junu niyat tere pyar ki Ch. 2

junu niyat tere pyar ki - Chapter 2

Posted by soulmate vibes • Sep 20, 2026 08:56 PM

अध्याय — इंटरव्यू

आज काश्वी का इंटरव्यू है। उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि वो क्या करे। उसे काम करना ही नहीं है, वो बिल्कुल भी काम नहीं करना चाहती। वो नहीं चाहती कि वो बाहर जाकर काम करे। उसे तो बाहर जाने से ही डर लगता है।

ऊपर से दिनभर न्यूज़ देखती रहती है, जिसमें दुनिया भर की घटनाएँ चलती रहती हैं। लड़कियों के साथ क्या-क्या होता है, क्या हुआ, बाहर जाने से क्या होता है—ये सब उसके दिमाग में चलता रहता है। इसलिए उसे लोगों से बहुत डर लगता है। ये सब उसके दिमाग में चलता ही रहता था। बेचारी क्या करे?(काश्वी की मां के ओवर प्रोटेक्शन के कारण काश्वी ऐसी है)

उसके पापा चाहते थे कि वो बाहर जाए, स्ट्रॉन्ग बने, पर वो निकलने को तैयार ही नहीं थी। पर उसकी मासी की बेटी अन्वी वर्मा, जिसकी उम्र भी काश्वी की जितनी ही थी, बस वो छह महीने बड़ी थी, इसलिए काश्वी उसे अन्वी दीदी बोलती थी।

अन्वी के मोटिवेट करने के कारण काश्वी तैयार हो जाती है। उसके कहने पर ही वो⚫ ब्लैक स्टोन क्राउन इंडस्ट्रीज🫅 में इंटरव्यू देने के लिए तैयार होती है।

उसे बिल्कुल भी नहीं पता था कि इस इंडस्ट्री का सीईओ कौन है। उसे तो इस कंपनी के बारे में भी बिल्कुल नहीं पता था। वो तो पहली बार इसका नाम सुन रही थी।

काश्वी को अच्छे से पता था कि वो सिलेक्ट नहीं होगी, क्योंकि उसे पढ़ाई में भी मन नहीं लगता था। पर कैसे, पता नहीं कैसे, उसे दिल्ली के सबसे महंगे कॉलेज," किंग्सफोर्ड इंटरनेशनल कॉलेज", में स्कॉलरशिप मिल जहां एडमिशन अमीरों के बच्चे या स्कॉलरशिप से होता हैं, जिसके बारे में आगे पता चलेगा, क्योंकि यहीं से उसे अपने प्यार का एहसास हुआ था और उसका दिल भी टूटा था।

अब आगे, जैसे गेट के अंदर जाती है और अन्वी उसे बाय बोलकर चली जाती है और बोलती है कि जब तुम्हारा इंटरव्यू खत्म हो जाए तो कॉल कर देना, मैं लेने के लिए आ जाऊँगी। वहीं कास्वी हाँ में सिर हिलाकर अंदर चले जाती हैं। जैसे-जैसे अंदर जाती हैं, वैसे-वैसे ही उसे मनमोहक इंटीरियर डिजाइनिंग को देखने लगती है। ऐसा लग रहा था कि कोई मेरी पसंद का बनाया हो।

काश्वी यही सोचते हुए अपने सिर को झटकती है।

“अरे यार! अभी मेरा इंटरव्यू है और मैं मुस्कुरा रही हूँ। पता नहीं क्या होगा!”

“अन्वीदी, तुम्हारा मोटिवेशन सब पानी में चला गया है।”

वो मन ही मन सोचती है—

“हे भगवान! मेरे घुटने क्यों काँप रहे हैं?”

जैसे-जैसे आगे जाती है, किसी तरह से रिसेप्शनिस्ट के पास पहुँचती है और बोलती है—

“मैं इंटरव्यू के लिए आई हूँ।”

और अपना नाम बता देती है।

“अच्छा, अच्छा मैम। आप प्लीज़ आगे जाकर लेफ्ट जाइए और वहाँ एक हॉल है, वहाँ बैठ जाइए। जैसे ही आपका नंबर आएगा, आप इंटरव्यू के लिए चली जाइएगा।”

काश्वी अंदर जाती है और वहाँ उसे पहले ही कितने सारे लोग पहुँचे हुए दिखाई देते हैं। ये देखकर बेचारी का कॉन्फिडेंस भी लो हो जाता है।

“काश्वी, तुम्हारा सिलेक्शन होने वाला तो है नहीं। यहाँ बैठकर टाइम पास ही करना है, क्या?”

उसे अचानक अन्वी की बात याद आ जाती है, इसलिए वो वहीं बैठ जाती है।

उसी टाइम एक लड़की जूस लेकर आती है और काश्वी के आगे जूस का गिलास रखते हुए कहती है—

“मैम, आपके लिए।”

काश्वी तो शॉक हो जाती है।

“कौन यार, इंटरव्यू में जूस देता है?”

वो उस लड़की से बोलती है—

“वो मेरे पास पानी है और आप मुझे ये दे रही हैं?”

उसी वक्त दो लड़के ट्रे लेकर अंदर आते हैं और सबको जूस देने लगते हैं।

काश्वी अपने मन में सोचने लगती है—

“कहीं ये लोग जूस पिलाकर बेहोश तो नहीं कर देंगे? मेरी किडनी निकालने का प्लान तो नहीं है? आजकल की न्यूज़ में भी तो कितनी खबरें आती हैं कि किडनी निकाल लेते है… इंटरव्यू के नाम पर किडनी निकालकर बेचने वाले लोग तो नहीं है!”

उसके दिमाग में तरह-तरह के ख्याल चलने लगते हैं।

तभी उस लड़की आवाज़ से काश्वी होश में आती है।

“मैम…”

काश्वी चौंक जाती है और ज़ोर से बोल उठती है—

“नहीं!”

उसकी आवाज़ सुनकर सारे लोग उसी की तरफ देखने लगते हैं।

काश्वी चारों तरफ देखकर बहुत एम्बैरेस हो जाती है।

“कुछ नहीं… मुझे कुछ याद आ गया था।”

वो जल्दी से वहाँ से निकलने वाली होती है कि तभी एक सत्ताईस साल का लड़का अंदर आते हुए आवाज़ लगाता है—

“मिस काश्वी शर्मा?”

वो लड़का राज पटेल था। हैंडसम, पाँच फीट ग्यारह इंच का और हमारे हीरो से थोड़ा कम लंबा।

काश्वी को उसे देखकर कुछ जाना-पहचाना-सा लगता है।

राज उसके पास आकर बोलता है—

“मिस काश्वी शर्मा, चलिए, आपका नंबर है।”

काश्वी सोचने लगती है—

“अभी तो आई हूँ और मेरा नंबर पहले कैसे आ सकता है? अब तो भागने का भी समय नहीं है। क्या करूँ मैं?”

यही सोचकर वो अपने चारों तरफ देखती है। लगभग सभी लोग जूस पी चुके थे।

काश्वी सोचती है—

“अभी तक तो कोई भी बेहोश नहीं हुआ!”

तभी राज को उसकी हालत देखकर हँसी आने लगती है।

राज आगे चलता है और काश्वी उसके पीछे-पीछे चलने लगती है।

कुछ ऑफिस की लड़कियाँ फुसफुसाकर बात कर रही थीं—

“ये राज सर इस लड़की को क्यों बुलाने आए हैं?”

“जो खुद बॉस के पर्सनल बॉडीगार्ड और सेक्रेटरी हैं, वो बॉस के अलावा किसी की बात नहीं सुनते। ये इस लड़की को खुद बुलाने आए हैं… पता नहीं क्या बात है!”

काश्वी उनकी बातें नहीं सुनती, वरना शायद पहले ही भाग जाती।

राज उसे लिफ्ट में ले जाता है।

अब तो काश्वी को और भी डर लग रहा था। वो अपने कपड़े मरोड़कर अपनी उँगलियों को आपस में फँसा रही थी।

लिफ्ट तैंतीसवें फ्लोर पर रुकती है।

बाहर का नज़ारा देखकर काश्वी का मन खुश हो जाता है। चारों तरफ फूलों के बागान बने हुए थे। जितने नीचे गार्डन में फूल-पौधे थे, उतने ही खूबसूरत फूल यहाँ भी लगे हुए थे।

और उनमें उसके सबसे पसंदीदा फूल—गुलाब थे।

उसे कुछ याद आने लगता है।

राज उसे आगे ले जाता है और एक गली से होते हुए एक रूम के पास पहुँचता है।

“इस रूम के अंदर जाना है।”

काश्वी अपना सिर हिला देती है।

राज बाहर चला जाता है।

काश्वी एक गहरी साँस लेते हुए अंदर जाने के लिए दरवाज़े के पास जाती है। वहाँ कोई नेमप्लेट नहीं लगी हुई थी, क्योंकि काश्वी के आने से पहले ही नेमप्लेट हटा दी गई थी।

दरवाज़ा खोलते ही अंदर का नज़ारा देखकर उसकी आँखें बड़ी हो जाती हैं।

“ये कोई केबिन है या होटल का कमरा?”

दीवारों पर लग्ज़ीरियस क्लासिकल एस्थेटिक लुक दिया गया था। एक तरफ स्टाइलिश सोफा था। एक तरफ ग्लास की वॉल थी, जहाँ से बाहर का खूबसूरत नज़ारा दिखाई दे रहा था।

पूरा कमरा ऐसा लग रहा था, जैसे किसी ने बहुत सोच-समझकर बनाया हो।

काश्वी अंदर आती है।

“गुड मॉर्निंग, सर।”

सामने बैठे मयंक ओबेरॉय 26 साल का (इस कंपनी में काम करता है और अद्विक का बूआ का बेटा है) काश्वी कोबैठने के लिए कहता है।

काश्वी बैठ जाती है और अपनी फाइल आगे करती है।

मयंक उसकी फाइल देखकर कुछ छोटे-मोटे सवाल पूछता है।

“आपका नाम?”

“काश्वी शर्मा।”

“कहाँ पढ़ी हैं?”

के. आई कॉलेज से।”

मयंक उससे कुछ और सवाल पूछता है। उसने कोई बहुत हार्ड क्वेश्चन नहीं पूछा।

कुछ देर बाद मयंक बोलता है—

“ओके, काश्वी। आप अभी से काम स्टार्ट कर सकती हैं।”

काश्वी हैरान होकर उसे देखने लगती है।

“क्या? मुझे कोई भारी क्वेशन पूछा ही नहीं? और मेरी जॉब लग गई?”

उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि उसकी नौकरी लग गई है।

मयंक मुस्कुराते हुए बोलता है—

“हाँ, आपकी जॉब लग चुकी है। आप बॉस के लिए बिल्कुल परफेक्ट हैं। मुझे बॉस के लिए एक अच्छी लड़की चाहिए थी।”

काश्वी कुछ अजीब-से एक्सप्रेशन करते हुए मयंक को देखने लगती है।

“सर, आप क्या बोल रहे हैं? मैं क्या…?”

मयंक बात संभालते हुए बोलता है—

“वो… आपने बताया था ना कि आपकी हॉबीज़ हरियाली और गार्डनिंग करना हैं। आपको फूल बहुत पसंद हैं और आप गार्डनिंग भी करती हैं। बॉस को भी ये सब चीज़ें बहुत पसंद हैं, तो बस मैंने इसी लिए कहा।”

काश्वी—

“अच्छा!”

मयंक मन ही मन फुसफुसाता है—

“बच गया यार!”

फिर वो बोलता है—

“तो ठीक है, आप यहाँ पर साइन कर दीजिए। उसके बाद बाहर इंतज़ार कीजिए। आपको डॉक्यूमेंट मिल जाएंगे।”

“ठीक है, सर।”

काश्वी को तो यकीन ही नहीं हो रहा था कि उसे नौकरी मिल गई है।

बहुत खुश होते हुए वो मयंक के दिए फॉर्म को कुछ देर देखती है और फिर उस पर साइन कर देती है।

फॉर्म में छोटे-छोटे अक्षरों में टर्म एंड कंडीशन लिखे थे, जिन्हें काश्वी ध्यान से देखती ही नहीं है। वो इतनी खुश थी कि उसका ध्यान उन चीज़ों पर गया ही नहीं।

मयंक के कहने पर वो बाहर चली जाती है।

बाहर आकर फूलों को देखकर काश्वी झूमने लगती है। वो फूलों से बात करने लगती है।

जैसे एक शख्स कब से उस पर नज़र रख रहा था। उसके गेट के अंदर आने से लेकर उसके हर एक्सप्रेशन को देख रहा था।

ये कोई और नहीं, हमारा हीरो आद्विक सेखावत था—ब्लैक स्टोन क्राउन इंडस्ट्रीज का मालिक।

उसकी एक नहीं, कई कंपनियाँ थीं। उसे खुद भी नहीं पता था कि उसकी कितनी कंपनियाँ देश-विदेश में फैली हुई थीं।

वो देश का नंबर वन बिजनेसमैन था और साथ ही एक माफिया भी था, जिसकी खबर मासूम-सी काश्वी को नहीं थी।

उस पर किसी की नज़र हर पल थी।

वहीं आद्विक अपनी बड़ी-सी किंग चेयर पर बैठकर दीवार पर लगी बड़ी-सी एलईडी पर काश्वी को देख रहा था। हाथ में ग्लास था और चेहरे पर एक टेढ़ी-सी मुस्कान।

वो धीमी आवाज़ में बोलता है—

“अब बस, काश्वी… तुम्हारे बगैर नहीं रह सकता। मुझे रोज़ तुम्हें देखना है, तुम्हें अपने पास रखना है। कुछ दिनों के लिए अपनी आज़ादी मना लो… इसके बाद तुम्हें मेरी कैद में होना होगा।”

यह बोलते हुए वो अपना सिर पीछे टिका देता है।

तभी बैकग्राउंड में एक रोमांटिक गाना बजने लगता है।

उधर मयंक आवाज़ लगाते हुए बोलता है—

“काश्वी, ये रहा तुम्हारा डॉक्यूमेंट। तुम्हारी जॉइनिंग मेल आ गई होगी, देखो चेक कर लेना।”

काश्वी मोबाइल से चेक करती है।

“अरे वाह! यहाँ तो सब कुछ कुछ ज़्यादा ही फास्ट है।”

“सर, मेल आ गया है। तो क्या मैं कल से आ सकती हूँ? मुझे घर जाना है और सबको बताना भी है।”

मयंक मुस्कुराते हुए बोलता है—

“हाँ, क्यों नहीं। उससे पहले बॉस से मिलोगी ना?”

काश्वी ने अन्वी से सुन रखा था कि आज तक इस कंपनी का बॉस किसी से नहीं मिलता, ना ही उसे किसी ने देखा है।

काश्वी को बॉस का नाम भी नहीं पता था। अन्वी ने उसे बॉस का नाम नहीं बताया था, क्योंकि उसे ज़रूरी नहीं लगा था। आखिर बॉस कभी इस कंपनी में आया ही नहीं था।

काश्वी सोचती है—

“मैं कितनी लकी हूँ! जिससे कोई नहीं मिलता, वो मुझसे मिलेगा।”

और मन ही मन सोचती है—

“अन्वी दीदी मैं तो कितनी लकी हूं यार!”

काश्वी यही सोच रही होती है कि मयंक उसे चलने के लिए कहता है।

“काश्वी, आइए।”

मयंक उसे लिफ्ट की तरफ ले जाता है।

लिफ्ट में जाते हुए काश्वी के दिल की धड़कनें अजीब-सी होने लगती हैं। उसे वही एहसास हो रहा था, जो चार साल पहले हुआ करता था।

लिफ्ट पैंतीसवें फ्लोर पर रुकती है।

दरवाज़ा खुलते ही मयंक काश्वी से बोलता है—

“काश्वी, अब तुम्हें आगे जाकर सामने राइट साइड में बॉस का कैबिन मिलेगा। तुम जाकर मिल लेना, ठीक है?”

“पर सर, मैं अकेले नहीं जा सकती।”

“मिस काश्वी, मैं खुद चलता, पर मेरी अभी बहुत इम्पॉर्टेंट मीटिंग है। सो, बाय!”

इतना बोलते हुए मयंक जल्दी से लिफ्ट का बटन प्रेस करता है और काश्वी को बाहर भेज देता है।

लिफ्ट का दरवाज़ा बंद होते ही मयंक गहरी साँस लेता है और अपना पसीना पोंछते हुए बोलता है—

“हे भगवान!”बच गया भाई का ओरा कितना खतरनाक है कि मुझे फिर से ही पसीने आ रहे हैं। बोलते - बोलते लिफ्ट से नीचे अपने कैबिन की तरफ चला जाता हैं।(

क्योंकि तैंतीसवें से पैंतीसवें फ्लोर तक किसी का आना मना था। खासकर पैंतीसवें फ्लोर पर तो सिर्फ आद्विक सेखावत ही आ सकता था। तैतीसवे फ्लोर पर काश्वी के इंटरव्यू के लिए मयंक को परमिशन मिली थी, जो कि आद्विक सेखावत का ही कैबिन था।

क्योंकि काश्वी को पता न चले कि ये आद्विक सेखावत का कैबिन है, इसलिए मयंक ने उसका इंटरव्यू लिया था।)

काश्वी बेचारी लिफ्ट का दरवाज़ा बंद होते हुए देखती है और धीरे-धीरे आगे बढ़ती है।

आगे ऐसा लग रहा था जैसे ऑक्सीजन भी परमिशन लेकर एंट्री ले रही हो।

पिन-ड्रॉप साइलेंस था।

आगे से राइट की तरफ एक ब्लैक एलिगेंट डोर था।

उसके सामने जाकर जैसे ही काश्वी दरवाज़ा नॉक करने वाली होती है, दरवाज़ा अपने आप खुल जाता है।

काश्वी कुछ झिझकते हुए अंदर बढ़ जाती है।

पूरा कैबिन ब्लैक कलर की थीम पर था, लेकिन बहुत एलिगेंट डिजाइन के साथ।

एक चेयर के पीछे कोई शख्स बैठा हुआ था। उसके सामने टेबल थी और आसपास बहुत महंगी चेयर्स लगी हुई थीं।

काश्वी चेयर के पास जाकर बोलती है—

“Good afternoon, sir.”

तब तक वो शख्स काश्वी की तरफ पीठ किए हुए था।

वो अपने हाथ से काश्वी को बैठने का इशारा करता है।

काश्वी बैठ जाती है।

काश्वी संकोच करते हुए बोलती है—

“सर, मैं काश्वी शर्मा हूँ और अभी-अभी मेरी जॉइनिंग हुई है।”

यह बोलते हुए वो शख्स अपनी चेयर घुमाकर काश्वी की तरफ आता है।

और तभी…

काश्वी का मुँह खुला का खुला रह जाता है।

उसकी दिल की धड़कनें अचानक बहुत तेज़ हो जाती हैं।

ये वही शख्स था…

काश्वी का प्यार।

वही इंसान जिसने कभी उसका दिल बुरी तरह तोड़ा था।

काश्वी की आँखों में हल्के आँसू आ जाते हैं, जिन्हें वो बाहर निकलने से रोक रही थी।

उसके होंठ काँपने लगते हैं।

और उसके मुँह से बस इतना निकलता है—

“आप…”

काश्वी अचानक अपनी कुर्सी से उठ खड़ी हुई।

उसकी आँखें सामने खड़े उस शख्स पर टिकी थीं, जिसे देखकर उसके दिल ने जैसे धड़कना ही भूल गया था।

तीन साल…

पूरे तीन साल बाद वो उसे अपने सामने देख रही थी।

वही चेहरा…

वही आँखें…

वही शांत, मगर अपने अंदर न जाने कितने राज़ छुपाए हुए चेहरा।

काश्वी के होंठ हल्के-से काँपे।

“आ… आप…”

आद्विक अपनी जगह बिल्कुल शांत खड़ा था।

उसकी आँखों में हैरानी का नाम तक नहीं था, जैसे वो इस मुलाकात का इंतज़ार पहले से कर रहा हो।

काश्वी ने पीछे हटने की कोशिश की।

“मुझे… मुझे जाना है।”

वो मुड़ने ही वाली थी कि आद्विक की गंभीर आवाज़ कमरे में गूँज उठी—

“बैठिए, मिस शर्मा।”

अगर आपको काश्वी और आद्विक की ये कहानी पसंद आई हो, तो अपना प्यार कमेंट में ज़रूर बताना 🥰❤️

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अगले चैप्टर में क्या होने वाला है, इसका अंदाज़ा है आपको? 👀💫

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मिलते हैं अगले चैप्टर में… तब तक कहानी से जुड़े रहिए! ❤️📖✨

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