Red Rose - Chapter 3
बारिश लगातार बरस रही थी। मुंबई की रात अब और भी गहरी हो चुकी थी। समुद्र की तरफ से उठने वाली ठंडी हवा ने कमरे की खिड़कियों पर नमी की एक धुंधली परत चढ़ा दी थी।
बिस्तर पर बिखरा रेशमी गाउन और तकियों की अस्त-व्यस्त हालत बहुत कुछ बयां कर रही थी। हवा में अब भी वाइन और चाहत की एक मिली-जुली खुमारी तैर रही थी।
सेलेना आईने के सामने खड़ी थी। उसके भीगे हुए सुनहरे बाल कंधों से चिपके थे। उसने अपने बदन पर संक्षिप्त की काली शर्ट पहन रखी थी। वह शर्ट उस पर काफी ढीली थी, लेकिन जांघों तक आते-आते उसकी कशिश को और भी ज़्यादा बढ़ा रही थी। शर्ट के ऊपर के दो बटन खुले हुए थे, जिनमें से उसके सीने का उभार साफ़ झलक रहा था।
सेलेना ने आईने में खुद को निहारा और उसके होंठों पर एक हल्की सी मुस्कान तैर गई, "डैम, मैं बिल्कुल उसकी जागीर लग रही हूँ।"
वॉशरूम से गिरते पानी की आवाज़ आ रही थी। संक्षिप्त अब भी अंदर ही था। शायद वह ठंडे पानी से खुद को शांत करने की कोशिश कर रहा था, लेकिन सेलेना जानती थी कि उसका बदन अब भी उसके होंठों और स्पर्श की गर्मी से सुलग रहा होगा।
तभी—
*खट... खट... खट...*
कमरे का दरवाज़ा ज़ोर से बजा।
सेलेना बुरी तरह चौंक गई। उसकी नज़रें पहले खिड़की की ओर उठीं और फिर दरवाज़े पर टिक गईं। बारिश के तेज़ शोर के बीच वह खटखटाहट और भी ज़ोरदार लग रही थी।
सेलेना ने घबराते हुए धीरे से पूछा, "कौन है वहाँ?"
सेलेना दरवाज़े की ओर बढ़ी। उसके हर कदम के साथ शर्ट उसके घुटनों से ऊपर झूल रही थी। उसने हल्का सा दरवाज़ा खोला। सामने एक आदमी खड़ा था— पूरी तरह से भीगा हुआ, सख़्त चेहरे वाला। उसके हाथ में टॉर्च और पुलिस का आईडी कार्ड चमक रहा था।
"कबीर रॉय, पुलिस," उसकी भारी आवाज़ गूँजी।
सेलेना की साँसें जैसे गले में ही अटक गईं। "पुलिस?"
कबीर की नज़रें बेहद तेज़ थीं। उसने सेलेना को ऊपर से नीचे तक देखा और फिर कमरे के भीतर झाँका। हवा में फैली वह मादक महक और बिस्तर की हालत ने बिना कुछ कहे ही सब कुछ बयां कर दिया था।
"क्या आप सेलेना विलियम्स हैं?" कबीर ने सीधा सवाल दागा।
"हाँ, मैं ही हूँ। लेकिन इतनी रात गए आप यहाँ क्या कर रहे हैं?" सेलेना ने पलटकर पूछा।
कबीर की आवाज़ और भी सख़्त हो गई। "एक और लाश मिली है... बिल्कुल उसी तरीके से। लाल रिबन... और मैंने वह लाश अभी नीचे सड़क के किनारे देखी है। ठीक इसी अपार्टमेंट के नीचे।"
यह सुनते ही सेलेना के चेहरे का रंग उड़ गया। उसने घबराहट में दरवाज़े को और कसकर पकड़ लिया। "नहीं... ऐसा नहीं हो सकता।"
कबीर आगे बढ़ा और बिना इजाज़त कमरे में दाखिल हो गया। उसके भीगे हुए जूतों से फर्श पर कीचड़ के निशान छप रहे थे। उसने एक ही नज़र में पूरे कमरे का मुआयना कर लिया। आधा भरा वाइन का गिलास, फर्श पर बिखरा रेशमी गाउन, बिस्तर की सिकुड़न, और सेलेना के बदन पर झूलती वह ढीली शर्ट।
कबीर की आँखें थोड़ी सिकुड़ गईं। "तुम यहाँ अकेली नहीं हो।"
सेलेना ने घबराहट में अपने होंठ चबाए। "इससे आपका कोई लेना-देना नहीं है।"
कबीर ने उसके एक कदम और करीब आकर कहा, "मेरा लेना-देना है, मिस विलियम्स। क्योंकि हर बार एक हत्या होती है... और किसी न किसी तरह तुम उस पूरी कहानी के बीचों-बीच नज़र आती हो।"
वॉशरूम से पानी गिरने की आवाज़ अब बंद हो चुकी थी। अंदर से किसी के चलने की हल्की सी आहट आई। सेलेना का दिल ज़ोरों से धड़कने लगा। अगर इसी वक़्त संक्षिप्त बाहर आ गया तो...
कबीर ने उसकी आँखों में गहराई से झाँकते हुए पूछा, "तुम डर रही हो... किससे?"
सेलेना ने अपना चेहरा घुमा लिया और खुद को सामान्य दिखाने के लिए वाइन का गिलास उठाने का नाटक करने लगी। उसके हाथ बुरी तरह काँप रहे थे। उसने बस इतना कहा, "मैं किसी से नहीं डरती। न तुमसे, और न ही किसी और से।"
कबीर ने अचानक आगे बढ़कर उसकी कलाई पकड़ ली। उसकी पकड़ बेहद सख़्त थी। "मुझसे झूठ मत बोलो। तुम्हारी साँसें, तुम्हारी आँखें सब सच बयां कर रही हैं। तुम यकीनन कुछ छुपा रही हो।"
दर्द और डर से सेलेना की आँखें भर आईं, लेकिन उसने उसी ज़िद्दी अंदाज़ में कहा, "छोड़ो मुझे।"
कबीर थोड़ा झुका और फुसफुसाते हुए बोला, "तब तक नहीं, जब तक मुझे सच नहीं मिल जाता।"
और ठीक उसी वक़्त— वॉशरूम का दरवाज़ा खुला।
संक्षिप्त बाहर आया। उसके बाल अभी भी भीगे थे और वह तौलिये से अपना चेहरा पोंछ रहा था। उसकी नज़र सीधे कबीर पर पड़ी। दोनों की आँखें आपस में टकराईं।
सेलेना का दिल जैसे एक पल के लिए धड़कना ही भूल गया। कमरे में मौत जैसा सन्नाटा छा गया।
कबीर ने धीमी लेकिन चुभती हुई आवाज़ में कहा, "मुझे पता था। तुम अकेली नहीं हो।"
संक्षिप्त ने तौलिया एक तरफ फेंका और सीधे कबीर की ओर बढ़ा। उसकी आँखों में वही खूंखार तेवर था, जो अमूमन पुलिस और किसी अपराधी के बीच नज़र आता है। "तुम यहाँ क्या कर रहे हो, इंस्पेक्टर?"
कबीर भी तनकर खड़ा हो गया। "अपना काम कर रहा हूँ। एक और कत्ल हुआ है... ठीक इसी इमारत के बाहर। और अंदाज़ा लगाओ क्या? उसकी गर्दन पर भी वही लाल रिबन बंधा हुआ है।"
यह सुनते ही सेलेना के हाथ से वाइन का गिलास छूट गया और फर्श पर गिरकर चकनाचूर हो गया।
अब उस कमरे में सिर्फ़ बाहर गिरती बारिश का शोर, टूटे हुए काँच की खनक और उन तीनों की भारी साँसें गूँज रही थीं।
संक्षिप्त की नज़र जैसे ही उस नज़ारे पर पड़ी— कबीर रॉय की मज़बूत उँगलियाँ सेलेना की नाज़ुक कलाई को जकड़े हुए थीं— उसकी साँसें गुस्से से भारी हो गईं।
संक्षिप्त के चेहरे पर गुस्सा साफ़ झलक रहा था। उसकी आँखों में एक ऐसी आग थी, जो किसी को भी पल भर में राख कर दे। उसने बिना एक शब्द कहे झटके से सेलेना को कबीर की पकड़ से छुड़ाया और अपनी ओर खींच लिया।
सेलेना का हल्का-सा शरीर सीधा उसके चौड़े सीने से आकर टकराया। उसका संतुलन बिगड़ा, और गिरने से बचने के लिए उसने अनजाने में ही संक्षिप्त की शर्ट को कसकर पकड़ लिया।
"बेडरूम में जाओ," संक्षिप्त की आवाज़ बेहद गहरी और सख़्त थी।
सेलेना ने सहमकर उसकी आँखों में देखा। वहाँ उसे बचाने का हक़ और बेतहाशा गुस्सा, दोनों नज़र आ रहे थे। उसके होंठ काँपे, "लेकिन..."
संक्षिप्त ने उसका चेहरा अपने हाथों में पकड़ा और सीधा अपनी आँखों के सामने कर लिया। "मैंने कहा अंदर जाओ, सेलेना। इसी वक़्त।"
सेलेना की हालत वैसे भी ठीक नहीं थी। अभी कुछ ही देर पहले उसका पूरा वजूद संक्षिप्त के जुनून में डूबा हुआ था। उसकी साँसें अब भी भारी थीं, उसके होंठ अब भी लाल थे। उसकी टाँगें काँप रही थीं। वह धीरे से सिर झुकाकर बेडरूम की ओर बढ़ गई।
कबीर की नज़रें इस पूरे घटनाक्रम के दौरान सिर्फ़ संक्षिप्त पर जमी रहीं। उसकी आँखों में गहरा शक और गुस्सा, दोनों उबल रहे थे।
"तो यहाँ ये सब चल रहा है?" कबीर ने धीमी लेकिन बेहद कड़क आवाज़ में ताना मारा।
संक्षिप्त ने उसकी ओर मुड़कर तीखी नज़र से देखा। "तुम्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए। तुम्हारा काम बाहर पड़ी लाश की तहकीकात करना है, मेरे बेडरूम में झाँकना नहीं।"
कबीर हल्के से मुस्कराया, लेकिन उसकी उस मुस्कान में एक तीखा तंज छिपा था। "दिलचस्प है। कत्ल नीचे हुआ है, और ऊपर तुम दोनों... मज़े ले रहे हो।"
संक्षिप्त की मुट्ठियाँ कस गईं। वह एक ही झटके में कबीर के बिल्कुल करीब आ गया, इतना करीब कि दोनों की साँसें टकराने लगीं। "अपनी ज़ुबान पर लगाम रखो, इंस्पेक्टर। मेरे सब्र का इम्तिहान मत लो।"
कबीर ने निडर होकर उसकी आँखों में सीधा झाँकते हुए कहा, "क्यों नहीं? हर केस में इस लड़की का नाम आता है। हर बार इसके आस-पास कुछ न कुछ सुराग मिलता है। और अब... तुम भी इसी के साथ यहाँ मौजूद हो। कुछ समझाना चाहोगे?"
संक्षिप्त ने एक गहरी साँस ली। उसकी नज़र बेडरूम में बिस्तर की तरफ़ गई, जहाँ सेलेना घुटनों से लगकर चादर में लिपटी बैठी थी। उसका शरीर अब भी बेचैन था, और उसकी आँखों में डर के साथ-साथ गहरी थकान साफ़ दिखाई दे रही थी।
संक्षिप्त ने बेडरूम का दरवाज़ा बाहर से बंद कर दिया और कबीर का सामना करने के लिए हॉल की तरफ़ बढ़ गया।