आधी रात का रहस्य - Chapter 2
रात के बारह बजने में कुछ ही मिनट बाकी थे।
देशमुख हवेली पूरी तरह शांत हो चुकी थी। कुछ देर पहले तक जिस घर में मेहमानों की आवाजें, हंसी और बातचीत गूंज रही थी, वहां अब सिर्फ घड़ी की टिक-टिक सुनाई दे रही थी।
अनन्या अपने कमरे में खिड़की के पास खड़ी थी।
उसके हाथ में वही रहस्यमय लिफाफा था।
“अगर अपने परिवार का सच जानना चाहती हो, तो आधी रात को पुराने मंदिर में अकेली आना।”
और उसके नीचे लिखा था—
“कृष्णन परिवार पर भरोसा मत करना।”
अनन्या ने संदेश को दोबारा पढ़ा।
“कृष्णन परिवार…”
उसके दिमाग में आदित्य का चेहरा घूम गया।
पहली मुलाकात में ही उसे लगा था कि आदित्य के पीछे कोई ऐसी कहानी है जो वह खुद भी नहीं बता रहा।
लेकिन क्या वह कहानी उसके परिवार से जुड़ी थी?
अनन्या ने लिफाफा मोड़ा और अपने ब्लाउज के अंदर सुरक्षित रख लिया।
वह दरवाजे की तरफ बढ़ी।
लेकिन जैसे ही उसने कुंडी खोली, बाहर किसी के कदमों की आहट सुनाई दी।
अनन्या तुरंत रुक गई।
कदम उसके कमरे के बाहर आकर रुक गए।
कुछ सेकंड तक सन्नाटा रहा।
फिर कोई धीरे से वहां से चला गया।
अनन्या ने दरवाजा खोला।
गलियारा खाली था।
उसने नीचे देखा।
फर्श पर एक छोटा-सा चांदी का लॉकेट पड़ा था।
अनन्या ने उसे उठाया।
लॉकेट के पीछे सिर्फ एक अक्षर खुदा था—
“A”
उसने भौंहें सिकोड़ लीं।
“A…”
आदित्य?
या कोई और?
उसने लॉकेट अपनी मुट्ठी में बंद कर लिया।
अब उसका वहां जाना और भी जरूरी हो गया था।
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आधी रात होते ही अनन्या चुपचाप हवेली से बाहर निकली।
उसने साधारण काला कुर्ता पहना था और अपने बाल बांध रखे थे।
पुराने मंदिर तक जाने वाला रास्ता हवेली के पीछे से होकर जाता था।
आसमान पर बादल छाए हुए थे।
चांद कभी दिखाई देता और कभी बादलों के पीछे छिप जाता।
अनन्या तेजी से चल रही थी।
लेकिन उसे यह पता नहीं था कि कोई दूर से उसका पीछा कर रहा था।
वह पुराने मंदिर के पास पहुंची।
मंदिर कई वर्षों से बंद पड़ा था।
उसकी दीवारों पर काई जम चुकी थी और मुख्य दरवाजे पर लोहे की पुरानी जंजीर लटकी थी।
अनन्या ने आसपास देखा।
“कोई है?”
कोई जवाब नहीं आया।
वह अंदर चली गई।
मंदिर के अंदर अंधेरा था।
सिर्फ टूटी हुई खिड़की से आती चांदनी फर्श पर पड़ रही थी।
तभी पीछे से आवाज आई—
“तुम्हें यहां नहीं आना चाहिए था।”
अनन्या तुरंत पलटी।
एक काले कपड़ों में आदमी स्तंभ के पीछे खड़ा था।
चेहरा कपड़े से ढका हुआ था।
अनन्या ने साहस के साथ पूछा—
“तुमने मुझे बुलाया था?”
“हाँ।”
“मेरे परिवार का सच क्या है?”
वह व्यक्ति कुछ सेकंड चुप रहा।
फिर बोला—
“तुम्हारे परिवार और कृष्णन परिवार के बीच जो रिश्ता है, वह सिर्फ व्यापार या दोस्ती का नहीं है।”
अनन्या की आंखें सिकुड़ गईं।
“तो क्या है?”
वह व्यक्ति धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ा।
“बीस साल पहले…”
अचानक मंदिर के बाहर किसी गाड़ी के रुकने की आवाज आई।
वह व्यक्ति घबरा गया।
“वे लोग यहां पहुंच गए हैं।”
“कौन?”
लेकिन वह पीछे की दीवार की तरफ भागा।
अनन्या ने उसका पीछा किया।
वह एक छोटे दरवाजे से बाहर निकलने ही वाला था कि अनन्या ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“रुको!”
उस आदमी ने उसे धक्का देने की कोशिश की।
अनन्या पीछे नहीं हटी।
उसने उसका हाथ मोड़कर उसे रोक लिया।
“मुझे जवाब चाहिए!”
आदमी ने अपना हाथ छुड़ाया और अंधेरे में भाग गया।
अनन्या उसके पीछे जाने लगी।
लेकिन तभी किसी ने पीछे से उसका नाम पुकारा—
“अनन्या!”
वह रुक गई।
आवाज पहचानते ही उसका चेहरा बदल गया।
आदित्य।
वह मंदिर के दरवाजे पर खड़ा था।
अनन्या ने गुस्से से पूछा—
“तुम यहां क्या कर रहे हो?”
आदित्य उसके पास आया।
“यह सवाल मुझे तुमसे पूछना चाहिए।”
“मैंने तुमसे सवाल पूछा है।”
“और मैं जवाब देने के लिए यहां नहीं आया।”
“तो फिर?”
आदित्य ने गंभीर होकर कहा—
“तुम्हें किसी ने यहां बुलाया था।”
अनन्या चौंकी।
“तुम्हें कैसे पता?”
आदित्य कुछ पल चुप रहा।
“क्योंकि मुझे भी एक संदेश मिला था।”
अनन्या की आंखें फैल गईं।
“क्या लिखा था?”
आदित्य ने जेब से एक मुड़ा हुआ कागज निकाला।
उस पर लिखा था—
“अगर अनन्या को बचाना है, तो आधी रात को पुराने मंदिर में आना।”
दोनों एक-दूसरे को देखते रह गए।
अनन्या ने धीमे स्वर में कहा—
“मतलब किसी ने हम दोनों को यहां बुलाया।”
“हाँ।”
“लेकिन क्यों?”
आदित्य ने मंदिर के अंदर देखा।
“शायद हमें डराने के लिए।”
अनन्या ने तुरंत सिर हिलाया।
“नहीं।”
“क्या?”
“जो व्यक्ति मुझे बुलाकर मेरे परिवार के बारे में बात करना चाहता था, वह सिर्फ डराना नहीं चाहता। वह कुछ बताना चाहता है।”
आदित्य ने उसे ध्यान से देखा।
“तुम हमेशा इतनी जल्दी निष्कर्ष पर पहुंच जाती हो?”
“और तुम हमेशा इतनी देर से सच स्वीकार करते हो?”
आदित्य हल्का मुस्कुराया।
लेकिन उसी पल मंदिर के अंदर से किसी चीज के गिरने की आवाज आई।
दोनों तुरंत अंदर दौड़े।
वहां कोई नहीं था।
लेकिन जमीन पर एक पुरानी लकड़ी की पेटी पड़ी थी।
उसका ढक्कन खुला हुआ था।
अंदर पुराने कागज, तस्वीरें और एक लाल कपड़े में लिपटी छोटी-सी वस्तु थी।
अनन्या ने एक तस्वीर उठाई।
तस्वीर देखकर उसका चेहरा सफेद पड़ गया।
उसमें उसके पिता विक्रम देशमुख और राघवन कृष्णन साथ खड़े थे।
लेकिन तस्वीर के बीच में एक और व्यक्ति था।
एक महिला।
अनन्या ने तस्वीर पलटी।
पीछे लिखा था—
“देशमुख और कृष्णन परिवार — एक वादा, एक विश्वास, एक विश्वासघात।”
अनन्या की उंगलियां कांपने लगीं।
“यह महिला कौन है?”
आदित्य ने तस्वीर अपने हाथ में ली।
उसका चेहरा भी अचानक गंभीर हो गया।
“मैं इन्हें जानता हूँ।”
अनन्या ने उसकी तरफ देखा।
“कौन हैं?”
आदित्य ने धीमे स्वर में कहा—
“मेरी मां की बड़ी बहन।”
अनन्या स्तब्ध रह गई।
“लेकिन तुम्हारी मां की बड़ी बहन तो…”
“मर चुकी हैं।”
कुछ पल तक दोनों के बीच सन्नाटा रहा।
अनन्या ने तस्वीर फिर अपने हाथ में ली।
“मेरे पिता इनके साथ क्यों थे?”
आदित्य ने जवाब नहीं दिया।
तभी पेटी के अंदर से एक पुराना लिफाफा नीचे गिरा।
अनन्या ने उसे उठाया।
उस पर लिखा था—
“सिर्फ अनन्या के लिए।”
उसने लिफाफा खोला।
अंदर एक पुराना पत्र था।
अनन्या ने पढ़ना शुरू किया।
कुछ पंक्तियां पढ़ते ही उसकी आंखों में आंसू आ गए।
पत्र में लिखा था कि बीस साल पहले दोनों परिवारों के बीच एक ऐसा समझौता हुआ था जिसने कई जिंदगियां बदल दी थीं।
लेकिन पत्र का सबसे बड़ा हिस्सा फटा हुआ था।
सिर्फ आखिरी लाइन बची थी—
“जिस दिन अनन्या और आदित्य एक-दूसरे के करीब आएंगे, उसी दिन वह राज़ फिर से सामने आएगा…”
अनन्या ने पत्र हाथ से गिरा दिया।
उसने आदित्य की तरफ देखा।
“हमारे करीब आने से… राज़ क्यों सामने आएगा?”
आदित्य भी कुछ समझ नहीं पा रहा था।
“मुझे नहीं पता।”
“तुम कुछ छुपा रहे हो।”
“नहीं।”
“झूठ!”
अनन्या की आवाज मंदिर में गूंज उठी।
आदित्य ने उसकी आंखों में देखा।
“अगर मुझे कुछ पता होता, तो मैं तुम्हें यहां आने से रोकता।”
अनन्या चुप हो गई।
कुछ पल बाद आदित्य ने कहा—
“लेकिन अब एक बात साफ है।”
“क्या?”
“हमारे परिवारों के बीच सिर्फ पुराना रिश्ता नहीं है।”
“तो?”
आदित्य ने तस्वीर की तरफ देखते हुए कहा—
“हमारे परिवारों के बीच एक ऐसा राज़ है, जिसकी वजह से शायद किसी ने बीस साल तक सच छुपाया।”
अचानक मंदिर के बाहर किसी के दौड़ने की आवाज आई।
आदित्य ने तुरंत अनन्या को पीछे किया।
“कोई है।”
दोनों बाहर आए।
दूर अंधेरे में एक परछाईं भाग रही थी।
आदित्य उसके पीछे दौड़ा।
अनन्या भी उसके पीछे भागी।
लेकिन कुछ ही दूरी पर वह व्यक्ति गायब हो चुका था।
जमीन पर सिर्फ एक वस्तु पड़ी थी।
एक काला रूमाल।
अनन्या ने उसे उठाया।
उस पर सुनहरे धागे से वही अक्षर बना था—
“A”
अनन्या ने आदित्य की तरफ देखा।
“यह तुम्हारा है?”
आदित्य ने रूमाल देखा।
उसका चेहरा अचानक बदल गया।
“नहीं।”
“तुम्हें यकीन है?”
“हाँ।”
आदित्य ने धीमे स्वर में कहा—
“लेकिन मैं जानता हूँ कि यह किसका है।”
अनन्या ने पूछा—
“किसका?”
आदित्य ने अंधेरे की तरफ देखा।
“मेरे परिवार में एक ऐसा इंसान है, जिसे हम बीस साल से मरा हुआ समझते हैं।”
अनन्या की सांस रुक गई।
“क्या?”
आदित्य ने उसकी तरफ देखा।
“और अगर मैं गलत नहीं हूँ…”
वह कुछ पल रुका।
फिर बोला—
“वह आज रात इसी मंदिर में था।”
दूर कहीं मंदिर की घंटी अचानक बज उठी।
दोनों ने एक साथ पीछे मुड़कर देखा।
मंदिर के अंदर कोई नहीं था।
लेकिन फर्श पर लाल रंग से एक वाक्य लिखा था—
“खेल अभी शुरू हुआ है।”
अनन्या ने आदित्य की तरफ देखा।
उसे पहली बार एहसास हुआ कि यह सिर्फ दो परिवारों की कहानी नहीं थी।
यह उनके अपने अतीत की कहानी थी।
और शायद…
उनका प्यार भी इसी रहस्य का हिस्सा था।
जारी रहेगा…