह बराड़ उन बातों से प्रभावित नहीं हो रहे थे। वह शांत बैठे सब सुन रहे थे, जैसे हर शब्द को परख रहे हों।
थोड़ी देर पहले जो बातचीत हुई थी, वह अब भी हवा में भारी थी।
सीताराम, जो अब तक चुप बैठे थे, धीरे से उठे। उन्होंने माहौल को समझते हुए नरेंद्र त्रिवेदी को इशारे से बाहर ले लिया।
बाहर आते ही नरेंद्र त्रिवेदी का गुस्सा फूट पड़ा—
“ये लड़का मान ही नहीं रहा… मुझे लगा था आसानी से मान जाएगा, लेकिन कितना जिद्दी है।”
सीताराम शांत रहे।
“तुम्हारा रिकॉर्ड ही ऐसा है नरेंद्र,” उन्होंने हल्के लेकिन सटीक शब्दों में कहा, “लोग तुम पर आसानी से भरोसा नहीं करते।”
नरेंद्र त्रिवेदी ने बेचैनी में पूछा,
“तो फिर मैं इसे कैसे कन्वेंस करूँ? क्या मैं पैसे की बात करूँ?”
सीताराम ने तुरंत सिर हिलाया,
“नहीं… भूलकर भी नहीं।”
उन्होंने गंभीर स्वर में कहा,
“उसका दिमाग पैसे पर नहीं चलता। उसके पास जमीन है, कारोबार है, और सम्मान है… उसे किसी चीज़ की कमी नहीं।”
सीताराम ने धीरे से कहा,
“तो तुम्हें उसे कुछ देना पड़ेगा… लेकिन पैसे नहीं।”
नरेंद्र त्रिवेदी ने पूछा,
“तो फिर क्या गारंटी दूँ?”
सीताराम कुछ पल रुके, फिर सीधे उनकी आँखों में देखते हुए बोले—
“तुम्हारी बेटी की शादी।”
एक पल का सन्नाटा छा गया।
सीताराम ने आगे कहा,
“उससे बेहतर खानदान तुम्हें नहीं मिलेगा। लड़का आगे चलकर सीएम बनने की ताकत रखता है… और तुम्हारी बेटी उस घर में राज करेगी।”
नरेंद्र त्रिवेदी ने गहरी सांस ली।
बात सच्ची भी थी और भारी भी।
समय बहुत कम था—सिर्फ एक हफ्ता बचा था आर्यमन से बात करने का। अगर गुरु शेर सिंह बराड़ इस बार तैयार हो गया, तो पूरा खेल बदल सकता था।
वरना होम मिनिस्ट्री का सपना वहीं खत्म हो सकता था।
अंदर कोठी में बराड़ अब भी शांत बैठे थे…
और बाहर, सत्ता का सबसे बड़ा फैसला किसी रिश्ते और भरोसे की तरफ धीरे-धीरे झुक रहा था।
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