अध्याय 3: आयशा-3
3. आयशा-3
अध्याय-1
आयशा
भाग-3
★★★
उस अंधेरी परछाई ने हाॅल के बीचो बीच आकर अपनी जगह संभाल ली। विजेंद्र थोड़ा सा पीछे हो गया था। आयशा अपनी मां के हाथों में थी जहां सरिता ने उसे थोड़ा सा पीछे कर लिया था।
अंधेरी परछाई ने डाइनिंग टेबल की तरफ देखा। वहां अभी भी खाने-पीने का सामान पड़ा था। उसने डाइनिंग टेबल से एक खीरा उठाया और उसे उठाकर अपने मुंह के पास ले गया। खीरे के मुंह के पास जाने से पहले वहां किसी भी तरह का चेहरा नहीं था, मगर जब खीरा मुंह के पास चला गया तो वहां चेहरे का निर्माण होने लगा। जब चेहरा पूरा बन गया तब उसने खीरे को अपने दांतो तले चबा लिया।
उसका चेहरा दिखने में पूरी तरह से सपाट था। दाढ़ी मूछ तो दूर की बात एक बाल तक उसके चेहरे पर नहीं दिखाई दे रहा था। आंखों के आइब्रो वाली जगह पर भी बाल नहीं थे। आंखों की पलकों पर जो बाल होते हैं वह भी नहीं थे। वह एक भयानक भददे चेहरे वाली अंधेरी परछाई थी।
विजेंद्र ने हिम्मत करते हुए उससे पूछा “शैतान के सबसे छोटे सिपेसहलार, मगर शैतान के साथ साथ उनके आने का रास्ता भी बंद है, तो तुम यहां कैसे आ सकता है। यह नामुमकिन है। ऐसा हो ही नहीं सकता।”
अंधेरी परछाई मुस्कुराई “ताला खोलने के सो रास्ते होते हैं, अगर आपके पास चाबी नहीं है तो आप उसे तोड़ भी सकते हैं। हमें यहां धरती पर आने का रास्ता मिल गया, रास्ता मिला तो हम आ गए। हां, लेकिन ज्यादा घबराने वाली बात नहीं है। जो रास्ता खुला है उससे सिर्फ सिपेहसालार धरती पर आ सकते हैं। शैतान की ताकत झेलने की क्षमता दरवाजे में नहीं तो वह यहां नहीं आ सकते।”
विजेंद्र अपनी पत्नी की तरफ देखने लगा। उसकी पत्नी ने सिर हिलाकर हामी भरी। दोनों ने ही इशारे इशारे में यह बात की थी कि अब आगे क्या किया जाए। सरिता ने उसे अंधेरी परछाई से यह पूछने के लिए कहा था कि वह यहां क्यों आई है।
विजेंद्र ने पत्नी की तरफ देखने के बाद वापस अंधेरी परछाई की तरफ देखा और उसे पूछा “क्या तुम बता सकते हो तुम हमारे पास क्यों आए हो? आखिर तुम्हारा हमसे क्या काम? हमारा तो अब आश्रम से भी कोई लेना देना नहीं, हम उसे पूरी तरह से छोड़ चुके हैं। आश्रम छोड़ने के बाद हम शैतान से भी दूर हो गए, आश्रम और शैतान के मसले में भी हमारी किसी तरह की भागीदारी नहीं रही।”
अंधेरी परछाई हंसने लगी “तुम ऐसी बेवकूफों वाली बातें नहीं कर सकते। तुम्हें अच्छे से पता है जब से आश्रम के इर्द-गिर्द सुरक्षा चक्कर बना है तब से अंधेरी परछाइयां हर एक आश्रमवासी को दुनिया के अलग-अलग कोनों में ढूंढकर उन्हें खत्म कर रही है। ताकि वह फिर से एकजूट ना हो सके। इसके बावजूद तुम हमसे सवाल पूछ रहे हो। हमारे यहां आने के लिए तो यही वजह काफी है की.... तुम्हारा कभी ना कभी आश्रम से संबंध रहा था।”
सरिता की आंखों से आंसू आने लगे। वहीं विजेंद्र के चेहरे पर भी परेशानी की लकीरें दिखने लगी थी। उन्हें इस बात का पता था अंधेरी परछाइयां आश्रम से बाहर रहने वाले लोगों के साथ क्या कर रही हैं। कोई भी उनके हमले के बाद बच नहीं पाता था।
विजेंद्र ने थोड़ा परेशान होते हुए कहा “मगर तुम्हें हमें नुकसान पहुंचाकर कुछ नहीं मिलने वाला। इससे ना तो आश्रम को कोई फर्क पड़ेगा, ना ही तुम्हारे शैतान को। हम मामूली लोगों की किम्मत दोनों ही और मामूली है।”
अंधेरी परछाई ने खुद को कुर्सी पर पीछे की तरफ किया। कुर्सी पर पीछे की तरफ करने के बाद उसने अपनी दोनों लाते डाइनिंग टेबल पर रखी। लाते डाइनिंग टेबल पर रखने के बाद उसने तलवार की नोक आयशा की तरफ की। विजेंदर और सरिता फिर से एक दूसरे को देखने लगे।
अंधेरी परछाई बोली “तुम तो मामूली लोग हो मगर तुम्हारी बेटी, वो कहीं से भी मामूली नहीं है। उसे पूरी दुनिया में वह शक्ति हासिल हुई है जो किसी के पास भी नहीं। जिंदा करने की शक्ति। किसी भी चीज को जिंदा करने की शक्ति। यहां तक कि.... मुर्दों को भी... जिंदा करने की शक्ति।”
“क....क्या...क्या...मतलब....” विजेंद्र के होठ कपकपाने लगे “तुम... तुम मेरी बेटी से क्या करवाने वाले हो... ?”
“लो....” अंधेरी परछाई ने तलवार की नोक को विजेंद्र की ओर कर दिया “मैंने मुर्दों का नाम ले लिया अब भी तुम यह सवाल मुझसे पूछ रहे हो। अरे भाई तुम्हारी बेटी की ताकत के जरिए मैं उन सभी मुर्दों को जिंदा करने वाला हूं जो अब यहां इस दुनिया में नहीं। मुर्दे हमारी सेना का एक नया हिस्सा बनेंगे, हमारी सेना बड़ी होगी जिसके बाद आश्रम नसतो नाबूत हो जाएगा। आश्रम का जादू भी सिर्फ अंधेरी परछाईयों पर चलता है। मुर्दों के लिए कोई जादू नहीं बना। यहां तक कि सुरक्षा चक्कर भी उन पर काम नहीं करता।” इसके बाद वह रुका और कुछ देर तक कुछ नहीं बोला। इसके बाद उसने एकदम से कहा “मगर हमें तुम्हारी बेटी से कुछ और भी काम है.... ऐसा काम जिसका जिक्र नहीं किया जा सकता.... यह थोड़ा रहस्यमई है” उसने कहकर अपनी तलवार अपने हाथों में घुमाई।
“तुम अपने इन इरादों में ही कभी कामयाब नहीं होगे।” विजेंद्र अपने चेहरे पर गुस्से के भाव लाता हुआ बोला “मेरी बेटी तुम्हारे इस काम में कभी तुम्हारा साथ नहीं देगी।”
“तो हम जबरदस्ती करेंगे।” अधेरी परछाई ने स्टाइल मारते हुए अपने दोनों हाथ फैला दिए। “जैसे हर ताले को खोलने के सो रास्ते होते हैं, वैसे ही हर एक काम को करने के कई सारे रास्ते होते हैं।”
“ऐसा तब होगा ना जब हम करने देंगे....” विजेंद्र बोला और अपने दोनों हाथों की मूठियां बंद कर ली। उसके मुट्ठी बंद करते ही उसका शरीर लाल रोशनी से चमकने लगा। सरिता ने भी आयशा को दूसरी तरफ किया और अपनी मुट्ठीया बंद कर ली। उसके ऐसा करते ही उसका शरीर नीली रोशनी से चमकने लगा। खुद के शरीर को चमकाने के बाद दोनों ही लड़ाई की स्थिती में आ गए।
अंधेरी परछाई ने गहरी सांस ली और उसे बाहर छोड़ा। बाहर छोड़ने के बाद उसने कहा “तुम लोग सीधे तरीके से कभी बाज नहीं आओगे ना” इतना कहकर उसने दरवाजे की तरफ देखा।
देखते ही देखते अंधेरी परछाइयों की दर्जनभर संख्या दरवाजे से अंदर आने लगी। उन सभी के हाथों में तलवार थी मगर उस तलवार से अलग जो उस अंधेरी परछाई के हाथ में थीं।
विजेंद्र समझ चुका था लड़ाई खतरनाक होने वाली है। सरिता भी इस बात को जानती थी। विजेंद्र ने आयशा की तरफ देखा और उससे कहा “तुम जाओ यहां से.... तुम्हारा यहां रहना खतरे से खाली नहीं है...”
सरिता भी बोली “हां आयशा.... तुम निकलो यहां से...”
“नहीं...” लेकिन आयशा ने सामने से साफ मना कर दिया “मैं आप दोनों को छोड़कर नहीं जाने वाली। मैं भी बराबर लडूंगी।”
आयशा ने कहा और अपनी आंखों को बड़ा कर अंधेरी परछाइयों की तरफ देखने लगी। इससे आयशा की आंखें सुनहरे रंग से चमकने लगी। सामने दर्जन भर अंधेरी परछाईयों ने अपनी तलवार विजेंद्र और सरिता की तरफ तान दी। सरिता और विजेंदर ने अपना चेहरा उनकी तरफ कर दिया।
इसके बाद अंधेरी परछाइयां एक के बाद एक हवा में उड़ती हुई उन दोनों की ओर बढ़ी और अलग-अलग उन पर हमला करने लगी।
विजेंद्र किचन वाले हिस्से की तरफ होकर अपने लाल रोशनी के जादू से अंधेरी परछाइयों का सामना करने लगा। सरिता हाॅल के दूसरे कोने में जाकर अंधेरी परेशानियों से लड़ने लगी। अपनी लड़ाई में वह नीले जादू का इस्तेमाल कर रही थी।
आयशा ने अपनी लड़ाई में खुद को सीढीओ की तरफ कर लिया। खुद को सीढीओ की तरफ करने के बाद उसने डायनिंग टेबल और वहां मौजूद कुर्सियों की तरफ देखा। इसके बाद मुंह में कुछ बुदबुदाई। ऐसा करते ही डायनिंग टेबल और कुर्सियां दोनों ही जीवित हो उठे। आश्चर्यजनक रूप से और किसी कार्टून की तरह। जीवित होने के बाद आयशा ने उन्हें आदेशात्मक स्वर में कहा “सब का सामना करो...”
डाइनिंग टेबल और कुर्सियों ने यह बात सुनी और वह अंधेरी परछाइयों से लड़ने लगी। आयशा ने ऐसे ही कर घर के कुछ और सामान को जिंदा कर दिया। घर की तमाम तस्वीरें, छत पर लगा पंखा, टीवी, ढेर सारी किताबें, गुलदस्ते, बर्तन, सब जिंदा होकर अंधेरी परछाइयों से लड़ाई में कूद गए थे।
पूरी की पूरी लड़ाई उस अंधेरी परछाई के इर्द-गिर्द हो रही थी जिसके हाथ में अजीब सी तलवार थी। इस पूरी लड़ाई में वह ना तो किसी तरह से हैरान हो रहा था ना ही किसी तरह से परेशान। वह बस यह सब देख कर मुस्कुरा रहा था।
लड़ाई काफी देर तक चलती रही। और वह ऐसे ही लड़ाई को होता हुआ देखता रहा। मगर जब उसे लगा काफी हो चुका है तब वह खड़ा हुआ और उसने अपने तलवार को हवा में खाली विजेंद्र की ओर घुमाया। ऐसा करते ही अचानक विजेंद्र लड़ता लड़ता रुक गया। विजेंद्र ने अपने शरीर की तरफ देखा। उसकी छाती के करीब से एक काफी गहरा घाव बन गया था जो शायद पूरे शरीर की आर-पार था। यानी वह वहां से दो हिस्सों में बंट गया था।
अंधेरी परछाई में विजेंद्र के साथ ऐसा करने के बाद सरिता के साथ भी ऐसा ही किया। सरिता के साथ भी कुछ ऐसा हुआ। वह भी लड़ते-लड़ते रुक गई। लड़ने के बाद उसने अपने शरीर की तरफ देखा। उसके शरीर पर भी तिरछा घाव बन गया था जिसने उसके शरीर के दो हिस्से कर दिए थे।
आयशा चिल्लाई “मम्मी... पापा....” और सीढ़ियों से नीचे उतर कर उनकी और आने की कोशिश की। लेकिन जैसे ही उसने कदम बढ़ाए वैसे ही उसके पापा ने हाथ कर उसे रुकने के लिए कहा। आयशा के आंखों से आंसू निकल आए थे। दिल पूरी तरह से बैठ गया था। पिता के रोकते ही वह रुक गई।
विजेंद्र ने अपने मौत के आखिरी क्षणों में बड़ी मुश्किल से कहा “अंगूठी..... वर्ष वर्धन आश्रम...” जिसके बाद उसके शरीर के घाव के ऊपर वाला हिस्सा नीचे वाले हिस्से से फिसलता हुआ सीधे फर्श पर गिर गया। उसके शरीर के दो हिस्से हो गए थे तो दोनों ही हिस्से अब अलग अलग हुए। सरिता के साथ भी ऐसा ही हुआ।
आयशा बेबस सीडीओ के पास खड़ी सब देखती रही। अंधेरी परछाई ने जिस के पास तलवार थी उसने बाकी की अंधेरी परछाइयों को आदेश दिए और आयशा को पकड़ लेने के लिए कहा।
आयशा ने जैसे ही यह सुना वह सिढ़ियों पर पीछे की तरफ हुई और तेजी से ऊपर चढ़ने लगी। ऊपर चढ़ने के बाद उसने कमरे का दरवाजा खोला और उसे बंद कर दिया। दरवाजा बंद करने के बाद वह रोते हुए बोली “अंगूठी.... वर्ष वर्धन आश्रम.. आखिर... आखिर पापा का इससे क्या मतलब...” तभी उसे कुछ याद आया और वह अपने बेडरूम में बेड के पास बनी ड्रॉयर की तरफ भागी।
वहां जाते ही उसने ड्रॉयर खोला जहां उसे अंगूठी दिखी। अंगूठी देखते ही उसे याद आया जब वह तकरीबन 10 या 12 साल की थी तब उसके पापा ने कहा था यह अंगूठी जादुई अंगूठी है और किसी भी जगह को वर्ष वर्धन आश्रम से जोड़ती है। इसके लिए अंगूठी को ऊपर करें वर्ष वर्धन का नाम लेना पड़ता है। यह याद आते ही वह समझ गई थी उसके पापा क्या कहना चाह रहे थे। वर्ष वर्धन आश्रम हाल फिलहाल में सबसे सुरक्षित जगह है और उसके पापा ने उसे वही जाने के लिए कहा था। उसने अंगूठी ली और तुरंत खिड़की की तरफ जाते हुए उसे ऊपर कर दिया। वह वर्ष वर्धन आश्रम कहने वाली थी लेकिन तभी दरवाजे के बाहर अंधेरी परछाइयां आई और उसने दरवाजे को धक्का मारते हुए दरवाजा तोड़ दिया। दरवाजे के टूटते ही वह उड़ता हुआ आयशा से टकराया और आयशा अंगूठी के साथ ही खिड़की से नीचे गिर गई।
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