इक तेरी चाहत! Ch. 2

इक तेरी चाहत! - Chapter 2

Posted by Neha Sayyed • Jul 08, 2026 04:42 PM

बढ़ते है कहानी की ओर---

पंखुड़ी बाहर आई , तो उसकी सास गायत्री जी अंदर ही आ रहीं थी । सिर पर पल्लू जमाते हुए वह उनकी तरफ बड़ी तो गायत्री मुस्कुरा दी और अपने साथ लाया प्रसाद उसे थमा दिया ।

" लल्ला आ गया कॉलेज से .. ? " वह चारपाई पर बैठते हुए बोली तो उन्हें पीने के लिए पानी देती पंखुड़ी ने हामी में सिर हिला दिया - " हां.. मां जी , आ गए है । लेकिन बहुत गुस्से में लग रहे है । मुझे डांट भी दिया... जबकि मै तो बस खाना लगाने का कह रहीं थी । "

" अच्छा... तुम मुझे दो उसके खाने की थाली । " पानी पीकर खाली गलास उसे ही थमाते हुए उन्होंने कहा तो वह भी फौरन ही रसोई में गई और किन्शुक के लिए खाना , एक थाली में सजा कर ले आई थी ।

गायत्री को अपने कमरे की तरफ जाता देख , पंखुड़ी वहीं बैठ गई कि दिल तो कर रहा था उसका भी उनके साथ कमरे में जाने का , मगर जानती थी कि अगर किन्शुक उसे देखेगा तो फिर खाना खाएगा भी नहीं और वह सुबह से भूखा था इसलिए वह नहीं चाहती थी कि वह और भूखा रहे ।

गायत्री बगैर कमरे का दरवाज़ा खटखटाए भीतर आई तो एक लम्हे के लिए ठिठक सी गई कि गुस्से में किन्शुक ने पूरे कमरे को फैला दिया था और अब बिस्तर पर औंधे मुंह पड़ा , तकिए में मुंह छुपाए सुबक रहा था ।

अपने बेटे को इस कद्र रोता देख , गायत्री जी का दिल भारी सा हो गया । फर्श पर बिखरी चीजों को पैर से बगल करते हुए वह बिस्तर के पास आई और वहीं खाने से भरी थाली रख , किन्शुक के सिर पर हाथ फेरते हुए नर्मी से बोली - " लल्ला... चल उठ , खाना खा ले बेटा । "

किन्शुक ने तकिए से चहरा हटा कर , अपनी मां को देखा पनीली आंखों के साथ , फिर वापस तकिए में मुंह छुपा , और तेज रोता हुआ बोला - " आपको क्या फर्क पड़ता है... आप लोगो को तो बस मेरी शादी करवानी थी ।  "

" बेटा शादी तो सब करते है । " गायत्री जी ने उसे समझाते हुए कहा था कि वह तो जैसे किलस ही पड़ा था - " आप लोगो को कोई अंदाजा भी नहीं है कि इस शादी की वजह से मुझे कितनी शर्मिंदगी हो रहीं है । आपको पता है , मेरे किसी भी दोस्त की शादी नहीं हो रखी । और जो बात भी करते थे शादी की , मैं मजाक उड़ाता था उनका । अब अगर किसी को पता चला कि मेरी इक्कीस की उम्र में ही शादी हो गई… तो मुझे क्या समझेंगे सब .. ?  हँसेंगे मुझ पर… मज़ाक बनाएँगे मेरा । मै तो किसी से नज़रे भी नहीं मिला पा रहा । "

" बेटा… लोग तो तब भी बोलते हैं जब कोई शादी ना करे… और तब भी जब जल्दी कर ले । दुनिया का काम बोलना है । पर जिंदगी उनकी नहीं , तेरी है । " गायत्री जी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा था । किन्शुक झटके से उठ बैठा , रोने की वजह से उसकी आँखें लाल थीं । वह अपने हाथो को एक बेबसी में झटकते हुए , अपने आंसुओं को रोकने की कोशिश करता हुआ बोला - " वहीं तो मां... मेरी ज़िंदगी थी और मुझे नहीं करनी थी शादी... क्योंकि शादी करना मेरा सपना नहीं था । मुझे पढ़ना था , खुद से कुछ करना था । अपने पैरों पर खड़ा होना था । लेकिन आप लोगो ने मेरी एक ना सुनी और मुझे बांध दिया उस पागल के साथ... "

" वह क्या तुम्हारे हाथ को पकड़े बैठी है या तुम्हारी किताबों को छीन रहीं है । आराम से पढ़ो , कामयाब होओ । " गायत्री जी ने एक निवाला तोड़ कर उसके मुंह की तरफ बढ़ाया था । तो किन्शुक तिलमिला उठा , वह उनका हाथ अपने मुंह के आगे से हटाता हुआ बोला - " आप समझ नहीं रहीं मां ! और ना समझ सकती है कि मैं कैसा महसूस कर रहा हूं । आप सबमें से कोई मेरा दर्द , मेरी तकलीफ़ नहीं समझ सकता । "

गायत्री जी ने एक गहरी सांस खींची और हाथ में पकड़े निवाले को थाली में एक तरफ रख दिया । किन्शुक जिस हाल में था , उसमें गायत्री जी चाहे उसे लाख दफा समझाए , उसे कोई भी बात समझ नहीं आने वाली थी ।

बाजदफ़ा इंसान जब अपनी तकलीफ़ में घिर जाता है, तो उसे वही सबसे बड़ी और सबसे सच्ची लगती है । वह अपनी कहानी के चारों तरफ एक घेरा बना लेता है, जिसके बाहर किसी और का दर्द या नज़रिया उसे दिखाई ही नहीं देता । ऐसे में कोई कितना भी समझाए, बात दिल तक नहीं उतरती, क्योंकि इंसान से इंसान नहीं समझता , उसे सिर्फ वक्त ही समझाता है । इसलिए गायत्री जी ने भी शब्दों का सहारा छोड़ दिया था , उन्होंने सब कुछ समय पर छोड़ दिया, क्योंकि उन्हें पता था कि जो दायरा आज बना है, उसे एक दिन वक्त ही तोड़ेगा ।

" लल्ला ! ख़ुद को शांत करो और खाना खाओ... "

" नहीं खाना मुझे... ले जाइए यह । " वह वापस औंधे मुंह बिस्तर पर गिरता हुआ नाराजगी से बोला ।

" मैं इसे यहीं छोड़ कर जा रहीं हूं । मन हो , तो खा लेना । " कहते हुए गायत्री जी उठी और कमरे से बाहर आ गई । तभी उनकी नजर पंखुड़ी पर गई ,जो चारपाई पर बैठी अपने चेहरे को ऊपर उठाए हुए थी । उसकी हरकत अजीब सी थी । गायत्री जी उलझन में उसे देखते हुए उसके पास आई - " बेटा... क्या हुआ .. ? "

चहरे को नीचे झुकाते हुए उसने आहिस्ते से अपने पेट पर हाथ रखा और अपने होठों को भींचते हुए बोली - " पेट दर्द कर रहा है , मां जी । "

" पेट दर्द .. ? कैसे हुआ बेटा .. क्या कुछ उल्टा खाया .. ? "  उन्होंने परेशान होकर पूछा तो पंखुड़ी ने मासूमियत से उन्हें देखा और ना में सिर हिला कर बोली - " कुछ खाया ही नहीं... "

" खाया नहीं .. ? तुमने सुबह से खाना ही नहीं खाया .. ? " पंखुड़ी को हैरानगी में देखते हुए वह बोली तो उसने फिर सिर हिलाया - " ये सुबह खाना खा कर नहीं गए तो मैं कैसे खा लेती । मां ने कहा था कि जब तक पति ना खाना खाए , तब तक मुझे भी नहीं खाना । "

गायत्री जी को उस मासूम सी लड़की पर बड़ा प्यार आया था । प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए वह बोली - " वह खा रहा है खाना... अब तुम भी खा लो बेटा वरना तुम्हारी तबीयत खराब हो जायेगी । "

गायत्री जी की बात सुनकर पंखुड़ी की आंखो में चमक आई । वह उठी और जी कहकर फौरन रसोई में घुस गई । की सुबह से अब तक जैसे - तैसे उसने खुद को रोक लिया था मगर अब और नहीं रोक सकती थी ।

" सही कहता है किन्शुक... पागल ही है यह । " उसके भोलेपन पर मुस्कुराते हुए उन्होंने कहा था ।

क्रमशः

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