साथी 3
आरोही को शारदा ताई से संगीत सीखते हुए सात दिन हो चुके थे। वह उनसे न केवल शास्त्रीय गायन की बारीकियाँ सीख रही थी, बल्कि वीणा बजाने की भी शिक्षा ले रही थी। हर दिन ताई के सान्निध्य में बिताया गया समय उसे भीतर तक समृद्ध कर रहा था। पर भीतर कहीं एक चिंता का बादल मंडरा रहा था — पैसों का।
शाम ढल चुकी थी। ताई का घर छोड़ते हुए आरोही अपने फ्लैट की ओर लौट रही थी, तभी रास्ते में विचारों की परतें खुलने लगीं— "माधव, धीरे-धीरे पैसे खत्म हो रहे हैं। मेरे पास कुल पच्चीस हजार रुपये थे, जिनमें से पांच हजार किराए में चले गए। टैक्सी, ट्रेन यात्रा, खाने-पीने में भी अच्छा खासा खर्च हो गया। ऐसे में बिना कमाई के कितने दिन और निकाल पाऊंगी? अब तो कोई नौकरी ढूंढनी ही पड़ेगी..."
सोचते-सोचते उसकी नज़र एक छोटी सी चाय की टपरी पर पड़ी। थकी हुई थी, सोचा थोड़ा सुकून मिलेगा। एक कुल्हड़ में चाय और कुछ बिस्किट लेकर वो अपने फ्लैट के सामने वाले अमरूद के पेड़ के नीचे जा बैठी। हवा में हल्की नमी थी, शाम की हलकी सुनहरी रौशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी। लेकिन मन अब भी चिंताओं में उलझा था।
इसी बीच, किसी के पास आकर बैठने का एहसास हुआ। उसने गर्दन घुमाई तो देखा — केशव।
नीले रंग का कुर्ता जिसपे मोरपंख बना हुआ था और सफेद धोती। वही सादगी, वही अपनापन। उसे देखकर आरोही के चेहरे पर अपने आप मुस्कान आ गई। वही शांति, वही सुकून जो उसे ट्रेन वाले दिन केशव के साथ महसूस हुआ था, फिर से लौट आया।
"अरे! आप यहाँ?" — केशव ने मुस्कराते हुए पूछा।
आरोही ने कुल्हड़ दिखाते हुए कहा, "चाय पी रही हूँ। तुम?"
केशव ने हँसते हुए थोड़ी सी शरारत भरी आवाज़ में कहा: "तुम्हारा बिस्किट ले तो लूँ, पर क्या पता तुम चोर हो? कहीं मुझे बेहोश कर लूट ना लो!"
आरोही को उसकी बात पर हँसी तो आई, पर उसने भी थोड़ा नाटकीय अंदाज़ अपनाते हुए कहा: "ओह! मैं लड़की होकर तुम जैसे हट्टे कट्ठे आदमी को लूट सकती हूँ? और तुम, जो खुद को इतना मजबूत समझते हो, वो खुद को नहीं बचा सकते? वाह रे पुरुष प्रधान समाज!"
फिर एक पल ठहरकर, हल्की मुस्कान के साथ पूछा, "वैसे सच-सच बताओ, पीछा कर रहे हो क्या?"
केशव ने भी उसी अंदाज़ में जवाब दिया, "हो भी सकता है... आपको क्या लगता है?"
"अगर कर रहे हो तो मत करो। और अगर नहीं कर रहे हो, तो अच्छी बात है।" — आरोही ने मुस्कुरा कर कहा।
"वैसे तुम तो टपरी पर भी चाय पी सकते थे, यहाँ क्यों आ गए?"
केशव थोड़ा हिचकिचाया, फिर शरमाते हुए बोला, "वो... वहाँ कुछ लड़कियाँ मुझे देख रही थीं..."
ये सुनकर आरोही की हँसी छूट गई। वह ज़ोर से खिलखिला उठी। कुछ देर दोनों चाय और बिस्किट का आनंद लेते रहे।
चाय खत्म होने के बाद केशव ने गंभीर होते हुए कहा, "चलिए, अब मैं चलता हूँ। और आप ज़्यादा चिंता मत किया कीजिए। जो होता है, अच्छे के लिए होता है। बस कर्म करते रहिए।"
केशव के जाने के बाद आरोही की नज़र पास पड़ी एक अख़बार के टुकड़े पर पड़ी। उस पर इंदौर में होने वाले एक सिंगिंग ऑडिशन का एड छपा था।
एड देखते ही उसके मन में एक उमंग जागी — "यही तो मौका है! संगीत में करियर की शुरुआत कहाँ से करनी है, ये सवाल था... अब जवाब सामने है। कहीं से तो शुरू करना है — तो यहीं से सही।"
उसकी आँखों में फिर से चमक लौट आई थी।
आरोही फिर हाथ जोड़कर ऊपर देखते हुए कहती है : "थैंक यू थैंक यू थैंक यू सो मच माधव।"
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अगले दिन
आरोही सिंगिंग ऑडिशन 🎤 के बारे में शारदा ताई को बताती है। शारदा ताई उसकी बात सुनकर कहती हैं— "आरोही बेटा, पहले बता देती कि तुझे पैसों की समस्या हो रही है। मुझसे तो तु पैसे लेगी नहीं, और मैं पूछकर तुझे छोटा भी महसूस नहीं कराऊंगी। पर तु मुझे बताती तो मैं तेरी मदद करती।
कोई बात नहीं… मैं तुझे कुछ और स्टूडियो के नाम बता दूंगी। वहाँ भी ऑडिशन दे देना।"
आरोही हिचकिचाते हुए कहती है— "लेकिन ताई, मैं आपके नाम का फायदा नहीं उठाना चाहती।"
असल में ताई का सिंगिंग इंडस्ट्री में बहुत बड़ा नाम था। उनके केवल नाम को अपने साथ जोड़ लेने से किसी को भी वो चांस मिल जाता, जो सामान्य तौर पर आसानी से नहीं मिलता।
ताई उसकी बात का बुरा नहीं मानतीं। आरोही के सिर पर प्यार से हाथ रखते हुए मुस्कराकर कहती हैं— "मैं तुझे इतना तो जान ही गई हूँ कि तुझे एहसान लेना पसंद नहीं। इसलिए बस इतना करूँगी कि पता कर दूँगी कहाँ-कहाँ ऑडिशन हो रहे हैं, और तुझे बता दूँगी। ओके?"
आरोही चेहरे पर हल्की मुस्कान लाते हुए कहती है— "ओके।"
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अगले कुछ दिन
आरोही कम से कम चार ऑडिशन दे चुकी थी। लेकिन हर जगह से जवाब एक जैसा ही आता।
कोई कहता— "हम आपको कुछ दिनों में बताते हैं।"
कोई कहता— "हम आपको नहीं ले पाएंगे।"
तो कोई कहता— "आप फिर आइएगा ऑडिशन के लिए।"
इन सबके बाद उसका आत्मविश्वास डोलने लगा था। एक ऑडिशन से लौटते हुए उसे रास्ते में भगवान कृष्ण का मंदिर दिखता है। वह अनायास ही वहाँ चली जाती है।
कृष्ण की मूर्ति के सामने हाथ जोड़ते हुए वह कहती है— "हे माधव, मेरा आत्मविश्वास डगमगा रहा है। क्या संगीत मेरे लिए नहीं, या मैं संगीत के लिए नहीं? कोई राह दिखाइए, सखा।"
तभी उसके पीछे से एक आवाज आती है— "अब तो समय है युद्धभूमि में टिके रहने का।"
आरोही चौंककर पीछे मुड़ती है। उसके सामने केशव खड़ा था—अपने मुख पर वही मनमोहन मुस्कान लिए हुए।
आरोही कंफ्यूज़ होते हुए पूछती है— "किस युद्ध की बात कर रहे हो, केशव?"
केशव मुस्कुराते हुए कहता है— "संघर्ष भरे जीवन का युद्ध। जिसमें कभी हार माननी ही नहीं चाहिए। और जब लगे कि अब हारने वाले हो, तो समझ लेना कि यही वो समय है जब सुबह बस होने ही वाली है। क्योंकि अंधेरा सबसे घना तब ही होता है, जब सुबह होने वाली होती है।"
फिर वह आरोही के सिर पर हल्के से हाथ फेरते हुए कहता है— "इसलिए अब समय है युद्ध में टिके रहने का। हार मत मानना।"
आरोही उसकी बात सुनकर धीरे से हाँ में सिर हिलाती है।
कुछ देर बाद केशव वहाँ से चला जाता है। आरोही भी कृष्ण की मूर्ति को प्रणाम कर अपने फ्लैट लौट आती है।
अब प्रीति और उसकी धीरे-धीरे बातचीत होने लगी थी। पर शायद… दोनों को ही एक-दूसरे में खुलकर घुलने-मिलने में अभी थोड़ा समय लगने वाला था।
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कौन है केशव?
क्या केशव सच में आरोही का पीछा कर रहा है?
क्या आरोही सिंगर नही बन पाएगी?
क्या आरोही के जीवन की दिशा बदलने वाली है ?
जानने के लिए पढ़ते रहिए ✨साथी✨।
Story में आगे क्या होगा जानने के लिए Stay Tuned 🌸!
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