हृदय की परख Ch. 3

पहला परिच्छेद

Posted by Storymania Classic Hindi • Sep 03, 2026 11:31 AM

रात बड़ी अँधेरी थी। ११ बज चुके थे, बादल गरज रहे थे, बिजली कड़क रही थी, और मूसलधार वर्षा हो रही थी। हाथों हाथ नहीं सूझता था, चारोंं ओर सन्नाटा छा रहा था। लोकनाथसिंह अपने खेत के पासवाले झोंपड़े में चुपचाप बैठा हुआ गुड़गुड़ी पी रहा था। अचानक उसे घोड़े की टाप के शब्द सुनाई दिए। पास ही आले में मिट्टी का एक दिया टिमटिमा रहा था। उसकी बत्ती एक तिनके से उकसाकर, उसने आँखों पर हाथ रखकर अँधेरे में देखा कि ऐसे बुरे वक़्त में कौन घर से बाहर निकला है। थोड़ी देर बाद किसी ने उसका द्वार खटखटाया। लोकनाथ ने बाहर आकर देखा, एक सवार पानी में तर-बतर खड़ा है, और उसके हाथों में एक नवजात बालक है। बालक दो ही चार दिन का होगा। सवार ने बूढ़े से कहा—“महाशय! क्या आप कृपा करके मेरी कुछ सहायता करेंगे? आप देखते हैं, मैं बिलकुल भीग गया—रात भी बहुत बीत गई है; कुछ ऐसी ही घटनाएँ हो गईं, जिससे इस बालक को ऐसे कुअवसर पर बाहर ले आना पड़ा। क्या आपसे कुछ आशा करूँ?”

बूढ़े ने दिए के धुँधले प्रकाश में सवार का मुख ध्यान से देखा। देखकर वह दंग रह गया। वैसा सुंदर मुख राजाओं का भी कम देखा जाता है। उसके सतेज नेत्रों को देखकर ऐसा बोध होता था, मानो दुनिया-भर की बुद्धि उसमें भरी है। बूढ़े ने सोचा, यह पुरुष साधारण नहीं है। फिर उसने कहा—“महाशय! इसे अपना ही झोपड़ा समझिए, उतर आइए, विश्राम करके प्रातःकाल उठ जाइएगा।”

सवार ने गंभीरता से कहा—“मैं इस समय ठहर नहीं सकता। यदि आप सवेरे तक बच्चे को रख सकें, तो बड़ा उपकार हो। सवेरे आकर इसे ले जाऊँगा।”

बूढ़ा राजी हो गया। बच्चे को वहीं छोड़कर सवार उसी आँधी-पानी में गायब हो गया। थोड़ी देर में घोड़े की टाप का सुनाई देना भी बंद हो गया।

100%