आर्य और सपनों का द्वंद Ch. 1

अध्याय 1: डरावनी सुबह

Posted by Aman Aj • Sep 12, 2026 05:32 PM

यह कहानी आर्य की अंधेरा कायम रहे कहानी का सिक्वेल है। इस कहानी के इवेंट काल चक्र और फोर पेजेस आॅफ लक से पहले के है।

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भाग-1

डरावनी सुबह

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यह सोमवार के प्रभात होने से पूर्व का समय था। चैत्र महीने की शुरुआत हो चुकी थी। नया साल शुरू हुए 4 महीने का समय हो गया था। उस घटना को भी 4 महीने बीत गए थे जहां वह आश्रम में आया था। आर्य जो इस वक्त अपनी छोटी सी झोपड़ी में एक सही तरीके से संयोजित चारपाई पर लेटा हुआ था, वह अपनी करवटों को बदलते जा रहा था।

आर्य 17 साल का एक अपरिपक्व युवक था। 2 महीने पहले ही वह 17 साल का हुआ था। हल्की उम्र होने की वजह से उसका शरीर कच्चा था। भुजाओं में मजबूती नहीं थी, सीना फुला हुआ नहीं था, दाढ़ी मूछ अभी अपने काफी बारिक दौर में थी। कुल मिलाकर कहा जाए तो वह एक 17 साल की उम्र वाला ठीक-ठाक दिखने वाला लड़का था, जैसा कि आमतौर पर इस उम्र के लड़के होते हैं। मगर इसके बावजूद वह खास था। वह आम लड़कों जैसा बिल्कुल नहीं था। उसके एक ऐसी खासियत थी, जो उसके पूरे आश्रम में मौजूद किसी भी और इस उम्र के लड़के के पास नहीं थी। वह भविष्यवाणी वाला लड़का था।

मगर अभी वह अपनी उम्र और अपनी खासियत से दूर किसी ऐसी चीज से जूझ रहा था, जिसकी वजह से उसे बार-बार करवटें बदलने पड़ रही थी। उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे उसके शरीर को किसी ने अंदर से जकड़ लिया है। उसकी मांसपेशियां संकुचित हो रही थी। दिल पर दबाव बढ़ रहा था। फेफड़े सांस लेते वक्त काफी कष्टदायक परिस्थितियों से गुजर रहे थे। मानो उस पर किसी ऊपरी आत्मा का साया आ गया हो।

लेकिन इस वक्त सिर्फ उसकी शारीरिक अवस्थाओं में हलचल नहीं हो रही थी, बल्कि वह दिमागी तौर पर भी किसी बड़ी रहस्यमई घटना का सामना कर रहा था। उसके दिमाग में विचारों के ताने बाने एक कुशल और परिपूर्ण दृश्य का निर्माण कर उसे किसी और ही दुनिया में लेकर जा रहे थे। और खुद आर्य, ना चाहते हुए भी, एक पीड़ादायक परिस्थिति से गुजरते हुए उस दृश्य की ओर खिंचता चला जा रहा था।

“आर्य.......”

“आर्य.....”

“आर्य....”

यह एक मधुर और मीठी आवाज थी। किसी कम उम्र वाली लड़की की मधुर और मीठी आवाज, जो किसी धुंध से भरे माहौल से निकल कर आ रही थी। आर्य अपने विचारों के जाल में खुद को उस जगह पर महसूस कर रहा था। उस जगह जहां से आवाज आ रही थी। वह आवाज की तरफ भाग पड़ा । नंगे पैर और ठंड से कंपकांपाते हुए, वो भी खुद से आवाज लगाते हुए।

“रुको...”

“रुको..”

“कौन हो तुम”

“मेरी बात सुनो”

ठंड से कांपते आर्य के शब्द बड़ी मुश्किल से उसके मुंह से निकल रहे थे। मगर वह आवाज के रहस्य को जानना चाहता था। वह आवाज के पीछे छुपी शख्सियत को जानना चाहता था। तमाम पीड़ा, तमाम कष्ट, यहां तक कि सर्दी के एहसास के बाद भी, वो उस आवाज तक पहुंचना चाहता था।

अचानक तभी आर्य के पैर लड़खड़ाए और वो‌ नीचे गिर गया। उसके नीचे गिरते ही उसका ध्यान कुछ समय के लिए अपने आसपास के दृश्यों से हट गया। उसने फौरन तेजी से खुद को संभाला और खड़ा हुआ। मगर उसके खड़े होते ही वहां कुछ और ही था।

उसके आसपास मौजूद धुंध किसी अंधेरी जगह में बदल गई थी। ठंडेपन के एहसास दूर हो गए थे। और वह खुद को तपता हुआ महसूस कर रहा था। उसने मुड़ कर पीछे देखा तो वहां एक चिता जल रही थी। चिता ज्यादा बड़ी नहीं थी। ऐसे लग रहा था जैसे किसी छोटे बच्चे को को अभी-अभी जलाया जा रहा है। चिता को देखते ही आर्य सहम गया। वह उस चिता से दूर भागने लगा। जितना तेज वो भाग सकता था उतना तेज। मगर इसके बावजूद उसे महसूस हो रहा था कि उसकी चिता से दूरी उतनी की उतनी ही है। एक तरह से जैसे जैसे वह आगे जा रहा था, वैसे वैसे चिता उसके पीछे आ रही थी।

दौड़ते दौड़ते आर्य की सांसें फूल चुकी थी। दिल की धड़कन का अनियंत्रित रूप से बढ़ना शुरू हो गया था। अचानक आर्य को महसूस हुआ कि उसे सांस आना बंद हो गई है। दौड़ते दौड़ते उसने अपनी छाती को पकड़ लिया। उसने अपनी गर्दन में अलग ही तरह की घुटन को महसूस किया। वह वहीं घुटनों के बल गिर गया। सांस लेने के लिए इधर-उधर हाथ मारने लगा। दम घुटने की वजह से हल्क धौकनी की तरह गुं-गुं कर रहा था। तभी उसके गले से एक जोरदार चीख निकली, और सब कुछ यहीं थम गया।

वो एकदम से अपने बिस्तर से उठ खड़ा हुआ। नींद से उठने की वजह से शरीर में नई जान सी आ गई। उसने अपने दिल पर हाथ रखा तो देखा धड़कन बढ़ी हुई थी। पूरा **** पसीनो पसीन हुआ पड़ा था। उसने फौरन माथे पर हाथ लगाया। माथा काफी गर्म था। आर्य ने एक गहरी सांस ली और झोपड़ी में बनी खिड़की से बाहर की तरफ देखा। सुबह होने को थी।

सुबह के समय इस तरह के सपने का आना काफी हैरतअंगेज था। आर्य के चेहरे पर भी सपने को लेकर परेशानी झलक रही थी। इस तरह का सपना आज से पहले उसे कभी नहीं आया था। और वह भी इतना खौफनाक और कष्टों से भरा हुआ। आखिर क्या मतलब था इस सपने का?

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आर्य जिस आश्रम में रहता था उसकी दिनचर्या निश्चित और नियमित थी। पुरे आश्रम में 165 लड़के, 235 लड़कियां, 23 गुरु, 10 अचार्य, और एक महा आचार्य थे। सुबह उठकर लड़कों का काम ठंडे पानी से नहा कर गायत्री मंत्र का उच्चारण करना होता था। और लड़कियों का काम नहाने के बाद सरस्वती वंदना करना। वही 23 गुरु, 10 आचार्य, और एक महा आचार्य भगवान ब्रह्मा की पूजा करते थे। इन सबके बाद आश्रम की साफ सफाई का काम लड़के और लड़कियां द्वारा होता था। 23 गुरु आश्रम में रहने वाले छात्राओं को शिक्षा देने का काम करते थे, तो वह पूजा के बाद अपनी-अपनी कक्षाओं में जाकर जो पढ़ाना है उनकी तैयारी करते थे। 10 आचार्य सुबह के समय तो पूरे आश्रम की व्यवस्था को नियंत्रित रखते थे। जबकि शाम को वह सभी असामान्य शिक्षा का ज्ञान छात्राओं को देते थे। जिनमें जादुई ज्ञान और लड़ने की कलाए मुख्य तौर पर शामिल थी। ऐसे में सुबह उनका काम इधर उधर टहलते हुए व्यवस्था को बिगड़ने से रोकने का था। जबकि शाम को शिक्षा देने का।

महा आचार्य ( आचार्य वर्धन )जो पूरे आश्रम के कर्ता-धर्ता, उसके मुखिया थे, वो पूजा के बाद अपने दूसरे कामों में व्यस्त हो जाते थे। आश्रम में कब क्या होना है, भविष्य के काम क्या है, दिनचर्या में क्या बदलाव करने हैं, इनके सारे फैसले उन्हीं को करने होते थे।

आर्य की सुबह एक डरावने सपने से शुरू हुई थी, तो गायत्री मंत्र के लिए नहाते वक्त भी वह उसी के बारे में सोच रहा था। ना चाहते हुए भी वह उस दृश्य को भूल नहीं पा रहा था, जहां कोई छोटी लड़की उसका नाम ले रही थी। और इसके बाद एक जलती हुई चिता लगातार उसके पीछे आ रही थी।

नहाने धोने के बाद उसने एक लाल चोगा ओढ़ा और गायत्री मंत्र के लिए बाहर आ गया। वहां सभी 165 लड़के लाल चोगे में ही थे। सभी ने 20-20 विद्यार्थियों की कतारें बनाई और सूरज की तरफ देखते हुए गायत्री मंत्र का उच्चारण किया।

गायत्री मंत्र के उच्चारण के बाद सभी ने सूर्य देव को प्रणाम किया। सूर्य देव को प्रणाम करने के लिए वह सूर्य नमस्कार के आसन का इस्तेमाल करते थे। इतना करने के बाद सब आश्रम की साफ सफाई में जुट गए।

दूसरी ओर लड़कियों में सभी ने सरस्वती वंदना की। सरस्वती वंदना के बाद उन्होंने भी अपना अपना काम शुरू कर दिया।

आश्रम में लड़कों लड़कियों के बीच किसी तरह का भेदभाव नहीं था। सब आपस में ही मिलकर साफ सफाई का काम किया करते थे। और क्लासों में भी अध्ययन साथ मिलकर ही होता था। अगर लड़के और लड़कियों में अंतर था तो वह सिर्फ रहने की जगह का, और शाम को मिलने वाली असामान्य शिक्षा का। शाम को लड़कों को युद्ध कला की शिक्षा दी जाती थी, जबकि लड़कियों को जादू सिखाने की।

यहां आश्रम में आर्य सिर्फ एक लड़की को जानता था। जिसका नाम हीना था। हिना तकरीबन 18 ( अब हो गई। उसका जन्मदिन मार्च में आता है) साल की उम्र वाली लड़की थी। गोरा रंग, गाल मोटे और भारी, उसके बाल भूरे रंग के थे। गोरे रंग और बुरे बाल होने की वजह से वह काफी आकर्षित लगती थी। फिर वह वह भले ही आर्य से 1 साल बड़ी थी, मगर जब दोनों साथ होते थे तो एक दूसरे के हम उम्र ही लगते थे। आश्रम में लड़कियां नीले रंग का चोगा पहनती थी। और नीला रंग हिना पर और भी ज्यादा सुहाता था।

आश्रम में साफ सफाई करते हुए आर्य और हिना ने एक दूसरे की तरफ देखा। दोनों ही झाड़ू लगा रहे थे। हिना की नजर आर्य पर पड़ी तो वह खुद को शुभ प्रभात कहने से नहीं रोक सकी। अक्सर उसके साथ ऐसा होता था। आर्य के मामले में वह थोड़ा उतेजित हो जाती थी। वह आर्य को पसंद करती थी और अपनी इस पसंद की वजह से मन में उमड़ रहे भावों को नियंत्रित रख पाना उसके बस से बाहर हो जाता था।

“शुभ प्रभात... तुम्हारा दिन अच्छा जाए..” जब हिना ने उसे सुप्रभात कहा तब आर्य ने जवाब दिया।

यह सुनकर हिना के चेहरे पर हल्की खुशी आ गई। जाने अनजाने ही उसके काम करने की गति बढ़ गई थी। यहां आश्रम में हिना अपने भाई के साथ रहती थी। उसका भाई आयुध मोटी तोंद वाला लड़का था। हालांकि उसे खाना खाने की बजाय बनाने का शौक था। और वह बनाते बनाते ही जो खाना होता था वह खा लेता था। साफ सफाई के बाद जहां बाकी के विधार्थी दोपहर तक कक्षाओं में अध्ययन करते थे। वही आयुध की कक्षा 11 बजे के बाद ही खत्म हो जाती थी। उसके बाद वह कुछ और छात्राओं और आचार्य के साथ मिलकर रसोईघर घर में खाना बनाने के लिए चला जाता था। इसके बाद वह रात के खाना बनाने तक कुछ भी नहीं करता था। उसे ना तो युद्ध कला से कोई मतलब था, ना ही जादुई चीजों से। इन सब में तो उसे इसी चीज को लेकर काफी खुशी मिल जाती थी, कि उसकी बहन जादू में अपने नए नए प्रयोग कर रही हैं। वह अपने हाथों को और शरिर को अब तक नीली रोशनी से चमकाना सीख चुकी थी। और आगे उड़ना जल्दी सीखने वाली थी।

सुबह की साफ सफाई का काम तकरीबन 8:00 बजे तक चला। हमेशा इतने बजे तक ही चलता है। ठीक 8:15 सभी कक्षाओं में अध्ययन शुरू हो जाता है। सभी विद्यार्थियों ने साफ सफाई की और जिस चीज को जहां से उठाया था वहां रख दिया। इसके बाद फौरन सभी अपनी-अपनी झोपड़ियों की ओर चले गए। वहां उन्होंने अध्ययन के लिए ज़रूरी सामग्री को उठाया और अपनी-अपनी क्लासों की तरफ प्रस्थान कर गए। अब यहां से सभी विद्यार्थियों की दोपहर तक अलग-अलग कक्षाओं का शुभारंभ होना था। आर्य भी इन सब के बीच अध्ययन की तैयारी कर रहा था। मगर उसके डरावने सपने वाला रहस्य.... इस अध्ययन में वह भी उसके साथ था।

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