Mafia's War - Chapter 3
अब आगे...
अगली सुबह
चार बजे—
कृष्णा अपनी जिम में पूरे फोकस के साथ एक्सरसाइज कर रहा था। उसके हर मूवमेंट में एक अजीब-सी सख्ती और अनुशासन झलक रहा था। तभी दरवाज़ा खुलता है और समर अंदर आता है।
समर: गुड मॉर्निंग, कृष।
कृष: (बिना रुके) गुड मॉर्निंग… वो कहाँ है?
समर: सर जी की नींद पूरी नहीं हुई है। कह रहा है शाम को करेगा, अभी नहीं।
कृष अचानक रुक जाता है, उसकी आँखों में सख्ती उतर आती है।
कृष: उसे उठा कर ला। अभी… इसी वक्त। बॉडी की जान की ज़रूरत पड़ेगी, और उसमें इतनी ताकत होनी चाहिए कि वो खुद को संभाल सके।
समर: (हल्की मुस्कान के साथ) कोई नहीं… सोने दे आज। वैसे भी कभी-कभी ही तो सोता है। और हम दोनों हैं ना उसके साथ—
कृष बीच में ही रोक देता है।
कृष: समर… भूल मत। जहाँ हम शासन करते हैं, वहाँ एक छोटी-सी चूक… हमारा वजूद खत्म कर सकती है।
समर उसकी आँखों में आँखें डालकर ठहर जाता है।
समर: मुझे लायन पर पूरा भरोसा है। उसका खुद का वजूद मिट जाएगा, लेकिन वो हमारे वजूद को किसी को छूने तक नहीं देगा।
ये सुनकर कृष के जबड़े भींच जाते हैं।
कृष: (धीमे मगर खतरनाक स्वर में) भूल मत… किसकी आँखों में आँखें डाल रहा है। और ये भी मत भूल—मैंने ये जंग उसी वजूद के लिए शुरू की है, जिसे मिटाने की साज़िश सालों से हो रही थी।
समर की आवाज़ अब और गहरी हो जाती है।
समर: तू भी मत भूल… मैं सब मिटा कर तेरे साथ खड़ा हूँ। और जो सो रहा है… उसने भी वही खोया है, जो तूने खोया है। उस दिन वजूद सिर्फ तेरा नहीं, हम सबका खोया था।
और अगर बचे हुए वजूद की तरफ किसी ने आँख उठाकर देखा ना… तो इतना दम है कि उसे बीच से फाड़ दूँ।
कुछ पल के लिए कमरे में सन्नाटा छा जाता है।
कृष नज़रें फेर लेता है।
कृष: मुझे सब परफेक्ट चाहिए। अगर तुम ऐसे ही रहोगे, तो अपने विला में रहने लगो। मुझे अकेला छोड़ दो… मेरे पास जो है, मैं उसके साथ खुश हूँ।
समर की आँखों में हल्की टीस झलकती है।
समर: तुम दोनों के पास कुछ है… लेकिन मेरे पास कुछ नहीं।
और रही बात अकेला छोड़ने की—तो सुन, तू खुद से दूर कर खुद को अकेला नहीं करेगा… हमें अकेला करेगा।
कृष: (ठंडे स्वर में) I don’t care… मुझे शांति चाहिए। आज चुपचाप अपने विला चले जाना। कोई बात हुई… तो देख लेंगे।
कृष बिना पीछे देखे वहाँ से निकल जाता है।
“देख लेंगे…” ये शब्द सुनकर समर के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ जाती है।
उसे पता था—कृष को अपने आसपास शांति पसंद है… और दो लोगों की मौजूदगी ही उसके लिए सबसे बड़ी अशांति बन जाती है।
कृष सीधे शौर्य के कमरे में जाता है।
दरवाज़ा खोलते ही वो एक बाल्टी ठंडा पानी शौर्य पर उड़ेल देता है।
शौर्य कुछ रिएक्ट करता उससे पहले कृष की कड़क आवाज उसके कानों में पड़ती है।
कृष: (सख्ती से) अगले दस मिनट में मुझे जिम में चाहिए तू।
ये कह कृष बिना उसकी सुने वापस जिम में आकर फिर से एक्सरसाइज में जुट जाता है।
इस बार समर भी चुपचाप अपने वर्कआउट में लग रहता है।
कुछ ही देर में शौर्य भी बड़बड़ाता हुआ वहां आ जाता है—भीगे बाल, चिढ़ा हुआ चेहरा, और नींद से भरी आँखें।
शौर्य: (बड़बड़ाते हुए) पागल आदमी…
फिर भी वो भी एक्सरसाइज शुरू कर देता है।
सात बजे—
तीनों पसीने से लथपथ, थके हुए लेकिन अंदर से और मजबूत होकर जिम से बाहर निकलते हैं और अपने-अपने कमरों की तरफ बढ़ जाते हैं।
आठ बजे—
तीनों तैयार होकर नीचे आते हैं। तीनों के हाथ में फोन था। कृष उन्हें मैसेज के थरु कुछ जानकारी दे रहा था और वे दोनों पूरे ध्यान से पढ़ रहे थे क्योंकि कृष लायन के रुप में वो इन्फोर्मेशन दे रहा था और दोनों लायन को बहुत सीरियस लेते थे।
वो तीनों फोन में घुसे हुए ही डाइनिंग टेबल पर आकर बैठ जाते हैं।
किचन में कौशल्या जी नाश्ता तैयार कर रही थीं।
जैसे ही उनकी नजर तीनों पर पड़ती है—फोन में डूबे चेहरे… बिना किसी बात के बैठे हुए।
वो हल्के से गर्दन हिलाती हैं, फिर मुस्कुराते हुए बाहर आती हैं।
कौशल्या जी: गुड मॉर्निंग… मेरे शेर पुत्रों।
उनकी आवाज़ में अपनापन था… और वो अपनापन, उस भारी माहौल में एक हल्की-सी गर्माहट घोल रहा था।
तीनों एक साथ कौशल्या जी को देखते हैं और उन्हें “गुड मॉर्निंग” विश करते हैं। कौशल्या जी तीनों को देखकर पूछती हैं, “मंदिर गए आप तीनों?”
यह सुनते ही तीनों जैसे ही फोन रखते हैं और मंदिर की तरफ बढ़ जाते हैं। तभी ऊपर से एक लड़की भागते हुए आती है—
“अरे रुको, मैं भी आती हूँ!”
ये हैं कृशा—कृष्णा की छोटी बहन। चलती-फिरती धमाका! लगभग 5.3 फीट की हाइट, गोरा रंग, बड़ी-बड़ी आँखें, छोटी सी नाक, पंखुड़ियों जैसे होंठ, कमर तक लहराते बाल… और पहने हुए जीन्स-टॉप—पूरी एनर्जी का पैकेट।
वो दौड़ते हुए आती है और कृष के सामने ब्रेक लगाकर कहती है,
“गुड मॉर्निंग भाई! कैसे हैं आप?”
कृष हल्की सी मुस्कान दबाते हुए कहता है,
“गुड मॉर्निंग, अब तक तो ठीक था… आगे पता नहीं।”
कृशा भौंहें सिकोड़ते हुए,
“आप कहना क्या चाहते हो?”
कृष कंधे उचकाकर,
“कुछ नहीं। चलो मंदिर… मुझे आज जल्दी ऑफिस जाना है।”
ये सुनते ही कृशा मुँह बनाकर बोलती है,
“आपको जल्दी कब नहीं जाना होता! जब देखो आपकी तो रेस लगी रहती है।”
कृष उंगली दिखाकर चिढ़ाता है,
“एक बार तू ग्रेजुएशन कर ले, फिर बताऊँगा रेस कैसे लगती है… स्टूपिड गर्ल!”
इतना कहकर वो मंदिर में चला जाता है। उसके पीछे-पीछे समर भी।
वहीं शौर्य, कृशा को देखकर मुस्कुराता है—
“हाय मेरी क्राइम पार्टनर!”
कृशा भी शरारती अंदाज़ में,
“हैलो मिस्टर राजपूत!”
तभी पीछे से कौशल्या जी की आवाज आती है,
“कभी तो तमीज़ से बात कर लिया कर, ये भाई है तेरा।”
कृशा तुरंत जवाब देती है,
“मॉम प्लीज़! मेरा एक भाई ही काफी है मुझे परेशान करने के लिए। और ज्यादा भाई नहीं चाहिए—मैंने यहाँ भाई-धर्मशाला नहीं खोलनी! शौर्य मेरा दोस्त है… और हम दोस्त ही ठीक हैं, क्यों शौर्य?”
शौर्य हँसते हुए सिर हिलाता है,
“ठरकी… तू सुधर जा, वरना एक दिन उस डेविल से बहुत पिटेगी।”
कृशा आँख मारकर,
“रिलैक्स शौर्य! इसकी बैंड तो भाभी बजाएंगी। बस एक बार इनकी शादी करवा दो… कसम से मैं खुशी में नाचने लग जाऊँगी! इनकी बीवी के ऐसे कान भरूँगी ना… इनका कीमा बना देगी वो।”
शौर्य हँसी रोकते हुए इधर-उधर देखता है,
“और अगर ये समर ने सुन लिया तो?”
कृशा पीछे मुड़कर देखती है—पर वहाँ कोई नहीं था। कौशल्या जी तो पहले ही किचन में जा चुकी थीं।
कृशा राहत की साँस लेकर शौर्य का हाथ खींचती है,
“वो तो मेरा सोना है… लेकिन भाई के साथ रहते-रहते उनके जैसे बनते जा रहे हैं। मुझे बड़ा गुस्सा आता है! कोई मेरी इनसे शादी करवा दो… कसम से इनका भूत उतार दूँगी!”
शौर्य हँसते हुए,
“चल अब… वरना फिर लेक्चर मिलेंगे।”
कृशा मुँह बनाती है, लेकिन फिर मंदिर में चली जाती है।
मंदिर में कृष समर आँखें बंद किए, शांत खड़े थे। तभी कृशा धीरे से बोलती है—
“अपना टाइम तो खराब कर ही रहे हैं… साथ में भगवान का भी कर रहे हैं। जिन्हें टाइम वेस्ट करना पसंद नहीं… वो भी टाइम वेस्ट कर रहे हैं। ओफ्फो गोंड कैसे कैसे लोग हैं यहां।”
कृष धीरे-धीरे आँखें खोलता है और गुस्से में उसे घूरने लगता है।
कृशा तुरंत मासूम सा चेहरा बनाकर दाँत दिखाती है,
“मैं इस पागल को बोल रही थी जो मेरे बगल में खड़ा है… आप जाइए, नाश्ता कीजिए। आज आपको जल्दी जाना है ना।”
कृष उसे एक “किलर लुक” देता है और वहाँ से निकल जाता है। उसके पीछे समर भी।
कृशा पीछे से बड़बड़ाती है,
“अगर भाई की पूँछ होती ना… तो ये मिस्टर सोना घंटी बनकर उसी से बंधे रहते! जब देखो ऐसे रहते हैं जैसे किसी ने मंदिर से चप्पल चुरा ली हो… और इन्हें धूप में नंगे पैर चलना पड़ रहा हो।”
शौर्य हँसते हुए,
“ये सब छोड़, चल! मुझे भूख लगी है। इस राक्षस ने चैन से सोने नहीं दिया… अब लगता है खाने भी नहीं देगा। मैं तो आज अपने विला जाऊँगा और चैन से सोऊँगा।”
कृशा उसे घूरते हुए,
“ओ कुंभकर्ण की छठी औलाद! सोने के अलावा भी काम होते हैं। अपनी महिला मित्र पर रहम खा… और उस खडूस से मेरी सेटिंग करवा।”
शौर्य नाटक करते हुए हाथ जोड़ता है,
“शर्म कर पिशाचनी… मंदिर में खड़ी है!”
कृशा मुस्कुराते हुए,
“कृपा मुझे पता है… बता मत!”
शौर्य जल्दी से हाथ जोड़कर निकलते हुए,
“मैं चला… वरना खाना भी रात को नसीब होगा।”
वो भाग जाता है।
कृशा कान्हा जी की मूर्ति के सामने खड़ी होकर धीरे से बोलती है—
“कान्हा जी… मेरी मदद करो उस खडूस को पटाने में। आप तो एक्सपर्ट थे ना… सबको अपनी उँगलियों पर नचाते थे। मुझे भी उसे उँगली पर नचाना है… प्लीज़!”
फिर खुद ही मुस्कुराती है,
“चलो… पहले उसे थोड़ा निहार ही लेती हूँ। सर जी को जाने की जल्दी जो बहुत रहती है।”
ये कहकर वो भागते हुए डायनिंग टेबल के पास पहुँचती है।
वहाँ शौर्य हाथ में दो पराठे उठाए खड़ा था, और कृष व समर हाथ धोकर निकलने के लिए तैयार थे।
तीनों कौशल्या जी के पैर छूते हैं और घर से निकल जाते हैं।
वहीं शौर्य खुद में बड़बड़ाता है—
“दोनों बहन-भाई एक जैसे हैं… एक सोने नहीं देता, दूसरी खाने के टाइम भी टाइम वेस्ट करवा देती है। एक म्यान की दो खतरनाक तलवारें… जो श्राप की तरह मेरे पीछे पड़ी हैं!”
आगे का नेक्स्ट पार्ट में
धन्यवाद 😊🙏🏻