रात 12 बजे की काल - Chapter 1
रात 12 बजे की कॉल
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रात के ठीक बारह बज रहे थे। पूरे शहर में गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था। बाहर हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। सड़क पर लगे बिजली के खंभों की पीली रोशनी भीगती हुई सड़क पर अजीब-सी परछाइयाँ बना रही थी। रोहन अपने छोटे-से फ्लैट में अकेला बैठा लैपटॉप पर ऑफिस का काम पूरा कर रहा था। तभी अचानक उसका मोबाइल बज उठा। स्क्रीन पर कोई नंबर नहीं था। केवल लिखा था"Unknown Caller." रोहन ने पहले तो कॉल काट दी। कुछ सेकंड बाद फिर वही कॉल आई। उसने सोचा शायद किसी को सचमुच ज़रूरी काम होगा। उसने कॉल रिसीव की। दूसरी तरफ़ कुछ पल तक केवल साँसों की आवाज़ सुनाई देती रही। फिर एक धीमी और काँपती हुई महिला की आवाज़ आई—"रोहन... मेरी मदद करो... मेरे पास बहुत कम समय है..." रोहन चौंक गया। उसने घबराकर पूछा, "आप कौन हैं?" लेकिन जवाब देने के बजाय दूसरी तरफ़ से केवल इतना सुनाई दिया"पुराने रेलवे पुल पर मत जाना... वरना बहुत देर हो जाएगी..." और कॉल कट गई। रोहन कुछ देर तक मोबाइल को देखता रह गया। वह समझ नहीं पा रहा था कि यह कोई मज़ाक था या किसी की मदद की पुकार। उसने नंबर मिलाने की कोशिश की, लेकिन मोबाइल पर लिखा आया—"This number does not exist." उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। उसने खुद को समझाया कि शायद किसी ने इंटरनेट कॉल से शरारत की होगी। वह वापस काम करने बैठ गया। तभी पाँच मिनट बाद फिर मोबाइल बजा। इस बार भी वही अनजान कॉल। उसने तुरंत उठा लिया। दूसरी तरफ़ वही आवाज़ थी, लेकिन इस बार वह और ज़्यादा घबराई हुई लग रही थी। "रोहन... मेरी बात ध्यान से सुनो... ठीक बारह बजकर पंद्रह मिनट पर एक लाल कार रेलवे पुल पार करेगी... उसे रोक लेना... नहीं तो बहुत बड़ा हादसा हो जाएगा..." रोहन ने गुस्से में कहा, "देखिए, आप हैं कौन? और मेरा नाम आपको कैसे पता है?" कुछ क्षण खामोशी रही। फिर बहुत धीमी आवाज़ आई—"क्योंकि... पाँच साल पहले... तुम मुझे बचा नहीं पाए थे..." इतना कहकर कॉल फिर कट गई। रोहन के हाथ काँपने लगे। पाँच साल पहले... रेलवे पुल... यह शब्द सुनते ही उसके दिमाग़ में एक पुरानी घटना कौंध गई। पाँच साल पहले उसी पुल पर एक भयानक सड़क दुर्घटना हुई थी। उस हादसे में एक लड़की की मौत हो गई थी। रोहन उस समय वहीं मौजूद था, लेकिन वह उसे बचा नहीं सका था। उसने कभी यह बात किसी को नहीं बताई थी। फिर यह अनजान कॉल करने वाला उस घटना के बारे में कैसे जानता था? घड़ी में बारह बजकर बारह मिनट हो चुके थे। रोहन के मन में डर और जिज्ञासा दोनों थे। उसने जल्दी से कार निकाली और तेज़ी से पुराने रेलवे पुल की ओर चल पड़ा। रास्ते भर वही आवाज़ उसके कानों में गूँजती रही"लाल कार को रोक लेना..." कुछ ही मिनटों में वह पुल के पास पहुँच गया। वहाँ दूर से एक लाल कार तेज़ रफ़्तार से आती दिखाई दी। रोहन सड़क के बीचों-बीच खड़ा हो गया और दोनों हाथ हिलाकर कार रोकने की कोशिश करने लगा। कार चालक ने ज़ोर से ब्रेक लगाए। कार रुक गई। अंदर एक पति-पत्नी और उनकी छोटी-सी बेटी बैठी थी। ड्राइवर गुस्से में बाहर निकला, "मरना है क्या?" रोहन कुछ कह पाता, उससे पहले पुल के बीच का एक बड़ा हिस्सा ज़ोरदार आवाज़ के साथ टूटकर नीचे नदी में गिर गया। अगर वह कार कुछ सेकंड और आगे बढ़ जाती, तो पूरा परिवार उस गहरी खाई में गिर चुका होता। कार में बैठे लोग काँप रहे थे। रोहन भी स्तब्ध था। तभी उसका मोबाइल फिर बजा। स्क्रीन पर फिर वही शब्द चमक रहे थे"Unknown Caller..."
रोहन के हाथ काँप रहे थे। उसने धीरे-धीरे कॉल रिसीव की। दूसरी तरफ़ फिर वही महिला की आवाज़ थी, लेकिन इस बार उसकी आवाज़ में पहले जैसी घबराहट नहीं, बल्कि एक अजीब-सी शांति थी। उसने कहा, "धन्यवाद... आज एक परिवार बच गया।" रोहन ने तुरंत पूछा, "तुम कौन हो? मेरा नाम कैसे जानती हो? और तुम्हें पुल टूटने की बात पहले से कैसे पता थी?" कुछ पल तक खामोशी रही। फिर आवाज़ आई, "सच जानना है... तो कल रात ठीक बारह बजे उसी जगह आना, जहाँ पाँच साल पहले मेरी ज़िंदगी खत्म हुई थी।" इतना कहकर कॉल कट गई।
पूरी रात रोहन सो नहीं सका। उसके दिमाग़ में वही सवाल घूमते रहे। आखिर वह लड़की कौन थी? उसे पाँच साल पुरानी दुर्घटना के बारे में कैसे पता था? अगले दिन उसने पुराने अख़बार खंगालने शुरू किए। घंटों की तलाश के बाद उसे पाँच साल पहले की खबर मिल गई। खबर में लिखा था कि रेलवे पुल के पास हुई दुर्घटना में नैना नाम की एक युवती की मौत हो गई थी। साथ ही एक छोटी-सी तस्वीर भी छपी थी।
तस्वीर देखते ही रोहन सन्न रह गया।
यही वही चेहरा था...
यही वही लड़की थी...
जिसे उसने कल रात अपनी कल्पना में नहीं, बल्कि उस पुरानी तस्वीर में देखा था।
उसकी धड़कन तेज़ हो गई।
रात के ठीक बारह बजे वह फिर उसी रेलवे पुल पर पहुँचा। चारों ओर घना सन्नाटा था। हवा तेज़ चल रही थी। नदी का पानी अँधेरे में और भी डरावना लग रहा था। अचानक उसका मोबाइल अपने-आप बज उठा।
"Unknown Caller..."
उसने कॉल उठाई।
आवाज़ आई
"पीछे मत देखना... पहले मेरी बात सुनो।"
रोहन वहीं खड़ा रह गया।
आवाज़ बोली
"पाँच साल पहले यह दुर्घटना नहीं थी... मेरी हत्या हुई थी।"
रोहन के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
आवाज़ फिर बोली—
"जिस कार ने मुझे टक्कर मारी थी, वह हादसा नहीं था। मुझे जानबूझकर रास्ते से हटाया गया था। जिसने यह किया, वह आज भी ज़िंदा है... और आज रात फिर एक अपराध करने वाला है।"
रोहन का गला सूख गया।
उसने काँपती आवाज़ में पूछा
"कौन है वह?"
कुछ क्षण खामोशी रही।
फिर मोबाइल पर केवल तीन शब्द सुनाई दिए
"तुम्हारा बॉस... विक्रम..."
उसी समय रोहन के मोबाइल पर दूसरी कॉल आने लगी।
इस बार स्क्रीन पर विक्रम का नाम चमक रहा था।
रोहन ने घबराकर कॉल उठाई।
विक्रम बोला
"रोहन, तुम कहाँ हो? मुझे अभी ऑफिस के पुराने गोदाम में मिलो। बहुत ज़रूरी काम है।"
कॉल कट गई।
रोहन ने तुरंत नैना की कॉल पर वापस आने की कोशिश की।
लेकिन इस बार मोबाइल पर केवल एक संदेश दिखाई दिया—
"जल्दी जाओ... देर हुई तो एक और निर्दोष मर जाएगा..."
रोहन बिना एक पल गँवाए अपनी कार में बैठा और पुराने गोदाम की ओर दौड़ पड़ा।
उसे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि उस गोदाम में उसका इंतज़ार केवल उसका बॉस नहीं...
बल्कि पाँच साल पुराने उस राज़ का असली हत्यारा कर रहा था।
रोहन बिना एक पल गँवाए अपनी कार लेकर पुराने गोदाम की ओर दौड़ पड़ा। रात के साढ़े बारह बज चुके थे। सड़कें सुनसान थीं। तेज़ हवा चल रही थी और आसमान में बादल गरज रहे थे। उसके मन में एक ही सवाल घूम रहा था—आख़िर वह अनजान लड़की कौन थी जो उसे बार-बार मौत से पहले सच बता रही थी? क्या वह सचमुच नैना थी... या कोई और?
करीब पंद्रह मिनट बाद वह पुराने गोदाम के सामने पहुँचा। बाहर सन्नाटा पसरा था। लोहे का बड़ा-सा गेट आधा खुला हुआ था। अंदर से हल्की रोशनी आ रही थी। रोहन ने धीरे-धीरे कदम बढ़ाए। तभी उसे किसी के चिल्लाने की आवाज़ सुनाई दी।
"मुझे छोड़ दो... मैंने कुछ नहीं किया..."
रोहन आवाज़ की दिशा में भागा। गोदाम के बीचों-बीच एक कुर्सी से एक आदमी बँधा हुआ था। उसके मुँह पर कपड़ा बँधा था। सामने रोहन का बॉस विक्रम खड़ा था। उसके हाथ में पिस्तौल थी।
रोहन को देखते ही विक्रम मुस्कुराया।
"मुझे पता था... तुम ज़रूर आओगे।"
रोहन ने गुस्से में पूछा, "यह सब क्या है?"
विक्रम हँसा।
"जिस तरह पाँच साल पहले नैना को हमेशा के लिए चुप कराया था... उसी तरह आज इसे भी चुप करा दूँगा।"
रोहन के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
"मतलब... नैना की मौत एक्सीडेंट नहीं थी?"
विक्रम ने ताली बजाई।
"बिल्कुल नहीं। उसने मेरे करोड़ों के घोटाले का सच जान लिया था। वह पुलिस तक पहुँच जाती, उससे पहले ही मैंने उसकी कार का ब्रेक फेल करवा दिया। दुनिया ने उसे हादसा समझा... और मैं बच गया।"
रोहन ने चोरी-छिपे अपना मोबाइल रिकॉर्डिंग पर लगा दिया।
विक्रम लगातार बोलता जा रहा था।
"अब यह अकाउंटेंट भी सब जान चुका है। इसलिए इसे भी आज मरना होगा।"
इतना कहकर उसने पिस्तौल उठाई।
उसी क्षण पूरे गोदाम की बिजली एक साथ चली गई।
चारों तरफ़ घुप्प अँधेरा छा गया।
अचानक किसी लड़की की हँसी पूरे गोदाम में गूँज उठी।
विक्रम घबरा गया।
"क... कौन है?"
फिर वही आवाज़ आई—
"विक्रम... याद है पाँच साल पहले की रात?"
हवा का तेज़ झोंका आया।
ऊपर लटका पंखा अपने-आप घूमने लगा।
बंद खिड़कियाँ ज़ोर-ज़ोर से बजने लगीं।
विक्रम के हाथ से पिस्तौल गिर गई।
वह काँपते हुए चिल्लाया—
"नैना... मुझे माफ़ कर दो..."
इसी मौके का फ़ायदा उठाकर रोहन ने बँधे हुए आदमी की रस्सियाँ खोल दीं।
दोनों बाहर की ओर भागे।
तभी बाहर पुलिस की गाड़ियों के सायरन सुनाई दिए।
दरअसल रोहन ने गोदाम में आते समय अपने दोस्त इंस्पेक्टर अर्जुन को अपनी लाइव लोकेशन भेज दी थी।
कुछ ही सेकंड में पुलिस ने गोदाम को चारों ओर से घेर लिया।
विक्रम भागने की कोशिश करने लगा, लेकिन पुलिस ने उसे पकड़ लिया।
रोहन ने अपने मोबाइल की रिकॉर्डिंग पुलिस को सौंप दी।
रिकॉर्डिंग में विक्रम ने खुद नैना की हत्या और करोड़ों के घोटाले की बात स्वीकार की थी।
अब उसके बचने का कोई रास्ता नहीं था।
लेकिन उसी समय...
रोहन का मोबाइल फिर बज उठा।
स्क्रीन पर वही शब्द चमक रहे थे—
"Unknown Caller..."
रोहन ने काँपते हाथों से कॉल रिसीव की।
दूसरी तरफ़ से केवल एक ही आवाज़ आई
"धन्यवाद... अब मैं हमेशा के लिए आज़ाद हूँ..."
और कॉल अपने-आप कट गई।
रोहन ने दोबारा कॉल मिलाई...
लेकिन इस बार मोबाइल की स्क्रीन पर केवल एक संदेश दिखाई दिया
"This Number Never Existed..."
रोहन कुछ क्षण तक मोबाइल की स्क्रीन को देखता रह गया। उस पर साफ़ लिखा था—"This Number Never Existed..." उसके पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गई। उसने पुलिस इंस्पेक्टर अर्जुन को मोबाइल दिखाया। अर्जुन ने कॉल लॉग देखा, लेकिन वहाँ किसी अनजान नंबर का कोई रिकॉर्ड ही नहीं था। ऐसा लग रहा था जैसे वह कॉल कभी आई ही न हो। रोहन हैरान रह गया। उसने कहा, "लेकिन मैंने चार बार बात की थी... उस लड़की ने ही मुझे यहाँ भेजा था।" अर्जुन ने गंभीर स्वर में कहा, "हो सकता है किसी ने इंटरनेट कॉल की हो। पहले थाने चलो, वहाँ आराम से बात करेंगे।"
पुलिस विक्रम को गिरफ्तार करके ले गई। गोदाम से कई पुराने दस्तावेज़, नकली खातों की फाइलें और हार्ड डिस्क बरामद हुईं। जाँच शुरू हुई तो करोड़ों रुपये के घोटाले का खुलासा हो गया। सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि पाँच साल पहले नैना ने इन्हीं सबूतों की कॉपी अपने पास रखी थी। वह उन्हें पुलिस तक पहुँचाने वाली थी, लेकिन उससे पहले ही उसकी हत्या कर दी गई।
दो दिन बाद रोहन नैना के घर पहुँचा। शहर के एक पुराने मोहल्ले में उसकी बूढ़ी माँ अकेली रहती थीं। उन्होंने रोहन को देखते ही पूछा, "बेटा... क्या मेरी बेटी के मामले में कोई नई बात हुई है?" रोहन ने पूरी घटना बता दी। बूढ़ी माँ की आँखों से आँसू बहने लगे। उन्होंने काँपते हाथों से एक पुराना फोटो एल्बम निकाला। उसमें नैना की कई तस्वीरें थीं। आख़िरी तस्वीर देखते ही रोहन का दिल ज़ोर से धड़क उठा।
वही चेहरा...
वही मुस्कान...
यही वह लड़की थी जिसकी आवाज़ वह चार रातों से सुन रहा था।
तभी बूढ़ी माँ ने एक पुराना मोबाइल रोहन के हाथ में दिया और बोलीं, "यह नैना का फोन था। पुलिस ने जाँच के बाद हमें लौटा दिया था। तब से यह कभी चालू नहीं हुआ।"
रोहन ने जिज्ञासा में पावर बटन दबाया।
अचानक...
मोबाइल अपने-आप ऑन हो गया।
स्क्रीन पर केवल एक संदेश उभरा
"Thank You..."
और अगले ही पल मोबाइल हमेशा के लिए बंद हो गया।
रोहन और नैना की माँ एक-दूसरे को देखते रह गए।
कुछ सप्ताह बाद अदालत ने विक्रम को नैना की हत्या, अपहरण, भ्रष्टाचार और हत्या की साज़िश का दोषी मानते हुए आजीवन कारावास की सज़ा सुना दी। पूरे शहर में इस फैसले की चर्चा होने लगी। अख़बारों की सुर्ख़ियाँ थीं—"पाँच साल पुरानी हत्या का राज़ खुला।"
फ़ैसले के बाद रोहन आख़िरी बार उस पुराने रेलवे पुल पर गया। शाम ढल रही थी। नदी का पानी शांत था। उसने पुल के किनारे एक सफ़ेद गुलाब रखा और धीरे से कहा, "अब तुम्हें इंसाफ़ मिल गया, नैना।"
उसी समय ठंडी हवा का एक झोंका आया।
रोहन को ऐसा लगा जैसे किसी ने बहुत हल्के से उसके कंधे पर हाथ रखा हो।
उसने पीछे मुड़कर देखा...
वहाँ कोई नहीं था।
लेकिन दूर पुल के दूसरे छोर पर सफ़ेद कपड़ों में एक लड़की खड़ी दिखाई दी।
वह मुस्कुराई...
धीरे से हाथ हिलाया...
और अगली ही क्षण धुंध में विलीन हो गई।
रोहन की आँखों में आँसू आ गए, लेकिन इस बार उनमें डर नहीं था।
उसने आसमान की ओर देखा और मुस्कुरा दिया।
उस रात के बाद...
घड़ी ने न जाने कितनी बार रात के बारह बजाए...
लेकिन रोहन के मोबाइल पर फिर कभी कोई अनजान कॉल नहीं आई।
क्योंकि कुछ कहानियाँ तब तक अधूरी रहती हैं, जब तक उन्हें न्याय नहीं मिल जाता।
और जिस रात न्याय मिल जाता है...
उसी रात वे आवाज़ें हमेशा के लिए ख़ामोश हो जाती हैं।