Jalim Hukum Sa - Chapter 1
राजस्थान की राजधानी जयपुर की रात आज कुछ अलग ही थी।
शहर की पुरानी हवेलियों और राजसी इमारतों के बीच खड़ा वह विशाल महल आज किसी दुल्हन की तरह सजा हुआ था। ऊँची-ऊँची दीवारों पर सुनहरी रोशनियाँ झिलमिला रही थीं। महल के मुख्य द्वार से लेकर भीतर के विशाल आँगन तक हर तरफ फूलों की लड़ियाँ और चमचमाते झूमर अपनी खूबसूरती बिखेर रहे थे।
हवा में गुलाब और मोगरे की खुशबू घुली हुई थी।
राजस्थानी लोक संगीत की मधुर धुन पूरे महल में गूँज रही थी और उसके साथ ही कहीं से आती ढोल की थाप माहौल में एक अलग ही उत्साह भर रही थी।
आज इस महल में सिर्फ एक शादी नहीं थी।
आज राजस्थान के सबसे ताकतवर नामों में से एक नाम की शादी थी।
अथर्व हुकुम सा।
राजस्थान के बड़े-बड़े कारोबारी, राजनेता, उद्योगपति और रईस परिवार इस शादी का हिस्सा बनने के लिए जयपुर पहुँचे थे। महल के बाहर महँगी गाड़ियों की कतार लगी थी और भीतर हर तरफ बड़े नामों की मौजूदगी साफ दिखाई दे रही थी।
महल के आँगन में बच्चे अपनी ही दुनिया में मग्न होकर इधर-उधर भाग रहे थे। बुज़ुर्ग एक-दूसरे से पुराने रिश्तों की बातें कर रहे थे। महिलाएँ दुल्हन के श्रृंगार और शादी की तैयारियों में व्यस्त थीं, तो कुछ युवा रिश्तेदार हँसी-मज़ाक में लगे हुए थे।
हर चेहरे पर खुशी थी।
हर तरफ उत्सव था।
लेकिन उसी महल के भीतर...
दो कमरों में दो बिल्कुल अलग दुनिया बसी हुई थीं।
एक कमरे में था वह पुरुष, जिसकी मौजूदगी मात्र से महफिलों का शोर थम जाता था।
और दूसरे कमरे में थी वह लड़की, जिसकी आँखों में आज खुशी से ज्यादा एक खामोश सवाल था।
दोनों की दुनिया अलग थी।
लेकिन आज...
उन दोनों दुनियाओं को एक ही रिश्ते के नाम से जोड़ दिया जाना था।
महल की ऊपरी मंज़िल पर बने एक विशाल कमरे में अथर्व हुकुम सा खड़े थे।
कमरे की बड़ी-बड़ी खिड़कियों से बाहर पूरा महल दिखाई दे रहा था, लेकिन उनकी नजरें बाहर की रौनक पर नहीं थीं।
उनकी नजरें आईने में खुद पर टिकी थीं।
गहरे सुनहरे रंग की शेरवानी उनके व्यक्तित्व पर इस तरह जँच रही थी, जैसे वह खास उनके लिए ही बनाई गई हो। चौड़े कंधे, ऊँचा कद, सधा हुआ व्यक्तित्व और चेहरे पर वह गंभीरता, जिसे देखकर सामने वाला अनायास ही अपनी आवाज धीमी कर ले।
उनकी काली, गहरी आँखें हमेशा की तरह शांत थीं।
लेकिन उस शांति के पीछे छिपे तूफान से राजस्थान का शायद ही कोई बड़ा आदमी अनजान था।
हल्की दाढ़ी से सजा उनका चेहरा उनकी गंभीरता को और निखार रहा था। घने बालों की कुछ लटें माथे पर हल्के से झूल रही थीं।
अथर्व हुकुम सा...
नाम ही काफी था।
वह उन लोगों में से नहीं थे जिन्हें अपनी ताकत साबित करने के लिए आवाज ऊँची करनी पड़े।
उनकी खामोशी ही काफी थी।
लोग उनके सामने बोलने से पहले कई बार सोचते थे।
उनकी आँखों में आँखें डालने से पहले लोग अपनी नजरें झुका लिया करते थे।
क्योंकि अथर्व के गुस्से की तपिश झेलने की हिम्मत हर किसी में नहीं थी।
वह अपने फैसलों के लिए जाने जाते थे।
सख्त।
स्पष्ट।
और बेरहम।
उनकी दुनिया में भावनाओं के लिए जगह बहुत छोटी थी।
उनके लिए रिश्ते भी अक्सर जिम्मेदारियाँ और सौदे बनकर रह जाते थे।
और शायद यही वजह थी कि आज अपनी शादी के दिन भी उनके चेहरे पर कोई उत्साह नहीं था।
न मुस्कान।
न घबराहट।
न खुशी।
बस वही ठहरा हुआ चेहरा...
जैसे यह शादी भी उनके जीवन का कोई जरूरी समझौता भर हो।
उन्होंने आईने से नजर हटाई और अपनी घड़ी पर एक नजर डाली।
कुछ ही देर में बारात निकलने वाली थी।
लेकिन उनके भीतर कुछ भी नहीं बदल रहा था।
उधर...
महल के दूसरे हिस्से में बने दुल्हन के कमरे में बिल्कुल अलग माहौल था।
कमरे में गुलाब की पंखुड़ियाँ बिखरी थीं। सामने बड़े से आईने के चारों तरफ सुनहरी रोशनियाँ जल रही थीं और बीच में बैठी थी...
सौम्या राणा।
लाल रंग के भारी ब्राइडल लहंगे में सजी सौम्या किसी राजसी चित्र से निकली हुई लग रही थी।
उसके लहंगे पर की गई महीन कढ़ाई रोशनी पड़ते ही चमक उठती थी। माथे पर सजा मांगटीका, कानों में झूमते भारी झुमके और हाथों में भरी चूड़ियाँ उसकी खूबसूरती को और निखार रही थीं।
लेकिन उसकी सबसे खूबसूरत चीज...
उसकी आँखें थीं।
बड़ी-बड़ी मासूम आँखें।
जिनमें आज काजल से ज्यादा सवाल थे।
होठों पर एक हल्की-सी मुस्कान थी।
लेकिन वह मुस्कान आँखों तक नहीं पहुँच रही थी।
सौम्या आईने में खुद को देख रही थी।
आज उसे दुल्हन बनना था।
आज उसे किसी की पत्नी बनना था।
लेकिन यह फैसला उसका नहीं था।
यह शादी उसकी मर्जी से नहीं हो रही थी।
यह एक सौदा था।
एक ऐसा सौदा जिसमें दो परिवारों के भविष्य की कीमत एक लड़की की जिंदगी से चुकाई जा रही थी।
सौम्या ने धीरे से अपनी आँखें बंद कर लीं।
उसे अपने भाई का चेहरा याद आया।
उसकी कंपनी पिछले कई महीनों से भारी नुकसान में चल रही थी। कर्ज बढ़ता जा रहा था और हालात इतने बिगड़ चुके थे कि परिवार का कारोबार बंद होने की कगार पर था।
तभी अथर्व हुकुम सा की कंपनी ने उनका हाथ थामा था।
निवेश के नाम पर।
मदद के नाम पर।
लेकिन उस मदद की एक कीमत थी।
यह शादी।
सौम्या जानती थी कि अगर उसने इस रिश्ते से इनकार किया...
तो सिर्फ उसकी जिंदगी नहीं बदलेगी।
उसके परिवार की जिंदगी भी बिखर सकती है।
और सौम्या उन लड़कियों में से नहीं थी जो अपने अपनों को टूटते हुए देखकर खुद को बचा लें।
उसने हमेशा अपने परिवार की खुशी को अपनी खुशी से ऊपर रखा था।
आज भी वही कर रही थी।
बस फर्क इतना था कि आज उसके दिल को समझाना थोड़ा मुश्किल था।
उसने अपनी आँखों के कोने में आई नमी को उँगली से साफ किया और खुद से धीमे से कहा—
“कुछ रिश्ते हमारी पसंद से नहीं मिलते... लेकिन शायद वक्त उन्हें हमारी किस्मत बना देता है।”
उसकी आवाज बहुत धीमी थी।
इतनी धीमी कि शायद उसके अलावा किसी ने उसे सुना भी नहीं।
दरवाजे के बाहर अचानक शहनाई की आवाज और तेज हो गई।
सौम्या ने एक बार फिर आईने में खुद को देखा।
उसने अपने चेहरे पर मुस्कान लाने की कोशिश की।
इस बार मुस्कान थोड़ी सच्ची थी।
क्योंकि उसे याद था...
उसके परिवार की खुशियाँ इसी मुस्कान से जुड़ी थीं।
महल के दूसरे छोर पर अथर्व भी कमरे से बाहर निकल चुके थे।
उनके कदमों की आहट के साथ ही आसपास खड़े लोग एक तरफ होने लगे।
किसी ने सिर झुकाकर उन्हें सलाम किया।
अथर्व ने सिर्फ हल्का-सा सिर हिलाया।
To be continue....