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बारिश मे हुई पहली मुलाकात

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Sunita Gupta SG
Sunita Gupta Author
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बारिश में हुई पहली मुलाक़ात जुलाई का महीना था। सुबह से ही आसमान पर काले बादलों का राज था। दोपहर होते-होते तेज़ बारिश शुरू हो गई। सड़कें पानी से भर गईं, पेड़ों की डालियाँ हवा के साथ झूमने लगीं और मिट्टी की सोंधी खुशबू पूरे शहर में फैल गई। ऑफिस की छुट्टी होते ही लोग जल्दी-जल्दी अपने घरों की ओर भागने लगे। कबीर भी अपनी बाइक लेकर पार्किंग से निकला, लेकिन कुछ ही दूर गया था कि मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। उसे मजबूर होकर सड़क किनारे बनी एक पुरानी चाय की दुकान के टीन शेड के नीचे रुकना पड़ा। वहाँ पहले से ही कई लोग बारिश थमने का इंतज़ार कर रहे थे। चाय की भाप, बारिश की बूँदें और ठंडी हवा मिलकर ऐसा मौसम बना रही थीं कि हर कोई कुछ देर वहीं ठहर जाना चाहता था। तभी अचानक सामने से एक ऑटो तेज़ी से गुज़रा और सड़क पर भरे पानी का बड़ा-सा छींटा शेड के पास खड़ी एक लड़की पर जा गिरा। उसके हाथ में रखी किताबें और फ़ाइलें पूरी तरह भीग गईं। वह घबरा गई। उसने जल्दी-जल्दी कागज़ समेटने शुरू किए, लेकिन तभी हवा का तेज़ झोंका आया और उसकी फ़ाइल खुल गई। दर्जनों कागज़ बारिश में उड़ने लगे। यह देखकर कबीर बिना एक पल गँवाए दौड़ पड़ा। वह बारिश की परवाह किए बिना एक-एक कागज़ पकड़ने लगा। लड़की भी उसके साथ भाग रही थी। कोई कागज़ नाली के किनारे अटक गया, कोई पेड़ की शाखा में फँस गया, तो कोई सड़क के बीचोंबीच जा गिरा। लगभग पाँच मिनट तक दोनों बारिश में भीगते रहे और आखिरकार सारे कागज़ इकट्ठे कर लिए। लड़की ने राहत की साँस ली। उसके चेहरे पर बारिश की बूँदें थीं या आँसू, यह समझना मुश्किल था। उसने मुस्कुराकर कहा, "बहुत-बहुत धन्यवाद... अगर ये फ़ाइल खो जाती, तो मेरी पहली नौकरी भी चली जाती।" कबीर ने भी मुस्कुराकर जवाब दिया, "लगता है आज बारिश ने मुझे किसी की मदद करने के लिए ही रोका था।" लड़की हल्का-सा हँस दी। उसकी हँसी बारिश की रिमझिम से भी ज़्यादा मधुर थी। उसने अपना हाथ आगे बढ़ाते हुए कहा, "मेरा नाम आन्या है।" कबीर ने भी हाथ मिलाया, "और मैं कबीर।" दोनों कुछ पल एक-दूसरे को देखते रहे। यह उनकी पहली मुलाक़ात थी, लेकिन न जाने क्यों दोनों को ऐसा लगा जैसे वे पहले भी कहीं मिल चुके हों। तभी तेज़ हवा चली और आन्या ठंड से काँप उठी। कबीर ने अपना छाता उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा, "अगर आपको बुरा न लगे तो हम एक ही छाते में बस स्टॉप तक चल सकते हैं। बारिश अभी जल्दी रुकने वाली नहीं लग रही।" आन्या कुछ पल झिझकी, फिर मुस्कुराकर बोली, "आज तो बारिश ने अजनबियों पर भरोसा करना भी सिखा दिया।" दोनों एक ही छाते के नीचे धीरे-धीरे चलने लगे। रास्ता ज़्यादा लंबा नहीं था, लेकिन उनकी बातें लंबी होती चली गईं। पता चला कि आन्या एक प्रकाशन संस्था में नई-नई नौकरी पर लगी थी और किताबें पढ़ना उसे बेहद पसंद था। कबीर एक आर्किटेक्ट था, जिसे बारिश, पुरानी इमारतें और कविता से प्यार था। दोनों को हैरानी हुई कि उनकी पसंद कितनी मिलती-जुलती है। रास्ते में एक छोटी-सी चाय की दुकान दिखी। बारिश और भी तेज़ हो गई थी। कबीर ने पूछा, "एक कुल्हड़ चाय हो जाए?" आन्या मुस्कुराकर मान गई। दोनों दुकान के बाहर खड़े होकर गरम चाय पीने लगे। बारिश की बूँदें टीन की छत पर पड़कर मधुर संगीत-सा बना रही थीं। आन्या ने चाय की चुस्की लेते हुए पूछा, "क्या आपको भी लगता है कि कुछ मुलाक़ातें पहले से लिखी होती हैं?" कबीर ने मुस्कुराकर कहा, "अगर ऐसा नहीं होता, तो आज मैं ऑफिस से पाँच मिनट देर से नहीं निकलता... और तुम्हारी फ़ाइल भी मेरे सामने नहीं उड़ती।" दोनों ज़ोर से हँस पड़े। कुछ देर बाद बारिश थोड़ी हल्की हुई। तभी आन्या का फोन बजा। उसने बात की और बोली, "मुझे अब जाना होगा। मम्मी बहुत परेशान हो रही हैं।" बस स्टॉप सामने ही था। बस आते ही वह उसमें चढ़ने लगी। अचानक उसने अपने बैग से एक छोटा-सा बुकमार्क निकाला और कबीर की ओर बढ़ाते हुए कहा, "इसे संभालकर रखिएगा... शायद अगली मुलाक़ात की वजह यही बन जाए।" बस चल पड़ी। कबीर ने बुकमार्क पलटकर देखा। उसके पीछे नीली स्याही से सिर्फ़ एक पंक्ति लिखी थी"बारिश में हुई मुलाक़ातें अक्सर दिल में हमेशा के लिए बस जाती हैं।" कबीर देर तक उसी बुकमार्क को देखता रहा। उसे बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था कि यह छोटी-सी बरसाती मुलाक़ात उसकी ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत और सबसे कठिन सफ़र बनने वाली है, क्योंकि किस्मत ने उनके लिए एक ऐसी कहानी लिख रखी थी जिसमें बारिश तो बहुत थी... लेकिन धूप बहुत देर से आने वाली थी। अगले दिन सुबह कबीर की नींद सबसे पहले उसी बुकमार्क पर पड़ी, जिसे उसने रात भर अपने तकिए के पास रखा था। उस पर लिखी एक पंक्ति बार-बार उसके चेहरे पर मुस्कान ले आती थी—"बारिश में हुई मुलाक़ातें अक्सर दिल में हमेशा के लिए बस जाती हैं।" वह खुद पर हँसने लगा। एक अनजान लड़की से कुछ मिनट की मुलाक़ात उसके दिल में इतनी जगह बना लेगी, उसने कभी सोचा भी नहीं था। ऑफिस पहुँचा तो काम में मन ही नहीं लगा। बार-बार उसकी नज़र मोबाइल पर चली जाती, जबकि उसके पास आन्या का नंबर तक नहीं था। उधर आन्या भी अपने ऑफिस में बैठी फ़ाइलें देख रही थी, लेकिन उसकी नज़र हर थोड़ी देर में खिड़की के बाहर होने वाली हल्की बारिश पर चली जाती। उसे भी बार-बार वही लड़का याद आ रहा था जिसने बिना किसी स्वार्थ के बारिश में भीगकर उसके सारे कागज़ बचा लिए थे। उसने अपने बैग में हाथ डाला तो उसे याद आया कि उसने अपना पसंदीदा बुकमार्क कबीर को दे दिया था। वह हल्का-सा मुस्कुराई और मन ही मन बोली, "पता नहीं फिर कभी मुलाक़ात होगी भी या नहीं।" दिन बीत गया। दूसरा दिन भी निकल गया। तीसरे दिन शाम को अचानक फिर से मौसम बदल गया। बादल गरजने लगे और तेज़ बारिश शुरू हो गई। कबीर ऑफिस से निकला तो अनजाने में उसी चाय की दुकान की तरफ़ उसके कदम बढ़ गए जहाँ पहली बार मुलाक़ात हुई थी। उसने खुद से कहा, "शायद आज भी बारिश मुझे यहीं ले आई है।" वह चाय लेकर खड़ा ही हुआ था कि पीछे से एक परिचित आवाज़ आई, "लगता है आपको भी बारिश बहुत पसंद है।" कबीर ने पलटकर देखा। सामने आन्या खड़ी थी। उसके हाथ में इस बार भी छाता नहीं था। दोनों एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा दिए। कबीर ने हँसते हुए कहा, "मुझे तो अब लगने लगा है कि बारिश हमारी पहचान बन गई है।" आन्या ने जवाब दिया, "या शायद हमारी मुलाक़ातों का बहाना।" दोनों फिर उसी चाय की दुकान पर बैठ गए। इस बार बातचीत पहले से भी लंबी चली। उन्होंने अपने बचपन की शरारतें, कॉलेज की यादें, परिवार, सपने और भविष्य की बातें कीं। कबीर को पता चला कि आन्या अपने माता-पिता की इकलौती बेटी है और उसके पिता कई महीनों से बीमार चल रहे हैं। घर की ज़िम्मेदारी अब उसी के कंधों पर थी। आन्या ने भी जाना कि कबीर की माँ का देहांत बचपन में ही हो गया था और वह अपने पिता के साथ रहता है। दोनों के जीवन में कुछ न कुछ अधूरा था, शायद यही अधूरापन उन्हें एक-दूसरे के करीब ला रहा था। बारिश लगातार हो रही थी। अचानक बिजली चली गई। पूरी सड़क अँधेरे में डूब गई। चाय वाले ने मोमबत्ती जला दी। मोमबत्ती की हल्की रोशनी में दोनों एक-दूसरे को देख रहे थे। तभी आन्या ने धीरे से पूछा, "अगर हमारी मुलाक़ात उस दिन बारिश में नहीं होती, तो क्या तुम मुझे कभी ढूँढ़ते?" कबीर कुछ पल चुप रहा, फिर मुस्कुराकर बोला, "शायद नहीं... लेकिन अब अगर तुम कभी खो गई, तो पूरी दुनिया ढूँढ़ लूँगा।" यह सुनकर आन्या की आँखें झुक गईं। उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आ गई। पहली बार उसके दिल ने कबीर के लिए कुछ अलग महसूस किया। तभी उसका फोन बजा। उसने बात की और अचानक उसका चेहरा उतर गया। उसने घबराकर कहा, "मुझे अभी अस्पताल जाना होगा। पापा की तबीयत अचानक बहुत बिगड़ गई है।" कबीर बिना कुछ सोचे बोला, "मैं तुम्हारे साथ चलता हूँ।" दोनों बारिश में दौड़ते हुए अस्पताल पहुँचे। डॉक्टर इलाज में लगे थे। करीब आधे घंटे बाद डॉक्टर बाहर आए और बोले, "अब खतरे की बात नहीं है, लेकिन मरीज को आराम की ज़रूरत है।" आन्या ने राहत की साँस ली। वह भावुक होकर रो पड़ी। कबीर ने बिना कुछ कहे उसे पानी की बोतल पकड़ाई। उस रात अस्पताल के कॉरिडोर में बैठकर दोनों देर तक बातें करते रहे। जाते-जाते आन्या ने पहली बार अपना मोबाइल नंबर कबीर को दिया और मुस्कुराकर कहा, "अब अगली मुलाक़ात के लिए बारिश का इंतज़ार मत करना।" कबीर ने नंबर अपने फोन में सेव किया और मन ही मन सोचा कि शायद किस्मत अब उनके बीच की दूरियाँ मिटाना चाहती है। लेकिन उसे यह नहीं पता था कि आने वाले दिनों में एक ऐसा सच सामने आने वाला है, जो उनकी इस खूबसूरत शुरुआत को सबसे कठिन मोड़ पर ले जाएगा... उस रात के बाद कबीर और आन्या की ज़िंदगी बदल गई। अब सुबह की शुरुआत एक-दूसरे के "गुड मॉर्निंग" संदेश से होती और रात का अंत घंटों की बातों के बाद "गुड नाइट" पर होता। धीरे-धीरे दोनों एक-दूसरे की आदत बन गए। कबीर ऑफिस से निकलते ही सबसे पहले आन्या को फोन करता और आन्या पूरे दिन की छोटी-छोटी बातें उसी से साझा करती। कभी दोनों शाम को पार्क में मिलते, कभी किताबों की दुकान पर, तो कभी उसी चाय वाले के यहाँ जहाँ बारिश ने पहली बार उन्हें मिलाया था। हर मुलाक़ात के साथ उनका रिश्ता और गहरा होता जा रहा था। एक दिन फिर से तेज़ बारिश शुरू हो गई। कबीर ने आन्या को फोन किया, "चलो, आज फिर उसी चाय की दुकान पर मिलते हैं।" आन्या हँसते हुए बोली, "लगता है हमारी कहानी का पता सिर्फ़ बारिश को ही मालूम है।" कुछ ही देर में दोनों वहाँ पहुँच गए। चाय वाला उन्हें देखकर मुस्कुरा दिया। उसने बिना पूछे ही दो कुल्हड़ चाय बना दी। दोनों बारिश को देखते हुए चाय पी रहे थे कि अचानक कबीर ने अपनी जेब से वही बुकमार्क निकाला, जो आन्या ने पहली मुलाक़ात में दिया था। उसने मुस्कुराकर कहा, "इसे मैं हमेशा अपने पास रखता हूँ। जिस दिन तुम मिली थीं, उसी दिन समझ गया था कि कुछ मुलाक़ातें यूँ ही नहीं होतीं।" आन्या की आँखें भर आईं। उसने धीमे से पूछा, "अगर एक दिन मैं तुम्हारी ज़िंदगी से चली गई तो?" कबीर ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया और बोला, "बारिश लौटकर हर साल आती है... और मुझे यकीन है, तुम भी कभी मेरा साथ नहीं छोड़ोगी।" आन्या मुस्कुराई, लेकिन उसके चेहरे पर एक अजीब-सी उदासी उतर आई। उसने धीरे से कहा, "काश... तुम्हारी बात सच हो।" कबीर ने उसके चेहरे की उदासी देख ली। उसने पूछा, "क्या बात है? कई दिनों से तुम कुछ छिपा रही हो।" आन्या कुछ देर तक चुप रही। फिर काँपती आवाज़ में बोली, "पापा चाहते हैं कि मेरी शादी उनके दोस्त के बेटे से हो जाए। उन्होंने मुझे कुछ नहीं कहा, लेकिन मैं उनकी मजबूरी समझती हूँ। उनकी तबीयत ठीक नहीं रहती। मैं उन्हें दुख नहीं देना चाहती।" यह सुनकर कबीर जैसे पत्थर का हो गया। कुछ देर तक वह कुछ बोल ही नहीं पाया। बारिश पहले से और तेज़ हो चुकी थी। दोनों के बीच एक लंबी ख़ामोशी थी। आखिर कबीर ने गहरी साँस लेकर कहा, "क्या... तुम भी यही चाहती हो?" आन्या ने तुरंत सिर हिला दिया, "नहीं... मेरा दिल तो उसी दिन तुम्हारा हो गया था, जिस दिन तुम बारिश में मेरे उड़ते हुए कागज़ समेट रहे थे। लेकिन मैं अपने पापा की आख़िरी इच्छा के खिलाफ़ भी नहीं जा सकती।" यह सुनते ही कबीर की आँखें नम हो गईं। उसने आसमान की ओर देखा। ऐसा लग रहा था जैसे बादल भी उनके दर्द में रो रहे हों। उसी समय आन्या के पिता का फोन आया। उन्होंने कहा कि अगले रविवार लड़के वाले घर आ रहे हैं। फोन कटते ही आन्या की हिम्मत टूट गई। वह फूट-फूटकर रोने लगी। कबीर ने उसे संभाला और कहा, "रोओ मत... अभी कुछ भी तय नहीं हुआ है। जब तक साँस है, उम्मीद भी है। मैं तुम्हारे पापा से मिलूँगा। उन्हें अपने दिल की बात बताऊँगा। अगर हमारा प्यार सच्चा है, तो कोई न कोई रास्ता ज़रूर निकलेगा।" आन्या ने आँसू पोंछे और पहली बार मुस्कुराई। उसने अपना सिर कबीर के कंधे पर रख दिया। बारिश लगातार बरस रही थी, लेकिन उस पल दोनों को बारिश की बूँदें नहीं, अपने दिलों की धड़कनें सुनाई दे रही थीं। उन्हें नहीं पता था कि अगले रविवार उनकी मोहब्बत की सबसे कठिन परीक्षा होने वाली है, जहाँ एक तरफ़ पिता का वचन होगा और दूसरी तरफ़ दो सच्चे दिलों का प्यार.. रविवार की सुबह आसमान बिल्कुल साफ़ था, लेकिन कबीर और आन्या के दिलों में घने बादल छाए हुए थे। रातभर दोनों की आँखों में नींद नहीं आई थी। सुबह-सुबह कबीर ने मंदिर जाकर भगवान के सामने हाथ जोड़कर सिर्फ़ एक प्रार्थना की—"अगर मेरा प्यार सच्चा है, तो आज मुझे हिम्मत देना।" उधर आन्या अपने कमरे में आईने के सामने बैठी थी। उसकी माँ उसे तैयार होने के लिए कह रही थीं, लेकिन उसके चेहरे पर दुल्हन वाली खुशी नहीं थी। उसकी आँखों में सिर्फ़ डर और बेचैनी थी। दोपहर होते-होते लड़के वाले घर पहुँच गए। बैठक में हँसी-मज़ाक चल रहा था, लेकिन आन्या का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। तभी दरवाज़े की घंटी बजी। आन्या के पिता ने दरवाज़ा खोला। सामने कबीर खड़ा था। उसके हाथ में फूलों का गुलदस्ता नहीं, बल्कि एक छोटी-सी फ़ाइल थी। उसे देखकर आन्या घबरा गई। उसने इशारे से कबीर को जाने के लिए कहा, लेकिन कबीर आज बिना अपनी बात कहे लौटने वाला नहीं था। उसने विनम्रता से कहा, "अंकल, मुझे आपसे पाँच मिनट अकेले में बात करनी है।" घर में सन्नाटा छा गया। कुछ पल सोचने के बाद आन्या के पिता उसे अपने कमरे में ले गए। कमरे का दरवाज़ा बंद होते ही कबीर ने कहा, "अंकल, मैं आपकी बेटी से प्यार करता हूँ और उससे शादी करना चाहता हूँ। लेकिन मैं उसे आपसे छीनने नहीं आया। मैं आपका आशीर्वाद लेने आया हूँ।" आन्या के पिता का चेहरा कठोर हो गया। उन्होंने कहा, "तुम जानते भी हो कि मैं अपनी बेटी की शादी कहीं और क्यों करना चाहता हूँ?" कबीर ने शांत स्वर में कहा, "नहीं अंकल... इसलिए आपकी बात सुनने आया हूँ।" उनकी आँखें भर आईं। उन्होंने अलमारी से एक मे****ल फ़ाइल निकालकर कबीर के सामने रख दी। काँपती आवाज़ में बोले, "मुझे दिल की गंभीर बीमारी है। डॉक्टर ने कहा है कि मेरे पास बहुत कम समय है। मैंने अपने सबसे पुराने दोस्त से वादा किया था कि अपनी बेटी की शादी उसके बेटे से करूँगा। मैं मरने से पहले अपना वादा निभाना चाहता हूँ।" यह सुनकर कबीर की आँखें भी नम हो गईं। उसने धीरे से फ़ाइल बंद की और बोला, "अंकल... अगर आपकी जगह मेरे पिताजी होते, तो शायद मैं भी यही चाहता। लेकिन एक बात पूछूँ? क्या आपने कभी आन्या से पूछा कि उसकी खुशी किसमें है?" कमरे में फिर ख़ामोशी छा गई। पहली बार आन्या के पिता के चेहरे पर सोच की लकीरें उभरीं। उसी समय बाहर से तेज़ बादलों की गड़गड़ाहट सुनाई दी। कुछ ही मिनटों में फिर मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। खिड़की से आती बारिश की बूँदें कमरे के फ़र्श पर गिरने लगीं। आन्या के पिता खिड़की के पास गए और बाहर बरसते आसमान को देखने लगे। उनकी आँखों के सामने अपनी बेटी का बचपन घूम गया—बारिश में भीगती हुई छोटी-सी आन्या, कागज़ की नाव चलाती हुई, खिलखिलाकर हँसती हुई। उन्होंने कभी उसकी मुस्कान से बढ़कर कुछ नहीं चाहा था। फिर आज उसकी मुस्कान क्यों छिन रही थी? उनकी आँखों से आँसू निकल पड़े। उन्होंने पीछे मुड़कर कबीर की ओर देखा। उसी समय बाहर बैठक में बैठे मेहमानों को भी सब कुछ पता चल चुका था। घर का माहौल पूरी तरह बदल गया था। लेकिन असली फैसला अभी बाकी था। क्या एक पिता अपना पुराना वादा निभाएगा... या अपनी बेटी की खुशी चुनेगा? इस सवाल का जवाब अब सिर्फ़ वही दे सकता था. कमरे में गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था। बाहर बारिश लगातार बरस रही थी। खिड़की के शीशों पर गिरती बूँदें मानो हर पल एक ही सवाल दोहरा रही थीं—क्या एक पिता अपना वादा निभाएगा या अपनी बेटी की खुशी चुनेगा? आन्या के पिता कुर्सी पर बैठ गए। उनकी आँखें भीगी हुई थीं। उन्होंने कबीर की ओर देखा और धीमे स्वर में कहा, "बेटा, ज़िंदगी में कुछ वादे ऐसे होते हैं जिन्हें निभाने के लिए इंसान अपने दिल को भी समझा लेता है। मैंने अपने दोस्त से वादा किया था कि आन्या की शादी उसके बेटे रचित से करूँगा। मैं उस वादे से पीछे कैसे हट जाऊँ?" कबीर ने सम्मान से सिर झुकाया और बोला, "अंकल, मैं आपका वादा तोड़ने नहीं आया हूँ। मैं सिर्फ़ इतना चाहता हूँ कि एक बार आन्या से पूछ लीजिए कि उसकी खुशी किसमें है। अगर वह रचित के साथ शादी करना चाहे, तो मैं आज के बाद कभी उसकी ज़िंदगी में वापस नहीं आऊँगा।" आन्या के पिता कुछ देर तक चुप रहे। फिर उन्होंने बाहर आकर सबको बैठक में बुलाया। रचित और उसका परिवार भी वहीं बैठे थे। उन्होंने सबके सामने कहा, "आज कोई फैसला मैं अकेले नहीं करूँगा। पहले मेरी बेटी अपनी बात कहेगी।" यह सुनते ही पूरे घर में खामोशी छा गई। आन्या काँपते कदमों से आगे बढ़ी। उसकी आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे। उसने अपने पिता के सामने हाथ जोड़ दिए और बोली, "पापा... मैंने आज तक आपकी हर बात मानी है। आपकी खुशी को अपनी खुशी समझा है। लेकिन इस बार... अगर मैंने अपने दिल की आवाज़ दबा दी, तो शायद पूरी ज़िंदगी मुस्कुरा नहीं पाऊँगी। मैं कबीर से प्यार करती हूँ।" यह कहते ही वह रो पड़ी। कमरे में बैठे सभी लोग स्तब्ध रह गए। तभी सबकी नज़र रचित पर गई। उसने धीरे-धीरे अपनी कुर्सी से उठकर आन्या के पिता के पास आकर कहा, "अंकल... अगर इजाज़त हो तो मैं भी कुछ कहना चाहता हूँ।" सब उसकी ओर देखने लगे। रचित मुस्कुराया और बोला, "रिश्ते ज़बरदस्ती नहीं निभाए जाते। मैं किसी ऐसी लड़की से शादी नहीं कर सकता जिसके दिल में किसी और की जगह हो। मुझे ऐसी पत्नी नहीं चाहिए जो मेरे साथ रहकर भी किसी और के लिए दुआ करे।" यह सुनते ही आन्या के पिता की आँखें भर आईं। रचित ने आगे बढ़कर कबीर का हाथ पकड़ लिया और बोला, "तुम खुशकिस्मत हो... क्योंकि तुम्हें सच्चा प्यार मिला है। इसे कभी खोना मत।" कमरे में बैठे सभी लोगों की आँखें नम हो गईं। आन्या के पिता धीरे-धीरे कबीर के पास आए। उन्होंने काँपते हाथों से उसका हाथ अपने हाथ में लिया और बोले, "बेटा... मैंने सारी उम्र अपनी बेटी को खुश देखने की दुआ माँगी थी। आज समझ आया कि उसकी खुशी तुम हो। अगर तुम वादा करो कि मेरी बेटी की आँखों में कभी आँसू नहीं आने दोगे, तो मैं यह रिश्ता खुशी-खुशी स्वीकार करता हूँ।" कबीर भावुक होकर उनके पैरों में झुक गया। उसने कहा, "अंकल, मैं वादा करता हूँ... आपकी बेटी का सम्मान और मुस्कान मेरी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी होगी।" आन्या दौड़कर अपने पिता के गले लग गई। वर्षों बाद वह इस तरह रो रही थी कि उसके आँसुओं में दर्द नहीं, राहत थी। बाहर बारिश अब भी हो रही थी, लेकिन इस बार हर बूँद जैसे खुशियाँ बरसा रही थी। कुछ महीनों बाद उसी मौसम में, उसी शहर में और उसी बारिश के बीच कबीर और आन्या की शादी हुई। जब दोनों सात फेरे ले रहे थे, तभी फिर हल्की बारिश शुरू हो गई। सभी लोग मुस्कुरा उठे। आन्या ने आसमान की ओर देखकर कहा, "लगता है हमारी पहली मुलाक़ात का गवाह आज हमारी शादी का आशीर्वाद देने आया है।" कबीर मुस्कुराया, उसका हाथ थामा और बोला, "हमारी कहानी की शुरुआत भी बारिश ने लिखी थी... और मंज़िल तक भी वही लेकर आई।" मंडप में बैठे सभी लोग तालियाँ बजाने लगे। दूर कहीं बादलों के बीच से सूरज की हल्की किरण निकल आई। उस दिन सबने महसूस किया कि सच्ची मोहब्बत की राह में मुश्किलें चाहे कितनी भी आएँ, अगर विश्वास, सम्मान और धैर्य साथ हों, तो मंज़िल ज़रूर मिलती है। और उस दिन के बाद जब भी बारिश होती, कबीर और आन्या मुस्कुराकर एक-दूसरे से सिर्फ़ इतना कहते"याद है... हमारी पहली मुलाक़ात?" फिर दोनों एक ही छाते के नीचे हाथों में हाथ डाले उसी पुरानी चाय की दुकान की ओर चल पड़ते, जहाँ एक बरसाती दिन ने दो अजनबियों को जीवनभर का हमसफ़र बना दिया था। सुनीता गुप्ता

Thriller Young Adult Hindi Romance

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