टोना टोटका भाग-3
अब घबराते हुए जल्दी से बाहर आकर देखा तो सब कुछ शांत था। तो फिर यह आवाज कैसी थी? यह सोचकर अपनी सासू मां के कमरे में गई, तो वह भी किसी से बातें कर रही थी। मुझे देखकर बोली, "क्या हुआ बेटा?" तो मैं बोली, "अभी मैंने किसी के चिल्लाने की आवाज सुनी थी।" यह सुनकर वह बोली, "नहीं, ऐसा तो कुछ नहीं है। शायद बगल वाले फ्लैट में से आवाज आई होगी। उनके दोनों पति-पत्नी के हमेशा लड़ाई-झगड़ा होता रहता है।" यह सुनकर मैं बोली, "हां, यह हो सकता है।"
और फिर वीर के कमरे की तरफ गई, लेकिन वीर अपने कमरे में नहीं था। अब वीर को अपने कमरे में न देखकर मैं बहुत ज्यादा परेशान हो गई थी। उसे इधर-उधर ढूंढने लगी, लेकिन वह कहीं भी मुझे दिखाई नहीं दिया। तो मैं हमारे फ्लैट के ऊपर ही हमारी ही छत थी, क्योंकि हमने टॉप फ्लोर वाला फ्लैट ले रखा था, वहां पर गई, तो मैं हैरान रह गई। वीर जो लोहे की रेलिंग थी, ना उस पर अजीब तरीके से अपने पैर लटका कर आधा छत के इस तरफ लटक रहा था, तो आधा इधर की साइड लटक रहा था। यह देखकर मैं हड़बड़ा आते हुए घबराते हुए बोली, "वीर, यह कर...।" उसका हाथ पकड़ कर उसे खींच लिया। उस वक्त मैं बहुत ज्यादा डर गई थी कि अगर गलती से वीर इधर गिर जाता, तो क्या होता? यह सोचकर ही घबराते हुए मेरे दिल की धड़कन बढ़ रही थी।
तभी खड़े होकर वीर मेरी तरफ अजीब तरीके से देखकर मुस्कुराने लगा और फिर अजीब सी भयानक सी भाषा में बोला, "क्यों आई हो यहां?" यह सुनकर मैं कुछ बोलती, लेकिन फिर घबराते हुए वीर की तरफ देखने लगी, क्योंकि उस वक्त यह वीर की आवाज नहीं थी। ऐसा लग रहा था जैसे किसी आदमी और औरत की मिली-जुली आवाज हो।
अब मैं वीर का हाथ पकड़ कर बोली, "चलो यहां से," यह कहकर उसे खींचने लगी। तो मैंने अपनी पूरी ताकत लगा दी, लेकिन वीर अपनी जगह पर से एक कदम भी नहीं हिला था। यह देखकर मैं काफी ज्यादा हैरान रह गई कि ऐसा कैसे हो सकता है? तभी वह जोर-जोर से हंसने लगा। उस वक्त उसकी हंसी काफी ज्यादा डरावनी लग रही थी, जिसे सुनकर घबराते हुए मैं बस उसकी तरफ देखते ही जा रही थी, कुछ बोल नहीं पा रही थी।
तभी वह फिर अजीब तरीके से गुस्से में मुझे घूरने लगा और बिना कुछ बोले नीचे चला गया। तो मैं भी उसके पीछे भागते हुए नीचे चली गई थी। उस वक्त मैंने उससे बात करने की बहुत कोशिश की, लेकिन गेस्ट रूम में जाकर उसने दरवाजा अंदर से बंद कर दिया था। अब काफी दरवाजा खटखटाने पर भी उसने दरवाजा नहीं खोला, तो मैं आवाज लगाते हुए उसे दरवाजा खोलने के लिए बोलने लगी। क्योंकि मुझे लग रहा था कि उसकी तबीयत कुछ ज्यादा ही खराब है। तभी मेरी आवाज सुनकर मेरी सासू मां आई और बोली, "क्या हुआ बेटा?" तो मैंने घबराते हुए उन्हें सारी बात बताई।
उस वक्त भी मेरी बातें सुनकर वह परेशान होते हुए बोली, "मुझे तो कुछ ठीक नहीं लगता। कुछ तो अजीब है बेटा, मेरी बात मानो। इस पर किसी बुरी शक्ति का असर है। मैंने अभी अपनी ही एक सहेली से बातें की हैं, वह यही दिल्ली में किसी तांत्रिक के बारे में बता रही थी। हम लोग इसे वहां पर ले चलते हैं।" यह सुनकर मैं बोली, "नहीं मम्मी जी, ऐसी बात नहीं है। ऐसा कुछ नहीं होता। यह सब कुछ किसी टेंशन की वजह से है। काफी बार इंसान जब ज्यादा टेंशन में होता है, तो उसका दिमागी संतुलन गड़बड़ा जाता है, जिसकी वजह से वह ऐसी हरकतें करता है।" उस वक्त भी मैंने अपनी सासू मां की बात पर यकीन नहीं किया।
फिर मैं अपने कमरे में आकर इसी बारे में सोचते हुए रोने लग गई थी कि आखिर हमारे हंसती-खेलती जिंदगी को किसकी बुरी नजर लग गई। यही सोचते जा रही थी कि तभी ऐसा लगा जैसे किसी ने अचानक मेरा गला पकड़ लिया हो। यह देखकर घबराते हुए मैं चारों तरफ देखने लगी, लेकिन मुझे कुछ भी नजर नहीं आया। पर मुझे महसूस हो रहा था कि किसी ने मेरा गला पकड़ा था। ऐसे में मैं कुछ भी समझ नहीं पाई, शायद मन का भ्रम होगा। यही सब सोचते हुए फिर आंखें बंद करके सोने की कोशिश करने लगी। कुछ ही देर में मुझे नींद भी आ गई थी।
आधी रात के वक्त मेरी नींद खुल गई थी। मैंने पानी पिया, पता नहीं क्यों लेकिन मुझे वीर की बहुत ज्यादा चिंता हो रही थी। जिस तरह वह छत पर रेलिंग से लटका हुआ था, ना यह देखकर कहीं वह अपने आप को कोई चोट ना पहुंचा ले। मैं उठकर उसके कमरे की तरफ गई, तो मुझे उसके कमरे के अंदर से अजीब सी आवाज आ रही थी, जैसे कुछ लोग बातें कर रहे हैं। समझ में तो नहीं आ रहा था कि क्या बातें कर रहे हैं, लेकिन बस आवाज सुनाई दे रही थी। तो ऐसे में हैरान रह गई कि वीर आखिर किससे बातें कर रहा है? शायद फोन पर किसी से बातें कर रहा होगा, लेकिन इतनी रात को फोन पर किससे बातें कर रहा है? यह सोचकर मैंने पास में ही जो उसके कमरे की खिड़की थी, उसके पास जाकर सुनने की कोशिश की। लेकिन आवाज सुनाई दे रही थी, बस समझ में नहीं आ रही थी। तो फिर मैंने धीरे से अपनी उंगली से उस खिड़की को खोलने की कोशिश की, वह अंदर से लॉक नहीं थी, तो थोड़ा खुल गई थी। अब मैंने अंदर झांककर देखा तो वीर गहरी नींद में सो रहा था और उसके कमरे में कोई नहीं था। तो फिर यह आवाज कैसी? यह सोचकर ही मैं हैरान रह गई।
अब कुछ भी समझ में ना आया तो मैं उसके कमरे का दरवाजा खोलने की कोशिश करने लगी, लेकिन वह अंदर से लॉक था। ऐसे में एक बार मन किया कि वीर को आवाज दूं, परंतु वह फिर से गुस्सा करेगा, इसलिए आवाज नहीं दी। वैसे अब कोई आवाज मुझे सुनाई नहीं दे रही थी। यह देखकर कहीं यह बगल वाली फ्लैट की आवाज तो नहीं थी? नहीं, नहीं, मैंने तो वीर के कमरे में से आवाज सुनी थी, मुझे अच्छे से पता है। यह सोचते हुए समझ में नहीं आ रहा था, दिमाग में काफी बातें आ रही थीं कि आखिर यह हो क्या रहा है? मैं वापस अपने कमरे में आ गई।
अभी मैं अपने कमरे का दरवाजा अंदर से लॉक करने ही वाली थी कि तभी मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे कमरे के पास में बाहर की तरफ कोई दीवार के पास में खड़ा चुपके से मुझे घूरते हुए देख रहा है, क्योंकि उसकी लाल चमकती हुई आंखें मुझे दिखाई दी थीं और एक पल में ही ना जाने कहां गायब हो गईं। तो घबराते हुए मैंने बाहर निकल कर देखा, लेकिन अब कोई नजर नहीं आ रहा था। शायद ऐसे ही भ्रम हुआ है, क्योंकि उस वक्त मैं वीर को लेकर इतनी ज्यादा परेशान थी कि जो कुछ मेरे साथ हो रहा था, ना उन्हें देखकर मैं यही समझ रही थी कि शायद मैं टेंशन में हूं, इस वजह से मुझे ऐसे भ्रम हो रहे हैं और कुछ नहीं। ऐसी बातें सोचकर फिर अंदर से दरवाजा लॉक किया और अपने बेड पर जाकर सोने के लिए लेट गई थी। उस वक्त सारी बातें सोचकर बहुत ज्यादा तकलीफ हो रही थी। मैंने सोच लिया था कि चाहे जो हो, मैं वीर को किसी साइकोलॉजिस्ट को दिखाऊंगी, तो फिर सब कुछ ठीक हो जाएगा। यह सोचकर अपने आप को तसल्ली देते हुए मैं सोने की कोशिश करने लगी और मुझे नींद आ गई। अभी सोए हुए कुछ वक्त हुआ था कि फिर से मुझे अपने कानों में किसी बच्चे के हंसने की आवाज सुनाई देने लगी। तो घबराते हुए आंखें खोलकर देखा, तो कोई नहीं था। अब मैंने फिर से आंखें बंद कर लीं और कुछ ही देर में मुझे नींद आ गई। धीरे-धीरे इसी तरह रात गुजर गई थी।
अगले दिन मैं वीर से बड़े ही प्यार से बातें करने लगी, लेकिन उसने गुस्से में मेरी तरफ देखा और गुस्से में चिल्लाते हुए बोला, "मुझे डिवोर्स चाहिए, जितनी जल्दी हो सके मुझे डिवोर्स चाहिए।" यह कहते हुए बाहर निकल गया। मैंने उसे रोकने की बहुत कोशिश की, क्योंकि आज मैं उसे साइकोलॉजिस्ट के पास ले जाना चाहती थी, लेकिन उसने मेरी बात तक नहीं सुनी। अब मैं बहुत ज्यादा परेशान हो गई थी।
उस दिन मैं अपने ऑफिस चली गई। वहां जाकर पता चला कि आज तो वीर ऑफिस आया ही नहीं है। अब यह देखकर मैं बहुत ज्यादा परेशान हो गई कि उसकी तबीयत तो पहले ही ठीक नहीं है, तो फिर आखिर वह कहां चला गया? जब मैंने उसके दोस्त से इस बारे में बातें की, तो अनिकेत भी परेशान था। वीर के बारे में कुछ नहीं पता था।
तभी मुझे मेरी एक फ्रेंड का कॉल आया, जो मेरे स्कूल फ्रेंड थी और मेरी शादी में भी आई हुई थी। उसने हमारी शादी में वीर को देख लिया था, इसलिए वह वीर को पहचान सकती थी। उसने बताया कि वीर किसी लड़की के साथ किसी गार्डन में बैठा हुआ है। यह सुनकर मैं काफी हैरान रह गई और जैसे ही मेरी फ्रेंड ने पता बताया, मैं वहां पर चली गई। वीर किसी लड़की के साथ में था। वह लड़की कौन थी, मैं नहीं जानती थी, लेकिन वीर को उसके साथ देखकर मैं गुस्से में तिलमिला उठी।
वैसे पहले तो मैं सोच रही थी कि वह वीर की कोई फ्रेंड होगी, लेकिन जिस तरह वीर उसके साथ गले में हाथ डालकर बैठा हुआ था, वे दोनों खुलेआम जिस तरह की हरकत कर रहे थे, उसे देखकर तो मेरा गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। ऐसे में मैं वीर के पास गई और गुस्से में चिल्लाते हुए बोली, "इसलिए तुम मुझसे डिवोर्स लेना चाहते थे ना? अगर तुम्हें इस लड़की के साथ रहना था, तो फिर मुझसे शादी कर क्यों की? जो मेरे साथ प्यार का झूठा नाटक किया।" यह कहते हुए मैं उसे भला-बुरा कहने लगी।
तो मेरी बात सुनकर अपनी गलती मानने की बजाय वीर अजीब तरीके से मेरी तरफ मुस्कुराते हुए देखने लगा। हुआ वह लड़की भी इसी तरह मुस्कुराते हुए देख रही थी। यह देखकर मुझे बहुत ज्यादा गुस्सा आया और मैं गुस्से में घर पर चली आई। मुझे इतनी ज्यादा परेशान देखकर मेरी सासू मां ने पूछा कि क्या हुआ, तो मैंने रोते हुए गुस्से में सारी बातें बता दीं।
अब यह सुनकर वह भी परेशान हो गई और बोली, "मेरा वीर ऐसा नहीं है।" यह सुनकर मैं गुस्से में बोली, "पहले मुझे भी ऐसा ही लगता था, लेकिन मैं खुद देखकर आई हूं।" तो फिर वह बोली, "बेटा, वह लड़की देखने कैसी थी? जिससे पता चले कि वह कौन थी?" लेकिन मैं तो गुस्से में कुछ बताना ही नहीं चाहती थी और तुरंत ही अपना सामान पैक करके मायके जाने के लिए निकल गई थी।