Raja aur Ruru Ch. 3

राजा और रूरू 3

Posted by Divya Verma • Sep 06, 2026 10:53 AM

कलिंग की यात्रा

छः दिनों की यात्रा कठिन थी। घने जंगलों को चीरते हुए और उफनती नदियाँ पार करते हुए दुष्यंत का दल आगे बढ़ता रहा। वे भोर में चल पड़ते और रात ढलते ही विश्राम के लिए रुक जाते।

उनके साथ थे उनके सबसे भरोसेमंद सेनापति सुमंत्र और सैनिकों की दो टुकड़ियाँ। वे साधारण दिखते थे, किंतु शाल्व के सबसे घातक योद्धा थे। कुछ चुनिंदा सेवक घोड़ों के पीछे-पीछे सामान लादे चलते।

जब कलिंग की घाटियाँ दिखाई दीं, तो सबकी दृष्टि ठहर गई। हरियाली से ढकी भूमि, नीलकंठ-सी चमकती चट्टानें, और उनके बीच फैला एक स्वप्निल राज्य।

नगर दृष्टि में आते ही साँसें थम-सी गईं। ऊँची दीवारें थीं, झंडे लहरा रहे थे—परंतु कोई डरावनी किलेबंदी नहीं थी। न ही शस्त्र ताने खड़े सैनिक। इसके स्थान पर चौड़ी सड़कें थीं, जिनके दोनों ओर फूलों से लदे वृक्ष। न स्तंभों पर विजय-गाथाएँ उकेरी गई थीं, न व्यापार के मानचित्र।

दुष्यंत ने सब कुछ ध्यान से देखा। उनका मानना था कि जो राज्य हमले का डर न रखे, वह या तो मूर्ख या अति आश्वस्त होता है।

सेनापति सुमंत्र ने कान में कहा, "सावधान रहें महाराज। यह शांति छल हो सकती है।"

दुष्यंत ने केवल सिर हिलाया। किंतु उनकी आँखें और अधिक पैनी हो गईं।

कलिंग का साम्राज्य सचमुच स्वप्नवत था। चारों ओर हरियाली, चमकते जलकुंड, बारीक कारीगरी से बने भवन, शांत गलियाँ और समृद्ध बाज़ार। यहाँ शाल्व की भय-छाया नहीं थी—यहाँ तो हँसी गूँजती थी, बच्चे सड़कों पर दौड़ते थे।

दुष्यंत का दल वहाँ किसी विदेशी अतिथि-सा प्रतीत हो रहा था। लोग झरोखों से उन्हें उत्सुक दृष्टि से देख रहे थे।

वे राजमहल पहुँचे।

खुले बरामदे, नक्काशीदार झरोखे, बहते फव्वारे—और हवा में अगरु और इत्र की सुगंध घुली हुई थी। द्वार पर बाजे बजे।

स्वयं कलिंग नरेश श्रुतायुध आगे बढ़े। वे दुष्यंत के पूर्ण विपरीत थे। उनका व्यक्तित्व साँझ की नरम धूप-सा था उज्ज्वल, सौम्य और मन को सुकून देने वाला। वे रूपवान थे; चेहरा चंद्रमा-सा दमकता, आँखों में दया और होंठों पर हल्की-सी मुस्कान, जो मन मोह लेती थी।

लंबा कद, उदार स्वभाव, और सबसे महत्त्वपूर्ण—धर्मनिष्ठ। यह सर्वविदित था कि श्रुतायुध क्रूरता से कोसों दूर थे। उन्होंने पीले रंग के रेशमी वस्त्र धारण किये हुए थे, उनके कंधे पर शाल थी। सबसे खास थे उनके कुर्ते पर लगे बटन। लकड़ी से बने गोल और मोटे, हर बटन पर नक्काशी की गई थी- एक पर कमल काँटों में खिल रहा था, दूसरे पर घूमता हुआ चक्र, तीसरे पर पत्ते से ओस टपक रही थी। उन्हें हाथ से तराशा गया था, ये कईं महीनों का काम था। इनकी सादगी में गहराई थी। पीले वस्त्र पर ये चमकते बटन कलिंग की कला का प्रतीक थे।

श्रुतायुध के पीछे सेवक थालियों में फूल और चंदन लिए खड़े थे।

उन्होंने हाथ जोड़कर शहद-सी मिठास भरी आवाज़ में कहा: "महाराज दुष्यंत, आपने आमंत्रण स्वीकार करके हमारा सम्मान बढ़ाया है। कलिंग आपका स्वागत करता है।"

दुष्यंत धीरे घोड़े से उतरे। उन्होंने गहरा हरा कुर्ता पहना था जिस पर काले धागों की कढ़ाई, सोने की लाई की गई थी। सफ़ेद धोती कमर पर कसी। माथे पर चाँदी का मुकुट, जिसके बीच में माणिक जड़ा हुआ है। गले में मोती-माला, कलाई पर सोने के कड़े पहन रखे थे। तलवार की मूठ पर उनका हाथ हमेशा तैयार रहता था। चेहरा कठोर था, न तो कोई झुकाव न ही कोई मुस्कान। दुष्यंत ने कुछ नहीं कहा।

श्रुतायुध मुस्कुराए। "शांति ही हमारा उद्देश्य है। सम्मेलन परसों प्रातः शुरू होगा। आप आज विश्राम करें।"

दुष्यंत ने सिर हिलाया। श्रुतायुध ने अतिथि खंड दिखाया—चमकदार गलियारे, खुले आंगन। फर्श के किनारों पर नालियाँ बनी हुई थीं जिनमें धीरे-धीरे जल बहता और उसकी कल-कल करती ध्वनि सुकून देती थी।

सेवक नाश्ता लाए। श्रुतायुध दुष्यंत के साथ बैठे। दुष्यंत ने नाश्ते को छुआ भी नहीं। कुछ देर वार्ता करने के बाद श्रुतायुध चले जाते हैं।

उनके जाने के पश्चात् सुमंत्र बोले, "अन्य सभी राजा पहुँच चुके हैं महाराज।" दुष्यंत ने सिर हिलाया। महल की यह खुली शांति उन्हें खटक रही थी। वे दुविधा में थे—यह विश्वास योग्य है या कोई षड्यंत्र?

रात हो गई। दुष्यंत बरामदे पर खड़े नीचे देख रहे थे, पूरा नगर सोया हुआ था। केवल मशाले जल रही थी।

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सुबह

भोर की पहली किरणें महल के झरोखों से छनकर अतिथि कक्ष में गिरीं। महाराज दुष्यंत जाग चुके थे।

सुमंत्र ने प्रवेश किया- “महाराज, महाराज श्रुतायुध के सेवक भेंट लेकर आए हैं।”

दुष्यंत ने संकेत दिया।

सेवक सेविकाएँ थालियाँ लिए भीतर आए—किसी में वस्त्र, किसी में फल, मिष्ठान, चंदन और इत्र। सभी राजाओं के लिए समान भेंट थी। दुष्यंत ने वस्त्रों को देखा। पीले रंग के, रेशम से बने, किनारे पर नीले धागों से समुद्र की लहरें सी कढ़ाई की गई थी। लेकिन सबसे अनोखे थे पत्थर से बने वो छोटे गोल बटन जिनमें सीप चिपकाई गई थी, सीप के बीच जगमगाता मोती और मोती के आसपास रेत के सूक्ष्म कण चमक रहे थे। दिखने में भारी, परंतु आश्चर्यजनक रूप से हल्के थे।

दुष्यंत ने एक बटन छुआ, ठंडा पत्थर, सीप का मुलायम स्पर्श और रेत की खुरदुरी चुभन महसूस हुई। ये कलिंग की सुप्रसिद्ध कला थी जो अपने भीतर एक गहराई समेटे थी क्योंकि हर बटन के पीछे कोई गहरी सोच होती है।

महाराज दुष्यंत ने सेनापति सुमंत्र को सामान की ओर इशारा करते हुए कहा- "परीक्षण करो।"

सुमंत्र तांबे का पात्र लाया। उसमें कड़वा रस था, वह विष का परीक्षण करने के काम आता था। उसने उसकी कुछ बूँदें वस्त्र पर टपकाई, रंग नहीं बदला, फलों पर रस छिड़का, कोई सड़न नहीं और इसी तरह हर सामान की जाँच की।

"साफ़ है महाराज," सुमंत्र ने कहा।

दुष्यंत ने गरम, चंदन की सुगंध वाले जल से स्नान किया। श्रुतायुध द्वारा भेजे गए वस्त्र पहने। अपना मुकुट पहना, गले मोती-माला, और तलवार म्यान में। चेहरा कठोर ही था किंतु मन में बार-बार बटन का ही विचार आ रहा था और अनायास ही उनके हाथ पुनः बटन को स्पर्श करने के लिए उठ जाते।

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महल का प्रांगण

सभी राजा आ चुके थे। श्रुतायुध ने जब सभी राजाओं को वही वस्त्र, जो उन्होंने भेजे थे, पहने देखा तो उनके चेहरे पर एक मुस्कान खिल गई।

श्रुतायुध ने पूछा- "हमारी भेंट आप सभी को स्वीकार है?" सब ने सहमति जताई। दुष्यंत चुपचाप खड़े रहे। सुमंत्र उनके पीछे खड़ा था।

श्रुतायुध ने भोज का न्योता दिया। थालियाँ सजीं, भोजन में फल, खीर, पान जैसे कईं व्यंजन थे। सबकी बातें शुरू हुई व्यापार, कर, सैन्य संधि इत्यादि। दुष्यंत सुन रहे थे।

अवंती के राजा ने कहा- "कलिंग की कला बहुत निराली है महाराज श्रुतायुध। ये बटन तो अद्भुत हैं।"

श्रुतायुध हँसे- "हमारे यहाँ के कारीगरों के हाथ का कमाल हैं।"

दुष्यंत का मन खटका, उसे बटन का रहस्य जानना था। सम्मेलन कल था। आज का दिन विश्राम करने के लिए रखा गया लेकिन दुष्यंत को सुकून नहीं था, वे बटन उसे आकर्षित कर रहे थे।

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