हसीन चेहरा- Chapter 3
उस ने. दरवाजा खोला तो निदा खड़ी थी हंसती हुई।
"हैलो भाभी! आप उठ गयीं।"
"भाई शायद सो रहे हैं। आप उन्हें जगा दें मैं आप का नाश्ता लाती हूं।" इतना कह कर निदा दरवाजे से ही पलट गई ,
"अब जगाऊं कैसे?" उसने अहद की तरफ कदम बढ़ाते हुए मन ही मन सोचा !
"सुने आप को निदा बुला रही है। नाश्ते के लिए।" लेकिन वह टस से मस नहीं हुआ। उस ने यही अमल दोबारह
अपनाया मगर नतीजा पहले ही जैसा था ।
'नहीं उठते न उठें मेरी बला से।" और वह वहां से हट गई। तभी निदा दस्तक देकर अन्दर दाखिल हुई।
'अरे भाई! अभी तक उठे नहीं। हैरत है भाभी आप से इतना छोटा सा काम नहीं हुआ।" उस ने छेड़ा।
"मैंने कोशिश की थी मगर यह उठे नहीं। भाई को उठाने का तरीका है अलार्म लगा कर कान के पास रखें नतीजा फौरन सामने आएगा।" और फिर उस ने ऐसा ही किया, अलार्म की तेज आवाज पर उस ने आंख खोली निदा पर नजर पड़ते ही उसे फौरन उस की शरारत समझ में आ गई।
"अब जल्दी से उठें और भाभी को लेकर फटाफट पहुंचें। अम्मी कह रही थीं आप नाश्ता हमारे साथ करेंगे।" वह कहती हुई बाहर निकल गई।
नाश्ते की टेबिल पर सब ही मौजूद थे, वह सबको सलाम करती अहद के बराबर बैठ गई !
नाश्ते में तरह तरह की चीज देख के उसे याद आया कि कितने दिनों से उसे ठीक से कुछ खाया नहीं लेकिन यूं सबके सामने उससे कुछ खाया नहीं जा रहा था इसलिए सिर्फ जूस पिया था उसने !
अरे भाभी आप ने तो कुछ खाया ही नहीं।" निदा ने टोका ।
"वह दरअस्ल मुझे भूक नहीं है
"लगता है बेटी! हमारी शर्मा रही है उस के सुसर ने मुहब्बत से उसे देखा था।
"लो जी! आप भी कमाल करते हैं। शर्म किस बात की। भला उस का अपना घर है। सब उस के अपने हैं
नगीन वेटा! तुम यह और लो शाबाश उस्की सास ने उसकी तरफ डिशेज बढ़ाते हुए कहा
वह उस की सास थीं। अहद इस मुहब्बत के मुज़ाहिरे को देख कर रह गया।
"अम्मां! रहने दे शायद उसका दिल नहीं चाह रहा होगा अहद ने उस के चेहरे पर बेजारी देख कर मां से कहा।
"तुम चुप करो यह मेरा और मेरी बहू का मुआमला है एक ही तो वहू है आखिर ।" उन्होंने मुहब्बत से नगीन को देखा जो कि प्लेट में सिर्फ चम्मच चला रही थी।
"हां जी और इकलौती दुल्हन चाहे देखना भी पसन्द न करे।" अहद ने धीरे से बुदबुदाते हुए कहा तो नगीन ने दांत किचकिचाए थे। कमरे में होती तो अब तक जवाब दे देती मगर यहां सब के सामने । वह अब इतनी बदतमीज भी न थी।
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"मामू! आन्टी कितनी प्यारी है।" यह अरसलान था, उस की बड़ी नन्द का लड़का जो कि अपने मामू के साथ बैड पर बैठा कार्टून नेटवर्क देख रहा था।
कार्टून खत्म हो चुके थे। अरसलान जा चुका था। वह उठ कर उस के बरावर जा बैठा। वह नागवारी से परे खिसक गई।
"तुम्हारे हाथ बहुत खूबसूरत है। नगीन का हाथ पकड़ते हुए, अहद ने उस की उंगलियों को छुआ तो वह कांप कर रह गई।
"मुझे घबराहट सी हो रही है। खड़े होते हुए उस ने कहा। जब कि अहद उस में यह नहीं पूछ सका कि वह जैसे ही उस के पास बैठता है उसे घबराहट क्यों होने लगती है। चन्द लम्हे वह उसे देखता रहा फिर एक झटके से बाहर निकल गया।
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"अम्मा! नगीन वहुत चुप चुप सी रहती है।" कहीं कुछ बात तों नहीं है उस की बड़ी नन्द समीना ने कहा।
"लो भला अभी एक हफ्ता हुआ है शादी को अव पटर पटर बोलती क्या अच्छी लगेगी नगीन की सास ने जवाब दिया ।
"मेरा मतलब यह नहीं था। अम्मा आप ने गौर नहीं किया। वह अहद से भी इतनी बात नहीं करती, न कोई दुल्हन वाली शर्मीली मुस्कान उन्होंने मां को समझाया ।
"अरे तुम यूं ही फिक्र मन्द हो रही हो। कुछ लड़कियां होती हैं ऐसी। नया माहौल नये लागे आहिस्ता आहिस्ता एडजस्ट करती हैं। वह भी ऐसी ही है इस लिए तुम्हें ऐसा लगता है।"
"आप समझ नहीं रही हैं मै यह कहना चाह रही थी !
जैसे वो इस रिश्ते से खुश नहीं है !
अम्मा ने चौंक कर उसे देखा था ...
देखें ना हर वक़्त कमरे में बन्द रहना। चुप चुप और उदास रहना इस से तो यही बात ज़ाहिर होती है।" अम्मां खामोश थीं ऐसे जैसे गहरी सोच में हों।
"अम्मां! आप परीशान न हों। हो सकता है मुझे गलत फहमी हुई हो और वैसे ही हो जैसे आप कह रही हैं।" अम्मां को परीशान देख कर समीना ने उन्हें तसल्ली दी।
"अब यह निदा पता नहीं कहां है अभी पैकिंग भी करनी है और वह है कि कोई फिक्र ही नहीं। इन लोगों को आज वापस जाना था सो वह अभी से सामान इकटठा कर के रख रही थीं। बोलते हुए उन्होंने चोर निगाहों से मां को देखा वह अभी तक कुछ सोच रही थीं।
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उस की दोनों नन्दें शाम को जा चुकी थीं। उन के जाने के बाद खामोशी सी छा गई थी। वह सुबह उठीं तो अहद नहीं था उसे आज आफिस जाना था। यह उस ने रात ही बता दिया था। उस ने घड़ी की तरफ देखा जहां घड़ी दस बजा रही थी वह हड़बड़ा कर उठी।"हाए आज इतनी देर सोती रही।" वह बेड से उठते हुए बोली !
मुन्ह धो कर वह बाहर आई तो सामने कुर्सी पर सुसर को बैठे देख कर उस ने दुपट्टा सर पर डाला सलाम कर के वह उन के पास ही बैठ गई। तभी उस की सास सामने से आती दिखाई दीं।"अरे बेटा! उठ गयीं मैंने गफूरा को भेजा था तुम्हें नाश्ते पर बुलाने के लिए उस ने बताया तुम सो रही हो तो मैंने मना करदिया जगाने को।" उन के इस तरह कहने से उसे अम्मी याद आई थीं। उस की आंखें भर आई।"अरे क्या हुआ बेटा?" उस को रोता देख कर वह उस के पास आई। उन्होंने उसे साथ लगा लिया।
उन्हें तशवीश हुई बेटी के खदशात उन्हें याद आए।"तो क्या वह वाकई खुश नहीं है?""
To be continued __