दर्द का रिश्ता: रूहानी इश्क़ की दास्तान Ch. 3

दर्द का रिश्ता: रूहानी इश्क़ की दास्तान - Chapter 3

Posted by Aarya Rai • Jul 05, 2026 07:35 AM

स्कूल को छुट्टी हुई तो नव्या अक्षत के साथ बातें करते हुए पार्किंग तक पहुँची तो सामने ही आदि अपनी साइकिल पकड़े खड़ा था और उसे ही देख रहा था। उसको देखते ही नव्या के लबों पर मुस्कान ठहर गयी। उसने अक्षत को बाय कहा और आदि के तरफ बढ़ गयी।

आदि उसको आँखे छोटी-छोटी करके घूरने लगा, वही नव्या उसके पास चली आई और मुस्कुराकर बोली, "क्या हुआ मुझे ऐसे घूर क्यों रहा है? मैं बिल्कुल टाइम पर आई हूँ, अभी तो टीचर निकली थी क्लास से और मैं तेरे पास आ गयी।"

आदि ने उसको खा जाने वाली नज़रों से घूरा और फिर अपनी कलाई पर बंधी घड़ी की तरफ देखने लगा तो नव्या के चेहरे के भाव बदल गए, उसने उसको घड़ी को गुस्से से घूरते हुए कहा, "सब चक्कर इस घड़ी का है, इसके वजह से तू हमेशा मुझपर गुस्सा करता रहता है, देखियो किसी दिन मैंने तेरी इस घड़ी को ऐसा गायब करना है कि दोबारा कभी मिलेगी ही नही, इतनी परेशान होती हूँ इसके वजह से।"

"अच्छा तो लेट तू आए और सारी ब्लेम मेरी घड़ी पर डाल रही है।" आदि की गुस्से भरी निगाहें उसके तरफ घूम गयी। नव्या ने देखा कि अब कोई चारा नही है, आदि सच मे नाराज हो गया है तो उसने अपनी बत्तीसी चमका दी और क्यूट सी शक्ल बनाकर बोली,

"अरे तुम तो सच मे भड़क गए, मैं तो बस मज़ाक कर रही थी। मुझे पता है मैं ही हमेशा तुम्हे लेट करवाती हूँ पर मैं क्या करूँ, मैं जानबूझकर कुछ भी नही करती हूँ, सब अपने आप ही हो जाता है।"

इस वक़्त नव्या हद से ज्यादा मासूम लग रही थी। आदि चाहकर भी उसपर गुस्से नही कर सका और साइकिल लेकर स्कूल के गेट के तरफ बढ़ गया पर नव्या को पीछे ही छोड़ गया।

नव्या भी तुरंत उसके पीछे भागते हुए चिल्लाने लगी, "आदि तुम मुझे छोड़कर कैसे जा रहे हो................. रुको तो सही मैं भी तो हूँ तुम्हारे साथ.............. रुक जाओ यार, तुम इतनी जल्दी-जल्दी चल रहे हो, मैं तो पीछे ही रह गयी।"

उसने आदि को रोकने की बहुत कोशिश की पर आदि ने साइकिल नही रोकी। आखिर मे नव्या को भी गुस्सा आ गया और वो मुँह फुलाकर एक जगह खड़ी हो गयी और गुस्से मे चिल्लाते बोली, "ठीक है, मत रुको मेरे लिए, बहुत बन रहे हो न साइकिल वाले, मैं भी नही जाऊंगी तुम्हारे साथ। जाओ अपनी सड़ी हुई शक्ल लेकर अकेले घर, मैं नही आती तुम्हारे पीछे............ इतनी सी लेट हुई तो इतना गुस्सा कर रहे हो, मुझे अब तुमसे बात ही नही करनी है।"

नव्या ने मुँह बना लिया और कमर पर हाथ रखे गुस्से से पीछे से आदि को देखती रही। इसके बाद उसने एक शब्द नही कहा। कुछ दूर जाकर आदि को एहसास हुआ कि नव्या मज़ाक नही कर रही है बल्कि वो सच मे उसके पीछे नही आ रही तो उसने साइकिल रोककर पलटकर पीछे देखा तो नव्या उसे ही घूरे जा रही थी।

आस-पास मौजूद स्टूडेंट्स भी उन्हें ही देख रहे थे क्योंकि नव्या और आदि का ये नाटक अक्सर होता ही रहता था और आखिर मे आदि को ही झुकना पड़ता था, उनकी ये नोंक-झोंक की सबको आदत हो चुकी थी। गार्ड अंकल भी दोनों को देखकर मुस्कुरा रहे थे।

आज भी वही हुआ, पहले गुस्सा आदि था पर अब नव्या का गोरा चेहरा गुस्सा से लाल हो चुका था और हमेशा के तरफ आखिर मे आदि को अपना गुस्सा साइड रखकर वापिस उसके पास जाना पड़ा। उसने अपनी साइकिल वही लगाई वो नव्या के पास चला आया।

"चलो" आदि ने हल्के गुस्से और बेरुखी से उसको चलने को कहा तो नव्या ने भी अकड़ते हुए कहा, "नही जाती क्या करोगे?"

"नव्या यहाँ तमाशा मत करो, तुम्हारी नौटंकी देखने का वक़्त नही है मेरे पास, माँ इंतज़ार कर रही होंगी, इसलिए अभी अपना नाटक बन्द करो और जल्दी चलो वरना मैं सच मे तुम्हे छोड़कर चला जाऊंगा फिर आती रहना अकेले वो भी पैदल।" आदि अब भी गुस्से मे था तो नव्या का गुस्सा भी बढ़ गया।

"तो जाओ न, मैंने तो नही बुलाया था तुम्हे? जाओ अकेले घर मुझे छोड़कर उसके बाद आंटी तुम्हे अच्छे से सबक सिखाएंगी। बड़े आए मुझे धमकी देने वाले, जैसे तुम मुझे लेकर नही जाओगे तो मैं घर ही नही पहुँच पाऊँगी।"

"नव्या नाटक बन्द करो और चलो मेरे साथ। " आदि ने उसका हाथ पकड़ लिया और आगे बढ़ा पर नव्या ने उसके हाथ को झटकते हुए मुँह फुलाकर कहा, "मैं नौटंकी करती हूँ न तो ठीक है इस नौटंकी वाली के साथ क्या कर रहे हो, जाओ अपनी तरफ किसी समझदार लड़की से दोस्ती करो और उसे ही अपनी साइकिल पर बिठाकर घुमाना, मुझे नही जाना तुम्हारे साथ। मैं खुदसे घर पहुँच जाऊंगी।"

नव्या ने गुस्से मे कहा और अकेले ही आगे बढ़ गयी। उसका बेमतलब का गुस्सा देखकर आदि का गुस्सा बढ़ता जा रहा था और वो वही खड़ा गुस्से से उसको घूर रहा था।

नव्या कुछ आगे पहुँची ही थी कि एक लड़के ने उसके आगे अपनी साइकिल रोक दी। नव्या पहले ही गुस्से मे थी, अब किसी ने उसका रास्ता रोका ये देखकर वो और भड़क उठी और खा जाने वाली निगाहों से उस लड़के को घूरने लगी।

वही वो लड़का उसको देखकर मुस्कुरा रहा था ।

"इतने खूबसूरत चेहरे पर इतना गुस्सा? चलो मैं तुम्हे तुम्हारे घर छोड़ देता हूँ।" उस लड़के ने मौके पर चौका मारना चाहा पर नव्या तो ठहरी नव्या, अब वो भड़क चुकी थी तो उस लड़के की खैर नही थी।

नव्या ने तुरंत ही भड़कते हुए कहा, "अबे चोमू जैसी शक्ल के, अपनी खटारा साइकिल उठा और निकल यहाँ से वरना मार-मार कर तेरा पूरा हुलिया बिगाड़ दूँगी उसके बाद दोबारा मेरा रास्ता रोकने की हिम्मत नही करेगा, समझा।"

लड़के की अच्छी खासी फ़ज़ीहत् हो चुकी थी और अब आसपास मौजूद जो कुछ स्टूडेंट्स थे वो उसपर हंस रहे थे। वो लड़का नव्या को घूरते हुए वहाँ से चला गया।

नव्या का गुस्सा अब और बढ़ चुका था और अब उसको चिढ़ हो रही थी। वो गुस्से मे आगे बढ़ गयी पर आदि जो गुस्से से अभी उस लड़के को घूर रहा था वो भागते हुए नव्या के पास पहुँच गया और उसका हाथ पकड़कर उसको अपनी साइकिल के तरफ लेकर चला गया। जैसे ही उसने वहाँ जाकर नव्या का हाथ छोड़ा वो फिर वहाँ से जाने लगी तो आदि ने फिरसे उसका हाथ पकड़ लिया और अब उसने थोड़ा प्यार से कहा,

"अबसे तुझपर गुस्सा नही करूँगा, अब तो शांत हो जा देवी। देर हो रही है यार, भाई पहुँच भी गए होंगे और हम अभी तक यही है। चल अब गुस्सा छोड़ और पीछे बैठ जा, तुझे छोड़कर नही जा सकता मैं।"

नव्या मुँह बनाकर उसके पीछे बैठ गयी पर उसने आदि के कंधे को नही पकड़ा, पीछे से साइकिल पकड़कर बैठ गयी। आदि ने गहरी सांस छोड़ी क्योंकि वो जानता था कि नव्या का गुस्सा इतनी जल्दी शांत नही होगा। उसने साइकिल स्टार्ट कर दी। दोनों ही खामोश थे अचानक ही नव्या ने आदि के कंधे को पकड़कर हिलाते हुए चिल्लाकर कहा, "आदि साइकिल रोको।"

उसके अचानक हिलाने से बेचारे आदि का बैलेंस बिगड़ गया, उसने जल्दी से साइकिल रोकी और खींझते हुए बोला, "क्या........... प्रॉब्लम क्या है आखिर तेरी? इंसानों के तरफ कोई काम कर सकती है या नही? हर वक़्त उल्टी सीधी हरकतें करती रहती है, अभी तेरी वजह से हम दोनों गिर जाते।"

"तुम फिरसे मुझपर चिल्ला रहे हो।" नव्या ने गाल फुलाते हुए कहा। आदि ने अपना गुस्सा शांत किया तो आराम से बोला,

"चिल्ला नही रहा हूँ, तुझे समझा रहा हूँ। सोच समझकर कोई भी काम किया कर वरना किसी दिन अपनी इस आदत के वजह से तू किसी मुसीबत मे फंस जाएगी। जो मन मे आता है बस कर देती है, ये भी नही सोचती कि उसका रिज़ल्ट क्या हो सकता है।

थोड़ी तो समझदारी दिखाया कर। अभी उस लड़के पर भी कैसे चिल्ला रही थी। मुझे चिंता होती है तुम्हारी, जैसे तुम बिना कुछ सोचे कुछ भी कर देती हो, कही कभी किसी मुश्किल मे न फंस जाओ।"

आदि के चेहरे पर उसके लिए परवाह साफ झलक रही थी। नव्या का गुस्सा भी अब शांत हो चुका था, उसने मुस्कुराकर कहा, "पर मुझे तो बिल्कुल चिंता नही होती क्योंकि मुझे पता है कि मैं कितनी ही बड़ी मुश्किल मे क्यों न फंस जाऊँ पर तुम मुझे हर मुश्किल से सही सलामत बाहर निकाल लोगे। याद नही तुम्ही तो कहते हो की आदि के होते हुए नव्या को कभी कुछ नही हो सकता, अब तुम खुद ही अपनी कही बात भूल गए? "

"भुला नही हूँ पर फिर भी मुझे तुम्हारी फिक्र होती है। कही ऐसा न हो जाए कि तुम मुश्किल मे हो और मैं तुम्हारे पास मौजूद न रहूँ तुम्हे उस मुश्किल से बाहर निकालने के लिए इसलिए चाहता हूँ की थोड़ा समझदार बन जाओ तुम। कुछ भी करने से पहले सोच लिया करो कि उसका रिज़ल्ट क्या हो सकता है? यूँही किसी से भी बेधड़क भिड़ जाना ठीक नही है।"

"अच्छा बाबा आगे से मैं ऐसे किसी से नही झगडुंगी, अब तुम मुझे समझाना छोड़ो और जल्दी से मुझे वो ला दो मुझे अभी खाना है।" नव्या ने उसकी बात का रुख बदल दिया और दूसरी तरफ इशारा कर दिया। आदि ने सर घुमाकर देखा तो बर्फ का गोले वाली रेडी खड़ी थी वहाँ।

आदि ने अब नव्या को देखा जो ललचाई आँखों से उसी दिशा मे देख रही थी। नव्या ने उसके कंधे को हिलाते हुए कहा, "आदि जाओ न मेरे लिए एक गोला ला दो, बहुत गर्मी हो गयी है मेरे दिमाग मे, अब उसको ठण्डा करना पड़ेगा।"

"मैं क्यों लाऊँ? तुम्हे भी तो पॉकेट मनी मिलती है जाकर खुद खरीद लो। रोज़ नई-नई फरमानईशें करती रहती हो, हर बार मेरे पैसे खर्च करवाती हो और खुदके पैसे बचाकर रखती हो। मैं नही दिलाऊँगी आज तुम्हे कुछ भी। अगर इतना ही खाने का मन है तो खुदसे जाकर खरीदकर खाओ।" आदि ने साफ इंकार करते हुए कहा। उसकी बात सुनकर नव्या का चेहरा उतर गया उसने मुँह लटकाते हुए कहा,

"तुम जानते हो मैं पैसे खर्च नही कर सकती फिर भी ऐसे कह रहे हो। बस दस रुपए के गोले को दिलाने मे कितना भाव खा रहे हो। बहुत सही, यही दोस्ती है तुम्हारी, एक चीज़ नही दिला सकते तुम मुझे। तुम्हे लिए वो दस रुपए मुझसे भी ज्यादा ज़रूरी है न।"

नव्या की नौटंकी एक बार फिर शुरू हो चुकी थी। आदि ने घूरकर उसे देखा तो नव्या निचले होंठ को बाहर निकाले और अपनी पलकों को बार-बार झपकाते हुए मासूम सी शक्ल बनाकर उसको देखने लगी।

आदि को फिरसे उसपर प्यार आ ही गया। वो साइकिल से नीचे उतर गया, नव्या खुश हो गयी। वो अपने पैसे खर्च नही करती थी उन्हें इकट्ठा करके रखती थी और जब थोड़े ज्यादा पैसे हो जाते थे तो उन पैसों को आदि के जन्मदिन वाले दिन पास के अनाथाश्रम मे दान कर देती थी।

अपने सारे शौक वो आदि से पूरे करवाती थी और महीने से पहले बेचारे आदि की सारी पॉकेट मनी खत्म हो जाती थी। फिर उसे अपने बड़े भाई आर्यन से पैसे मांगने पड़ते थे, पर आदि नव्या को इंकार भी नही कर पाता था। आज भी वो उसकी मासूम सी शक्ल पर पिघल ही गया। उसने जाकर एक गोला खरीदा और लाकर नव्या को पकड़ा दिया।

नव्या का चेहरा खुशी से खिल उठा, उसने झट से उसको चूसा फिर आँखे बन्द करते हुए बोली,

"उह्ह्ह्......... मज़ा आ गया"

"चलो अब जल्दी से बैठो वरना तुम्हारे चक्कर मे आज माँ और आंटी दोनों से डाँट पड़ेगी मुझे।" आदि वापिस साइकिल पर बैठ गया। नव्या भी उसके पीछे बैठ गयी और अपना गोला खाने लगी, उसने आदि को पकड़ा हुआ नही था, कहीं वो गिर न जाए इस डर से आदि साइकिल धीरे-धीरे चला रहा था।

कुछ देर बाद साइकिल आदि के घर के बाहर रुकी तो नव्या तुरंत नीचे उतरकर आंटी पुकारते हुए अंदर के तरफ दौड़ गयी। उसकी बचकानी हरकत आदि के लबों पर आई मुस्कान की वजह बन गयी।

आदि ने भी साइकिल खड़ी की और अंदर के तरफ चला आया। अंदर पहुँचा तो नव्या डाइनिंग टेबल पर चढ़कर बैठी हुई थी और सामने खड़ी नंदिनी जी उसको अपने हाथों से खाना खिला रही थी। आदि से देखकर मुस्कुराते हुए अपने कमरे मे चला गया क्योंकि ये रोज़ का ही था।

कुछ देर बाद वो नीचे आया तो आर्यन पहले से वहाँ मौजूद था। आदि भी आकर उनके बगल मे बैठ गया। नंदिनी जी तो नव्या के साथ बीज़ी थी तो आर्यन खुद ही अपना खाना निकाल रहा था।

आदि को देखते ही उसने मुस्कुराकर कहा, "आज तो जल्दी आ गए, जैसे तुम्हारा नाटक चल रहा था मुझे लगा था कमसे कम एक घंटा तो लगेगा तुम्हे नव्या को मनाकर घर लाने मे।"

उसकी बात सुनकर आदि का मुँह उतर गया उसने बेचारगी से उसे देखा तो आर्यन की हंसी छूट गयी। आदि ने अब घूरकर नव्या को तो नव्या ने तुरंत ही नंदिनी जी से शिकायत लगाते हुए कहा, "देखिये आंटी आदि फिरसे मुझे कैसे घूर रहा है। "

नंदिनी जी ने घूरकर उसे देखा तो आदि ने मुँह बना लिया। तभी वहा महिमा जी पहुँच गयी और नव्या को स्कूल ड्रेस मे डाइनिंग टेबल पर बैठे खाना खाते देख, उनकी आँखे गुस्से से छोटी-छोटी हो गयी।

To be continued...

चलिए बताइये कैसा लगा आपको ये सरप्राइज पार्ट और हमारे प्यारे आदि और नव्या की ये तकरार भरा प्यार।

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