Teri panaha me
अध्याय 2 : पाँच साल बाद...,.
अब तक ,
सरस्वती काकी बोलीं,
"बिटिया, तू बैठ जा... आज बहुत काम कर लिया।"
"नहीं काकी, घर में खुशी का दिन है। आज काम करके भी अच्छा लग रहा है।"
उसी समय नंदिनी भागती हुई आई।
"सिया... जल्दी चल!"
"क्या हुआ?"
"भैया का वीडियो कॉल आया है!"
सिया घबरा गई।
"न... नहीं... मैं नहीं आऊँगी।"
"क्यों?"
"पहली बार मिलूँगी... वो भी वीडियो पर? नहीं।"
नंदिनी उसका हाथ पकड़कर ड्रॉइंग रूम में ले गई।
मोबाइल स्क्रीन पर एक लंबा, गंभीर और बेहद आकर्षक युवक दिखाई दे रहा था।
सफेद शर्ट, काली जैकेट, गहरी आँखें और चेहरे पर कोई मुस्कान नहीं।
यही था...
डॉ. आर्यवीर सिंह राठौर।
उन्होंने सबसे पहले दादा-दादी को प्रणाम किया।
फिर माँ-पापा से हालचाल पूछा।
नंदिनी मुस्कुराई।
"भैया, आपके लिए एक सरप्राइज़ है।"
आर्यवीर ने भौंहें चढ़ाईं।
"क्या?"
नंदिनी कैमरा सिया की तरफ घुमाने ही वाली थी कि सिया घबराकर पीछे हट गई।
मोबाइल उसके हाथ से छूटते-छूटते बचा।
पूरा घर हँस पड़ा।
आर्यवीर ने बस एक पल के लिए उस लड़की की झलक देखी...
और बिना कुछ कहे स्क्रीन से नज़र हटा ली।
"मैं शाम तक पहुँच रहा हूँ।"
इतना कहकर उन्होंने कॉल काट दिया।
सिया ने राहत की साँस ली।
"हे भगवान... कितने गंभीर हैं।"
नंदिनी मुस्कुराई।
"तुमने अभी सिर्फ़ फोटो देखी है... असली तूफ़ान तो शाम को आएगा।"
शाम होने में अब कुछ ही घंटे बाकी थे...
और किसी को नहीं पता था कि आर्यवीर की घर वापसी सिर्फ़ एक बेटे की वापसी नहीं, बल्कि कई पुराने राज़ों की शुरुआत बनने वाली है।
अब आगे,
राठौर हवेली आज किसी त्योहार से कम नहीं लग रही थी।
मुख्य द्वार पर गेंदे और गुलाब के फूलों की लड़ियाँ सजाई गई थीं। पूरे आँगन में रंगोली बनी थी। नौकर-चाकर इधर-उधर भाग रहे थे। दादी कमला देवी हर पाँच मिनट में किसी न किसी को निर्देश दे रही थीं।
"अरे रामू! वो फूल टेढ़े क्यों लगे हैं? सीधा करो..."
"जी अम्मा जी... अभी करता हूँ।"
रामू काका जैसे ही स्टूल पर चढ़े, उनका संतुलन बिगड़ गया और वे सीधे नीचे रखे फूलों की टोकरियों में जा गिरे।
पूरा आँगन ठहाकों से गूँज उठा।
महेंद्र चाचा हँसते-हँसते बोले,
"रामू... फूल सजाने गए थे या खुद सजने?"
रामू शर्माते हुए उठे।
"मालिक... गलती फूलों की है... बहुत फिसल रहे थे।"
"हाँ-हाँ... अब फूल भी दोषी हो गए!"
सब फिर हँस पड़े।
सिया बरामदे में खड़ी यह सब देखकर मुस्कुरा रही थी।
उसे इस घर की यही बात सबसे अच्छी लगती थी—हर कोई एक-दूसरे का सम्मान करता था और छोटी-छोटी बातों में खुशियाँ ढूँढ़ लेता था।
तभी दादी ने आवाज़ दी।
"सिया बेटा..."
"जी दादी।"
"आज पहली बार आर्यवीर घर आ रहा है। उसकी आरती तुम ही उतारोगी।"
सिया एकदम घबरा गई।
"मैं...? नहीं दादी... आप कीजिए ना।"
"क्यों?"
"मुझे शर्म आती है।"
नंदिनी तुरंत बीच में कूद पड़ी।
"दादी, देख लेना... भैया को देखते ही ये आरती की थाली गिरा देगी।"
"नंदिनी!"
"क्या...? मैं सच बोल रही हूँ।"
सिया ने उसे घूरा तो वह हँसते हुए भाग गई।
उधर...
एक काली चमचमाती लग्ज़री कार एयरपोर्ट से निकल चुकी थी।
ड्राइवर गाड़ी चला रहा था।
पीछे की सीट पर बैठा आर्यवीर खिड़की से बाहर देख रहा था।
पाँच साल...
पाँच साल बाद वह अपने शहर लौट रहा था।
विदेश ने उसे बहुत कुछ दिया था—नाम, अनुभव और पहचान।
लेकिन घर...
घर जैसी सुकून की जगह कहीं नहीं थी।
ड्राइवर ने धीरे से कहा,
"सर... सब लोग आपका बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं।"
आर्यवीर ने सिर्फ़ "हूँ..." कहा।
उसी समय उसका फ़ोन बजा।
स्क्रीन पर लिखा था—नंदिनी कॉलिंग...
उसने कॉल उठाई।
"हाँ।"
"भैया... जल्दी आइए ना। दादी ने आपकी पसंद के गुलाब जामुन बनाए हैं।"
"मैं रास्ते में हूँ।"
"और सुनिए..."
"क्या?"
"घर में एक सरप्राइज़ भी है।"
"कैसा सरप्राइज़?"
"वो घर आकर पता चलेगा।"
कॉल कट गई।
आर्यवीर हल्का-सा मुस्कुराया।
"ये लड़की कभी नहीं सुधरेगी।"
राठौर हवेली...
सिया ने आरती की थाली तैयार कर ली थी।
लेकिन उसके हाथ अब भी काँप रहे थे।
"इतना डर क्यों रही हो?" माँ अनामिका ने प्यार से पूछा।
"पता नहीं... सब लोग उनकी इतनी बातें करते हैं कि मिलने से पहले ही डर लगने लगा।"
माँ मुस्कुरा दीं।
"वो दिल के बहुत अच्छे हैं... बस चेहरे पर मुस्कान कम रहती है।"
तभी बाहर से गाड़ियों के रुकने की आवाज़ आई।
दादी खुशी से लगभग दौड़ पड़ीं।
"आ गया... मेरा बच्चा आ गया।"
पूरा परिवार मुख्य द्वार की ओर बढ़ गया।
सिया सबसे पीछे खड़ी थी।
मुख्य गेट खुला।
एक लंबा, आत्मविश्वासी युवक काली शर्ट और ग्रे कोट में धीरे-धीरे अंदर आया।
उसके चेहरे पर वही गंभीरता थी, जिसकी बातें सिया सुबह से सुन रही थी।
उसने सबसे पहले झुककर दादा-दादी के पैर छुए।
दादी ने उसे गले लगा लिया।
"बहुत इंतज़ार करवाया तूने..."
"सॉरी दादी।"
फिर उसने माँ-पापा और चाचा-चाची के पैर छुए।
महेंद्र चाचा हँसते हुए बोले,
"डॉक्टर साहब... अब विदेश से लौट आए हो, हमें भूल मत जाना।"
आर्यवीर ने हल्की-सी मुस्कान दी।
"आपको भूलना आसान नहीं है, चाचू।"
इतने में नंदिनी दौड़कर आई और पीछे से उससे लिपट गई।
"भैया..."
"तू अब भी उतनी ही शैतान है।"
"और आप अब भी उतने ही खड़ूस।"
पूरा परिवार हँस पड़ा।
आर्यवीर ने पहली बार खुलकर मुस्कुराया।
दूर खड़ी सिया यह सब देख रही थी।
"ये तो उतने डरावने नहीं लग रहे..." उसने मन ही मन सोचा।
दादी ने आवाज़ दी,
"सिया बेटा... आरती।"
सिया धीरे-धीरे आगे बढ़ी।
उसके हाथ हल्के-हल्के काँप रहे थे।
आर्यवीर ने पहली बार उसे ध्यान से देखा।
सादगी...
मासूमियत...
और आँखों में एक अजीब-सी शांति।
सिया ने आरती उतारी।
जैसे ही तिलक लगाने लगी, नंदिनी पीछे से धीरे से बोली,
"हाथ मत काँपाना..."
सिया घबरा गई।
तिलक लगाने की जगह उसके माथे पर रोली की एक लंबी लकीर बन गई।
दो सेकंड की ख़ामोशी...
फिर पूरा परिवार ज़ोर से हँस पड़ा।
सिया का चेहरा शर्म से लाल हो गया।
"म... माफ़ कीजिए..."
आर्यवीर ने बिना कुछ कहे रूमाल निकाला, आईने में देखकर रोली साफ़ की और शांत स्वर में बोला,
"कोई बात नहीं।"
बस इतना।
न गुस्सा...
न मुस्कान...
न शिकायत।
सिया ने राहत की साँस ली।
लेकिन उसे क्या पता था...
यह उनकी पहली मुलाक़ात थी।
और आने वाले दिनों में यही दो लोग एक-दूसरे की ज़िंदगी बदलने वाले थे।
क्रमशः...
इस तरह कहानी धीरे-धीरे आगे बढ़ेगी—पहले परिवार से जुड़ाव, फिर आर्यवीर और सिया की नोकझोंक, उसके बाद दोस्ती और फिर प्रेम। इससे कहानी स्वाभाविक और भावनात्मक लगेगी।
Radhe Radhe 🍁..............