Cover
Ongoing Historical Fiction

पुराना रेडियो

0.0 (0 ratings)
Sunita Gupta SG
Sunita Gupta Author
0 Reads
0 Chapters
0 Comments

पुराना रेडियो (भाग–1) बरसों पुराने पीपल के पेड़ की छाया में बसा एक छोटा-सा गाँव था। उसी गाँव के आख़िरी छोर पर मिट्टी की दीवारों और खपरैल की छत वाला एक छोटा-सा घर था। उस घर में सत्तर वर्षीय हरिदास अकेले रहते थे। उनकी पत्नी सावित्री का कई वर्ष पहले बीमारी के कारण निधन हो चुका था। इकलौता बेटा अमन पढ़-लिखकर विदेश में बस गया था। शुरुआत में वह हर रविवार फ़ोन करता था, फिर महीने में एक बार, और अब कई-कई महीने बीत जाते, लेकिन उसका कोई संदेश तक नहीं आता था। हरिदास कभी शिकायत नहीं करते थे। वे बस घर के आँगन में रखी पुरानी चारपाई पर बैठकर आसमान की ओर देखते और मन ही मन बेटे की सलामती की दुआ करते। हरिदास की सबसे अनमोल चीज़ थी एक पुराना रेडियो। वह साधारण रेडियो नहीं था, बल्कि उनकी पूरी ज़िंदगी की यादों का ख़ज़ाना था। लगभग पैंतालीस साल पहले उनकी शादी की पहली सालगिरह पर सावित्री ने अपनी बचत से वह रेडियो खरीदा था। जब उन्होंने वह उपहार हरिदास को दिया था, तब उनकी आँखों में जो खुशी थी, वही खुशी हरिदास आज भी उस रेडियो को देखते समय महसूस करते थे। उस रेडियो पर दोनों साथ बैठकर पुराने गीत सुनते, समाचार सुनते और रात देर तक भविष्य के सपने देखा करते थे। सावित्री अक्सर मुस्कुराकर कहती थीं, "जब मैं तुम्हारे साथ नहीं रहूँगी, तब यही रेडियो तुम्हें मेरी आवाज़ सुनाएगा।" उस समय हरिदास हँस देते थे, लेकिन आज वही बात उनके दिल में तीर की तरह चुभती थी। हर सुबह सूरज निकलने से पहले हरिदास उठ जाते। सबसे पहले आँगन में झाड़ू लगाते, तुलसी में जल चढ़ाते और फिर एक साफ़ कपड़े से बड़े प्यार से रेडियो की धूल साफ़ करते। उसके बाद चाय बनाकर चारपाई पर बैठते और रेडियो का गोल बटन धीरे-धीरे घुमाते। जैसे ही पुराने फ़िल्मी गीत बजते, उनके चेहरे पर मुस्कान लौट आती। उन्हें लगता, जैसे सावित्री पास बैठी मुस्कुरा रही हों। कई बार वे रेडियो से बातें भी करने लगते—"सुनो सावित्री, आज आम के पेड़ पर बहुत बौर आया है..." या "आज फिर तुम्हारी पसंद का गीत बज रहा है..." गाँव के कुछ बच्चे रोज़ स्कूल जाते समय उनके घर के सामने से निकलते। उनमें सबसे शरारती था बारह साल का आर्यन। वह अक्सर अपने दोस्तों से कहता, "देखो, बाबा फिर अपने पुराने रेडियो से बातें कर रहे हैं।" सब बच्चे हँस पड़ते। लेकिन हरिदास कभी बुरा नहीं मानते। वे केवल मुस्कुराकर कहते, "बेटा, जब तुम बड़े हो जाओगे, तब समझोगे कि कुछ चीज़ें आवाज़ नहीं, यादें सुनाती हैं।" एक दिन गाँव में ज़ोरदार आँधी आई। काले बादलों ने पूरा आसमान ढक लिया। तेज़ हवा से पेड़ झूमने लगे। हरिदास जल्दी-जल्दी आँगन का सामान समेटने लगे। तभी अचानक छत का एक पुराना बाँस टूटकर नीचे गिरा। उसके साथ ही लकड़ी की शेल्फ़ भी टूट गई, जिस पर रेडियो रखा था। रेडियो ज़मीन पर गिरा और उसके कई हिस्से अलग हो गए। हरिदास दौड़कर पहुँचे। उन्होंने काँपते हाथों से रेडियो उठाया। उसका स्पीकर टूट चुका था। उन्होंने स्विच घुमाया, लेकिन इस बार कोई आवाज़ नहीं आई। उनके चेहरे की मुस्कान पलभर में गायब हो गई। ऐसा लगा, जैसे किसी ने उनकी आख़िरी याद भी उनसे छीन ली हो। उन्होंने रेडियो को सीने से लगाया और उनकी आँखों से आँसू बह निकले। अगली सुबह वे उसे कपड़े में लपेटकर शहर के पुराने बाज़ार पहुँचे। वहाँ एक बूढ़े मैकेनिक की छोटी-सी दुकान थी। उसने रेडियो खोलकर ध्यान से देखा और गहरी साँस लेते हुए कहा, "बाबा, यह बहुत पुराना मॉडल है। इसके पुर्ज़े अब मिलना लगभग नामुमकिन है। मैं कोशिश कर सकता हूँ, लेकिन कोई वादा नहीं कर सकता।" हरिदास चुपचाप सिर झुकाकर वापस लौट आए। रास्ते भर उन्हें ऐसा लग रहा था, जैसे वे अपनी ज़िंदगी का सबसे क़ीमती हिस्सा खो चुके हों। उसी शाम स्कूल से लौटते समय आर्यन ने पहली बार हरिदास को उदास देखा। वह उनके पास गया और पूछा, "बाबा, आज रेडियो क्यों नहीं बज रहा?" हरिदास ने टूटे हुए रेडियो की ओर देखते हुए धीमी आवाज़ में कहा, "बेटा... कभी-कभी चीज़ें नहीं टूटतीं... उनसे जुड़ी यादें टूट जाती हैं।" आर्यन ने पहली बार उनकी आँखों में आँसू देखे। उसी पल उसके मन में एक संकल्प जन्म ले चुका था... उस रात आर्यन को बिल्कुल नींद नहीं आई। बार-बार हरिदास बाबा का उदास चेहरा उसकी आँखों के सामने घूम रहा था। उसे याद आने लगा कि वह और उसके दोस्त कितनी बार बाबा का मज़ाक उड़ाया करते थे। लेकिन आज पहली बार उसे समझ आया कि वह पुराना रेडियो सिर्फ़ एक मशीन नहीं, बल्कि किसी की पूरी ज़िंदगी की यादों का सहारा था। अगले दिन स्कूल में भी उसका मन पढ़ाई में नहीं लगा। छुट्टी होते ही वह सीधे हरिदास बाबा के घर पहुँचा। बाबा आँगन में चारपाई पर बैठे टूटे हुए रेडियो को सहला रहे थे। आर्यन ने धीरे से पूछा, "बाबा... अगर मैं इसे ठीक करवा दूँ तो?" हरिदास हल्का-सा मुस्कुराए और बोले, "बेटा, शहर का सबसे बड़ा मैकेनिक भी मना कर चुका है। अब शायद यह कभी नहीं बजेगा।" आर्यन ने रेडियो अपने हाथों में उठाया और बोला, "जब तक पूरी कोशिश न कर लूँ, मैं हार नहीं मानूँगा।" आर्यन रेडियो लेकर अपने घर पहुँचा। उसके पिता बिजली का छोटा-सा काम करते थे। घर में पुराने तार, ट्रांजिस्टर, स्क्रू और कई इलेक्ट्रॉनिक सामान रखे रहते थे। आर्यन ने इंटरनेट पर पुराने रेडियो के बारे में पढ़ना शुरू किया। स्कूल के विज्ञान शिक्षक से सलाह ली। रविवार को वह कबाड़ी बाज़ार गया और घंटों पुराने सामान के ढेर में ऐसे पुर्ज़े ढूँढ़ता रहा जो इस रेडियो में लग सकें। कई दुकानदारों ने उसे मना कर दिया, लेकिन एक बुज़ुर्ग कबाड़ी ने कहा, "बेटा, मेरे पास कुछ पुराने रेडियो पड़े हैं। अगर किस्मत अच्छी हुई तो काम के पुर्ज़े मिल जाएँगे।" आर्यन ने अपनी जेब खर्च के सारे पैसे देकर दो पुराने रेडियो खरीद लिए। कई दिनों तक वह स्कूल से लौटकर पढ़ाई करता और फिर देर रात तक रेडियो खोलकर उसके तार जोड़ता रहता। कई बार उसे झटका भी लगा, कई बार पूरा सर्किट फिर से बिगड़ गया, लेकिन उसने हार नहीं मानी। उधर हरिदास बाबा रोज़ शाम को दरवाज़े की ओर देखते रहते कि शायद आज आर्यन कोई खुशखबरी लेकर आए। लगभग दस दिन बाद रविवार की सुबह आर्यन खुशी-खुशी हरिदास बाबा के घर पहुँचा। उसके हाथ में वही पुराना रेडियो था। उसने मुस्कुराकर कहा, "बाबा... एक बार इसे चलाकर देखिए।" हरिदास ने काँपते हाथों से रेडियो लिया। उन्होंने धीरे-धीरे स्विच घुमाया। पहले कुछ खरखराहट हुई। फिर कुछ सेकंड तक सन्नाटा रहा। अचानक रेडियो से पुराने फ़िल्मी गीत की मधुर धुन गूँज उठी। पूरा आँगन संगीत से भर गया। हरिदास की आँखें छलक उठीं। उन्होंने रेडियो को सीने से लगा लिया। ऐसा लगा जैसे वर्षों बाद उनकी सावित्री फिर से उनके पास लौट आई हो। उन्होंने भावुक होकर आर्यन को गले लगा लिया। उनकी आवाज़ भर्रा गई, "बेटा... तुमने मेरा रेडियो नहीं, मेरी साँसें लौटा दीं।" यह दृश्य देखकर आसपास के पड़ोसी भी इकट्ठा हो गए। जिन बच्चों ने कभी बाबा का मज़ाक उड़ाया था, वे आज शर्मिंदा होकर खड़े थे। हरिदास ने सबको बुलाया और बोले, "बच्चो, याद रखना... पुरानी चीज़ों की कीमत बाज़ार नहीं, दिल तय करता है।" उस दिन के बाद आर्यन रोज़ कुछ समय हरिदास बाबा के साथ बिताने लगा। दोनों रेडियो पर पुराने गीत सुनते, चाय पीते और जीवन की बातें करते। धीरे-धीरे दूसरे बच्चे भी आने लगे। बाबा उन्हें अपने बचपन, गाँव की पुरानी परंपराओं और जीवन के अनुभव सुनाते। बदले में बच्चे उन्हें नई तकनीक, मोबाइल और इंटरनेट की बातें बताते। कुछ ही दिनों में वह छोटा-सा आँगन पूरे गाँव का सबसे जीवंत कोना बन गया, जहाँ हर शाम हँसी, गीत और अपनापन गूँजने लगा। लेकिन उधर विदेश में बैठे अमन को अभी तक यह पता नहीं था कि उसके पिता के जीवन में एक छोटा-सा रेडियो फिर से खुशियाँ लौटा चुका है... और जल्द ही एक ऐसी घटना होने वाली थी जो पिता और बेटे के रिश्ते को हमेशा के लिए बदल देगी। आर्यन की वजह से हरिदास बाबा की ज़िंदगी में फिर से रौनक लौट आई थी। अब हर शाम उनके आँगन में बच्चों की चहल-पहल रहती। कोई कहानी सुनने आता, कोई पहेलियाँ पूछता, तो कोई रेडियो पर बजते पुराने गीतों के बारे में जानना चाहता। हरिदास बाबा भी पूरे मन से बच्चों को जीवन के अनुभव सुनाते। वे कहते, "बेटा, इंसान के पास धन हो या न हो, लेकिन अच्छे रिश्ते ज़रूर होने चाहिए। बुढ़ापे में दौलत नहीं, अपने लोगों का साथ सबसे बड़ी पूँजी होता है।" एक दिन आर्यन ने देखा कि हरिदास बाबा पुराने लकड़ी के संदूक से कुछ तस्वीरें निकालकर देख रहे हैं। उसने उत्सुकता से पूछा, "बाबा, ये किसकी तस्वीरें हैं?" हरिदास ने मुस्कुराते हुए एक तस्वीर उसके हाथ में दी। उसमें एक सुंदर-सी महिला रेडियो के पास बैठी मुस्कुरा रही थी। "ये तुम्हारी दादी नहीं... मेरी सावित्री है," उन्होंने प्यार से कहा। फिर दूसरी तस्वीर दिखाई, जिसमें एक छोटा-सा लड़का उनकी गोद में बैठा था। "ये मेरा बेटा अमन है। जब छोटा था तो हर शाम इसी रेडियो पर बच्चों के कार्यक्रम सुनता था।" इतना कहते-कहते उनकी आँखें भर आईं। आर्यन ने धीरे से पूछा, "बाबा, वो आपसे मिलने क्यों नहीं आते?" हरिदास ने गहरी साँस ली और बोले, "ज़िंदगी की भागदौड़ में कभी-कभी अपने लोग भी दूर हो जाते हैं। मैं उससे नाराज़ नहीं हूँ। बस उसकी खुशी चाहता हूँ।" आर्यन चुप हो गया, लेकिन उसने मन ही मन तय कर लिया कि वह अमन तक यह बात ज़रूर पहुँचाएगा। उस शाम उसने अपने स्कूल के कंप्यूटर शिक्षक की मदद से सोशल मीडिया पर एक छोटा-सा वीडियो बनाया। वीडियो में हरिदास बाबा पुराने रेडियो के साथ बैठे थे और पृष्ठभूमि में वही गीत बज रहा था जिसे सावित्री सबसे ज़्यादा पसंद करती थीं। वीडियो के अंत में केवल एक पंक्ति लिखी थी— "अगर आपके माता-पिता आपका इंतज़ार कर रहे हैं, तो उन्हें समय दीजिए... क्योंकि यादें कभी बूढ़ी नहीं होतीं।" कुछ ही दिनों में वह वीडियो लाखों लोगों तक पहुँच गया। लोगों ने उसे खूब साझा किया। कई समाचार चैनलों ने भी उस कहानी को दिखाया। एक दिन विदेश में बैठे अमन के एक मित्र ने वह वीडियो उसे भेजा। वीडियो देखते ही अमन की आँखें नम हो गईं। उसे याद आया कि बचपन में वह हर रविवार पिता के साथ इसी रेडियो पर गीत सुना करता था। काम और पैसों की दौड़ में उसने वर्षों से पिता का अकेलापन महसूस ही नहीं किया था। उसने उसी रात भारत की टिकट बुक कर ली। दो दिन बाद दोपहर के समय हरिदास बाबा हमेशा की तरह आँगन में रेडियो सुन रहे थे। तभी घर के बाहर एक कार आकर रुकी। दरवाज़ा खुला। एक व्यक्ति धीरे-धीरे अंदर आया। हरिदास ने नज़र उठाई... सामने उनका बेटा अमन खड़ा था। कुछ पल तक दोनों एक-दूसरे को देखते रहे। फिर अमन दौड़कर पिता के गले लग गया। उसकी आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे। वह बार-बार कह रहा था "बाबा... मुझे माफ़ कर दीजिए... मैं बहुत देर से आया।" हरिदास ने बेटे के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा— "बेटा... अपने घर लौटने वालों के लिए कभी देर नहीं होती।" यह दृश्य देखकर आर्यन, गाँव के बच्चे और पड़ोसी भी भावुक हो उठे। उसी समय रेडियो पर एक पुराना गीत बजने लगा "चलते-चलते मेरे ये गीत याद रखना..." हरिदास मुस्कुराए। उन्होंने आकाश की ओर देखा और मन ही मन कहा "सावित्री... देखो, हमारा घर फिर से हँसने लगा है।" उस दिन के बाद अमन ने फैसला किया कि वह हर कुछ महीनों में भारत आएगा और पिता को कभी अकेला महसूस नहीं होने देगा। उसने गाँव में बुज़ुर्गों के लिए एक छोटा-सा मिलन केंद्र भी बनवाया, जहाँ हर शाम लोग बैठते, बातें करते और वही पुराना रेडियो सबको गीत सुनाता। अब वह रेडियो केवल हरिदास बाबा की याद नहीं था... वह पूरे गाँव की मुस्कान बन चुका था।

World War II Historical Fiction Hindi Romance

    No chapters available.