Jalim Hukum Sa - Chapter 3
अब आगे...
अर्धव ने सौम्या का हाथ मजबूती से थामा और बिना उसकी तरफ देखे उसे अपनी गाड़ी की ओर ले जाने लगा।
मंडप के चारों ओर अब भी शादी की रस्मों की खुशबू तैर रही थी। कहीं फूलों की पंखुड़ियां बिखरी पड़ी थीं, कहीं बुझते हुए दीपक धीमी लौ में जल रहे थे। कुछ देर पहले जिस जगह हंसी, शहनाइयों और मंत्रों की आवाजें गूंज रही थीं, वहीं अब एक अजीब-सी खामोशी उतरने लगी थी।
अथर्व के पीछे उसका पूरा परिवार भी विदा लेने लगा।
एक-एक कर सभी ने हाथ जोड़कर सामने खड़े लोगों से विदाई ली और अपनी-अपनी गाड़ियों की तरफ बढ़ गए।
वहीं सौम्या के मां-पापा और उसका भाई विक्रम राणा बस उसे देखते रह गए।
उनकी आंखों के सामने उनकी बेटी लाल जोड़े में अपने पति के साथ जा रही थी, लेकिन उस विदाई में वह खुशी नहीं थी जो किसी बेटी के विवाह के बाद उसके मायके से विदा होते समय होती है।
सौम्या भी बार-बार अपनी गर्दन मोड़कर पीछे देख रही थी।
उसकी नजर सबसे पहले अपनी मां पर टिकती, फिर पिता पर और आखिर में विक्रम पर।
उसकी आंखों से आंसू लगातार बह रहे थे।
उसका मन चीख-चीखकर कह रहा था कि वह वापस दौड़ जाए, अपनी मां के गले लग जाए, अपने पिता के पैर छूकर आशीर्वाद ले और भाई के सीने से लगकर खूब रोए।
लेकिन उसके कदम अथर्व के साथ बढ़ते जा रहे थे।
क्योंकि सच यही था...
यह शादी शादी नहीं, एक सौदा थी।
और उस सौदे में सौम्या के पास अपनी पसंद, अपनी इच्छा और अपने रिश्तों के लिए कोई जगह नहीं थी।
उसने आखिरी बार मुड़कर अपने घरवालों को देखा।
उसकी मां की आंखों से आंसू बह रहे थे। पिता ने अपनी भावनाओं को रोकने की लाख कोशिश की, लेकिन उनकी आंखें भीग चुकी थीं।
विक्रम ने अपने होंठ भींच रखे थे।
वह अपनी बहन को रोकना चाहता था।
लेकिन वह जानता था, इस समय उसके पास करने के लिए कुछ नहीं था।
अथर्व ने गाड़ी का दरवाजा खोला और बिना कुछ कहे सौम्या को अंदर बैठा दिया।
फिर दरवाजा बंद किया और गाड़ी की दूसरी तरफ से जाकर खुद ड्राइविंग सीट पर बैठ गया।
कुछ ही सेकंड बाद गाड़ी वहां से निकल गई।
उसके पीछे बाकी गाड़ियां भी एक-एक करके हवेली के लिए रवाना होने लगीं।
जैसे-जैसे गाड़ियां दूर होती गईं, सौम्या की आंखों के सामने उसका मायका धुंधला पड़ता गया।
वह मुड़-मुड़कर पीछे देखती रही।
फिर एक मोड़ आया...
और उसका घर उसकी नजरों से पूरी तरह ओझल हो गया।
उसी पल उसकी आंखों से एक और आंसू गिरा।
वह कुछ नहीं बोली।
बस दोनों हाथों को अपनी गोद में समेटकर बैठ गई।
उधर विक्रम कुछ कदम आगे बढ़ा और आखिरकार खुद को रोक नहीं पाया।
वह अपनी मां से लिपट गया।
मां ने भी बेटे को कसकर पकड़ लिया।
दोनों की सिसकियां वहीं दब गईं।
उनकी बच्ची...
बिना उनसे मिले...
बिना उनका आशीर्वाद लिए...
मंडप से ही अपने पति के साथ विदा हो चुकी थी।
यह दृश्य एक मां-बाप के लिए कितना असहनीय था, इसे शायद शब्दों में कभी नहीं कहा जा सकता था।
वहीं गाड़ी के अंदर सौम्या के हाथ-पैर बुरी तरह कांप रहे थे।
उसकी उंगलियां एक-दूसरे में उलझी हुई थीं।
आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे।
वह अपने दिल को समझाने की कोशिश कर रही थी कि उसे मजबूत बनना होगा।
लेकिन हर कोशिश नाकाम हो रही थी।
कुछ मिनटों तक अर्धव ने कुछ नहीं कहा।
गाड़ी की खिड़कियों से शहर की रोशनी अंदर-बाहर हो रही थी। सड़क के किनारे लगी लाइटें एक के बाद एक पीछे छूटती जा रही थीं।
फिर अचानक अथर्व की आवाज ने उस खामोशी को तोड़ दिया।
"मुझे यह रोना-धोना पसंद नहीं है। अपने आंसू साफ करो और चुपचाप बैठो।"
सौम्या ने उसकी तरफ देखा भी नहीं।
उसने बस एक लंबी, गहरी हिचकी ली।
उसके कंधे कांप उठे।
उसने अपने आंसुओं को रोकने की कोशिश की।
लेकिन हिचकियां रुकने के बजाय और बढ़ गईं।
यह देखकर अथर्व ने पास रखी पानी की बोतल उठाई और उसकी तरफ फेंक दी।
बोतल सौम्या की गोद में आकर गिरी।
सौम्या घबराकर उसे उठाने लगी।
उसने जल्दी से ढक्कन खोला और कांपते हाथों से पानी पीने लगी।
कुछ घूंट पानी उसके गले से नीचे उतरा, लेकिन उसके भीतर उठता तूफान शांत नहीं हुआ।
उसका घूंघट अब भी उसके चेहरे पर था।
अथर्व ने उसकी तरफ देखा तक नहीं।
उसकी नजर सड़क पर थी।
शादी के लिए पूरे शहर को रोशनी से सजाया गया था। दूर-दूर तक सजी लाइटें, हवेली की ओर जाती सड़क पर लगाए गए फूलों के मेहराब और जगह-जगह जलते दीपक इस रात को खूबसूरत बना रहे थे।
लेकिन उस खूबसूरती के बीच गाड़ी में बैठी सौम्या का मन बिल्कुल खाली था।
लगभग आधे घंटे के सफर के बाद गाड़ी आखिरकार विशाल हवेली के सामने जाकर रुकी।
गाड़ी के रुकते ही अथर्व बिना एक पल गंवाए बाहर निकल गया।
फिर वह दूसरी तरफ आया और सौम्या का दरवाजा खोल दिया।
उसने उसका हाथ पकड़ लिया और लगभग खींचते हुए उसे गाड़ी से बाहर निकाला।
सौम्या ने एक हाथ से अपना भारी लहंगा संभाला और दूसरे हाथ से उसके हाथ की पकड़ से खुद को संतुलित करने की कोशिश की।
वह मुश्किल से उसके पीछे कदम बढ़ा रही थी।
हवेली का मुख्य दरवाजा रोशनी से जगमगा रहा था।
सीढ़ियों के दोनों तरफ बड़े-बड़े दीपक जल रहे थे। फूलों की लंबी झालरें दरवाजे से लेकर छत तक सजी थीं।
वहीं मुख्य द्वार पर अथर्व की मां रीना जी खड़ी थीं।
उनके हाथ में पूजा की थाली थी और चेहरे पर स्वागत की एक अलग ही चमक थी।
अथर्व ने सौम्या का हाथ छोड़ दिया।
रीना जी ने दोनों को देखकर उनकी आरती उतारी।
फिर उन्होंने सौम्या के कंधे पर हाथ रखा।
"बेटा, अपने दाएं पैर से कलश को अंदर धकेलो और फिर आलता की थाली में कदम रखकर घर के अंदर आओ।"
सौम्या ने धीरे से सिर हिलाया।
उसने कांपते हाथों से अपना लहंगा थोड़ा ऊपर उठाया ताकि कपड़े पैरों में न उलझें।
फिर उसने अपने दाएं पैर से कलश को धीरे-से अंदर की तरफ धकेला।
चावल बिखरकर दरवाजे के दोनों ओर फैल गए।
इसके बाद उसने थाली में कदम रखा।
उसके पैरों के नीचे लाल रंग की छाप बनने लगी।
एक नई दुल्हन के रूप में वह इस घर में प्रवेश कर रही थी...
लेकिन उसके चेहरे पर नई जिंदगी की खुशी का एक भी रंग नहीं था।
अथर्व ने उसकी तरफ देखा तक नहीं।
वह उसी समय उसे वहीं छोड़कर अंदर की तरफ अपने कमरे में चला गया।
जाते-जाते उसके और सौम्या के बीच बंधा गठबंधन नीचे की ओर खिंचने लगा।
सौम्या की नजर तुरंत उस पर गई।
उसने जल्दी से हाथ बढ़ाया और गठबंधन को गिरने से बचा लिया।
कुछ पल तक वह उस कपड़े को देखती रही।
फिर उसने उसे समेटकर अपने सीने से लगा लिया।
उसकी आंखें फिर भर आईं।
रीना जी ने यह देखा तो धीरे से उसके सिर पर हाथ रखा।
"बेटा..."
सौम्या ने उनकी तरफ देखा।
रीना जी के चेहरे पर अब पहले जैसी मुस्कान नहीं थी।
"तुम्हारा यह सफर आसान नहीं होगा।"
सौम्या की पलकों पर आंसू ठहर गए।
रीना जी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,
"लेकिन मेरी एक दुआ है... इस सफर में तुम्हारी हिम्मत कभी न टूटे।"
सौम्या कुछ नहीं कह पाई।
वह बस झुककर रीना जी के पैर छूने लगी।
रीना जी ने उसे आशीर्वाद दिया।
फिर उनका स्वर थोड़ा बदल गया।
"लेकिन कुछ बातें तुम्हें अभी से समझनी होंगी।"
सौम्या ने सिर उठाया।
"तुम्हें अपना घूंघट उठाने की इजाजत नहीं है। तुम सिर्फ अपने पति के सामने और अपने कमरे में घूंघट उठा सकती हो। इस पूरे महल में तुम्हें घूंघट के साथ ही रहना होगा।"
सौम्या की उंगलियां आपस में कस गईं।
रीना जी आगे बोलीं,
"और अगर तुम्हें किसी से कुछ कहना हो, तो पहले मेरे पास आना होगा... या अपने पति से कहना होगा। तुम अपनी मर्जी से किसी से कुछ नहीं कह सकतीं।"
कुछ पल रुककर उन्होंने जोड़ा,
"यह तुम्हारे पति का आदेश है। उन्होंने मुझसे कहा था कि ये बातें तुम्हें मैं समझा दूं।"
To be continue...