A Blank Book ,Attempt:07 - Chapter 2
Part:2 A Wrong Turn
(पुलिस वैन)
इंस्पेक्टर का फोन रिंग होता है…
“हैलो क्या तुमने उस किताब के पेज को ट्रांसलेट करने के लिए भेजा?” वो कॉल पर पूछते है।
“यस सर लेकिन अभी तक कोई अपडेट नहीं आया है…” कॉल पर आदमी कहता है।
“और..उस किताब की सारी हिस्ट्री निकलो और अगर कही पर कॉपी हो तो उसे भी ढूंढो हमे सुबह तक किसी भी हालत में कला जी के बारे में पता लगाना ही है” वो कहते है।
“यस सर…. सर हमे कला जी कॉल लॉग्स एक और बात पता चली है”
“कौनसी?”
“सर एक नंबर के बीच इनके काफी बातचीत होती थी…”
“वो नंबर किसका है?”
“सनलाइट कंपनी के ऑनर शशांक मेहरा..” उधर से धीरे से हवलदार कहता है।
“उन दोनों के मोबाइल लोकेशन्स काफी बार होटल्स में मिले है…मुझे लगता है सर जरूर एक्स्ट्रा मारियटल अफेयर का मामला है…” वो कहता है।
“ok सावंत थैंक्स…” इंस्पेक्टर कॉल रख देता है…और ड्राइवर पुलिस से कहता है “तुम्हे बिजनेस मैन शशांक मेहरा का घर मालूम है?”
“जी सिर..”
“तो लेलो वोही पर”
(चाय की दुकान)
अमर अपने पॉकेट से एक सिगरेट निकलता है और दूर कोने में सिगरेट पीनें लगता है..
तभी वहां शशि आता है…और अमर उसे भी सिगरेट ऑफर करता है..
शशि एक सिगरेट लेता है और उसे लाइटर से जलाता है….
“यहां से अभी कितना वक्त लगेगा?” अमर शशि से पूछता है।
“यहां से भी करीब 1.5 घंटे का रास्ता है..लेकिन बारिश है तो शायद ज्यादा भी लगे..”शशि कहता है।
“आप लोग कहा पर जा रहे है आगे?” अमर पूछता है|
“मेरा होमटाउन ही है आगे…जैसे ही हम पहाड़ों से नीचे उतरेंगे वैसे ही…” शशि सिगरेट पीते हुए कहता है।
“आप..कहा पर जा रहे है?” वो आगे अमर से पूछता है|
अमर थोड़ा रूकता है और फिर कहने लगता है “हम अपने बच्चों को बोर्डिंग स्कूल में डालने जा रहे है..”
“लेकिन आपका बेटा ओ बहुत छोटा है..वो आप लोगों के बिना रह पाएगा?”
“उसे अब आदत डालनी पड़ेगी..क्योंकि हम दोनों इसके बाद…(वो फिर रुका)..अलग होने वाले है तो..यह आखिरीबार है कि हम दोनों साथ में है..”
“ओह ई एम सॉरी..” शशि कहता है।
“बच्चों के सामने यह सब तमाशा न हो इसीलिए हम उन्हें बोर्डिंग स्कूल रखने वाले है..फिर आगे का फैसला तो कोर्ट का रहेगा” अमर अपनी सिगरेट नीचे जमीन पर फेंक कर उसे कुचलते हुए कहता है।
रघु और श्याम दोनों ही उस कम हवा वाले पहिए बदलने की कवायत कर रहे थे..लेकिन बारिश के कारण उन्हें बहुत ज्यादा मुश्किल हो रही थी…
“श्याम जैक तो बहुत जैम हो चुका है…यह तो घूम ही नहीं रहा है…अंदर से ऑयल का डिब्बा दे मुझे…”
श्याम ऑयल का डिब्बा ढूंढता है…लेकिन उसे सोडा की बॉटल्स दिखते है।
“रघु…ये इतनी सारी सोडा की बॉटल्स क्यों जमा कर रहा है?” श्याम उससे पूछता है।
“अरे उन्हें छुपा दे…”रघु तुरन्त कहता है।
श्याम उन्हें छिपा देता है।
“हमारे गांव की दुकान में में बेच देता हु.. वो इसमें कुछ भी भर के बेच देते है…गांव में किस को क्या पता चलता है” रघु कहता है।
“बारिश ऐसा लग रहा है कि आज सब डूबा ही देगी…” रमा की नानी कहती है|
“नानी..आप को ज्यादा ठंड तो नहीं लग रही ना?” रमा उनसे पूछती है।
“नही..नहीं में ठीक हु..बारिश के कारण थोड़ा सिर दर्द कर रहा है बस..”
“तो नानी..मेरे पास इन सबके किए दवाइयां है मेरे बैग में…वो क्या है न कि खेल के टाइम पर जरूरत पड़ सकती है”
नेहाल उत्साह से कहता है।
“अह..थैंक्स बट नानी के बैग में भी नानी की दवाइयां है..तो उसकी कोई जरूरत नहीं है” रमा कहती है।
“तुझे कहा न उसने की वो खुद डॉक्टर की पढ़ाई कर रही है…तो क्यों बार बार डॉक्टर बन रहा है?” स्वीटी नेहाल को डांट देती है।
(थोड़े समय बाद)
रघु और श्याम ने पहिया बदल दिया था…और बस अब निकलने की तैयारी में ही थी…
लोग अब भी थोड़ा थोड़ा खाने का सामान रस्ते के लिए ले रहे थे..
फिर अब सब लोग वापिस बस में बैठने लगते है…
“रुको…रुको…” वो चाय वाला रघु और श्याम को रोकता है..”
“क्या हुआ चाचा?..किसीने पैसे कम दिए क्या?” रघु पूछता है।
“नहीं…नहीं…यह कह रह था कि आगे रास्ता तो बंद कर है..” वो कहते है।
“क्या?...रास्ता बंद है?” श्याम चौंककर पूछता है|
शशि और अमर भी उनके पास आते है।
“तो अब हम जाए कैसे?” अमर पूछता है।
“जंगल वाला रास्ता अब भी चालू है…” वो बूढ़ा आदमी कहता है।
“हां…पुराना वाला रास्ता..” रघु कहता है।
“हां…वो रास्ता चालू होगा..” शशि भी कहता है।
“वो रास्ता ठीक तो है ना?” अमर चिंता से पूछता है।
“हां…थोड़ा खराब हुआ होगा.लेकिन अब भी वहां से जा सकते है” शशि कहता है।
“हां..जब मैने नौकरी शुरू के थी तो वोही एक रास्ता था…बाद में यह नया रास्ता बन गया..”
तो शशि और रघु पहले उस रस्ते से काफी बार जा चुके थे इसके फैसला लिया जाता है कि जंगल वाले रस्ते से जायेंगे…
बस में सबको इस बारे में बताया जाता है….
“जंगल कौन कौन से जानवर देखने को मिलेंगे?” नेहाल मस्ती में रघु से पूछता है।
रघु उसकी तरफ गुस्से में देखकर ड्राइवर सीट पर बैठ जाता है और गाड़ी फिर से चलने लगती है…
“सही सवाल तो पूछा…उसमें इतना गुस्से में देखने की क्या जरूरत है?” नेहाल कहता है।
“तु कही ले जाने के लायक ही नहीं है..”
“यहां सब लोग टेंशन में है कि कैसे भी करके घाट से निकल जाए..हमारे साथ छोटे बच्चे है..बुजुर्ग है..और तो इस तरह का सवाल पूछ रहा है?” स्वीटी फिर से नेहाल को डांट देती है।
“नेहाल..तुम्हे शायद किसी पागलखाने में होना चाहिए था वहां तुम्हारा इलाज पॉसिबल है..” रमा उससे मस्ती करके कहती है।
“हां…अगर तुम्हारी जैसी डॉक्टर मुझे मिले तो में जरूर अपना इलाज करवा लूंगा..” नेहाल रमा के कान में कहता है।
रमा शर्म से लाल हो गई और उसने हंसते हुए अपना मुंह दूसरी तरफ कर लिया…
नेहाल के चेहरे पर भी एक छोटी सी मुस्कान थी…फिर बाद में दोनों एक दूसरे के तरफ देखकर हंसने लगते है…लेकिन ऐसे की किसीको पता ही नहीं चला…
(शशांक मेहरा का घर)
“हैलो इंस्पेक्टर में इस वक्त आपको यहां पर एक्सपेक्ट नहीं कर रहा था” इंस्पेक्टर को देखकर शशांक कहता है।
“क्या करे सर? एक केस में हमे आपकी मदद चाहिए थी इसीलिए बिना वक्त गवाए हम आप के यहां आगए”
“आप को कुछ…” शशांक को बीच में ही रोकते हुए इंस्पेक्टर कहता है..
“में यहां चाय किसी और दिन पिऊंगा..क्योंकि केस थोड़ा टाइम सेंसिटिव है तो हम सीधा मुद्दे पर आते है..(इंस्पेक्टर कला की फोटो शशांक को दिखता है)...आप कला जी को कितने अच्छे से जानते है?”
शशांक अपने सोफे पर धीरे से बैठ जाता है….और कहने लगता है.. “आप मुझसे अगर कला के बारे में पूछोगे तो में आपसे झूठ नहीं बोलूंगा…(वो एक सांस लेता है)..में और कला रिलेशन में है…”
“कब से?” इंस्पेक्टर तुरंत पूछता है..
“करीब ढाई साल से..” शशांक कहता है|
“क्या कला जी के हसबैंड ये बात जानते है?” इंस्पेक्टर फिर पूछता है।
“हां…अली हमारे बारे में सब जनता है”
“तो उन्होंने कुछ रिएक्ट नहीं किया?”
“नहीं…कला को हमेशा ही अपने बच्चे की चाहत है लेकिन अली में कुछ कॉम्प्लिकेशन होने की वजह से वो कभी मां नहीं बन पाई, इससे उनका रिश्ता कभी ठीक हो ही नहीं पाया…इसीलिए कला अली को डाइवोर्स देने वाली थी और फिर में और कला शादी करने वाले है…” शशांक कहता है।
इंस्पेक्टर भी सोफे पर बैठ जाता है और..फिर से शंशाक से पूछता है “ तो ऐसा तो नहीं कि अली ने कला जी को खत्म कर दिया और जानबूझ कर उनकी मिसिंग कंपलेंट लिखवाई हो?”
“नहीं..नहीं..अली कला से आज भी उतना ही प्यार करता है…कला की खुशी के लिए ही वो उसे खुशी खुशी डाइवोर्स दे सकता है ताकि वो अपनी जिंदगी में खुश रहे…” शशांक कहता है।
“तो वो आखिरकार गई कहा?..आपको इसके बारे में कुछ पता है?” इंस्पेक्टर पूछते है।
“मेरी लास्ट वीक ही उससे बात की थी…तबसे उसका कोई कांटैक्ट नहीं हुआ है..मैने भी अपने तरीके से बहुत कोशिश की थी लेकिन कुछ नहीं पता चला है…” शशांक कहता है।
Blank Book की फोटो दिखाते हुए इंस्पेक्टर उससे पूछता है “क्या उन्होंने कभी इस किताब के बारे में कुछ बताया था?”
शशांक ध्यान से देखकर कहता है…”नहीं..नहीं..कभी नहीं..”
(बस में)
बस अब उस मोड पर खड़ी थी जहां से दो रस्ते एक नया और एक पुराना अलग होता था…
“श्याम..यही वो रास्ता है…पुराने वाला..” रघु कहता है।
वहां पर आगे ही एक पुराना बोर्ड लगा हुआ था…जो कि जंगली जानवर से सावधान रहने को कह रह था….
“यह रास्ता बहुत खराब लग रहा है…..”स्वीटी कहती है।
बस धीरे धीरे पुराने वाले रस्ते से आगे बढ़ने लगती है…
कुछ खाने के बाद सबकी आँखें भारी होने लगीं…बस की लाइट जो कबसे चालू थी वो भी अब बंद कर दी गई थी…
अब ड्राइवर और कंडक्टर के अलावा सब सो रहे थे…जैसे जैसे रास्ता थोड़ा ठीक होता रघु बस की रफ्तार बढ़ा लेता…वो भी इस घाट से जल्दी से जल्दी उतरकर शहर तक पहुंचना चाहता था।
बारिश वैसे ही हो रही थी जैसे पहले लेकिन जंगल का रास्ता भी बहुत घना था, तुरन्त पता चलता था कि काफी वक्त से इस रस्ते का इस्तेमाल नहीं हुआ है।
पेड़ो ने इस रस्ते को बिलकुल ही ढक दिया था.. वहां इतना अंधेरा था कि बस की हैडलाइट सूरज समान रोशनी कर रही थी।
श्याम और रघु दोनों बातचीत किए जा रहे थे ताकि रघु की कही आंख न लग जाएं।
“ये रास्ता तो बहुत खतरनाक हो गया है…” रघु श्याम से कहता है।
“ हां.. अब इसे तो जंगल के जानवर ही इस्तेमाल करते होंगे” श्याम कहता है।
“अच्छा हुआ हमने पहिया बदल लिया पहले ही…अगर उस वाले से चलते तो गाड़ी कही भी रोकनी पड़ जाती” रघु आगे कहता है।
“अरे शुभ शुभ बोल भाई..; जब तक हम इस रास्ते पर है.. जितना बस के अंदर है उतने ही ठीक है…बाहर पता नहीं कौनसा जानवर भूखा घूम रहा होगा” श्याम इधर उधर देखते हुए कहता है।
“अरे इस जंगल में ज्यादा से ज्यादा तेंदुए होंगे और कोई बड़ा जानवर नहीं है इस जंगल में..” रघु श्याम की तरफ देखकर कहता है।
लेकिन तभी ही रास्ते से तेजी से दौड़ती किसी चीज से बस जोर से टकरा जाती है…रघु और श्याम को काली काली कोई तो चीज दिखती है जोकि अचानक ही बस के एकदम सामने आ गई।
बस फिरसे झटके से रुकी थी…इस बार भी पहले की तरह सब लोग एकदम से उठे…
“ अरे क्या फिर से भैंस आ गई क्या?” नेहाल गुस्से में पीछे से चिल्लाया।
इस बार भी उसी तरह की अफरा तफरी हो गई।
सब लोग रघु पर चिल्लाने लगते है…लेकिन रघु और श्याम हैडलाइट की उस रोशनी में काला जोगा ओढ़े जमीन पर गिरा हुआ आदमी जैसे आकृति को देख रहे थे।
“रघु.. रघु…हमने किसी इंसान को ठोक दिया क्या?” श्याम डरकर पूछता है।
रघु का पसीना इसके माथे पर साफ दिखाई दे रहा था… “प..प.. पता नहीं यार”
पीछे से शशि उनके पास आता है… “आपको गाड़ी…” अचानक उसकी भी नजर बाहर के तरफ गई…उसने भी उस आकृति को देखा।
“ ये तो कोई इंसान है…” वो कहता है।
सब लोग पीछे से पूछने लगते है कि आखिरकार हुआ क्या है?
रघु बड़ी हिम्मत से कहता है “ हो सकता है जिंदा हो…चलो चलो देख लेते है.. चलो जल्दी..” वो ड्राइवर साइड से उतर गया।
शशि और श्याम भी छाता लेकर…पैसेंजर साइड से उतरे…नेहाल भी एक छाता लेकर उनके पीछे पीछे उतरा…बाकी सब लेडीज अंदर से ही सब देख रही थी।
अमर अपने डरे हुए बच्चों को संभाल रहा था।
रघु धीरे धीरे उसके पास जाने लगा…और ये बाकी सब भी धीरे धीरे वहां तक पहुंचते है।
रघु हिम्मत करके उसे ओए पलटता है…और यह एक औरत थी जो काला लिबाज ओढ कर दौड़ती हुई अचानक इनके सामने आ गई थी।
उसके सिर से खून निकल रहा था…वो हिलडुल नहीं रही थी।
“यह तो कोई औरत है…ऐसे मौसम में जंगल में वो भी इस समय?” शशि सबसे अपनी मन का प्रश्न पूछता है।
“ये अचानक ही दौड़ते हुए बस के सामने आ गई…झाड़ियों में बिल्कुल दिखी ही नहीं” रघु डरते हुए अपना पक्ष रखता है।
“ये सिर्फ बेहोश हुई है…इसकी उंगलियों अभी भी हिल रही है” श्याम उसकी उंगलियों की तरफ इशारा करके कहता है।
रघु नीचे बैठकर उसे उठाने की कोशिश करने लगा… “हे..हे उठो…उठो..” वो उसके चेहरे पर हल्के हल्के चांटे मारने लगा ताकी वो होश में आए।
थोड़ी देर कोशिश करने के बाद अचानक ही उस औरत में जान आई, उसने एक लंबी सांस ली….
और उसने उन सब लोगों की तरफ देखा…
“भागो…भागो…” वो जोर जोर से सांस लेकर कहने लगी।
वहां किसी को भी कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वो सबको भागने के लिए क्यों कह रही है?
“आंटी…आप ठीक तो है ना?” नेहाल उनसे पूछता है।
“ भागो बेवकूफों…वो आ रही है…वो हम सबको मार डालेगी…जल्दी भागो यहां से…”वो उठकर बस की तरफ भागने लगती है।
(To be continued)