तुम असल में हो कौन ....?
अब आगे
मुंबई की रात अपनी पूरी चमक पर थी। आसमान को छूती इमारतों की रोशनियाँ समुद्र की लहरों पर पड़कर ऐसा दृश्य बना रही थीं जैसे पूरा शहर हीरे की तरह चमक रहा हो। लेकिन उस चमक के पीछे एक ऐसी दुनिया भी थी जहाँ कानून नहीं, ताकत चलती थी।
और उस दुनिया की बेताज बादशाह थी — ऋषिका राठौर।
नीलामी वाली घटना को चार दिन बीत चुके थे।
चार दिनों से विराट राणा उसके पेंटहाउस में रह रहा था।
लेकिन जितना समय बीत रहा था, रूहानी की बेचैनी उतनी ही बढ़ती जा रही थी।
विराट में कुछ तो ऐसा था जो उसे बाकी लोगों से अलग बनाता था।
वह डरता नहीं था।
झुकता नहीं था।
और सबसे अजीब बात...
वह किसी भी चीज़ से प्रभावित नहीं होता था।
ऋषिका के सामने बड़े-बड़े माफिया सर झुका देते थे, लेकिन विराट की आँखों में न डर था, न सम्मान और न ही घृणा।
बस एक रहस्यमयी शांति।
ऐसी शांति जो किसी साधारण इंसान में नहीं हो सकती।
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सुबह के सात बजे थे।
ऋषिका अपने ऑफिस में बैठी कुछ फाइलें देख रही थी।
तभी उसका दाहिना हाथ अर्जुन अंदर आया।
"मैडम।"
"हाँ?"
"विराट अभी भी जिम में है।"
ऋषिका ने भौंहें सिकोड़ लीं।
"कितने समय से?"
"लगभग दो घंटे।"
ऋषिका ने फाइल बंद कर दी।
दो घंटे लगातार ट्रेनिंग?
एक आम बिजनेसमैन ऐसा नहीं करता।
"उसे मेरे पास भेजो।"
"जी।"
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कुछ मिनट बाद विराट ऑफिस में दाखिल हुआ।
ब्लैक टी-शर्ट और ट्रैक पैंट में भी वह किसी मॉडल की तरह दिख रहा था।
लेकिन ऋषिका का ध्यान उसके चेहरे पर नहीं था।
उसकी नजर विराट के हाथों पर गई।
पुराने जख्मों के निशान।
बहुत सारे निशान।
ऐसे निशान जो किसी ऑफिस में बैठने वाले आदमी के नहीं हो सकते थे।
"बैठो।"
विराट बिना कुछ कहे सामने बैठ गया।
ऋषिका कुछ सेकंड तक उसे देखती रही।
फिर बोली—
"तुम असल में हो कौन?"
विराट हल्का-सा मुस्कुराया।
"ये सवाल तो मुझे पूछना चाहिए।"
"मैं मजाक नहीं कर रही।"
"मैं भी नहीं।"
दोनों कुछ पल तक एक-दूसरे को देखते रहे।
कमरे का माहौल अचानक भारी हो गया।
फिर ऋषिका ने कुर्सी से टिकते हुए कहा—
"आज तुम मेरे साथ चल रहे हो।"
"कहाँ?"
"पता चल जाएगा।"
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एक घंटे बाद काले रंग की कई गाड़ियाँ मुंबई के डॉकयार्ड की तरफ बढ़ रही थीं।
ऋषिका आगे वाली गाड़ी में बैठी थी।
विराट उसके साथ था।
रास्ते भर दोनों में कोई बात नहीं हुई।
लेकिन विराट की आँखें लगातार बाहर घूम रही थीं।
सड़कें।
बिल्डिंग्स।
रास्ते।
निकास द्वार।
सब कुछ।
ऋषिका ने यह बात नोटिस कर ली।
वह किसी आम इंसान की तरह नज़ारे नहीं देख रहा था।
वह इलाके का अध्ययन कर रहा था।
जैसे कोई सैनिक किसी युद्ध क्षेत्र का नक्शा याद कर रहा हो।
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डॉकयार्ड पहुँचते ही दर्जनों हथियारबंद लोग उनकी सुरक्षा में खड़े हो गए।
यह ऋषिका के सबसे महत्वपूर्ण ठिकानों में से एक था।
यहीं से उसके कई बड़े सौदे संचालित होते थे।
ऋषिका जानबूझकर विराट को वहाँ लाई थी।
वह देखना चाहती थी कि इतनी खतरनाक जगह देखकर उसके चेहरे पर कोई बदलाव आता है या नहीं।
लेकिन कुछ नहीं हुआ।
विराट बिल्कुल सामान्य था।
मानो यह सब उसके लिए नया ही न हो।
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तभी एक आदमी दौड़ता हुआ आया।
"मैडम, समस्या हो गई है।"
"क्या हुआ?"
"कंटेनर नंबर बारह में गड़बड़ है।"
ऋषिका तुरंत वहाँ पहुँची।
कई लोग एक कंटेनर के पास खड़े थे।
मामला गंभीर लग रहा था।
अर्जुन और बाकी लोग स्थिति समझने की कोशिश कर रहे थे।
लेकिन विराट कुछ कदम पीछे खड़ा चुपचाप सब देख रहा था।
उसने आसपास नजर दौड़ाई।
फिर कंटेनर को देखा।
फिर गार्ड्स की पोजीशन।
और फिर बोला—
"समस्या कंटेनर में नहीं है।"
सबकी नजर उसकी तरफ घूम गई।
अर्जुन ने तिरस्कार से पूछा—
"तो कहाँ है?"
विराट ने सामने खड़े एक गार्ड की ओर इशारा किया।
"वहाँ।"
गार्ड घबरा गया।
"क्या मतलब?"
विराट की आवाज शांत थी।
"उसके जूते पर लाल मिट्टी लगी है। जबकि इस पूरे डॉकयार्ड में ऐसी मिट्टी कहीं नहीं है।"
सबकी नजर गार्ड के जूतों पर गई।
वास्तव में वहाँ लाल मिट्टी लगी हुई थी।
"और?" ऋषिका ने पूछा।
"और इसका मतलब है कि यह अभी किसी दूसरी जगह से आया है। ऐसी जगह जहाँ इसे नहीं होना चाहिए था।"
गार्ड के चेहरे का रंग उड़ गया।
कुछ ही मिनटों की पूछताछ के बाद सच सामने आ गया।
वह आदमी दुश्मनों को जानकारी बेच रहा था।
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पूरा माहौल बदल गया।
अर्जुन हैरान था।
बाकी लोग भी।
लेकिन सबसे ज्यादा चौंकी हुई रूहानी थी।
विराट ने कुछ ही सेकंड में वह चीज़ पकड़ ली थी जो उसके प्रशिक्षित लोग घंटों में नहीं पकड़ पाए।
यह सामान्य नहीं था।
बिल्कुल भी सामान्य नहीं।
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रात को पेंटहाउस लौटने के बाद ऋषिका अपने निजी ऑफिस में बैठी थी।
उसके सामने विराट की पूरी फाइल खुली हुई थी।
नाम — विराट राणा।
पेशा — बिजनेसमैन।
परिवार — जानकारी उपलब्ध नहीं।
पिछला रिकॉर्ड — लगभग साफ।
सब कुछ सही दिख रहा था।
लेकिन अब उसे यकीन था कि यह फाइल झूठी है।
किसी ने बहुत सावधानी से विराट का असली अतीत छिपाया था।
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उसी समय अर्जुन कमरे में आया।
"मैडम।"
"हाँ?"
"हमने विराट की फिर से जांच शुरू कर दी है।"
"और?"
"अभी तक कुछ नहीं मिला।"
ऋषिका धीरे-धीरे मुस्कुराई।
"यही तो समस्या है अर्जुन।"
"मतलब?"
"दुनिया में कोई इंसान ऐसा नहीं होता जिसका अतीत ही न हो।"
अर्जुन चुप हो गया।
क्योंकि वह भी यही सोच रहा था।
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उधर विराट अपने कमरे की बालकनी में खड़ा था।
नीचे मुंबई की जगमगाती सड़कें दिखाई दे रही थीं।
उसकी आँखों में एक अजीब-सी गहराई थी।
जैसे वह किसी बहुत पुराने खेल को याद कर रहा हो।
उसने जेब से एक पुराना धातु का सिक्का निकाला।
कुछ पल उसे देखा।
फिर हल्का-सा मुस्कुराया।
"अभी नहीं..."
उसने धीमे से कहा।
"अभी समय नहीं आया है।"
उसकी आवाज में ऐसा आत्मविश्वास था जो केवल उन्हीं लोगों में होता है जो हर स्थिति पर नियंत्रण रखना जानते हैं।
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उसी समय पेंटहाउस के एक अंधेरे कोने में खड़ा एक आदमी चुपचाप विराट को देख रहा था।
वह ऋषिका का जासूस था।
लेकिन जैसे ही उसकी नजर विराट पर पड़ी, उसके शरीर में सिहरन दौड़ गई।
क्योंकि कुछ सेकंड के लिए विराट ने सीधे उसकी तरफ देखा था।
ठीक उसी दिशा में जहाँ वह छिपा हुआ था।
हालाँकि वहाँ अंधेरा था।
और किसी भी सामान्य इंसान के लिए उसे देख पाना लगभग असंभव था।
जासूस का गला सूख गया।
उसके मन में सिर्फ एक ही सवाल गूँज रहा था—
क्या विराट को पहले से पता था कि उस पर नजर रखी जा रही है?
और अगर पता था...
तो उसने प्रतिक्रिया क्यों नहीं दी?
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उस रात ऋषिका को नींद नहीं आई।
पहली बार उसे किसी इंसान को समझने में मुश्किल हो रही थी।
दूसरी तरफ विराट राणा शांत था।
बहुत शांत।
जैसे वह ऋषिका की दुनिया को एक-एक परत खोलकर पढ़ रहा हो।
जैसे वह किसी बड़े तूफान से पहले की खामोशी हो।
और शायद सबसे खतरनाक बात यही थी—
ऋषिका उसे परख रही थी, लेकिन उसे नहीं पता था कि विराट भी उसकी परीक्षा ले रहा था।
जारी रहेगा...